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<title>Tej Rafter News &#45; : Bloge</title>
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<title>Somnath Temple: पीएम मोदी ने सोमनाथ मंदिर को बताया भारत की आस्था और आत्मा का प्रतीक, पढ़ें पूरा ब्लॉग</title>
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<description><![CDATA[ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर के बारे में लिखा है. उन्होंने अपने ब्लॉग पोस्ट में लिखा कि सोमनाथ... ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है. भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है. द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है. ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है...&amp;ldquo;सौराष्ट्रे सोमनाथं च...यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है. ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है.&amp;nbsp;
शास्त्रों में ये भी कहा गया है:
&amp;ldquo;सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते.लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥&amp;rdquo;
अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है. मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है.
दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था.
वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं. जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था. यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था.
सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है. फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है. साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे. मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका. संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है. 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था. तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे.
1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है. जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय कांप उठता है. हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है.
हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा. सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था. ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था. ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी. हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे.
सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है. ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है.
1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया. यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था. लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया. और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया.
महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका. सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ. उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर सांस लेती रही. साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है. वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है.
ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया. उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें.
1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया. 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की.उन्होंने कहा, &amp;ldquo;दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे. ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे.
इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है. ये बार बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए. पहले की तरह सशक्त. पहले की तरह जीवंत. यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है. इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है. इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु. इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा.&amp;rdquo;
ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया. उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया. 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई. उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा. अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए.
उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे. महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था.तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे. वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें. उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी. लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया.
सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है. उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था. सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक &amp;lsquo;सोमनाथ, द श्राइन इटरनल&amp;rsquo;, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए.
जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है. हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः. सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही.
इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है. इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है. दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है. वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है. हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं. योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं. ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं. आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है.अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है. सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहां आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा, &amp;ldquo;भवबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य. अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं. जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं.
आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है. मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है.
1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं. उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है.
अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं. उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है. इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है. सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है. करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है. ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है.
अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं. आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं. एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए. एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है.
जय सोमनाथ ! ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 15:59:46 +0530</pubDate>
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<title>ओपिनियन: भारत कैसे आंकड़ों की कमी की वजह से प्रदूषण रोकने में नाकाम? जानें</title>
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<description><![CDATA[ बॉम्बे हाई कोर्ट पिछले कई सालों से वायु प्रदूषण पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है. हाल ही में हुई सुनवाई हमारे AQI संकट की जड़ में मौजूद असली दिक्कतों को उजागर करती हैं. हमारे पास प्रदूषण के स्रोतों की सार्थक पहचान के लिए जरूरी डेटा नहीं है और जो उपाय वर्तमान में मौजूद हैं, वो प्रभावी तौर पर लागू भी नहीं हो रहे.&amp;nbsp;
हाल ही में संसद में भारत सरकार की ओर से दिया गया यह जवाब काफी ज्यादा चर्चा में रहा कि हाई AQI और फेफड़ों की बीमारियों के बीच प्रत्यक्ष रूप से संबंध को दिखाने वाला कोई डेटा मौजूद नहीं है, लेकिन इस पर करीब किसी ने यह भी सवाल नहीं उठाया कि ऐसा डेटा इकट्ठा करने के लिए कोई ठोस पहल दिखाई ही नहीं देती है. यह विडंबना है कि सरकार के उसी जवाब में &#039;&amp;hellip;वायु प्रदूषण से संबंधित बीमारियों को टारगेट करने वाले मेटेरियल के विकास&amp;hellip;&#039; का उल्लेख भी किया गया है. इससे यह स्पष्ट है कि किसी न किसी स्तर पर संबंध को स्वीकार किया जा रहा है. फिर चाहे वह को-रिलेशनल हो या कैजुअल.&amp;nbsp;
भारत में डेटा की यह कमी वायु प्रदूषण से जुड़े हर पहलू में व्याप्त है. इस हफ्ते हुई सुनवाई में बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कई जगहों पर लगाए गए प्रदूषण सेंसर काम नहीं कर रहे हैं. ऐसे में यह भी बेहद चिंताजनक है कि बॉम्बे हाई कोर्ट को खुद एक ओर कंस्ट्रक्शन साइटों पर प्रदूषण नियंत्रण के दिशा-निर्देशों के जमीनी स्तर पर लागू न होने के आम अनुभव और दूसरी ओर BMC की ओर से उन्हें लागू करने के कागजी दावे के डेल्टा को रेखांकित करना पड़ा.
दरअसल, बीएमसी का कागजी रिकॉर्ड यानी डेटा यह दिखाता है कि उसने बिल्कुल सही कार्रवाई की है, लेकिन शहरी जिंदगी कुछ और ही कहानी कहती हैं और एक प्रदूषण सेंसर नेटवर्क, जो हमारे मेगासिटी के घनत्व और स्थानीय विविधताओं को नहीं दिखाता है, हमें और कोर्ट को अंधेरे में काम करने पर मजबूर करता है.&amp;nbsp;
मुश्किल बड़ी, पर ध्यान में कमी
हालांकि, यह भी हैरानी की बात है कि महामारी (कोविड-19) के बाद सबसे बड़ा हेल्थ क्राइसिस होने के बावजूद वायु प्रदूषण पर इतना कम ध्यान दिया जा रहा है. जैसा कि मैं हमेशा कहता हूं कि हम सभी एक सांस से जुड़े हैं, हम एक ही हवा में सांस लेते हैं और आज हर सांस में ऐसे प्रदूषक शामिल हैं, जो स्वास्थ्य के लिए स्पष्ट रूप से हानिकारक हैं. कई दफा मीडिया में ऐसी रिपोर्ट्स सामने आती हैं कि मुंबई या दिल्ली में एक दिन सांस लेना कितनी सिगरेट पीने के बराबर है, लेकिन फिर भी हम सब हर रोज बिना कुछ बदले अपनी दिनचर्चा में लगे रहते हैं.&amp;nbsp;
यहां तक कि हम उन सभी वर्तमान और भविष्य के आर्थिक खर्चों को नजरअंदाज कर रहे हैं, जो हम अभी झेल रहे हैं. आसान शब्दों में कहें तो आज के समय में स्वास्थ्य देखभाल करना बेहद महंगा है और जितना हम सभी सीमित मात्रा में जानते हैं कि AQI संकट का स्वास्थ्य पर असर काफी डरावना हैं. आज हमें इस स्थिति तक पहुंचाने वाले कई कारण हैं, जिनमें फ्रैगमेटेंड रेगुलेशन, नॉन-एग्जीसटेंट रियल-वर्ल्ड एप्लिकेशन और उसके नतीजों के साथ ऐश्पिरेशनल नीतियां और स्वच्छ हवा के लक्ष्यों और बढ़ती अर्थव्यवस्था की मांगों के बीच संतुलन की मांग. इस समस्या को तब तक दूर नहीं किया जा सकता, जब तक डेटा का अभाव और प्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहनों और सजा का अभाव बना रहेगा.&amp;nbsp;
डेटा क्यों जरूरी है?
डेटा बेहद जरूरी है. हमें अपने स्थानीय इलाकों की हवा की गुणवत्ता और प्रदूषण के स्रोतों को समझना होगा. जैसे कि मुंबई में वायु गुणवत्ता सेंसर नेटवर्क कई सालों में बेहतर हुआ है, लेकिन इसकी हर वार्ड में कवरेज अधूरी है, जबकि सेंसर की कवरेज हर वॉर्ड में, हर इलाके में होनी चाहिए. हमें सही तरीक से कैलिब्रेट किए गए, कम लागत वाले और स्थानीय स्तर पर घने सेंसर नेटवर्क की ओर बढ़ना होगा, जो मौजूदा सूचना प्रणालियों से भी जुड़े हों. हमें प्रदूषण की निगरानी और उसके स्रोत के निर्धारण के लिए एक पूरी तरह से कार्यशील डेटा स्पाइन की सख्त जरूरत है.
स्रोत का निर्धारण एक और डेटा की खामी को करता है उजागर
भले ही हम खुद को मैक्सिमम सिटी और उर्ब्स प्राइमा मान लें, लेकिन हम MMR के एक एयरशेड का हिस्सा हैं और हमें हर रोज के जमीनी और समुद्री हवाओं को देखते हुए प्रदूषण को समझना जरूरी है. क्या बड़े MMR से उत्पन्न प्रदूषण सच में शहर को प्रभावित करता है? अनुभव और सामान्य तर्क इसे लेकर हामी भरते हैं, लेकिन सच यह है कि हम यह जानते हैं कि हम नहीं जानते हैं.
