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<title>Tej Rafter News &#45; : हेल्थकेयर</title>
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<description>Tej Rafter News &#45; : हेल्थकेयर</description>
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<dc:rights>TEJ RAFTER NEWS</dc:rights>

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<title>बिना डायबिटीज वाले और युवा लोगों का तेजी से घटता है वजन, चौंका देगी GLP&#45;1 दवाओं पर नई स्टडी</title>
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<description><![CDATA[ हमारे देश में नई पीढ़ी की वजन घटाने वाली दवाओं पर हुई एक स्टडी में सामने आया है कि बिना डायबिटीज वाले लोग को और कम उम्र के मरीजों में वजन तेजी से कम होता है. यह स्टडी देश में पहली बार वास्तविक परिस्थितियों में की गई है, जिसमें ओवरवेट और मोटापे से जूझ रहे लोगों पर इन दवाओं के असर को देखा गया है. यह रिसर्च 150 ऐसे लोगों पर आधारित है, जिन्हें 6 महीने तक इंजेक्शन के जरिए सेमाग्लूटाइड और टिरजेपेटाइड जैसी दवाएं दी गई. यह दोनों दवाएं जीएलपी-1 थेरेपी से जुड़ी है, जो पहले टाइप-2 डायबिटीज के इलाज के लिए विकसित की गई थी. लेकिन अब मोटापे के इलाज में भी इस्तेमाल हो रही है. इस स्टडी के नतीजे इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित हुए हैं.कितने लोगों का वजन कितना घटा?स्टडी के अनुसार करीब 41 प्रतिशत प्रतिभागियों का वजन 10 प्रतिशत से ज्यादा काम हुआ. कुल मिलाकर औसत वजन घटने की दर 8.2 प्रतिशत रही. इस स्टडी में डायबिटीज से ग्रस्त और बिना डायबिटीज वाले लोगों के बीच अंतर भी साफ दिखा. जिन लोगों को डायबिटीज नहीं थी, उनका वजन औसतन 11.21 प्रतिशत तक घटा, जबकि डायबिटीज वाले मरीजों में यह कमी करीब 5.48 प्रतिशत रही.कौन सी दवाएं रही ज्यादा असरदार?इस स्टडी में यह भी पाया गया है कि टिरजेपेटाइड लेने वाले मरीजों में वजन घटने की दर ज्यादा रही. इस दवा के साथ औसत वजन में 8.60 प्रतिशत की कमी देखी गई. जबकि सेमाग्लूटाइड लेने वालों में यह 5.62 प्रतिशत रही. इसके अलावा जो मरीज पहले कभी जीएलपी-1 थेरेपी नहीं ले चुके थे उनमें वजन तेजी से घटता देखा गया.स्टडी में उम्र का भी दिखा असररिसर्च में यह सामने आया कि युवाओं में वजन कम होने की प्रक्रिया तेज होती है. खासतौर पर 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने का लक्ष्य युवा और नए मरीजों में जल्दी हासिल हुआ. हालांकि 10 प्रतिशत से कम वजन घटाने की रफ्तार पर डायबिटीज का असर खास असर नहीं देखा गया है. इसके अलावा स्टडी के अनुसार 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन घटाने में औसतन 9.5 महीने का समय लगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन दवाओं का पूरा असर आमतौर पर 12 से 18 महीना के बीच दिखाई देता है.ये भी पढ़ें-Roti or Rice Health Benefits: उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?
डायबिटीज और मोटापे के बीच का कनेक्शनस्टडी में यह भी सामने आया है कि जिन मरीजों को डायबिटीज के साथ मोटापा भी है, उनमें वजन कम होना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है. एक्सपर्ट के अनुसार भारतीय मरीजों में मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्या ज्यादा खतरनाक होती है और इन्सुलिन रेजिस्टेंस भी ज्यादा पाया जाता है. इसके अलावा डायबिटीज के मरीज अक्सर पहले से कई दवाएं ले रहे होते हैं, जिनमें इंसुलिन भी शामिल हो सकता है. इससे वजन घटाने की प्रक्रिया धीमी में हो जाती है. वहीं बताया जा रहा है कि यह नतीजा ऐसे समय सामने आए हैं, जब सेमाग्लूटाइड का पेटेंट खत्म हो गया है, जिससे भारत के तेजी से बढ़ते एंटी ओबेसिटी मार्केट में कई जेनेरिक वर्शन का रास्ता साफ हो गया है. जिससे देश में हिंदी दवाओं की बिक्री और बढ़ गई है. वहीं एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज पीड़ित है. 25.4 करोड़ लोग जनरलाइज्ड ओबेसिटी से पीड़ित है और 35.1 प्रतिशत लोग पेट के मोटापे से पीड़ित है. डॉक्टरों के अनुसार यह सब बदलते खान-पान और बढ़ती हुई सेडेंटरी लाइफस्टाइल की वजह से हो रहा है.
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:04 +0530</pubDate>
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<title>Milk And Parkinson Disease:सेहतमंद समझकर रोज पी रहे हैं दूध? इस लाइलाज बीमारी का बढ़ सकता है खतरा</title>
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<description><![CDATA[ Does Drinking Milk Increase Parkinson Disease Risk: आपने शायद कहीं न कहीं यह जरूर सुना होगा या देखा होगा कि दूध और पार्किंसन बीमारी के बीच कोई संबंध हो सकता है. यह सुनकर कई लोग चौंक जाते हैं और सोचने लगते हैं कि क्या अब दूध पीना भी नुकसानदायक है. सच यह है कि इस विषय पर जो रिसर्च हुई है, वह पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है, लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है कि दूध पीना बंद कर दें, वरना बीमारी हो जाएगी.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. सादिक पठान ने TOI को बताया कि कई स्टडीज में यह देखा गया है कि डेयरी प्रोडक्ट्स, खासकर ज्यादा मात्रा में दूध पीने वाले लोगों में पार्किंसन का खतरा थोड़ा बढ़ सकता है. खासतौर पर पुरुषों में यह जोखिम 20 से 40 प्रतिशत तक ज्यादा पाया गया है. हालांकि, यह सीधा कारण नहीं बल्कि एक संबंध है, जिसे अभी पूरी तरह समझा जाना बाकी है.
क्या निकला रिसर्च में?
इस विषय पर सबसे लंबी और बड़ी रिसर्च हार्वर्ड यूनिवर्सिटीसे जुड़ी स्टडीज में नर्सेस हेल्थ स्टडी और हेल्थ प्रोफेशनल्स फॉलो-अप स्टडी में सामने आई. करीब 25 साल तक लोगों की डाइट को ट्रैक करने के बाद पाया गया कि जो लोग रोजाना लो-फैट डेयरी के तीन या उससे ज्यादा सर्विंग लेते थे, उनमें पार्किंसन का खतरा 34 प्रतिशत ज्यादा था, तुलना में उन लोगों के जो बहुत कम डेयरी लेते थे.
इसी तरह अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की कैंसर प्रिवेंशन स्टडी में भी एक दिलचस्प पैटर्न सामने आया. इसमें हजारों पुरुष और महिलाओं को शामिल किया गया और पाया गया कि डेयरी का सेवन करने वालों में यह जोखिम पुरुषों में 1.8 गुना और महिलाओं में 1.3 गुना तक बढ़ा हुआ था.
क्या दूध से ऐसा होता है?
अब सवाल यह है कि आखिर दूध में ऐसा क्या हो सकता है? कुछ रिसर्च में यह संभावना जताई गई है कि दूध में मौजूद पेस्टिसाइड के अवशेष, जैसे हेप्टाक्लोर एपॉक्साइड, दिमाग के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. इसके अलावा दूध में मौजूद गैलेक्टोज भी एक फैक्टर माना जा रहा है, जो ज्यादा मात्रा में लेने पर दिमाग पर असर डाल सकता है. एक और दिलचस्प थ्योरी गट-ब्रेन कनेक्शन से जुड़ी है. माना जाता है कि डेयरी हमारे गट माइक्रोबायोम को प्रभावित कर सकती है, जिससे कुछ ऐसे प्रोटीन बनते हैं जो आगे चलकर दिमाग तक पहुंच सकते हैं और बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकते हैं.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;पीरियड्स पेन का पैटर्न: पहले दिन ज्यादा, बाद में कम क्या है वजह? डॉक्टर ने बताया असली कारण
हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको तुरंत दूध या डेयरी प्रोडक्ट्स छोड़ देने चाहिए. रिसर्च का संकेत सिर्फ इतना है कि संतुलन जरूरी है. अगर आप बहुत ज्यादा मात्रा में खासकर लो-फैट या स्किम मिल्क लेते हैं, तो उसे थोड़ा कम करना बेहतर हो सकता है.
क्या होता है पार्किंसन के लक्षण?
भारत में पार्किंसन के मामले भी धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं. इसके लक्षणों में हाथ कांपना, शरीर में जकड़न, धीमी मूवमेंट और पोस्टर का बिगड़ना शामिल हैं. वहीं शुरुआती संकेतों में कब्ज, सूंघने की क्षमता कम होना, नींद की समस्या और मूड स्विंग भी देखे जा सकते हैं. डॉक्टरों का मानना है कि इस बीमारी से पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर जोखिम को कम जरूर किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:04 +0530</pubDate>
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<title>Using Phone On Toilet Risks: टॉयलेट सीट पर बैठकर चलाते हैं फोन, डॉक्टर से जानें यह आदत आपको कैसे कर रही बीमार?</title>
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<description><![CDATA[ Is It Bad To Use Phone On Toilet: हम में से ज्यादातर लोग ये आदत अपना चुके हैं कि टॉयलेट पर बैठते ही फोन निकाल लेना और फिर कब 10 से 15 मिनट निकल जाते हैं, पता ही नहीं चलता. यह आदत देखने में बिल्कुल सामान्य और हार्मलेस &amp;nbsp;लगती है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार यह आपकी पेल्विक हेल्थ को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रही है. चलिए आपको बताते हैं कि इससे क्या नुकसान होते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. प्रमोद कदम ने TOI को बताया कि &amp;nbsp;टॉयलेट का एक खास मकसद होता है और जितना ज्यादा समय आप वहां बिताते हैं, उतना ही शरीर पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है. जब आप टॉयलेट सीट पर बैठते हैं, तो आपके रेक्टम को वैसा सपोर्ट नहीं मिलता जैसा एक सामान्य कुर्सी पर मिलता है. ऐसे में ग्रैविटी के कारण खून नीचे की तरफ जमा होने लगता है और समय बढ़ने के साथ प्रेशर भी बढ़ता जाता है.
अगर आप 10 मिनट से ज्यादा बैठते हैं, तो यह दबाव आपके ब्लड वेसल्स पर असर डालने लगता है. इसका सबसे आम नतीजा होता है पाइल्स. यह दरअसल एनल कैनाल की सूजी हुई नसें होती हैं, जिनमें दर्द और ब्लीडिंग हो सकती है.
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बॉडी की नैचुरल सिस्टम भी प्रभावित
लेकिन समस्या सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती एक्सपर्ट बताते हैं कि फोन चलाते समय हमारी बॉडी की नैचुरल सिस्टम भी प्रभावित होती है. जब आप स्क्रीन में खो जाते हैं, तो शरीर के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. इससे मल ज्यादा देर तक कोलन में रहता है, सूख जाता है और बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है. यही कारण है कि कब्ज, पाइल्स और एनल फिशर जैसी समस्याएं बढ़ती हैं.
क्या है बचने का तरीका?
डॉक्टर इसे स्ट्रेनिंग पैराडॉक्स भी कहते हैं. यानी आप जानबूझकर जोर नहीं लगा रहे होते, फिर भी लंबे समय तक बैठने से पेल्विक फ्लोर पर लगातार हल्का दबाव बना रहता है. इससे एनल कैनाल की नाजुक परत में दरार आ सकती है, जिसे फिशर कहा जाता है और यह काफी दर्दनाक होता है. इससे बचने का सबसे आसान तरीका है कि 5 मिनट का नियम. डॉ कदम के अनुसार, अगर 5 मिनट में काम पूरा नहीं होता, तो उठ जाना चाहिए और बाद में फिर कोशिश करनी चाहिए. टॉयलेट को लाइब्रेरी या ऑफिस की तरह इस्तेमाल करना सही नहीं है.
फोन को टॉयलेट से दूर रखा जाए
इस नियम को अपनाने के लिए सबसे जरूरी है कि फोन को टॉयलेट से दूर रखा जाए. बिना किसी डिस्ट्रैक्शन के आप अपने शरीर के संकेतों को बेहतर समझ पाएंगे और जरूरत से ज्यादा समय भी नहीं बिताएंगे. इसके अलावा, बैठने का तरीका भी मायने रखता है. पैरों के नीचे छोटा स्टूल रखने से शरीर का एंगल सही हो जाता है, जिससे प्रक्रिया आसान और जल्दी पूरी होती है. डॉक्टर्स यह भी सलाह देते हैं कि शरीर के संकेतों को कभी नजरअंदाज न करें, पर्याप्त पानी पिएं और फाइबर युक्त खाना खाएं. ये छोटी-छोटी आदतें मिलकर बड़ी समस्याओं से बचाती हैं. टॉयलेट पर फोन चलाना भले ही मामूली लगे, लेकिन इसका असर धीरे-धीरे शरीर पर पड़ता है. इसलिए अगली बार जब आप टॉयलेट जाएं, तो फोन बाहर ही छोड़ दें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:03 +0530</pubDate>
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<title>Health Warning Signs: शरीर के इन छोटे संकेतों को न करें इग्नोर, वरना डैमेज हो सकते हैं लिवर और किडनी</title>
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<description><![CDATA[ Early Signs Your Body Is In Trouble: हमारा शरीर कभी अचानक से बीमार नहीं पड़ता, बल्कि वह पहले छोटे-छोटे संकेत देता है. थकान, दिमाग का भारी लगना, त्वचा में बदलाव या हल्की-फुल्की असहजता, ये सब यूं ही नहीं होते. ये संकेत बताते हैं कि शरीर के अंदर कहीं न कहीं दबाव बन रहा है. समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इन संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं और तब ध्यान देते हैं जब दर्द शुरू हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. भानु मिश्रा ने TOI को बताया कि &quot;ज्यादातर अंगों को होने वाला नुकसान बिना किसी स्पष्ट लक्षण के ही होता है. लोग इन संकेतों को इसलिए नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि ये साफ नजर नहीं आते.&quot; यही सबसे बड़ा खतरा है कि जब तक लक्षण गंभीर बनते हैं, तब तक नुकसान गहरा हो चुका होता है.&amp;nbsp;
थकान सबसे आम समस्या
थकान एक आम समस्या है, लेकिन अगर सही नींद लेने के बाद भी थकावट बनी रहती है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह सिर्फ व्यस्त दिनचर्या की वजह से नहीं होता, बल्कि यह लिवर या किडनी पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है. &amp;nbsp;डॉ. भानु &amp;nbsp;के अनुसार, &quot;क्रॉनिक थकान का मतलब सिर्फ नींद की कमी नहीं, बल्कि लिवर या किडनी में समस्या भी हो सकती है.&quot; ऐसी थकान धीरे-धीरे आपकी सोच और ऊर्जा दोनों को प्रभावित करती है.&amp;nbsp;
ब्रेन के इन सिग्नल को न करें नजरअंदाज
दिमाग भी अपने तरीके से संकेत देता है। बार-बार सिरदर्द होना, ध्यान लगाने में दिक्कत या दिमाग का धुंधला लगना अक्सर लोग तनाव या स्क्रीन टाइम का असर मान लेते हैं. लेकिन &amp;nbsp;एक्सपर्ट बताते हैं कि यह डिहाइड्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर या शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ने का संकेत हो सकता है. याददाश्त में कमी या फोकस में गिरावट दिमाग पर पड़ रहे दबाव का संकेत है.
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इन संकेतों को भी न करें नजरअंदाज
शरीर के कुछ और संकेत भी बहुत कुछ बताते हैं. जैसे पेशाब का रंग बदलना, पैरों में सूजन या आंखों के आसपास फुलाव, ये सब किडनी स्ट्रेस की ओर इशारा कर सकते हैं. इसी तरह बार-बार पेट फूलना, भूख कम लगना या खाने के बाद असहजता महसूस होना लिवर या पैंक्रियाज की परेशानी का संकेत हो सकता है. त्वचा, बाल और नाखून भी शरीर के अंदर की स्थिति को दिखाते हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, त्वचा का फीका पड़ना, खुजली या हल्का पीलापन इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर के अंदर कुछ ठीक नहीं है. इसके अलावा बालों का पतला होना या नाखूनों का कमजोर होना भी पोषण की कमी या आंतरिक असंतुलन दर्शाता है. कई बार हल्की-फुल्की समस्याएं जैसे पीठ में जकड़न, पैरों में सुन्नता या खड़े होने पर चक्कर आना भी नजरअंदाज कर दिए जाते हैं.
इससे बचने के लिए क्या कर सकते हैं?
इन सभी संकेतों से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है कि रोजमर्रा की अच्छी आदतें अपनाना. पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना, प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा नमक-चीनी से दूरी बनाना, नियमित व्यायाम और पूरी नींद, ये सब शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. इसके साथ ही, बिना लक्षण के भी समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना जरूरी है. यही नहीं, एक अहम स्टडी जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में पब्लिश हुई है, बताती है कि आजकल लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां चुपचाप बढ़ रही हैं और अक्सर इनका पता तब चलता है जब लोग रूटीन चेकअप करवाते हैं. यानी शरीर पहले संकेत देता है, लेकिन हम उन्हें समझ नहीं पाते. इसलिए समय से चेकअप करवाना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:03 +0530</pubDate>
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<title>Weight Loss Tips: क्रैश डाइट नहीं, बैलेंस्ड लाइफस्टाइल से घटेगा वजन, चेन्नई की इंफ्लुएंसर ने बताया फिटनेस सीक्रेट</title>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:03 +0530</pubDate>
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<title>Blood Kick Trend: भोपाल में फैला &amp;apos;ब्लड किक&amp;apos; का जानलेवा नशा, सुकून के लिए अपना ही खून निकाल रहे युवा</title>
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<description><![CDATA[ Is Injecting Your Own Blood Dangerous: भोपाल में एक बेहद खतरनाक और चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है, जिसे डॉक्टर ब्लड किक के नाम से पहचान रहे हैं. यह कोई सामान्य नशा नहीं है, न इसमें शराब है, न ड्रग्स. लेकिन इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर उतने ही गंभीर और जानलेवा हो सकते हैं. इस अजीब आदत में कुछ युवा अपने ही शरीर से खून निकालकर उसे दोबारा इंजेक्ट करते हैं, ताकि उन्हें कुछ पलों के लिए ऊर्जा, सुकून या कंट्रोल का एहसास हो सके.
जनवरी 2026 से अब तक गांधी मेडिकल कॉलेज में ऐसे कम से कम पांच मामले सामने आ चुके हैं. सभी मरीज 18 से 25 साल के हैं. शुरुआत में परिवार को सिर्फ व्यवहार में बदलाव दिखता है, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेले रहना. लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि उन्हें साइकेट्रिक के पास ले जाना पड़ता है.