अगर हमें अपनी सांस लेने वाली हवा और उसके प्रभावों को समझने के में कोई प्रगति करनी है, तो इन मुद्दों का समाधान होना बहुत जरूरी है. डेटा को पारदर्शी तरीके से शेयर करना, जागरूकता बढ़ाने और हमारे AQI संकट के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को कम करने में भी मदद करेगा. यह उल्लेख करना जरूरी है कि 2023 में MPCB, CSIR-NEERI और IIT बॉम्बे की ओर से किए गए एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग, एमिशन इन्वेंटरी और सोर्स अपॉर्शनमेंट स्टडी में इन बातों को रेखांकित किया गया था, लेकिन इन सिफारिशों के क्रियान्वयन में बहुत कम प्रगति हुई है.&amp;nbsp;
वहीं, दूसरी तरफ हमें प्रवर्तन को प्रोत्साहित करना होगा. टैक्सेशन और बजट्री अलोकेशन्स के माध्यम से लागू किए गए वित्तीय प्रोत्साहन और दंड हमारे रेगुलेटरी मेकेनिज्म की दिखाई देने वाली उदासीनता को बदल सकते हैं. भारत के पास हाल के सालों में ऐसे कई मेकेनिज्म के सफल उदाहरण मौजूद हैं, हमें उसी अनुभव के आधार पर अपने सांस के संकट से निपटना चाहिए.&amp;nbsp;
निस्संदेह, इसके लिए एक मजबूत नीति की पहल और एक अधिक सशक्त विधायी इच्छाशक्ति की जरूरत होगी, लेकिन हमें इस दिशा में चलना शुरू तो करना ही होगा. नहीं तो, जिस हवा को हम अपनी सांस में लेते हैं, उसे देखते रहेंगे और मुश्किल यह होगी कि हमें यह भी नहीं पता होगा कि हम वास्तव में क्या देख रहे हैं.
(लेखक जस्टिन एन भरूचा, भारुचा एंड पार्टनर्स में मैनेजिंग पार्टनर हैं)
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह जरूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.] ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 15:59:43 +0530</pubDate>
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<title>मेरठ की दलित बेटी के मामले पर सियासत, योगी सरकार का सख्त एक्शन तय, पुराने मामले गवाह</title>
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<description><![CDATA[ 
मेरठ के सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव में दलित महिला की हत्या कर बेटी का अपहरण कर लिया गया, जिससे पूरे इलाके में तनाव फैल गया. इस संवेदनशील मामले पर सियासत तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी ने मामले में एनएसए और बुलडोजर एक्शन की मांग की है. समाजवादी पार्टी के अलावा आम आदमी पार्टी ने भी पूछा है कि &#039;बुलडोजर कब चलेगा&#039;?
विपक्ष के इन सवालों के बीच योगी सरकार का इतिहास साफ बताता है कि अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई जाती है. पुराने मामलों से सिद्ध होता है कि योगी राज में दलित सुरक्षा को प्राथमिकता मिली, जबकि सपा काल में न्याय अधर में लटकता था.
योगी सरकार के पुराने एक्शन: बुलडोजर का कमाल
योगी सरकार महिला सुरक्षा के मामले में तेज एक्शन लेती रही है. अयोध्या के एक मामले को देखें. 2024 में एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म के मामले में मुख्य आरोपी मोइद खान पर कठोर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने उसे तुरंत गिरफ्तार किया था. सरकार ने आरोपी की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चलवाया और पीड़िता के परिवार को न्याय का पूरा भरोसा दिया. इसी तरह रेप का मामला हो या फिर किसी भी अन्य महिला हिंसा का, योगी सरकार सख्त एक्शन से बिल्कुल नहीं कतराती.
योगी सरकार ने लव जिहाद और दलित अत्याचार जैसे मामलों में बुलडोजर चलाकर अपराधियों को सबक सिखाया है. उदाहरणस्वरूप, बरेली में सपा नेता आजम खान से जुड़े अवैध निर्माणों पर 2025 में बुलडोजर चला, जो सपा काल के 14 साल पुराने रसूख को चूर कर गया. इसी तरह, माफिया राज के खिलाफ सैकड़ों बुलडोजर कार्रवाइयों को पूरे यूपी ने देखा है.
मेरठ मामले में जारी है सख्त एक्शन
मेरठ मामले में भी एसएसपी विपिन ताडा ने 10 टीमें लगाई हैं, गिरफ्तारी तय है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामले में एससी-एसटी एक्ट सहित तमाम गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है. दो कंपनी पीएसी, 250 से ज्यादा पुलिसकर्मी 15 इंस्पेक्टर और CO लेवल के अफसर गांव में तैनात किए गए हैं.
सपा राज के काले अध्याय: दलित न्याय पर सवाल
मेरठ केस में योगी सरकार पर आरोप लगा रही समाजवादी पार्टी की सरकार में दलित हिंसा के गंभीर मामले हुए थे. बदायूं कांड से लेकर मोहनलालगंज रेप और बुलंदशहर गैंगरेप केस तक महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कई बड़े मामले हुए.
न्याय योगी मॉडल की गारंटी
मेरठ घटना में पुलिस छापेमारी जारी है, बेटी की बरामदगी और सजा सुनिश्चित. सपा की मांग नौटंकी है, जनता पुराने मामलों से सीख चुकी. अपराध मुक्त यूपी का सफर जारी रहेगा. बता दें कि हाल ही में कोडीन सिरप से जुड़े मामले में भी आरोप लगा रही सपा को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा कि जब बुलडोजर चलेगा तब रोना मत.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस लड़ाई (कोडीन केस के खिलाफ) को लड़ा है और जीता है. कोई भी अपराधी छूटने नहीं पाएगा. समय आने पर बुलडोजर एक्शन भी होगा. बस सपाइयों से अनुरोध है कि उस वक्त चिल्लाना मत.
(लेखक भावेष पाण्डेय (अधिवक्ता) नेशनल एसोसिएशन ऑफ यूथ के अध्यक्ष हैं.)
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह जरूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 15:59:40 +0530</pubDate>
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<title>प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता के लिए योगी सरकार ने कौन&#45;कौन से कदम उठाए?</title>
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<description><![CDATA[ 
उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी के द्वार हैं. योगी आदित्यनाथ सरकार ने भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी और मेरिट आधारित भर्ती प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है.&amp;nbsp; यह बदलाव न केवल युवाओं के सपनों को साकार कर रहा है, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बना रहा है.
कई प्रमुख परीक्षाओं में अनियमितताएं सामने आईं, जैसे 2014 में उत्तर प्रदेश संयुक्त प्री-मेडिकल टेस्ट (UP-CPMT) का पेपर लीक होना, जहां प्रश्नपत्रों की सीलबंद बॉक्सेस से छेड़छाड़ पाई गई, जिसके कारण परीक्षा रद्द करनी पड़ी. इसी तरह 2015 में प्रांतीय सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा (UPPCS) का पेपर व्हाट्सएप पर लीक हो गया, जिसके कारण परीक्षा रद्द करनी पड़ी और छात्रों ने लखनऊ, इलाहाबाद व कानपुर में प्रदर्शन कर आक्रोश जताया. पुलिस कांस्टेबल भर्ती, शिक्षक भर्ती और अन्य चयनों में भी व्यापक धांधली, मेरिट में हेरफेर और पक्षपात के आरोप लगे, जिससे अदालती हस्तक्षेप हुए और भर्तियां वर्षों लटकी रहीं. 
भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर कड़ा प्रहार
योगी सरकार ने सत्ता संभालते ही प्रतियोगी परीक्षाओं में व्याप्त अनियमितताओं पर कड़ा प्रहार किया. पहले की सरकारों में पेपर लीक, नकल और सॉल्वर गैंग जैसी समस्याएं आम थीं, जो युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करती थीं. लेकिन 2017 के बाद सरकार ने जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई. पेपर लीक करने वालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाने के निर्देश दिए गए. एजेंसियों को ब्लैकलिस्ट करने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की व्यवस्था की गई.
तकनीकी सुधार और कानूनी मजबूती
सरकार ने तकनीकी सुधारों पर भी जोर दिया. डिजिटल मॉनिटरिंग, सीसीटीवी निगरानी और ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया को मजबूत बनाया गया. 2024 में उत्तर प्रदेश पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अध्यादेश लाया गया, जिसमें पेपर लीक करने वालों को आजीवन कारावास और एक करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है. इससे न केवल अपराधियों में डर पैदा हुआ, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया की पवित्रता बनी रही. पिछले आठ वर्षों में 8.50 लाख से अधिक सरकारी नौकरियां पारदर्शी तरीके से दी गईं, जिसमें पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विभाग शामिल हैं. यह आंकड़ा खुद बताता है कि सरकार युवाओं के हित में कितनी प्रतिबद्ध है.