&amp;nbsp;पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग
हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि यह पारंपरिक नशे से बिल्कुल अलग मामला है. इन युवाओं में न शराब के लक्षण मिलते हैं, न ड्रग्स के. लेकिन शरीर पर सुई के निशान साफ दिखाई देते हैं. उनका मानना होता है कि अपने ही खून को दोबारा शरीर में डालने से उन्हें तुरंत राहत मिलती है, जबकि असल में यह एक खतरनाक मानसिक और शारीरिक जाल है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, साइकेट्रिस्ट डॉ जेपी अग्रवाल के अनुसार, यह व्यवहारिक लत है, कोई इलाज नहीं. दिमाग इस प्रक्रिया को एक इनाम की तरह लेने लगता है. खून निकालने का दर्द और उसके बाद मिलने वाला एहसास धीरे-धीरे आदत बन जाता है. वे बताते हैं यह खून के बारे में नहीं, बल्कि उस झूठे सुकून के बारे में है, जिसे व्यक्ति महसूस करता है.
बेहद गंभीर मामले
एक्सपर्ट के अनुसार, इसके खतरे बेहद गंभीर हैं. बार-बार खुद को इंजेक्शन लगाने से शरीर में इंफेक्शन फैल सकता है. सेप्सिस, एचआईवी, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा नसों को नुकसान, खून के थक्के, एनीमिया और यहां तक कि अंग फेल होने का जोखिम भी रहता है. शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया इस तरह के दबाव को झेल नहीं पाती और कुछ मामलों में यह अचानक मौत का कारण बन सकता है.
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मेंटल हेल्थ पर असर
डॉक्टर यह भी बताते हैं कि यह समस्या सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ी है. इसके पीछे अक्सर डिप्रेशन, आत्म-नुकसान की प्रवृत्ति या ध्यान पाने की इच्छा छिपी होती है. यानी यह एक तरह से अंदर के दर्द का संकेत है, जो बाहर सुकून के रूप में दिखाई देता है. सोशल मीडिया भी इस खतरनाक ट्रेंड को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है. अजीब और जोखिम भरे कंटेंट युवाओं को एक्सपेरिमेंट करने के लिए उकसाते हैं, जो धीरे-धीरे लत में बदल जाता है.
डॉ. जेपी अग्रवाल साफ चेतावनी देते हैं, जो खून आपको जिंदा रखता है, वही गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर जान भी ले सकता है. यह कोई थ्रिल नहीं, बल्कि क्लिनिकल डेथ की ओर बढ़ता कदम है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:03 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Heat Impact On Sperm Quality; गर्मियों में धूप में बाइक खड़ी करने से पहले 100 बार सोचना, वरना नहीं बन पाओगे पापा</title>
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<description><![CDATA[ Can Heat Damage Sperm Quality In Men: गर्मियों में तेज धूप में बाइक खड़ी करना कई लोगों के लिए रोज की बात है. जल्दी में हम अक्सर इस बात पर ध्यान ही नहीं देते कि कुछ घंटों तक धूप में खड़ी रही बाइक कितनी ज्यादा गर्म हो जाती है. लेकिन शायद ही कोई यह सोचता हो कि इसका असर सिर्फ बाइक पर नहीं, बल्कि आपकी सेहत खासतौर पर पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर भी पड़ सकता है.&amp;nbsp;
क्या होता है असर?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट cloudninecare शरीर के बाकी हिस्सों की तुलना में स्पर्म सेल्स तापमान के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं. यही वजह है कि टेस्टिकल्स शरीर के बाहर होते हैं, ताकि उनका तापमान शरीर से 2&amp;ndash;4 डिग्री कम बना रहे. यह संतुलन स्पर्म के सही विकास के लिए बेहद जरूरी होता है. लेकिन जब आप धूप से गर्म चीजों के संपर्क में आते हैं, तो गर्मी सीधे इस हिस्से का तापमान बढ़ा देती है.
एक्सपर्ट्स के अनुसार, लंबे समय तक ज्यादा गर्मी के संपर्क में रहने से स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या दोनों पर असर पड़ सकता है. हाई टेम्परेचर स्पर्म की मूवमेंट &amp;nbsp;को धीमा कर देता है, जिससे उनकी स्टिकल्स तक पहुंचने की क्षमता कम हो जाती है. इतना ही नहीं, ज्यादा गर्मी स्पर्म के डीएनए को भी नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे उनकी संरचना असामान्य हो जाती है.
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हार्मोनल बैलेंस पर भी असर
गर्मी का असर सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. लगातार शरीर के उस हिस्से का तापमान बढ़ने से हार्मोनल बैलेंस भी बिगड़ सकता है. टेस्टोस्टेरोन जैसे जरूरी हार्मोन, जो स्पर्म प्रोडक्शन को नियंत्रित करते हैं, उनका स्तर प्रभावित हो सकता है. इसके साथ ही, ज्यादा गर्मी से शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है, जो टेस्टिकल्स को नुकसान पहुंचा सकता है. गर्मियों में डिहाइड्रेशन भी एक बड़ी समस्या बन जाता है. शरीर में पानी की कमी होने पर ब्लड फ्लो और हार्मोन का ट्रांसपोर्ट प्रभावित होता है. इससे स्पर्म बनने की प्रक्रिया और भी कमजोर हो सकती है. याद रखें, सीमन का बड़ा हिस्सा पानी से बना होता है, इसलिए शरीर का हाइड्रेटेड रहना बहुत जरूरी है.
इन चीजों का भी होता है असर
इसके अलावा टाइट कपड़े पहनना, लंबे समय तक गर्म सीट पर बैठना और लगातार धूप में रहना ये सभी चीजें मिलकर स्थिति को और खराब कर सकती हैं. यही कारण है कि एक्सपर्ट्स गर्मियों में शरीर को ठंडा रखने और ज्यादा हीट एक्सपोजर से बचने की सलाह देते हैं. अगर आप रोजाना बाइक इस्तेमाल करते हैं, तो कोशिश करें कि उसे सीधी धूप में लंबे समय तक खड़ा न रखें. कवर का इस्तेमाल करें या छांव में पार्क करें. बाइक चलाने से पहले सीट को थोड़ा ठंडा होने दें. इसके साथ ही, ढीले और आरामदायक कपड़े पहनें और शरीर को हाइड्रेट रखें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:03 +0530</pubDate>
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<title>Therapy For Hearing Loss: जन्म से बहरेपन का इलाज अब मुमकिन! इस इंजेक्शन से लौटेगी बच्चों की सुनने की शक्ति</title>
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<description><![CDATA[ Can Gene Therapy Cure Congenital Deafness: जन्म से सुनने की समस्या झेल रहे लोगों के लिए दुनिया हमेशा से कुछ हद तक खामोश रही है. इस स्थिति को कंजेनिटल डेफनेस कहा जाता है, जो जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है और व्यक्ति के बातचीत, पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर डालती है. अक्सर इसके पीछे जेनेटिक कारण होते हैं, यानी कुछ खास जीन में बदलाव, जो पीढ़ियों के जरिए आगे बढ़ते हैं. अब तक ऐसे मामलों में हियरिंग एड या कॉक्लियर इम्प्लांट जैसे विकल्प ही उपलब्ध थे, जो मदद तो करते हैं, लेकिन पूरी तरह से प्राकृतिक सुनने की क्षमता वापस नहीं ला पाते.&amp;nbsp;
नई उम्मीद
इसी बीच स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टिट्यूट &amp;nbsp;से आई एक नई स्टडी ने उम्मीद की नई किरण जगाई है. यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित हुआ है. इसमें बताया गया है कि जीन थेरेपी के जरिए एक खास तरह की जेनेटिक बहरापन को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है, वह भी बच्चों और युवाओं दोनों में.&amp;nbsp;
कहां हुई है खोज?
इस रिसर्च में साइंटिस्ट ने चीन के अस्पतालों और विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर 1 से 24 साल की उम्र के 10 मरीजों पर काम किया. इन सभी में सुनने की समस्या OTOF जीन में बदलाव के कारण थी. यह जीन ओटोफरलिन नाम के एक प्रोटीन को बनाने में अहम भूमिका निभाता है, जो कान से दिमाग तक ध्वनि संकेत पहुंचाने में मदद करता है. जब यह प्रोटीन ठीक से काम नहीं करता, तो कान आवाज को महसूस तो कर लेता है, लेकिन दिमाग तक सही तरीके से सिग्नल नहीं पहुंच पाता.
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ऐसे निकला समस्या का हल
इस समस्या के समाधान के लिए रिसर्चर ने जीन थेरेपी का इस्तेमाल किया. इसमें एक स्वस्थ जीन को शरीर में पहुंचाया जाता है. इसके लिए एक सुरक्षित वायरस एडेनो-असोसिएटेड वायरस का इस्तेमाल किया गया, जिसके जरिए काम करने वाला OTOF जीन सीधे कान के अंदर पहुंचाया गया. यह प्रक्रिया कॉक्लिया के निचले हिस्से में मौजूद राउंड विंडो नाम की जगह पर एक छोटे इंजेक्शन के जरिए की गई. नतीजे काफी उत्साहजनक रहे. कई मरीजों ने सिर्फ एक महीने के भीतर ही सुनने में सुधार महसूस करना शुरू कर दिया. छह महीने बाद सभी प्रतिभागियों में स्पष्ट रूप से फायदा देखा गया. वे पहले की तुलना में काफी धीमी आवाजें भी सुनने लगे, जो पहले उनके लिए असंभव था.