पुलिस भर्ती में अभ्यर्थियों को बड़ी राहत, तीन वर्ष की आयु सीमा छूट
हाल ही में योगी सरकार ने पुलिस भर्ती में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. 32,679 पदों की भर्ती के लिए सभी श्रेणियों के अभ्यर्थियों को एक बारगी तीन वर्ष की आयु सीमा में छूट दी गई है. इससे उन लाखों युवाओं को लाभ मिलेगा, जो पिछले वर्षों में देरी के कारण आयु सीमा पार कर चुके थे. यह निर्णय न केवल अभ्यर्थियों की लंबे समय से चली आ रही मांग को पूरा करता है, बल्कि सरकार की संवेदनशीलता को भी दर्शाता है. मुख्यमंत्री के निर्देश पर जारी इस आदेश से पुलिस बल में योग्य और उत्साही युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे कानून-व्यवस्था और मजबूत होगी. यह कदम युवाओं के प्रति सरकार के सकारात्मक दृष्टिकोण का जीता-जागता प्रमाण है.
युवा हित में अतिरिक्त पहलें
योगी सरकार की इन पहलों से स्पष्ट है कि प्रतियोगी परीक्षाएं अब केवल योग्यता की परीक्षा हैं. पहले जहां भर्तियां वर्षों लटकी रहती थीं, वहीं अब समयबद्ध और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जा रही है. योगी सरकार ने न केवल पेपर लीक पर अंकुश लगाया, बल्कि अभ्यर्थियों की सुविधा के लिए कई योजनाएं शुरू कीं, जैसे मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना, जिसमें मुफ्त कोचिंग और मार्गदर्शन दिया जाता है.
योगी सरकार ने प्रतियोगी परीक्षाओं को एक नया आयाम दिया है. पारदर्शिता, मेरिट और युवा हित को सर्वोपरि रखते हुए उठाए गए कदम उत्तर प्रदेश को अन्य राज्यों के लिए मॉडल बना रहे हैं. इन प्रयासों से युवा वर्ग में विश्वास जागा है कि मेहनत का फल जरूर मिलेगा. सरकार की यह प्रतिबद्धता राज्य के विकास और युवा सशक्तिकरण की मजबूत नींव है. आने वाले समय में और अधिक सुधारों की उम्मीद है, जो उत्तर प्रदेश को समृद्ध और न्यायपूर्ण बनाएंगे.
(लेखक: डॉ. विनम्र सेन सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, राजनीतिक विश्लेषक और चिंतक के रूप में ख्यातिलब्ध हैं.)
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 15:59:40 +0530</pubDate>
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<title>वो एक गलती जिसने अमेरिका और इजराइल से  न सिर्फ &amp;apos;जीत&amp;apos; छीन ली, बल्कि दानव बना दिया</title>
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<description><![CDATA[ 28 फरवरी 2026. जब अमेरिका और इजरायल ने &#039;ऑपरेशन एपिक फ्यूरी&#039; के तहत ईरान पर अपने सबसे बड़े और घातक संयुक्त हमले की शुरुआत की, तो उनका लक्ष्य स्पष्ट था&amp;mdash;ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई का खात्मा. खामनेई इस हमले में मारे गए. रणनीतिक और सैन्य दृष्टिकोण से, वाशिंगटन और तेल अवीव में इसे एक &#039;ऐतिहासिक जीत&#039; माना जा रहा था. डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे दुनिया के सामने एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया.
लेकिन यह &#039;जीत&#039; चंद घंटों में ही एक ऐसे रणनीतिक और कूटनीतिक दुःस्वप्न में बदल गई, जिसने न केवल अमेरिका और इजरायल को पूरी दुनिया में अलग-थलग कर दिया, बल्कि उन्हें एक &#039;दानवी&#039; स्वरूप में भी स्थापित कर दिया. वह गलती खामनेई की हत्या नहीं थी, बल्कि दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर में &#039;शजरेह तैयबेह&#039; (Shajareh Tayyebeh) प्राथमिक विद्यालय की उन 165 मासूम बच्चियों की सामूहिक हत्या थी, जिनका इस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था.
मिनाब का वह खौफनाक मंजर: जब स्कूल बना कब्रिस्तान
28 फरवरी की सुबह, जब 7 से 12 साल की बच्चियां अपनी कक्षाओं में पढ़ रही थीं, तभी आसमान से मौत बरसी. अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियों और जांचकर्ताओं (जैसे सीएनएन और अल जज़ीरा) के अनुसार, यह कोई सामान्य चूक या &#039;कोलैटरल डैमेज&#039; नहीं था. रिपोर्टों के मुताबिक, इस स्कूल पर एक के बाद एक कई मिसाइलें दागी गईं (जिसे सैन्य भाषा में &#039;डबल टैप&#039; या &#039;ट्रिपल टैप&#039; कहा जाता है). इस हमले में स्कूल की छत ढह गई और 165 से अधिक मासूम बच्चियां, उनके शिक्षक और कुछ माता-पिता मलबे में दफन हो गए.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे &quot;ईरान की अपनी खराब मिसाइलों का नतीजा&quot; बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की. लेकिन स्वतंत्र जांचों और मलबे से मिले अमेरिकी &#039;टोमाहॉक&#039; (Tomahawk) क्रूज़ मिसाइल के टुकड़ों ने सच्चाई को दुनिया के सामने ला दिया. सबसे डराने वाला तथ्य यह सामने आया कि इस हमले के लक्ष्यों को चुनने में कथित तौर पर &#039;आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस&#039; (AI) का इस्तेमाल किया गया था, जिसने एक नागरिक स्कूल को सैन्य बेस समझकर पल भर में तबाह कर दिया.
दुनिया के सामने बेनकाब हुआ &#039;दानवी&#039; रूप और सहयोगियों का पीछे हटना
खामनेई की हत्या को एक सैन्य या राजनीतिक कार्रवाई मानकर शायद दुनिया का एक बड़ा धड़ा चुप रह जाता, लेकिन मिनाब की घटना ने अमेरिका और इजरायल के उस नैतिक आधार को पूरी तरह नष्ट कर दिया, जिसका वे अक्सर दावा करते हैं. इस एक घटना ने वैश्विक कूटनीति के समीकरणों को रातों-रात पलट दिया:
&amp;bull; वैश्विक संस्थाओं का तीव्र आक्रोश: संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इसे &quot;बच्चों और शिक्षा पर एक गंभीर व अक्षम्य हमला&quot; करार दिया. यूनेस्को (UNESCO) ने इसे &quot;अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का घोर उल्लंघन&quot; बताया. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ने भी इस हमले की निंदा करते हुए इसे एक ऐसा अपराध कहा जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता.
&amp;bull; शुभचिंतकों और सहयोगियों का किनारा करना: जो यूरोपीय देश (फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन) और खाड़ी राष्ट्र (सऊदी अरब, यूएई) शुरुआत में इस हमले पर मौन थे या परोक्ष समर्थन दे रहे थे, वे इस नरसंहार की तस्वीरें सामने आते ही पीछे हट गए. खून से सने स्कूल बैग्स और मलबे में दबी बच्चियों की तस्वीरों ने पश्चिमी देशों में भी घरेलू राजनीति में भूचाल ला दिया. कोई भी वैश्विक नेता अब &#039;बाल हत्यारों&#039; के साथ खड़ा नहीं दिखना चाहता था.
सैन्य विजय बनाम कूटनीतिक आत्महत्या: क्यों दूर रही जीत?
&quot;किसी स्कूल पर हमला और कक्षा में बच्चियों की हत्या इस बात का सबसे ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे युद्ध एक झटके में उनका भविष्य चुरा लेता है.&quot; &amp;mdash; संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञ
ट्रंप और नेतन्याहू ने सोचा था कि खामनेई के खात्मे से ईरान का हौसला टूट जाएगा और मध्य पूर्व में उनका निर्विवाद वर्चस्व स्थापित हो जाएगा. लेकिन मिनाब की घटना ने इस पूरे विमर्श को पलट दिया. इस सामूहिक हत्या ने ईरान के भीतर और बाहर, अमेरिका-इजरायल विरोधी भावनाओं को उस चरम पर पहुंचा दिया, जहां किसी भी तरह की शांति वार्ता या समझौते की गुंजाइश खत्म हो गई.
ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामनेई को अब अपने देशवासियों का वह पूर्ण और उग्र समर्थन प्राप्त है, जो शायद शांति काल में संभव नहीं था. ईरान के जो नागरिक अपनी ही सरकार का विरोध कर रहे थे, वे भी विदेशी ताकतों द्वारा अपनी बच्चियों की इस बेरहम हत्या के बाद राष्ट्रवाद की लहर में एकजुट हो गए हैं.
महाशक्तियों के अहंकार की हार
इतिहासकार जब 2026 के इस ईरान युद्ध का मूल्यांकन करेंगे, तो वे खामनेई की मौत को केवल एक घटना के रूप में देखेंगे. मुख्य अध्याय मिनाब की उन मासूम बच्चियों का होगा, जिनकी सामूहिक हत्या ने आधुनिक युद्ध प्रणाली की क्रूरता को दुनिया के सामने नंगा कर दिया. यह एक ऐसी गलती थी जिसने साबित कर दिया कि जब युद्ध की मशीनरी अंधी हो जाती है, तो वह सबसे पहले अपनी ही &#039;जीत&#039; को निगल जाती है.
आज अमेरिका और इजरायल के पास भले ही असीमित सैन्य ताकत हो, लेकिन वैश्विक मंच पर वे इतने अकेले, अलग-थलग और कलंकित पहले कभी नहीं थे. मिनाब के स्कूल के मलबे से उठती चीखें और अंतरराष्ट्रीय कानून की उड़ती धज्जियां, ट्रंप और नेतन्याहू की इस तथाकथित ऐतिहासिक जीत की सबसे बड़ी और शर्मनाक हार का स्थायी प्रतीक बन गई हैं.
[लेखक प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और सम-सामयिक लेखन के साथ ही टेलीविजन डिबेट्स में अपनी राय जोरदार तरीके से रखते आ रहे हैं] ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 15:59:39 +0530</pubDate>
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<title>Ishu Kalra, Team Is Working Tirelessly To Spread Smiles Around The World</title>
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<description><![CDATA[ Ishu Kalra is a common man from somewhere in India, yet he&#039;s a hero to many souls. Ishu runs an NGO named Humanity.  ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:06:59 +0530</pubDate>
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<title>Zeel Joshi, Gujarat&#45;Based&#45;Performer Of Culture And Modernity</title>
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<description><![CDATA[ Zeel always ups her social media game because she is aware of how the world works and how this generation is captivated by it.  ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:06:59 +0530</pubDate>
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<title>If Tobacco Can’t Be Removed From The Population, Could Combustion Be, Experts Deliberate</title>
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<description><![CDATA[ Considering efforts by the government over two decades have not shown a significant impact, Tobacco has become an irremovable part of our society. What could the government do to save the legal age of smokers?  ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:06:58 +0530</pubDate>
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<title>Success Story: How Ashish Jain Made A Mark In Real Estate Sector Despite Starting From Scratch</title>
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<description><![CDATA[ In 2020, Ashish Jain&#039;s company, Kundan Spaces, secured the coveted Best Architectural Award for their outstanding project, Emirus.  ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:06:57 +0530</pubDate>
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<title>How Will Wall Realty Is Elevating Commercial Real Estate For Over Three Decades</title>
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<description><![CDATA[ Currently headquartered in Goregaon East, Mumbai, Will Wall Realty is rapidly expanding its footprint. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:06:56 +0530</pubDate>
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<title>How Customization In Elevators Can Make The Look Aesthetically Pleasing</title>
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<description><![CDATA[ Elevator rides are often perceived as mundane and uneventful. However, customization has the power to transform these moments into memorable experiences. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:06:55 +0530</pubDate>
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<title>How Premature AI Adoption Can Lead To Customer Frustration, Explains Ravi Kumar Of Cubastion Consulting</title>
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<description><![CDATA[ Before embracing AI, it&#039;s essential for companies to have a solid foundation in their traditional technology infrastructure.  ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:06:54 +0530</pubDate>
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<title>Exclusive Interview: Astrologer Pankaj Khanna Explores the Impact of Astrology, Gemstones, and Vastu on Well&#45;being</title>
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<description><![CDATA[ Mr. Khanna emphasized the integral role of astrology in guiding individuals toward a more balanced and prosperous life. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:06:53 +0530</pubDate>
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<title>उच्चस्तरीय शिक्षा, नवाचार और स्किल डेवलपमेंट योजनाओं से बेटियां बन रहीं आत्मनिर्भर</title>
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<description><![CDATA[ उत्तर प्रदेश में बेटियों को सुरक्षित माहौल देने के बाद योगी सरकार का लक्ष्य उन्हें आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है, ताकि उनके सपनों को पंख मिल सकें. इसके लिए सरकार शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में लगातार नए अवसर सृजित कर रही है. उच्चस्तरीय शिक्षा, नवाचार और उद्योगों की जरूरत के अनुरूप प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से प्रदेश की बेटियों को अपने सपनों को साकार करने का अवसर मिल रहा है. प्रदेश सरकार का लक्ष्य है कि बेटियां केवल पढ़ाई तक सीमित न रहें, बल्कि आधुनिक तकनीकी और व्यावसायिक कौशल के साथ रोजगार और उद्यमिता के क्षेत्र में भी आगे बढ़ें.
इसी दिशा में राज्य सरकार द्वारा संचालित उत्तर प्रदेश स्किल डेवलपमेंट मिशन के माध्यम से बड़ी संख्या में युवतियों को रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जा रहा है. मिशन के तहत आईटी, हेल्थकेयर, फैशन डिजाइनिंग, ब्यूटी एंड वेलनेस, इलेक्ट्रॉनिक्स और रिटेल जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार से जोड़ा जा रहा है. सरकार ने कौशल प्रशिक्षण को उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप बनाने पर विशेष जोर दिया है.
प्रशिक्षण केंद्रों में युवतियों को आधुनिक तकनीक, डिजिटल स्किल और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे प्रशिक्षण के बाद उनके लिए रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं. इसके साथ ही बेटियों को स्वरोजगार और स्टार्टअप के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है. तकनीकी प्रशिक्षण के साथ अब युवतियों को सॉफ्ट स्किल्स, डिजिटल लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक क्षमताओं में भी प्रशिक्षित किया जा रहा है, ताकि वे बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें.
इसी दिशा में कौशल विकास मिशन ने छह प्रतिष्ठित संस्थाओं के साथ समझौता कर प्रशिक्षण कार्यक्रमों को और आधुनिक बनाया है. इन संस्थाओं के सहयोग से युवतियों को मंच कौशल, संवाद क्षमता, व्यक्तित्व विकास और डिजिटल दक्षता का प्रशिक्षण दिया जाएगा. परफॉर्मिंग आर्ट्स और सॉफ्ट स्किल्स के प्रशिक्षण से युवतियों में संवाद कौशल, आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का विकास होगा. भारतेंदु नाट्य अकादमी के सहयोग से प्रशिक्षणार्थियों को मंच कौशल और रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रशिक्षण मिलेगा, जिससे कला आधारित रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे.
सरकार कौशल प्रशिक्षण को उद्योगों की मांग के अनुरूप बनाने पर जोर दे रही है. इसी उद्देश्य से इन्वेस्ट यूपी और कौशल विकास मिशन के बीच &amp;lsquo;कौशल कनेक्ट सेल&amp;rsquo; का गठन किया गया है, जिससे निवेश करने वाले उद्योगों को प्रशिक्षित वर्कफोर्स उपलब्ध कराई जा सकेगी. इससे युवतियों के लिए भी रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर बढ़ेंगे. कौशल प्रशिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रशिक्षण संस्थानों की परफॉर्मेंस-बेस्ड ग्रेडिंग प्रणाली लागू की गई है. इस व्यवस्था के तहत बेहतर प्रदर्शन करने वाले संस्थानों को अधिक अवसर दिए जाएंगे, जिससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार होगा और युवाओं के साथ ही युवतियों को बेहतर रोजगार के अवसर मिलेंगे.
युवाओं को योजनाओं और रोजगार अवसरों से जोड़ने के लिए मिशन मुख्यालय में &amp;lsquo;कौशल कॉल सेंटर&amp;rsquo; भी शुरू किया गया है. इसके माध्यम से प्रशिक्षण, प्लेसमेंट और रोजगार से जुड़ी जानकारी सीधे युवाओं तक पहुंचाई जाएगी, ताकि कोई भी बेटी केवल जानकारी के अभाव में किसी अवसर से वंचित न रह जाए. तकनीकी और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी बेटियों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है.
प्रदेश के विभिन्न तकनीकी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में छात्राएं इंजीनियरिंग, सूचना प्रौद्योगिकी और अन्य तकनीकी विषयों में शिक्षा प्राप्त कर रही हैं. वर्तमान में प्रदेश में लगभग 35 सेक्टर्स और 1300 से अधिक जॉब रोल्स में कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा है. वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में भी कौशल विकास और व्यावसायिक शिक्षा को सशक्त बनाने के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं.
योगी सरकार की इन पहलों से उत्तर प्रदेश की बेटियां शिक्षा, कौशल और रोजगार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही हैं और आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.