बच्चों में सुधार
खास बात यह रही कि बच्चों में सुधार सबसे ज्यादा देखा गया, खासकर 5 से 8 साल की उम्र के बीच. एक छोटी बच्ची ने तो इलाज के कुछ महीनों के भीतर लगभग सामान्य सुनने की क्षमता हासिल कर ली और अपनी मां से आसानी से बातचीत करने लगी. इससे यह भी संकेत मिलता है कि समय रहते इलाज शुरू किया जाए तो परिणाम और बेहतर हो सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:02 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Drinking Risks: सावधान! हफ्ते में एक दिन भी ज्यादा शराब पीना लिवर के लिए घातक, नई स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा</title>
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<description><![CDATA[ Is Occasional Binge Drinking Dangerous: अक्सर लोग ऐसा ही सोचते हैं कि कभी-कभार ज्यादा शराब पी लेना कोई बड़ी बात नहीं है. खासकर तब, जब वे पूरे हफ्ते बहुत कम या बिल्कुल नहीं पीते. लेकिन अब एक नई स्टडी इस धारणा को चुनौती दे रही है और बता रही है कि ऐसी आदतें लिवर के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं. अमेरिका के केक मेडिसिन और निवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया के रिसर्चर के तरफ से की गई यह स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल क्लिनिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और हेपेटोलॉजी में पब्लिश हुई है. इसमें सामने आया है कि कभी-कभार भी ज्यादा मात्रा में शराब पीना लिवर डैमेज के खतरे को काफी बढ़ा सकता है.
क्या निकला रिसर्च में?&amp;nbsp;&amp;nbsp;
यह रिसर्च खास तौर पर एक बीमारी मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) पर केंद्रित थी, जो आज दुनिया में तेजी से बढ़ती लिवर से जुड़ी समस्याओं में से एक है. इस बीमारी में लिवर में फैट जमा हो जाता है, जो आगे चलकर सूजन और स्कारिंग जैसी गंभीर स्थितियों का कारण बन सकता है. आमतौर पर यह समस्या मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहे लोगों में ज्यादा देखी जाती है.&amp;nbsp;
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&amp;nbsp;शराब पीने पर कितना असर?
रिसर्चर ने सिर्फ यह नहीं देखा कि लोग कितनी शराब पीते हैं, बल्कि यह भी समझने की कोशिश की कि पीने का तरीका कितना असर डालता है. उन्होंने एपिसोडिक हेवी ड्रिंकिंग यानी एक ही दिन में ज्यादा शराब पीने की आदत पर फोकस किया. इसमें महिलाओं के लिए एक दिन में चार या उससे ज्यादा ड्रिंक और पुरुषों के लिए पांच या उससे ज्यादा ड्रिंक शामिल किए गए, वह भी महीने में कम से कम एक बार. यह भी सामने आया कि युवा और पुरुष इस तरह की ड्रिंकिंग के प्रति ज्यादा झुकाव रखते हैं. इसके साथ ही, एक बार में ज्यादा शराब पीने वालों में लिवर को होने वाला नुकसान भी ज्यादा गंभीर पाया गया. एक्सपर्ट का मानना है कि एक साथ ज्यादा शराब पीने से लिवर पर अचानक दबाव पड़ता है, जिससे सूजन और नुकसान का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
रिजल्ट चौंकाने वाले
2017 से 2023 के बीच 8,000 से ज्यादा एडल्ट के डेटा का एनालिसि करने पर चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. जिन लोगों को MASLD था और जो इस तरह की हेवी ड्रिंकिंग करते थे, उनमें एडवांस्ड लिवर फाइब्रोसिस का खतरा लगभग तीन गुना ज्यादा पाया गया. यह वह स्थिति है, जब लिवर में स्कार टिश्यू बन जाता है और उसकी काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है. स्टडी की एक अहम बात यह रही कि कुल शराब की मात्रा से ज्यादा मायने उसका सेवन करने का तरीका रखता है. यानी दो लोग अगर हफ्ते में बराबर मात्रा में शराब पीते हैं, तो जो व्यक्ति उसे एक ही दिन में खत्म करता है, उसके लिवर पर ज्यादा खतरा मंडराता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:02 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Bone Broth Soup Benefits : बोन ब्रोथ सूप से बढ़ाएं प्रोटीन और पाएं मजबूत गट हेल्थ, जानें इसके फायदे</title>
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<description><![CDATA[ Bone Broth Soup Benefits : बोन ब्रोथ सूप से बढ़ाएं प्रोटीन और पाएं मजबूत गट हेल्थ, जानें इसके फायदे ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:01:02 +0530</pubDate>
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<title>When a child’s eyes don’t align: 5 warning signs of squint every parent must know</title>
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<description><![CDATA[ Squint does not correct itself with time. Waiting usually makes things harder. If left untreated, it can lead to amblyopia (lazy eye), where the brain starts ignoring input from one eye. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:07:36 +0530</pubDate>
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<title>World homoeopathy day 2026: From chronic allergies to hormonal health &#45; Looking beyond symptoms</title>
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<description><![CDATA[ World homoeopathy day 2026: What homoeopathy does is not obvious at first glance. It doesn’t rush to name things. It lingers. The concern is not merely what is wrong, but how that wrongness settles into a person’s everyday. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:07:36 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Night shifts are silently destroying your health, even if you&amp;apos;re young and fit, study warns</title>
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<description><![CDATA[ In a study, 77% of night shift workers had insulin resistance, a precursor to Type 2 diabetes, compared to 62% among day workers. Notably, this was observed despite night workers being younger on average.
  ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:07:35 +0530</pubDate>
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<title>Is Zombie Apocalypse happening? Experts explain the medical reality behind growing &amp;apos;zombie drug&amp;apos; fears</title>
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<description><![CDATA[ Videos from Chandigarh and Bengaluru showing alleged &#039;zombie drug&#039; effects went viral on social media in March–April 2026, sparking widespread panic and speculation online. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:07:35 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Nutritionist reveals how to balance nutrition for a healthier life</title>
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<description><![CDATA[ A good starting point is building meals that include adequate protein, healthy fats, and fibre, while also bringing in a basic awareness of calorie intake and macro distribution.  ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:07:35 +0530</pubDate>
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<title>Want to get a tattoo? Here are 6 important things you should never ignore</title>
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<description><![CDATA[ Before you go get that tattoo you&#039;ve been dreaming of, here are 6 important things you need to keep in mind. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:07:34 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Amit Shah Diabetes Recovery: 6 साल में डायबिटीज से कैसे उबरे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह? खुद बयां किया जंग जीतने का किस्सा</title>
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<description><![CDATA[ Diabetes Control Without Insulin: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी सेहत को लेकर एक प्रेरणादायक अनुभव साझा किया. उन्होंने बताया कि कैसे एक समय डायबिटीज से जूझने के बाद उन्होंने अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव कर न सिर्फ बीमारी पर काबू पाया, बल्कि खुद को पहले से ज्यादा फिट बना लिया. चलिए आपको बताते हैं कि उन्होने डायबिटीज से लड़ने में क्या उपाय अपनाया.
अमित शाह ने क्या कहा?
वर्ल्ड लीवर डे के मौके 2025 पर आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि &quot;मैं डायबिटिक था, लेकिन मई 2020 के बाद मैंने अपनी दिनचर्या में बड़े बदलाव किए.&quot; उन्होंने बताया कि सही मात्रा में नींद लेना, पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार अपनाना और नियमित एक्सरसाइज करना उनकी सेहत के लिए गेमचेंजर साबित हुआ. उन्होंने आगे कहा कि &quot;आज मैं आपके सामने बिना किसी एलोपैथिक दवा और इंसुलिन के खड़ा हूं.&quot;&amp;nbsp;
&amp;nbsp;

#WATCH | Delhi: At the event organised by ILBS (Institute of Liver and Biliary Sciences) on World Liver Day, Union Home Minister Amit Shah says, &quot;... I made a huge change in my life since May 2020 till today. The required amount of sleep, water and diet, and routine exercise has&amp;hellip; pic.twitter.com/HxDZgv0YGh
&amp;mdash; ANI (@ANI) April 19, 2025



टी-छोटी आदतों को लगातार अपनाना
उन्होंने यह भी बताया कि इन बदलावों की वजह से उनका वजन 20 किलो से ज्यादा कम हुआ. उनका मानना है कि कोई भी बड़ा बदलाव अचानक नहीं होता, बल्कि छोटी-छोटी आदतों को लगातार अपनाने से ही लंबे समय तक असर दिखता है.
युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि शरीर और दिमाग दोनों को स्वस्थ रखना जरूरी है. अपने शरीर के लिए रोजाना दो घंटे एक्सरसाइज और दिमाग के लिए कम से कम छह घंटे की नींद जरूर लें। यह मेरे अपने अनुभव से निकली सलाह है.
 डिसिप्लिन और संतुलन
अगर उनकी इस जर्नी से कुछ सीखना हो, तो सबसे जरूरी है डिसिप्लिन और संतुलन. अच्छी नींद, भरपूर पानी और घर का संतुलित खाना शरीर को अंदर से मजबूत बनाता है. प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा शुगर से दूरी बनाकर रखना भी उतना ही जरूरी है. नियमित एक्सरसाइज को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए. यह जरूरी नहीं कि हमेशा जिम ही जाएं, आप वॉक, योग, या कोई खेल भी चुन सकते हैं. सबसे अहम है निरंतरता. इसके अलावा, जल्दी परिणाम पाने के चक्कर में क्रैश डाइट या शॉर्टकट अपनाने से बचना चाहिए. असली बदलाव धीरे-धीरे आता है और वही टिकाऊ होता है.
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लाइफस्टाइल में क्या बदलाव करना चाहिए?
उन्होंने यह भी बताया कि लिवर का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. इसके लिए शराब का सीमित सेवन, ज्यादा तैलीय खाने से बचाव और हरी सब्जियां, खट्टे फल और हल्दी जैसे खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करना फायदेमंद होता है. अंत में उनका यही संदेश था कि शुरुआत छोटी करें, लेकिन लगातार करें. एक-एक बदलाव जोड़ते जाएं, और समय के साथ यही आदतें आपकी सेहत को पूरी तरह बदल सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:04:19 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>क्या किसी महिला को महीने में दो बार पीरियड्स आ सकते हैं, कितनी खतरनाक होती है यह सिचुएशन? </title>
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<description><![CDATA[ Irregular Menstruation: महीने में एक बार पीरियड्स होना आम बात है लेकिन 2 बार होना चिंता का विषय बन सकता है. हालांकि, इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. अगर यह चीज महिला के साथ बार-बार हो रहा है कि उन्हें महीने में 2 बार पीरियड्स आ रहा है तो बिना समय गवाएं उन्हें तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए. साथ ही आज के समय में महिलाओं में पीरियड्स से जुड़ी कई समस्याएं देखने को मिलती हैं.