(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज के संस्कृत विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. सामाजिक बदलावों में गहरी अभिरुचि रखती हैं और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर लेखन करती हैं.) ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 08:58:04 +0530</pubDate>
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<title>महाराष्ट्र की राजनीति के धुरंधर बनकर उभरे फडणवीस</title>
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<description><![CDATA[ महाराष्ट्र की महानगरपालिकाओं में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की अभूतपूर्व जीत ने एक बार फिर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की विकास की राजनीति और उनके राजनीतिक चातुर्य का डंका बजा दिया है. वह एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति के धुरंधर बनकर उभरे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा को मिली जीत केवल सत्ता परिवर्तन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह राज्य की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में आए एक गहरे बदलाव का संकेत भी है.&amp;nbsp;
बीजेपी केवल सहयोगी दल नहीं, राजनीति की धुरी&amp;nbsp;
2026 के नगर निकाय चुनावों के परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा अब महाराष्ट्र में केवल एक सहयोगी दल नहीं, बल्कि राजनीति की धुरी बन चुकी है. दशकों से महाराष्ट्र की राजनीति, विशेष रूप से मुंबई और ठाणे जैसे शहरी केंद्रों में &amp;nbsp;&#039;भूमिपुत्र&#039; और &#039;मराठी अस्मिता&#039; जैसे भावनात्मक मुद्दों पर केंद्रित रही है.&amp;nbsp;
सीएम फडणवीस की बातों पर ज्यादा भरोसा
भाजपा ने इस पारंपरिक विमर्श को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के &#039;सर्वसमावेशी विकास&#039; और &#039;हिंदुत्व&#039; के मिश्रण से ध्वस्त कर दिया है. मुख्यमंत्री फडणवीस महानगरपालिका चुनावों के दौरान अपने भाषणों का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अपने कार्यकाल में हुए विकास कार्यों को गिनाने एवं भविष्य में होनेवाले कार्यों की जानकारी देने में खर्च करते थे. बीएमसी जैसे प्रमुख शहरी निकायों में भाजपा की जीत यह दर्शाती है कि शहरी और मध्यमवर्गीय मतदाताओं ने भावनात्मक या क्षेत्रीय मुद्दों के बजाय मुख्यमंत्री द्वारा कही गई बातों पर ज्यादा भरोसा किया है.&amp;nbsp;
भाजपा का एक प्रमुख चुनावी नारा &#039;ट्रिपल इंजन सरकार&#039;
अब मतदाता बेहतर बुनियादी ढांचे, कुशल सार्वजनिक सेवाओं, पारदर्शी प्रशासन और वैश्विक मानकों वाली नागरिक सुविधाओं पर ज्यादा ध्यान देते दिखाई दे रहे हैं. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा का एक प्रमुख चुनावी नारा &#039;ट्रिपल इंजन सरकार&#039; (केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय में एक ही दल/गठबंधन) रहा है. इस अवधारणा के पीछे तर्क यह है कि तीनों स्तरों पर सत्ता में एक ही दल होने से विकास परियोजनाओं के निष्पादन में समन्वय बढ़ेगा और प्रशासनिक दक्षता में सुधार होगा.
राज्य की अधिकांश महानगरपालिकाओं पर भाजपा या भाजपानीत महायुति के नियंत्रण का सीधा अर्थ होगा, &amp;nbsp;राज्य के कुल बजटीय संसाधनों के एक महत्वपूर्ण हिस्से पर नियंत्रण. महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं का संयुक्त बजट कई छोटे भारतीय राज्यों को मिलाकर उनके कुल बजट से अधिक होता है.&amp;nbsp;
वोट बैंक और अधिक मजबूत होगा
भाजपा अब इन विशाल संसाधनों का उपयोग अपनी प्रमुख जनकल्याणकारी योजनाओं और विकास एजेंडे को सीधे जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए कर सकती है. इस सीधे हस्तक्षेप से न केवल परियोजनाओं का त्वरित क्रियान्वयन संभव होगा, बल्कि भाजपा का स्थानीय स्तर पर सीधा संपर्क बढ़ेगा और उसका वोट बैंक और अधिक मजबूत होगा.
सीएम फडणवीस का &#039;माइक्रो मैनेजमेंट&#039;&amp;nbsp;
हालिया चुनावी सफलताओं का श्रेय महाराष्ट्र में भाजपा के वरिष्ठ नेता देवेंद्र फडणवीस की रणनीतिक कुशलता और सूक्ष्म-प्रबंधन (माइक्रो मैनेजमेंट) को जाता है. उन्होंने न केवल अपनी पार्टी के लिए जीत सुनिश्चित की, बल्कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और अजीत पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के साथ &amp;nbsp;गठबंधन को भी सफलतापूर्वक संभाला.&amp;nbsp;
देवेंद्र फडणवीस की साख बढ़ी
इन सफलताओं ने भाजपा के भीतर देवेंद्र फडणवीस की स्थिति को निर्विवाद रूप से मजबूत किया है. उनकी रणनीतिक क्षमता और नेतृत्व कौशल ने केंद्रीय नेतृत्व के सामने उनकी साख को और बढ़ाया है. यह परिणाम इस बात का भी संकेत है कि भविष्य में, भाजपा राज्य में किसी भी गठबंधन का नेतृत्व एक प्रमुख या &#039;बड़े भाई&#039; की भूमिका में ही करेगी.&amp;nbsp;
महाराष्ट्र की आधी आबादी तक भाजपा की सीधी पहुंच
सीएम फडणवीस का नेतृत्व भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण संपत्ति साबित हुआ है, और उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत महाराष्ट्र में पार्टी के भविष्य को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. फडणवीस के नेतृत्व में महानगरपालिकाओं में जीत का मतलब है महाराष्ट्र की लगभग आधी आबादी तक भाजपा की सीधी पहुंच.&amp;nbsp;
बीजेपी ने मजबूत की अपनी पैठ
भाजपा ने शहरी युवाओं, पेशेवर वर्गों और प्रवासियों के बीच अपनी पैठ मजबूत की है. महानगर निगमों के माध्यम से लागू किए जाने वाले प्रमुख विकास कार्य, जैसे कि मेट्रो रेल परियोजनाएं, तटीय सड़कें, स्मार्ट सिटी पहल और अन्य शहरी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं, भाजपा को एक &#039;विकास-समर्थक&#039; और आधुनिक पार्टी के रूप में स्थापित करती हैं. इस शहरी केंद्रित विकास के नैरेटिव का लाभ भाजपा को ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी मिल सकता है, क्योंकि शहरी विकास अक्सर आसपास के क्षेत्रों को भी प्रभावित करता है.
2029 के विधानसभा चुनावों का &#039;प्रवेश द्वार&#039;
भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान पिछली सरकारों और नगर निकायों में व्याप्त कथित &amp;lsquo;कमीशन राज&amp;rsquo; और भ्रष्टाचार को एक प्रमुख मुद्दा बनाया. मुख्यमंत्री फडणवीस ने मतदाताओं को यह आश्वासन दिया कि भाजपा के नेतृत्व में एक पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त शासन प्रदान किया जाएगा. &amp;nbsp;अब ज्यादातर &amp;nbsp;नगर निकायों में सत्ता प्राप्त करने के बाद भाजपा पर यह सिद्ध करने की जिम्मेदारी है कि वह वास्तव में पारदर्शिता और जवाबदेही ला सकती है. यदि भाजपा शहरी शासन में महत्वपूर्ण सुधार लाने और नागरिकों को बेहतर सेवाएं प्रदान करने में सफल रहती है, तो यह उसके लिए 2029 के विधानसभा चुनावों का &#039;प्रवेश द्वार&#039; साबित हो सकता है.
सामाजिक आधार का सफलतापूर्वक विस्तार
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा ने अपने सामाजिक आधार का सफलतापूर्वक विस्तार किया है. पार्टी ने अब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और मराठा समुदायों में भी अपनी पैठ मजबूत की है, जो महाराष्ट्र में महत्वपूर्ण मतदाता समूह हैं. नगर निगम चुनावों में, भाजपा ने विभिन्न जातियों और समुदायों के उम्मीदवारों को टिकट वितरण में प्रतिनिधित्व दिया. इस &#039;सोशल इंजीनियरिंग&#039; रणनीति से स्थानीय स्तर पर नए नेतृत्व का उदय हो रहा है, जो अपने समुदायों में पार्टी के लिए समर्थन जुटा सकते हैं.&amp;nbsp;
पारंपरिक &#039;पावर सेंटर्स&#039; को चुनौती दी
यह विस्तार भाजपा को भविष्य में अन्य दलों के पारंपरिक जातीय वोट बैंकों में सेंध लगाने में मदद करेगा. वास्तव में महाराष्ट्र की महानगरपालिकाओं में भाजपा का वर्तमान प्रभुत्व केवल एक चुनावी जीत से कहीं अधिक है. इसने राज्य की राजनीति में एक मौलिक राजनीतिक पुनर्गठन का रास्ता खोल दिया है. इसने महाराष्ट्र की राजनीति के पारंपरिक &#039;पावर सेंटर्स&#039; को चुनौती दी है और एक नई राजनीतिक गतिशीलता स्थापित की है. भविष्य में &amp;nbsp;इसका सबसे बड़ा प्रभाव यह होगा कि राज्य की राजनीति &#039;गठबंधन की मजबूरी&#039; और खंडित जनादेश के युग से निकलकर &#039;एकदलीय प्रभुत्व&#039; या एक प्रमुख गठबंधन के वर्चस्व की ओर बढ़ सकती है.&amp;nbsp;
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&amp;nbsp; ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:55 +0530</pubDate>
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<title>मायावती और ओवैसी फैक्टर ने बदली अखिलेश की चुनावी स्क्रिप्ट</title>
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<description><![CDATA[ उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी जिस बदले हुए तेवर-कलेवर को अपनाकर चलती हुई दिख रही है, वह किसी वैचारिक आत्ममंथन का परिणाम कम और बदलते चुनावी गणित की उपज ज्यादा है. दरअसल प्रदेश में मायावती और ओवैसी फैक्टर की मजबूती ने स्पष्ट रूप से समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले को सीधी चुनौती है. यही कारण है कि समाजवादी पार्टी ने लंबे समय तक जिस M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण को सत्ता की चाबी माना, वह अब पहले जैसी भरोसेमंद पूंजी नहीं रह गई है.