अपने पीरियड्स साइकल को समझें&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;
आमतौर पर पीरियड का चक्र 28 दिनों का होता है, लेकिन अगर यह 21 से 35 दिनों के बीच भी है तो इसे सामान्य माना जाता है. लेकिन वही अगर आपका पीरियड चक्र 21 दिनों से छोटा या 36 दिनों से बड़ा है, या हर महीने इसकी तारीखों में बहुत ज़्यादा अंतर आता है, तो इसे अनियमित माना जाता है. साथ ही तनाव या लाइफस्टाइल में बदलाव की वजह से कभी-कभी पीरियड की तारीख ऊपर-नीचे होना बिल्कुल नॉर्मल बात है. लेकिन अगर ऐसा बार-बार या लगातार हो रहा है, तो ये आपके शरीर के लिए खतरनाक साबित हो रहा है.
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महीने में दो बार पीरियड्स होने के पीछे का कारण

हार्मोनल असंतुलन: हार्मोन में उतार-चढ़ाव एक महीने में दो बार पीरियड्स आने का सबसे बड़ा कारण है. एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन हमारे पीरियड्स के चक्र को चलाने में मदद करते हैं. वही जब इन हार्मोनों का संतुलन बिगड़ जाता है, तो पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं और महीने में एक से ज़्यादा बार आ सकते हैं. यह समझना ज़रूरी है कि बहुत ज़्यादा तनाव, या जीवन जीने के तरीके में बदलाव की वजह से हार्मोन का यह संतुलन बिगड़ सकता है.
PCOS: PCOS (पीसीओएस) हार्मोन से जुड़ी एक आम समस्या है जिसकी वजह से पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं और महीने में दो बार भी आ सकते हैं. इसमें महिलाओं की ओवरी में छोटी-छोटी गांठें बन जाते हैं, जो पीरियड्स के सही समय को बिगाड़ देते हैं.
गर्भाशय फाइब्रॉएड: Uterine Fibroids गर्भाशय में होने वाली छोटी गांठें होती हैं, ये गांठें कहाँ और कितनी बड़ी हैं, इस आधार पर पीरियड्स में बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग या अनियमितता होती है, और कभी-कभी महीने में दो बार भी पीरियड्स भी आ सकते हैं.
थायराइड विकार: &amp;nbsp;थायराइड की समस्या, जैसे हाइपरथायरायडिज्म या हाइपोथायरायडिज्म, आपके पीरियड्स के चक्र को बिगाड़ सकती है. ये बीमारियाँ थायराइड ग्रंथि (thyroid gland) से निकलने वाले हार्मोन को प्रभावित करती हैं, जिससे पीरियड्स के समय और ब्लीडिंग कम या ज़्यादा होने में बदलाव होने लगता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:04:19 +0530</pubDate>
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<title>Post Lunch Sleepiness: लंच के बाद सवार हो जाती है सुस्ती और आने लगती है नींद, हल्के में न लीजिए ये लक्षण</title>
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<description><![CDATA[ Why Do I Feel Very Sleepy After Lunch Every Day: दोपहर का खाना खाने के बाद सुस्ती आना और नींद लगना कई लोगों के लिए आम बात है. लंच के बाद आने वाली यह थकान अक्सर लोगों की कंसंट्रेशन को प्रभावित करती है और वे खुद को जागे रहने के लिए चाय या कॉफी का सहारा लेते हुए पाते हैं. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अगर यह समस्या रोज होने लगे, तो इसे सिर्फ भारी खाना खाकर हुई थकान समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
भारत के जाने-माने डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. वी मोहन ने इसको लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया. उन्होंने अपने पोस्ट में बताया कि खाने के बाद होने वाली थकान इस बात का संकेत हो सकती है कि हमारा शरीर भोजन को कैसे प्रोसेस कर रहा है, हार्मोन कैसे बैलेंस हो रहे हैं और ब्लड शुगर का स्तर किस तरह कंट्रोल हो रहा है. वे बताते हैं कि खाना खाने के बाद हल्की रिलैक्सेशन महसूस होना सामान्य है, लेकिन अगर हर दिन खाने के बाद बहुत ज्यादा नींद आने लगे, थकान महसूस हो या ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत हो, तो यह एक चेतावनी संकेत हो सकता हैय यह इस बात की ओर इशारा करता है कि शरीर में ब्लड शुगर सही तरीके से नियंत्रित नहीं हो रहा है.&amp;nbsp;
नींद आने के क्या होते हैं कारण?
खाना खाने के बाद नींद आने के पीछे एक नेचुरल कारण भी होता है. दरअसल, भोजन के बाद शरीर पाचन प्रक्रिया को तेज करने के लिए पेट और आंतों की ओर अधिक ब्लड भेजता है. ऐसे में कुछ समय के लिए ब्रेन तक पहुंचने वाला &amp;nbsp;ब्लड थोड़ा कम हो सकता है, जिससे हल्की सुस्ती महसूस होती है. डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि भारी भोजन के तुरंत बाद ज्यादा मेहनत वाला काम या व्यायाम करने से बचना चाहिए. खासकर दिल के मरीजों में इस दौरान ब्लड फ्लो में बदलाव के कारण सीने में दर्द की समस्या बढ़ सकती है.
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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका
ज्यादा खाना या गलत तरह का खाना भी इस समस्या को बढ़ाता है. बड़ी मात्रा में भोजन करना, खासकर सफेद चावल, मिठाई या तले हुए खाद्य पदार्थ जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट से भरपूर चीजें खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है. इसके बाद शरीर इंसुलिन रिलीज करता है, जिससे शुगर लेवल अचानक गिरता है और व्यक्ति को थकान, कमजोरी या नींद महसूस होती है. अगर हर बार खाने के बाद ऐसा महसूस हो, तो यह प्रीडायबिटीज या डायबिटीज का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. बार-बार एनर्जी का गिरना इस बात की ओर इशारा करता है कि शरीर में शुगर का स्तर स्थिर नहीं रह पा रहा है.
कैसे कर सकते हैं बचाव?
हालांकि, कुछ आसान लाइफस्टाइल बदलाव इस समस्या से बचने में मदद कर सकते हैं. कम मात्रा में भोजन करना, खाने में प्रोटीन और सब्जियों को शामिल करना और मीठे व रिफाइंड फूड को कम करना काफी फायदेमंद साबित हो सकता है. इसके अलावा, खाना खाने के बाद थोड़ी देर टहलना भी ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद करता है. नियमित रूप से सक्रिय रहना, पर्याप्त नींद लेना और स्वस्थ वजन बनाए रखना शरीर की ऊर्जा को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<title>Hemoglobin Deficiency: अच्छी डाइट के बावजूद शरीर में हो रही हीमोग्लोबिन की कमी, जानें कहां हो रही दिक्कत?</title>
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<description><![CDATA[ Hemoglobin Deficiency: काफी लोग अपनी सेहत को लेकर बहुत जागरूक होते हैं. वे हर काम समय के अनुसार करते हैं, अच्छी डाइट लेते हैं और नियमित रूप से एक्सरसाइज भी करते हैं। लेकिन इसके बावजूद उनके शरीर में खून की कमी की समस्या खत्म नहीं होती.हीमोग्लोबिन हमारे शरीर में ऑक्सीजन को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम करता है,ऐसे में खून की कमी से उन्हें जल्दी थकान होने लगती है, चक्कर आने लगते हैं और कई बार आंखों के सामने अंधेरा भी छाने लगता है.
&amp;nbsp;क्यों होती है यह समस्या?
यह स्थिति काफी हैरान करने वाली होती है कि इतना अच्छा खानपान और हेल्थ कॉन्शियस होने के बावजूद भी शरीर में खून की कमी क्यों हो रही है.ऐसे में आपके मन में यह सवाल जरूर आता होगा कि आखिर ऐसा क्यों होता है और क्या यह किसी नई बीमारी का संकेत तो नहीं है
&amp;nbsp;सही अवशोषण का महत्व
सबसे पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि सिर्फ हेल्दी खाना खाना ही काफी नहीं होता, बल्कि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जो हम खा रहे हैं, उसका हमारे शरीर में सही तरीके से अवशोषण (Absorption) हो रहा है या नहीं.कई बार लोग आयरन से भरपूर चीजें जैसे हरी सब्जियां, दाल और फल तो खाते हैं, लेकिन शरीर उन्हें ठीक से अवशोषित नहीं कर पाता। यहीं से असली समस्या शुरू होती है और शरीर में खून की कमी होने लगती है.
यह भी पढ़ेंः कमर दर्द के साथ दिखें ये बदलाव तो तुरंत कराएं जांच, हो सकती है किडनी फेल
&amp;nbsp;विटामिन C की भूमिका
इसका एक कारण विटामिन C की कमी भी हो सकती है, क्योंकि यह आयरन को शरीर में अवशोषित करने में मदद करता है. इसलिए अगर आप आयरन ले रहे हैं, लेकिन साथ में विटामिन C युक्त चीजें जैसे नींबू, संतरा नहीं ले रहे हैं, तो शरीर आयरन का उपयोग नहीं कर पाता.&amp;nbsp;
&amp;nbsp;पाचन तंत्र का प्रभाव
अगर आपका डाइजेशन सही नहीं है, तो शरीर पोषक तत्वों को सही से नहीं ले पाता.जिसमें गैस, एसिडिटी &amp;nbsp;से जुड़ी समस्याएं हो सकती है जो हीमोग्लोबिन कम होने का कारण बन सकती हैं.