अखिलेश यादव को कहीं न कहीं इस बात का भान है और हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और बिहार जैसे पड़ोसी राज्य के चुनावी नतीजे ने इसे और पुष्ट किया है. ऐसे में, आज सपा की नई रणनीति का केंद्र इस विमर्श पर टिका है कि जब परंपरागत वोट बैंक बिखरने लगे, तो आखिर चुनाव कैसे जीता जाए? जाहिर है, बिना सवर्णों के सहयोग से ऐसा हो पाना असंभव है.
बिहार से मिला पहला बड़ा संकेत
इस बदलाव की पहली स्पष्ट झलक बिहार विधानसभा चुनाव में दिखी. अखिलेश यादव ने वहां विपक्षी गठबंधन के लिए आक्रामक प्रचार किया और 25 से अधिक सीटों पर रैलियां कीं. रणनीति यह थी कि एकजुट अल्पसंख्यक वोट सत्ता विरोधी लहर पैदा करेगा. लेकिन, नतीजा इसके उलट निकला. मुस्लिम वोटों के बड़े पैमाने पर एकजुट होने के बावजूद एनडीए ने प्रचंड जीत दर्ज की. यह परिणाम अखिलेश के लिए चेतावनी था कि केवल अल्पसंख्यक गोलबंदी भी अब सत्ता की गारंटी नहीं रही.
ओवैसी फैक्टर ने गरमाई मुस्लिम वोटों की नई राजनीति
बिहार के बाद महाराष्ट्र और अन्य राज्यों AIMIM के प्रदर्शन ने इस आशंका को और गहरा कर दिया है. इन राज्यों में ओवैसी फैक्टर के प्रभाव ने यह साबित कर दिया कि मुस्लिम मतदाता अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति तलाश रहा है. उत्तर प्रदेश में भी AIMIM की मौजूदगी और उसका बढ़ता जमीनी प्रभाव सपा के लिए खतरे की घंटी है. अखिलेश जानते हैं कि अगर AIMIM यूपी में मजबूती से उतरी, तो मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा सपा से खिसकना तय है. मुस्लिम वोटों का छिटकना सपा के लिए निर्णायक हार तय कर सकता है.
मायावती की वापसी और PDA का संकट
अखिलेश की दूसरी बड़ी चुनौती मायावती की सक्रियता है. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) का नारा देकर सपा ने खासतौर पर &#039;संविधान बदलने&#039; के नैरेटिव के सहारे दलित वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की थी. लेकिन वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हालात बदलते दिख रहे हैं. बसपा फिर से संगठन को खड़ा कर रही है और मायावती खुलकर चुनावी मैदान में उतरने के संकेत दे रही हैं. यदि बसपा दलित वोटों को फिर से अपने पाले में करने में सफल रही तो PDA का गणित स्वतः ही कमजोर पड़ जाएगा.
ओवर डिपेंडेंस अब लगने लगा है जोखिम
सपा के रुख में बदलाव का संकेत पार्टी के भीतर के घटनाक्रमों से भी मिलता है. जैसे रामपुर में उम्मीदवार चयन से लेकर आजम खान का निर्णय न मानना. इसे केवल व्यक्तिगत मतभेद कहकर नहीं टाला जा सकता. यह दरअसल उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें पार्टी यह दिखाना चाहती है कि वह किसी एक चेहरे या एक समुदाय पर निर्भर नहीं है. अल्पसंख्यक राजनीति का &#039;ओवर-डिपेंडेंस&#039; अब सपा को जोखिम भरा लगने लगा है.
सवर्णों की ओर बढ़ता सपा का कदम
नई चुनावी पिच पर सपा इन दिनों खुलकर खेल रही है. ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण मतदाताओं को लुभाने के प्रयास, धार्मिक स्थलों का प्रचार, सांस्कृतिक प्रतीकों पर नरम रुख इसी रणनीति का हिस्सा हैं. संदेश साफ है: सपा का भरोसा अब पिछड़ा-अल्पसंख्यक वोटों पर पहले जैसा नहीं रहा. यह बदलाव वैचारिक क्रांति नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विवशता से उपजा है जो मानती है कि M-Y समीकरण अब &amp;lsquo;जीत की गारंटी&amp;rsquo; नहीं.
एक वोट बैंक पर निर्भरता का अंत&amp;nbsp;
पिछले कई विधानसभा चुनावों का ट्रैक रिकॉर्ड यही बताता है कि यूपी जैसे राज्य में किसी एक सामाजिक समूह के सहारे सत्ता पाना अब लगभग असंभव हो चुका है. भाजपा ने व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाकर यह मॉडल पहले ही स्थापित कर दिया है. अखिलेश अब उसी वास्तविकता को स्वीकारते दिख रहे हैं. उन्हें अंदेशा है कि यदि बसपा दलित वोट काटे और AIMIM मुस्लिम वोटों में सेंध लगाए, तो सपा का पारंपरिक आधार बुरी तरह कमजोर हो सकता है.
2027 की तैयारी और बदला हुआ गणित
वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है. ऐसे में अखिलेश यादव के पास विकल्प सीमित हैं. या तो वे पुराने समीकरणों पर भरोसा करते रहें या फिर जोखिम उठाएं और नए सामाजिक समूहों को साधने की कोशिश करें.
M-Y समीकरण पर कम हुए भरोसे के बीच सवर्णों की ओर बढ़ता झुकाव इसी दूसरे विकल्प का संकेत है. यह रणनीति सफल होगी या नहीं, यह अलग विषय है, लेकिन इतना तय है कि मायावती और ओवैसी के उभार ने अखिलेश को अपनी राजनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. इस संकेत को समझना अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए भी अहम है. क्योंकि यह एक ऐसा वोटर समूह रहा है जिसने एकजुट होकर हमेशा सपा को वोट दिया.
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&amp;nbsp; ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:53 +0530</pubDate>
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<title>यूजीसी रेग्युलेशन 2026&#45; मोदी का मंडल और मंदिर दोनों वोट बैंक खतरे में!</title>
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<description><![CDATA[ आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने &amp;lsquo;यूजीसी रेगुलेशन 2026&amp;rsquo; पर रोक लगा दी. सर्वोच्च अदालत का कहना है कि नियम बहुत साफ नहीं हैं. जब तक नये और स्पष्ट नियम नहीं आ जाते फिलहाल 2012 वाला नियम ही लागू रहेगा.
हम जैसे ओल्ड स्कूल तो माननीय न्यायमूर्ति की नीयत पर सवाल उठाने का साहस नहीं कर सकते. मगर इस आदेश पर पिछड़ा-दलित क्वार्टर से आवाज आयी कि चीफ जस्टिस ब्राह्मण हैं और बेंच के दूसरे जस्टिस बागची बंगाली सवर्ण हैं. इस स्टे ने उस वर्ग की आशंका को सही साबित किया. इक्विटी कमेटी का मुखिया अगर सवर्ण होगा तो वो दलित पिछड़ों के हित में क्या फैसला देगा.
फिलहाल जब तक स्टे लागू है 2012 के नियम ही लागू होंगे. यानि तब तक ओबीसी इसके दायरे से बाहर होंगे और शिकायत ग़लत पाए जाने पर शिकायत करने वाले के खिलाफ कार्रवाई होगी. 2026 के रेग्युलेशन में यही दो चीजें एकदम नयी थीं. फिलहाल मामला तारीख़ पर तारीख़ के अदालती चक्र में चला गया है तो समझिए लटक ही गया है. अदालत ने स्टे लगाते हुए क्या-क्या कहा ये अब सबको पता है, सवाल तो इसके पीछे की सियासत का है.