महिलाओं में अधिक समस्या
महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है, खासकर उनको जिनको पीरियड्स में ज्यादा ब्लीडिंग होती है इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान भी शरीर को ज्यादा आयरन की जरूरत होती है, और अगर इस दौरान सही ध्यान न रखा जाए तो हीमोग्लोबिन कम हो सकता है.
विटामिन B12 और फोलिक एसिड की कमी
इसके अलावा विटामिन &amp;nbsp;B12 और फोलिक एसिड की कमी भी हीमोग्लोबिन नहीं बढ़ने देती क्योंकि &amp;nbsp;ये दोनों Red Blood Cells के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं वही अगर शरीर में इनकी ही कमी होने लगे तो शरीर में खून बनने कि प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है.
यह भी पढ़ेंः&amp;nbsp;क्या आप भी रहते हैं हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट को लेकर कन्फ्यूज, जानें दोनों में क्या अंतर? ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:04:19 +0530</pubDate>
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<title>Fake Cancer Drug Racket India: 1.5 लाख का &amp;apos;जादुई&amp;apos; कैंसर इंजेक्शन निकला नकली, ऐसे चल रहा था खौफनाक खेल</title>
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<description><![CDATA[ How Fake Keytruda Reached Cancer Patients In India: पंजाब के एक साधारण घर से शुरू हुई यह कहानी भारत में कैंसर इलाज की एक खतरनाक सच्चाई को उजागर करती है. साल 2022 की शुरुआत में चंडीगढ़ के पास रहने वाली 56 वर्षीय महिला का लिवर कैंसर का इलाज PGIMER में चल रहा था. डॉक्टरों ने उन्हें एक महंगी इम्यूनोथेरेपी दवा कीट्रूडा &amp;nbsp;लेने की सलाह दी, जिसकी कीमत 100 mg की एक वायल के लिए 1.5 लाख रुपये से ज्यादा है. इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं था, इसलिए परिवार ने सितंबर से दिसंबर के बीच 12 वायल डिस्काउंट पर करीब 16 लाख रुपये में खरीदीं। लेकिन कुछ समय बाद दिल्ली पुलिस का फोन आया और पता चला कि ये दवाएं नकली थीं, जिनमें एंटीफंगल दवा भरी गई थी.
जांच में खुलासा
यह मामला अकेला नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस औरइंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स की संयुक्त जांच में सामने आया है कि भारत में महंगी कैंसर दवाओं, खासकर कीट्रूडा, का एक बड़ा नकली बाजार सक्रिय है. इस जांच में 12,500 से ज्यादा पन्नों के रिकॉर्ड, अस्पताल डेटा और डॉक्टरों से बातचीत शामिल रही.
बेहद संगठित तरीके से काम करता है नेटवर्क 
जांच में पता चला कि यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता है. खाली वायल इकट्ठा की जाती हैं, उनमें दूसरी दवाएं भरकर दोबारा सील किया जाता है और फिर बाजार में सस्ती कीमत पर बेचा जाता है. कई बार यह कीमत असली से 40 प्रतिशत तक कम होती है, जिससे मरीजों को यह राहत लगती है, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन जाती है.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क में अस्पतालों के अंदर के लोग भी शामिल पाए गए. दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर में काम करने वाले कुछ फार्मासिस्ट कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए या आधे भरे वायल बाहर ले जाते थे और उन्हें इस रैकेट को बेचते थे. पुलिस ने छापेमारी में कई वायल, खाली बॉक्स और संदिग्ध बैच नंबर बरामद किए, जो सीधे मरीजों को दी गई दवाओं से मेल खाते थे. जांच में जब पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलनी शुरू कीं, तो एक अहम नाम सामने आया, परवेज. वह पहले एक अस्पताल में फार्मासिस्ट के तौर पर काम कर चुका था और बाद में इस रैकेट का अहम हिस्सा बन गया. पुलिस के मुताबिक, परवेज ही वह कड़ी था जो अस्पताल के अंदर से दवाओं को बाहर लाने और उन्हें आगे सप्लाई करने का काम संभाल रहा था.
अस्पताल में काम करने वाले लोग शामिल
परवेज ने यह भी बताया कि उसने अस्पताल में काम करने वाले कोमल और अभय से संपर्क किया, जो उसे खाली और भरी हुई वायल उपलब्ध कराते थे. उसने बताया कि मैं खाली &amp;nbsp;वायल के 3000 दूंगा और अगर अगर वो इंजेक्शन भरा उपलब्ध करवाते हैं, तो उसके बदले में 40 हजार से 50 हजार दिया जाएगा. इस तरह 8 से 9 महीने में 10- 12 भरा वायल और 120 वायर कोमल से उसे मिला और अभय ने उसे 10 खाली और 10-12 भरा वायर दिया. जो बाद में इस अवैध नेटवर्क के जरिए बेची गईं.
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मरीज की हो गई मौत
जांच में यह भी सामने आया कि अस्पतालों में सख्त प्रोटोकॉल होने के बावजूद एक बड़ी कमी थी कि खाली वायल की गिनती का कोई ठोस सिस्टम नहीं था. इसी खामी का फायदा उठाकर यह पूरा खेल चलाया गया. बाद में अस्पतालों ने निगरानी बढ़ाई, CCTV सिस्टम मजबूत किया और दवा निपटान की प्रक्रिया को और सख्त बनाया. इस रैकेट का सबसे दर्दनाक असर मरीजों पर पड़ता है. बिहार की एक महिला, जो सस्ती दवा की तलाश में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से इंजेक्शन खरीद रही थीं, इलाज के दौरान ही हालत बिगड़ने के बाद दम तोड़ गईं. बाद में परिवार को पता चला कि दवा नकली हो सकती थी. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक गैंग तक सीमित नहीं है. यह एक बड़े सिस्टम की कमजोरी को दिखाता है, जहां महंगे इलाज और आर्थिक दबाव के बीच मरीज आसानी से ठगी का शिकार बन जाते हैं.
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:04:18 +0530</pubDate>
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<title>Roti or Rice Health Benefits: उत्तर भारत के लोग ज्यादातर रोटी खाते हैं लेकिन दक्षिण के चावल, जानें सेहत के लिए क्या है बेस्ट?</title>
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<description><![CDATA[ Roti or Rice Health Benefits : भारत में खाने की परंपरा बहुत अलग है. उत्तर भारत में जहां रोटी मुख्य खाना है, वहीं दक्षिण और पूर्व भारत में खाने में चावल का ज्यादा यूज होता है. अक्सर लोग इस बात पर बहस करते हैं कि रोटी ज्यादा हेल्दी है या चावल? कुछ लोग कहते हैं कि चावल खाने से वजन बढ़ता है, जबकि कई लोग मानते हैं कि चावल तो सदियों से हमारा मुख्य खाना रहा है और इसे खाने से लोग हेल्दी रहते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है.&amp;nbsp;
रोटी और चावल सेहत के लिए क्या बेस्ट है
असल में रोटी और चावल के बीच कौन बेहतर है, इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह व्यक्ति के शरीर, उसकी पाचन शक्ति, लाइफस्टाइल और खाने की आदतों पर निर्भर करता है. आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इस बात को मानते हैं कि हर इंसान के लिए एक जैसी डाइट सही नहीं होती है. जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर होती है, उनके लिए चावल हल्का और आसानी से पचने वाला ऑप्शन होता है, जबकि जिनका शरीर ज्यादा एक्टिव है और जो शारीरिक मेहनत करते हैं, उनके लिए रोटी ज्यादा एनर्जी और लंबे समय तक पेट भरा रखने वाली होती है.&amp;nbsp;
चावल और गेहूं के फायदे&amp;nbsp;
1. चावल और गेहूं दोनों को ही जरूरी अनाज माना गया है, लेकिन इनके गुण और प्रभाव अलग-अलग बताए गए हैं. आयुर्वेद के अनुसार हर खाने का असर शरीर की प्रकृति (प्रकृति), पाचन शक्ति (अग्नि) और दोषों (वात, पित्त, कफ) पर पड़ता है.
&amp;nbsp;2. चावल को आयुर्वेद में मीठे टेस्ट वाला, शरीर को ठंडक देने वाला और हल्का अनाज माना गया है, जो आसानी से पच जाता है.&amp;nbsp;3. इसे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ तीनों को संतुलित करने में मददगार बताया गया है. इसी कारण चावल को रोज खाने योग्य खाना माना गया है, खासकर जब इसे सही तरीके से पकाया जाए और बैलेंस डाइट के साथ लिया जाए.&amp;nbsp;&amp;nbsp;4. वहीं रोटी को भारी, ज्यादा पोषण देने वाला और शरीर को शक्ति प्रदान करने वाला अनाज कहा गया है.&amp;nbsp;5. यह शरीर में ताकत और एनर्जी बढ़ाने में मदद करता है और वात- पित्त दोष को शांत करता है. इसलिए गेहूं को विशेष रूप से उन लोगों के लिए अच्छा माना गया है जो शारीरिक रूप से ज्यादा एक्टिव रहते हैं या जिन्हें ज्यादा एनर्जी और ताकत की जरूरत होती है.&amp;nbsp;
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किन लोगों के लिए क्या बेहतर है?
चावल और रोटी दोनों ही अलग-अलग लोगों के लिए अलग तरह से फायदेमंद होते हैं. चावल को हल्का और आसानी से पचने वाला माना जाता है, इसलिए यह बीमार लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और कमजोर पाचन शक्ति वाले व्यक्तियों के लिए बेहतर ऑप्शन है. ऐसे लोगों के लिए खिचड़ी या दाल-चावल जैसा हल्का खाना ज्यादा यूजफुल होता है क्योंकि ये पेट पर ज्यादा बोझ नहीं डालते और आसानी से पच जाते हैं. वहीं दूसरी ओर रोटी, यानी गेहूं से बना खाना, ज्यादा एनर्जी और ताकत देने वाला माना जाता है, इसलिए यह उन लोगों के लिए बेहतर है जो शारीरिक मेहनत करते हैं, जैसे किसान या भारी काम करने वाले लोग, या जिनकी पाचन शक्ति मजबूत होती है.&amp;nbsp;
विज्ञान क्या कहता है?