जिन्हें लगता है कि यूजीसी रेग्युलेशन-2026 के प्रावधान सरकार की सहमति के बगैर और लापरवाही से लागू हो गए, वो मुगालते में हैं. मोदी सरकार अल्पसंख्यक सवर्णों के मुकाबले बहुसंख्यक ओबीसी&amp;ndash;दलित-आदिवासी वोट को लेकर ज्यादा चिंतित है. सवर्णों को तो वो अपना स्थायी वोट बैंक मान कर चल रही थी &amp;ndash; जो जाएं तो जाएं कहां की मनस्थिति में हैं.
एक सच ये भी है कि जैसे सवर्णों में ब्राह्मण है उसी तरह ओबीसी में यादव हैं. इन्हें यूपी-बिहार में नियो रिच और पॉलिटिकली पावरफुल माना जाता है. अगर 2026 के रेगुलेशन में ओबीसी को नहीं शुमार किया गया होता तो शायद ये विरोध इतना इंटेंस नहीं होता. दलित तो मॉरली आज भी इतना दबा हुआ है कि बहुत सारी जगहों पर वो आवाज़ नहीं निकालता मगर यादव ऐसा करते हैं. कुर्मियों के बारे में मशहूर है कि वो निहुरे-निहुरे (झुके-झुके) ही ऊंट चुरा लेने की कला में माहिर हैं. यादवों की तरह लाउड नहीं हैं.
बहरहाल इस रेगुलेशन को लेकर सोशल मीडिया से सड़क तक जिस तरह पीएम मोदी का विरोध हुआ- ऐसा पहले नहीं देखा गया. अब तक मोदी ही रैलियों में खुद को सबसे बड़ा ओबीसी बताते थे, मगर इस बार तो हद पार हो गयी जब उन्हें ही उनकी जाति बताई जाने लगी, उन्हें घांची तेली कहा जाने लगा.
यूपी के गोंडा में एक संगठन ने मोदी तेरी कब्र खुदेगी जैसे अमंगलकारी जेएनयू टाइप नारे लगाए. एक जगह तो बीच चौराहे पर मोदी और अमित शाह के पुतलों की जूते से पिटाई की तस्वीर भी सामने आयी.
मत भूलिए कि ये वही यूपी है जहां से वीपी सिंह के मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने पर तीखा विरोध शुरु हुआ. पुलिस की गोली से पहली शहादत भी ब्राह्मण बहुल पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुई. मरने वाला छात्र भी त्रिपाठी ब्राह्मण ही था. दिल्ली में गोस्वामी ने तो आत्मदाह की कोशिश बहुत बाद में की. जिस शख्स के लिए राजा नहीं फक़ीर है का नारा लगा था, वो राजा ओबीसी आरक्षण का खलनायक बन गया था. राजा मांडा यानि वीपी सिंह को इसका कोई फायदा हुआ हो या न हुआ हो, यूपी और बिहार में इसने दो मंडलवादी धुरंधर पैदा किए &amp;ndash; मुलायम सिंह यादव और लालू यादव. जबकि मंडल का &amp;lsquo;किक बैक&amp;rsquo; मिला बीजेपी को.
आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या की पहली रथयात्रा मंडल के काउंटर में ही निकाली थी. भले ही 1986 के पालनपुर, हिमाचल के अधिवेशन में हिंदुत्व और राममंदिर बीजेपी के एजेंडे पर आ चुके थे, मगर जो मुहिम बाद में शुरु होनी थी उसे मंडल के चलते &amp;lsquo;प्री-पोन&amp;rsquo; करना पड़ा. दरअसल मोदी से पहले बीजेपी कभी भी खुलकर जाति की राजनीति नहीं करती थी. आज भी हिंदुत्व का ध्रुवीकरण ही बीजेपी को फायदा पहुंचाता है, और जातियों की गोलबंदी उसे हरा देती है. क्योंकि आखिर-आखिर वो सवर्णों की पार्टी ही मानी जाती है. लिहाज़ा मंडल विरोध में सामाजिक धरातल पर जो हो रहा था बीजेपी वो देख रही थी. ओबीसी को 26 फीसदी आरक्षण का हिंसक और आत्मघाती विरोध कर रहे सवर्णों की वजह से जो काउंटर पोलराइजेशन हो रहा था, बीजेपी उसे देख कर चिंता में थी.
मंडल की आग तो ठंढी हो गयी मगर ओबीसी आज भी पूरी तरह बीजेपी के हाथ नहीं आया. यादव तो खैर पूरी तरह लालू- मुलायम के हो गए. दोनों राज्यों में मुस्लिम-यादव का एमवाई समीकरण बना. यादवों के बाद दूसरे नंबर के ओबीसी कुर्मी भी उनके साथ ही गए, लेकिन 2014 आते-आते चाणक्य अमित शाह ने कुर्मियों को यादवों से अलगाने में कामयाबी हासिल की - खासतौर पर यूपी में. मगर बिहार में नीतीश को साधने में उन्हें वक्त लगा.
एक सवाल ये भी है कि क्या सरकार ने खुद ही मंडल और कमंडल दोनों के वोटों को खतरे में डाल दिया है.
क्योंकि ये भी एक संयोग है कि जब मंडलवाद का भूत मंडरा रहा होता है, मंदिरवादी राजनीति का साया भी उसी वक्त गहराने लगता है. काशी में ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट पर तोड़-फोड़ पर बहस चल ही रही थी, माघ मेले में पालकी से स्नान के लिए जा रहे शंकराचार्य को लाठी के दम पर रोकने का विरोध हो रहा था. उसी वक्त यूजीसी रेग्युलेशन का जिन्न बाहर आ गया. मणिकर्णिका और शंकराचार्य के मसले पर तो सरकार की ओर से बोलने वाले बहुतेरे थे. जब संकट मोचन के महंत विश्वंभर नाथ मिश्र ने डबडबायी आंखों से घाट पर आकर कहा कि मणिकर्णिका गंगा से पहले का तीर्थ है, तो सरकार समर्थक पंडितों ने लेख लिख डाले कि मणिकर्णिका का ऐसा कोई महत्व ही नहीं. वो भी एक और श्मशानघाट है.
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को तो फर्जी ठहराने वाले ब्राह्मणों की कतार लग गयी जो उन्हें बीजेपी विरोधी और अखिलेश &amp;ndash; कांग्रेस समर्थक बताने में तमाम हदें पार कर रहे थे.
मगर, यूजीसी रेगुलेशन 2026 का मसला सीधे सवर्ण छात्रों के भविष्य से जुड़ रहा था तो वहां किसी तरह की दो फाड़ नहीं हुई. सरकार के सूचना तंत्र ने जब हालात की गंभीरता बयान की तो होश फाख्ता हो गए. हालात बिगड़ने से बचाने के लिए बेताल फिर लौट कर उसी डाल पर आया.
राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र जैसे ब्राह्मण नेता खोज कर बाहर निकाले गए जिन्होंने रेग्युलेशन के खिलाफ़ बयान दिया. दबदबे वाले ठाकुर बृज भूषण शरण सिंह ने भी विरोध में बयान दिया. जबकि उनके बेटे करण भूषण रेग्युलेशन वाली संसदीय समिति में थे. हालांकि कोशिश संसदीय समिति के अद्धयक्ष कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के सिर ठीकरा फोड़ने की भी हुई. मगर दिग्गी ने साफ कर दिया कि नियम बनाने में संसदीय समिति का कोई रोल था ही नहीं, हमने सिर्फ सिफारिशें दी थीं. रेग्युलेशन का प्रारुप तो यूजीसी की कमेटी ने ही बनाया.
विरोध की सुगबुगाहट पार्टी के भीतर भी थी, अब सरकार खुद तो पीछे हट नहीं सकती थी और अदालत ही एक रास्ता था जो अख्तियार किया गया. मगर एक बात 100 फीसदी सच है कि इस रेग्युलेशन ने सवर्णों का संशय बढ़ाया है, ओबीसी तो पहले ही इसे लेकर आश्वस्त नहीं था. लिहाजा इसका असर आगे क्या होता है देखने वाली बात होगी.
पुनश्च: इस बीच एक मजेदार चीज देखने को मिली. किसी सवर्ण ने सोशल मीडिया पर लिखा ब्राह्मण, ठाकुर और पठान यूजीसी बिल के विरोध में एक साथ. इस पर किसी मुसलमान की त्वरित टिप्पणी आयी - अभी हम कागज़ खोजने में लगे हैं आप अपना देख लो. किसी शख्स ने दोनों को मिला कर मजाहिया मीम बना दिया.