विज्ञान के अनुसार, रोटी और चावल दोनों के अपने अलग-अलग पोषण गुण हैं, ऐसे में यह तय करना कि कौन बेहतर है, इसके लिए पूरा डाइट पैटर्न ज्यादा जरूरी होता है. गेहूं में चावल की तुलना में ज्यादा प्रोटीन और फाइबर पाया जाता है, जिससे यह पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है और एनर्जी धीरे-धीरे रिलीज करता है. वहीं चावल हल्का होता है और जल्दी पच जाता है. लेकिन जब इन्हें दाल, सब्जी और घी जैसे संतुलित आहार के साथ खाया जाता है, तो दोनों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) लगभग समान हो जाता है, यानी ब्लड शुगर पर इनका असर काफी हद तक संतुलित हो जाता है. इसलिए विज्ञान यह बताता है कि सिर्फ रोटी या चावल पर ध्यान देने की जगह पूरे खाने की क्वालिटी और बैलेंस ज्यादा फायदेमंद रखता है.&amp;nbsp;
किस अनाज से होता है शरीर को नुकसान&amp;nbsp;
आजकल हम जो अनाज खाते हैं वह बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड और रिफाइंड हो चुका है. पॉलिश किया हुआ सफेद चावल अपने छिलके और जर्म को खो देता है, जिससे उसमें फाइबर और जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं और उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बढ़ जाता है, जिसके कारण यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकता है. इसी तरह मैदा, जो गेहूं को बहुत ज्यादा रिफाइन करके बनाया जाता है, उसमें भी फाइबर और पोषण लगभग खत्म हो जाते हैं, जिससे यह पाचन के लिए भारी और शरीर के लिए कम फायदेमंद हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या है सही और बेस्ट ऑप्शन&amp;nbsp;
सही और बेस्ट ऑप्शन के लिए आप प्राकृतिक और कम प्रोसेस किए हुए अनाज चुनें, जैसे ब्राउन राइस या अनपॉलिश चावल, और होल व्हीट यानी साबुत गेहूं का आटा, क्योंकि इनमें फाइबर और पोषक तत्व अधिक मात्रा में सुरक्षित रहते हैं. इसके साथ ही खाने को हमेशा बैलेंस में लेना जरूरी है, जिसमें दाल, सब्जी और थोड़ी मात्रा में घी शामिल हो, ताकि शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व मिल सकें.
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<title>Drinking Water Before Meals: खाना खाने से पहले पानी पीने के लिए क्यों कहते हैं डॉक्टर्स, इस आदत से शरीर को कितना फायदा?</title>
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<description><![CDATA[ Why Doctors Recommend Drinking Water Before Meals: अक्सर आपने सुना होगा कि खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए. डॉक्टर भी इस आदत को अपनाने की सलाह देते हैं. लेकिन क्या यह सच में फायदेमंद है या सिर्फ एक आम धारणा? इस सवाल का जवाब समझना जरूरी है, क्योंकि यह हमारी रोजमर्रा की हेल्थ से जुड़ा हुआ है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर डॉक्टर ऐसा क्यों कहते हैं.
क्यों खाने से पहले पानी पीना चाहिए?
Harvard Health की एक रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;असल में, खाना खाने से पहले पानी पीने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे पेट पहले से थोड़ा भर जाता है, जिससे आप कम खाना खाते हैं. हमारे पेट में कुछ ऐसे नर्व्स होते हैं जो फैलाव को महसूस करके दिमाग को संकेत भेजते हैं कि अब खाना पर्याप्त है. माना जाता है कि अगर आप पहले पानी पी लेते हैं, तो यही सिग्नल जल्दी मिलने लगता है और ओवरईटिंग से बचाव होता है.
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क्या होता है इसका असर?
कुछ छोटे और सीमित समय वाली स्टडी में यह देखा भी गया है कि जो लोग खाने से पहले एक गिलास पानी पीते हैं, वे दूसरों के मुकाबले थोड़ा कम खाना खाते हैं. खासकर जो लोग वजन घटाने की कोशिश कर रहे होते हैं, उनमें यह आदत हल्का फायदा दे सकती है. हालांकि, लंबे समय में इसका असर कितना होता है, इस पर अभी भी पुख्ता सबूत नहीं हैं.
एक और कारण यह बताया जाता है कि कई बार हमें भूख नहीं बल्कि प्यास लगती है, लेकिन हम इसे समझ नहीं पाते और कुछ खा लेते हैं. ऐसे में अगर पहले पानी पी लिया जाए, तो अनावश्यक कैलोरी लेने से बचा जा सकता है. लेकिन इस थ्योरी को लेकर भी साइंटफिक प्रमाण बहुत मजबूत नहीं हैं.
वजन कम करने में मददगार
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि पानी पीने से शरीर कैलोरी बर्न करता है, क्योंकि शरीर को पानी को अपने तापमान तक गर्म करना पड़ता है. लेकिन हाल के रिसर्च बताते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत कम कैलोरी खर्च होती है, इसलिए इसे वजन घटाने का बड़ा कारण नहीं माना जा सकता. हालांकि, एक बात साफ है कि अगर आप मीठे पेय या हाई-कैलोरी ड्रिंक्स की जगह पानी पीते हैं, तो यह आपकी सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है और वजन कम करने में मदद कर सकता है. &amp;nbsp;तो क्या खाना खाने से पहले पानी पीना चाहिए? इसका जवाब पूरी तरह &amp;nbsp;हां या नहीं में नहीं है. कुछ लोगों के लिए यह आदत फायदेमंद हो सकती है, खासकर अगर इससे वे कम खाते हैं या ओवरईटिंग से बचते हैं. लेकिन इसे कोई जादुई उपाय भी नहीं माना जा सकता.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<title>Home Remedies For Cuts: चोट लगने पर भूल जाएंगे एंटीसेप्टिक लोशन, ये देसी नुस्खे फटाफट भर देते हैं घाव</title>
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<description><![CDATA[ Benefits Of Raw Honey For Skin: शहद को हम अक्सर सिर्फ मिठास के लिए जानते हैं, लेकिन यह नेचुरल उपचार का एक बेहद असरदार तरीका भी है. आजकल छोटे-मोटे घावों के इलाज में शहद फिर से चर्चा में हैय जब बागवानी करते समय या घर के काम में हल्की खरोंच लगती है, तो हम आमतौर पर एंटीसेप्टिक लोशन की तरफ बढ़ते हैं, लेकिन अब कई लोग रसोई में रखे शहद को ही प्राथमिक उपचार के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं.
पहले भी होते थे यूज
दरअसल, शहद का उपयोग घाव भरने के लिए कोई नया तरीका नहीं है. प्राचीन मिस्र और रोम में भी इसे त्वचा के उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता था. आज भी इसे एक बेहतरीन प्राकृतिक हीलिंग एजेंट माना जाता है. इसकी खासियत इसके केमिकल कंपोजिशन में छिपी है. जैसे ही शहद को किसी ताजा घाव पर लगाया जाता है, यह एक सुरक्षा परत बना देता है, जो धूल और बैक्टीरिया से बचाती हैय इस बारे में हनी: एन एडवांस्ड एंटीमाइक्रोबियल एंड वूंड हीलिंग बायोमटेरियल फॉर टिशू इंजीनियरिंग एप्लिकेशंस नामक रिसर्च में विस्तार से बताया गया है.
&amp;nbsp;बैक्टीरिया को खत्म करने में मददगार
शहद की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह त्वचा की नमी के संपर्क में आते ही हाइड्रोजन पेरॉक्साइड बनाता है, जो बैक्टीरिया को खत्म करने में मदद करता है. इसका असर बाजार में मिलने वाले केमिकल एंटीसेप्टिक जैसा ही होता है, लेकिन बिना जलन या दर्द के. इसके साथ ही, शहद का हल्का एसिडिक स्वभाव घाव के pH स्तर को कम कर देता है, जिससे बैक्टीरिया के लिए जीवित रहना मुश्किल हो जाता है.
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&amp;nbsp;घाव को नम बनाए रखने में भी मददगार
इतना ही नहीं, शहद घाव को नम बनाए रखने में भी मदद करता है. सूखा घाव अक्सर खुजली और पपड़ी बनने का कारण बनता है, जिससे नई त्वचा को नुकसान हो सकता है. इसके विपरीत, शहद नमी बनाए रखकर सेल्स को तेजी से जुड़ने में मदद करता है और घाव जल्दी भरता है. हनी, वूंड रिपेयर एंड रीजेनेरेटिव मेडिसिन में बताया गया है कि शहद नई सेल्स के विकास के लिए ऊर्जा का काम करता है. इसके साथ ही, यह सूजन को भी कम करता है. जब घाव लाल, गर्म और दर्दनाक लगता है, तो यह शरीर की सूजन प्रतिक्रिया होती है. &amp;nbsp;शहद इस सूजन को शांत करता है और फ्री रेडिकल्स को कम करके हीलिंग को तेज करता है.
कैसे कर सकते हैं इसका यूज?