डिस्क्लेमर:- यह लेखक के निजी विचार हैं.&amp;nbsp; ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:52 +0530</pubDate>
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<title>Earth Saviours Foundation&amp;apos;s President Jas Kalra Working To Build World&amp;apos;s Largest Shelter Home</title>
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<description><![CDATA[ Jas Kalra&#039;s compassion extends beyond the walls of his shelter home. He has personally rescued more than 1,500 destitute people from harrowing conditions on the streets. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 15:50:44 +0530</pubDate>
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<title>Shahroz Ali Khan&amp;apos;s Grit Takes Him Places in the Glam World</title>
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<description><![CDATA[ Undeterred by rejections and barriers, he persisted, starting off by assisting senior producers and directors to learn the ropes of film-making.
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<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 15:50:43 +0530</pubDate>
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<title>सोमनाथ के एक हजार वर्ष: प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत के स्वाभिमान का पुनर्जागरण</title>
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<description><![CDATA[ इंडिया अर्थात भारत है. संविधान का यह वाक्य मात्र शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक सभ्यता का उद्घोष है. स्वतंत्रता के बाद हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने भारत को केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक सतत सभ्यता के रूप में देखने की परिकल्पना की थी. राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सांस्कृतिक आत्मबोध की पुनर्स्थापना. यही वह अधूरा स्वप्न था, जिसे समय के साथ पूरा होना था. आज अयोध्या से काशी और काशी से सोमनाथ तक की यात्रा उसी स्वप्न की साकार अभिव्यक्ति है. यह किसी भूखंड की वापसी नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों से प्रवाहित भारतीय संस्कृति, चेतना और आत्मा की पुनर्प्रतिष्ठा है.
इसी सभ्यतागत दृष्टि को समकालीन भारत में स्पष्ट स्वर देने का कार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है. सोमनाथ के एक हज़ार वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान का सार्वजनिक उद्घोष है. यह संदेश है कि आधुनिक भारत अब अपने मंदिरों, स्मृतियों और परंपराओं को इतिहास के हाशिये पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में देखता है.
सोमनाथ मंदिर इस निरंतरता का सबसे सशक्त प्रतीक है. समुद्र के तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता की जीवित स्मृति है. पिछले एक हज़ार वर्षों में शायद ही कोई ऐसा मंदिर हो, जिसने इतने आक्रमण, विध्वंस और अपमान सहे हों और फिर भी हर बार पहले से अधिक दृढ़ होकर खड़ा हुआ हो. सोमनाथ का इतिहास यह स्पष्ट करता है कि भारत की सभ्यता को नष्ट किया जा सकता है, पर मिटाया नहीं जा सकता.
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि यह पुनरुत्थान कोई एक बार की घटना नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया रही है. 7वीं शताब्दी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने लाल बलुआ पत्थर से दूसरा मंदिर खड़ा किया. यह केवल स्थापत्य का कार्य नहीं था, बल्कि यह स्पष्ट संदेश था कि आस्था अस्थायी नहीं होती. 9वीं शताब्दी में जब अरब आक्रमणों ने विनाश किया, तब प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय ने तीसरे भव्य मंदिर का निर्माण कराया. इतिहास ने देखा कि तलवारें आईं और चली गईं, लेकिन शिव वहीं रहे.
11वीं शताब्दी में महामूद गजनी के आक्रमण के तुरंत बाद राजा भीमदेव प्रथम और मालवा के परमार राजा भोज ने मिलकर मंदिर को फिर जीवित किया. लकड़ी से आरंभ हुआ यह पुनर्निर्माण बताता है कि हिंदू समाज समय नहीं गंवाता&amp;mdash;वह शोक में नहीं रुकता, बल्कि संकल्प में बदल जाता है. 12वीं शताब्दी में चालुक्य राजा कुमारपाल ने पत्थर का, रत्नों से सुसज्जित भव्य सोमनाथ खड़ा किया. यह केवल पुनर्निर्माण नहीं था, बल्कि यह घोषणा थी कि श्रद्धा को क्षय नहीं लगता.
13वीं और 14वीं शताब्दी में खिलजी काल के विध्वंस के बाद भी चूड़ासमा राजा महिपाल और उनके पुत्र खेंगारा ने पुनः शिवलिंग की स्थापना की. इतिहास ने एक बार फिर लिखा कि शिव को हटाया नहीं जा सकता. 18वीं शताब्दी में, जब मुख्य स्थल पर पूजा असंभव हो गई थी, तब माता अहिल्याबाई होलकर ने पास में मंदिर बनवाकर यह सिद्ध किया कि आस्था परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती है. वह अपना मार्ग स्वयं बना लेती है.
अयोध्या, काशी और सोमनाथ. ये तीनों स्थान भारत की आत्मा के तीन स्तंभ हैं. अयोध्या मर्यादा और धर्म की भूमि है, काशी ज्ञान और मोक्ष की चेतना है, और सोमनाथ तप, त्याग तथा पुनरुत्थान का प्रतीक. इन स्थलों की पुनर्प्रतिष्ठा किसी एक कालखंड की राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सदियों से दबे हुए सांस्कृतिक आत्मविश्वास की वापसी है. यह उस भारत की घोषणा है, जो अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिकता की ओर बढ़ना चाहता है.
आधुनिक भारत की यात्रा केवल आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे या वैश्विक रैंकिंग तक सीमित नहीं हो सकती. राष्ट्र तब पूर्ण होता है, जब उसकी अर्थव्यवस्था और उसकी सभ्यता&amp;mdash;दोनों एक साथ आगे बढ़ें. पिछले दशकों में विकास की परिभाषा अक्सर सकल घरेलू उत्पाद, निवेश और औद्योगीकरण तक सिमट गई थी. परंतु भारत जैसा प्राचीन राष्ट्र जानता है कि सच्चा विकास आत्मा से कटकर संभव नहीं. सोमनाथ जैसे स्थल हमें स्मरण कराते हैं कि सभ्यता की निरंतरता ही राष्ट्र की वास्तविक पूँजी होती है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोमनाथ को भारत के स्वाभिमान से जोड़कर देखना इसी व्यापक दृष्टि को रेखांकित करता है. सोमनाथ स्वाभिमान पर्व यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र की शक्ति केवल वर्तमान उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उस स्मृति में भी निहित होती है, जो पीढ़ियों को जोड़ती है. यह आयोजन उस अधूरे स्वप्न की पूर्ति का संकेत है कि भारत अब अपने अतीत से संकोच नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ संवाद कर रहा है.
सोमनाथ हमें यह भी सिखाता है कि भारतीय सभ्यता की शक्ति उसके बहुलतावाद में निहित है. यहांं आस्था केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि है. मंदिर का समुद्र के सामने खड़ा होना मानो यह कहता है कि भारत का धर्म संकीर्ण नहीं, बल्कि व्यापक है, जो प्रकृति, मानव और ब्रह्मांड को एक सूत्र में बांधता है. यही कारण है कि सोमनाथ न केवल श्रद्धालुओं, बल्कि इतिहासकारों, दार्शनिकों और यात्रियों को भी आकर्षित करता है.
आज की पीढ़ी के लिए सोमनाथ का अर्थ केवल एक ऐतिहासिक कथा नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है. अपनी सभ्यता को समझने का, उसे आत्मविश्वास के साथ जीने का, और आधुनिक विश्व में उसकी प्रासंगिकता को स्थापित करने का. जब भारत अपने मंदिरों, परंपराओं और सांस्कृतिक स्थलों को पुनः केंद्र में लाता है, तो वह किसी से कुछ छीन नहीं रहा होता; वह केवल स्वयं को वापस पा रहा होता है.
अयोध्या से काशी और काशी से सोमनाथ तक की यह यात्रा एक राष्ट्र की आत्मखोज है. यह यात्रा बताती है कि भारत का भविष्य उसकी स्मृति से होकर जाता है. एक ऐसा भारत, जो आर्थिक रूप से सशक्त हो, तकनीकी रूप से अग्रणी हो, और सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी भी हो. सोमनाथ के एक हज़ार वर्ष हमें यही सिखाते हैं कि सभ्यता केवल अतीत में नहीं रहती है. वह वर्तमान में सांस लेती है और भविष्य को दिशा देती है.
अंततः, सोमनाथ किसी एक मंदिर की कहानी नहीं है. यह भारत की कहानी है&amp;mdash;एक ऐसी सभ्यता की कहानी, जो टूटती नहीं, झुकती नहीं, और हर युग में स्वयं को पुनः खोज लेती है. यही भारत है. यही भारत की आत्मा है. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 15:47:59 +0530</pubDate>
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<title>राष्ट्रपति_द्रौपदी_मुर्मू_ने_क्या_गिफ्ट_दिया_प्रेमानंद_महाराज_को!President_Gift_To_Premanand_Maharaj</title>
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<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:40:37 +0530</pubDate>
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<title>Ahmedabad_Plane_Crash__प्लेन_क्रैश_का_VIDEO_बनाने_वाले_Aryan_को_क्यों_उठा_ले_गई_Police_____</title>
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<pubDate>Mon, 16 Jun 2025 02:33:36 +0530</pubDate>
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