घर पर शहद का इस्तेमाल करना आसान है. सबसे पहले घाव को साफ पानी से धो लें, ताकि गंदगी हट जाए. फिर उस पर शहद की एक पतली परत लगाएं. अगर जरूरत हो तो उस पर गॉज या पट्टी लगा सकते हैं, ताकि शहद अपनी जगह बना रहे। बेहतर परिणाम के लिए कच्चा या मेडिकल ग्रेड शहद इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि इनमें एंजाइम और एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:04:18 +0530</pubDate>
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<title>Omega&#45;3 Deficiency: बाल झड़ने और रूखी त्वचा से परेशान? ये हैं ओमेगा&#45;3 की कमी के सिग्नल, आज ही खाएं ये चीजें</title>
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<description><![CDATA[ Symptoms Of Omega-3 Deficiency: दुनिया की लगभग तीन-चौथाई आबादी यानी करीब 76 &amp;nbsp;प्रतिशत लोग ओमेगा-3 की पर्याप्त मात्रा नहीं ले रहे हैं. यह वही पोषक तत्व है जिसे हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता. हैरानी की बात यह है कि अगर आप ज्यादातर लोगों से पूछें कि वे ओमेगा-3 कितना लेते हैं, तो या तो उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं होगी या फिर वे कभी-कभार लिए गए फिश ऑयल सप्लीमेंट का जिक्र करेंगे.
क्या निकला रिसर्च में
यह कोई मामूली कमी नहीं है. साल 2025 में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन और हॉलैंड एंड बैरेट के रिसर्च के एक बड़े स्टडी में सामने आया कि दुनिया की 76 प्रतिशत आबादी EPA और DHA के रिकमंड स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है. &amp;nbsp;ये दोनों ओमेगा-3 के महत्वपूर्ण रूप हैं, जो दिल की सेहत, दिमाग के विकास, सूजन को कंट्रोल करने और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
किम्स हॉस्पिटल्स, बेंगलुरु की चीफ ऑफ डाइटेटिक्स Ms. Chitra BK ने TOI Health को बताया कि ओमेगा-3 फैटी एसिड्स ऐसे जरूरी पोषक तत्व हैं, जो आधुनिक डाइट में अक्सर कम पाए जाते हैं. आजकल लोग प्रोटीन, विटामिन D और आयरन की बात तो करते हैं, लेकिन ओमेगा-3 की कमी को नजरअंदाज कर देते हैं. जबकि शरीर इन्हें खुद नहीं बना सकता, इसलिए इन्हें नियमित रूप से आहार में शामिल करना जरूरी है.&amp;nbsp;
लाइफस्टाइल में बदलाव आया
उन्होंने आगे बताया कि पिछले कुछ दशकों में खानपान के तरीके में बड़ा बदलाव आया है. &amp;nbsp;पहले लोग ज्यादा मछली, मेवे और बीज खाते थे, लेकिन अब प्रोसेस्ड फूड और रिफाइंड वेजिटेबल ऑयल का इस्तेमाल बढ़ गया है. इससे शरीर में ओमेगा-6 की मात्रा ज्यादा हो गई है, जो सूजन को बढ़ावा देती है और कई क्रॉनिक बीमारियों का कारण बन सकती है. इसके अलावा, खासकर शहरी युवाओं 18-25 साल और शाकाहारी लोगों में मछली का सेवन काफी कम हुआ है, जिससे DHA और EPA की कमी और बढ़ गई है.
यह भी पढ़ें - &amp;nbsp;ग्रेड-1 फैटी लिवर में फायदेमंद हो सकता है मेथी का पानी, जानिए इसके चौंकाने वाले फायदे
इसकी कमी से क्या दिक्कत होती है
अगर शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाए, तो इसके संकेत धीरे-धीरे नजर आते हैं. जैसे त्वचा का रूखा होना, बालों का कमजोर होना, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत, मूड में बदलाव, थकान महसूस होना और जोड़ों में दर्द. अक्सर लोग इन लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
इसकी कमी को कैसे दूर करें
इस कमी को दूर करने के लिए रोजाना के खानपान में कुछ बदलाव करना जरूरी है. हफ्ते में कम से कम दो बार फैटी फिश जैसे सैल्मन, सार्डिन, मैकेरल या टूना शामिल करें. इसके अलावा अलसी के बीज, चिया सीड्स, अखरोट, ब्राजील नट्स, एवोकाडो, सोया प्रोडक्ट्स और कैनोला ऑयल भी अच्छे सोर्स हैं. जरूरत पड़ने पर ओमेगा-3 से भरपूर फोर्टिफाइड फूड या सप्लीमेंट भी लिए जा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<title>Salt to Newborn Baby: यहां बच्चा पैदा होते ही चटा दिया जाता है नमक, जानें इसका सेहत पर क्या पड़ता है असर?</title>
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<description><![CDATA[ 
Salt to Newborn Baby: हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में परंपराएं और रीति रिवाज जीवन के हर पड़ाव से जुड़े होते हैं. ऐसा ही एक रिवाज एक समुदाय में भी खूब प्रचलित हैं. जहां जन्म से लेकर मृत्यु तक कई खास परंपराएं निभाई जाती है, जिनमें नमक का भी विशेष महत्व माना जाता है.
हमारे देश में एक जगह पर नवजात बच्चे को जन्म के तुरंत बाद नमक चाटने की परंपरा है, जो इस समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि कौन सी जगह पर बच्चा पैदा होते ही नमक चटाया जाता है और इसका सेहत पर क्या असर पड़ता है.&amp;nbsp;
यहां बच्चा पैदा होते ही चटाया जाता है नमक&amp;nbsp;
मणिपुर के मैतेई समुदाय में बच्चा पैदा होते ही नमक चाटने की परंपरा है. मैतेई समुदाय में नमक सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि जीवन से जुड़े हर महत्वपूर्ण अवसर का हिस्सा माना जाता है. स्थानीय स्तर पर तैयार किया जाने वाला नमक जिसे थुम भी कहा जाता है, इसे प्राकृतिक खारे पानी के सोर्स से तैयार किया जाता है. गांव में लोग इन सोर्स से पानी इकट्ठा कर उसे उबालते हैं, जिससे नमक तैयार होता है. यही नमक बाद में घरों में उपयोग किया जाता है और बाजार में भी बेचा जाता है. वहीं इस समुदाय में मान्यता है कि बच्चों के जन्म के बाद उसे नमक चाटना जरूरी होता है. इस तरह यहां किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसके मुंह में नमक रखा जाता है. शादी, त्योहार और दूसरे पारिवारिक आयोजन में भी नमक का इस्तेमाल अनिवार्य माना जाता है. इस तरह से यहां नमक को जीवन चक्र का अहम हिस्सा माना जाता है.&amp;nbsp;
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सेहत के नजरिए से क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि नवजात बच्चे को जन्म के बाद शुरुआती महीनों में नमक देना ठीक नहीं होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और डॉक्टराें के अनुसार, बच्चों को जन्म से लेकर 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध ही देना चाहिए. इसके बाद ठोस आहार शुरू किया जाता है, तब भी शुरुआत में नमक और चीनी से परहेज करने की सलाह दी जाती है. डॉक्टरों का कहना है कि छोटे बच्चों की किडनी पूरी तरह विकसित नहीं होती है. इसलिए ज्यादा नमक उनके लिए नुकसानदायक हो सकता है. इससे किडनी पर दबाव पड़ता है और भविष्य में हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.&amp;nbsp;
कब देना चाहिए बच्चों को नमक?
हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार बच्चों को 1 साल की उम्र के बाद ही सीमित मात्रा में नमक देना शुरू करना चाहिए. 1 से 3 साल के बच्चों के लिए रोजाना नमक की मात्रा बहुत कम रखनी चाहिए, ताकि उनके शरीर पर इसका नकारात्मक असर न पड़े.
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<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 09:04:17 +0530</pubDate>
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<title>Smoking kills: सिगरेट और गांजा पीने वालों का सिकुड़ रहा दिमाग, नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा</title>
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<description><![CDATA[ Smoking kills: आज के समय में ड्रग यूज जैसे गांजा (वीड) और तम्बाकू, Gen-Z और Millenials के बीच काफी आम हो गए हैं. ये सोसाइटी में इस तरह normalize कर दिए गए हैं कि ये अब कल्चर का हिस्सा बनते जा रहे हैं. इसमें यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि ये न्यूरोएक्टिव ड्रग्स हमारे दिमाग पर क्या असर डालते हैं और लंबे समय तक इसका इस्तेमाल करने से क्या दिक्कतें आती हैं. हाल ही में Addiction द्वारा पब्लिश की गई रिसर्च में चौंकाने वाला सच सामने आया है, जिसमें स्मोकिंग की वजह से दिमाग में सिकुड़न जैसी गंभीर समस्याएं देखी गई हैं, जो आज के युवाओं ही नहीं बल्कि हर पीढ़ी के लिए खतरे की घंटी है.
गांजा और तम्बाकू उपयोग के पैटर्न
गांजा का कंजम्पशन दिन प्रतिदिन बढता जा रहा है. 2022 के डेटा के अनुसार लगभग 23 करोड लोग इसका सालाना सेवन कर रहे थे, जो दुनिया की कुल आबादी का 4.4 प्रतिशत था.तंबाकू का इस्तेमाल इससे भी कहीं ज्यादा होता है. 2020 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की लगभग 30 प्रतिशत आबादी इसका सेवन करती है, और यह हर साल करीब 80 लाख मौतों का कारण बनता है. इसके अधिक सेवन से गरीब वर्ग के लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं.
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रिसर्च में क्या खुलासे हुए?
इस स्टडी में (Cross sectional, Longitudinal, MR) जैसे तरीकों को देखकर यह पाया गया कि गांजा और सिगरेट के दिमाग पर असर को लेकर रिसर्च अभी सीमित है. कई स्टडीज में डेटा संतुलित नहीं था. जैसे गांजे के लिए पुरुषों के सैंपल ज्यादा थे, जबकि तंबाकू में महिलाओं के सैंपल ज्यादा थे. फिर भी, जितना डेटा उपलब्ध है, उसके आधार पर कुछ चिंताजनक नतीजे सामने आए हैं:

कुछ मामलों में गांजा से दिमाग के एक हिस्से (अमिगडाला) का साइज छोटा पाया गया, लेकिन हर उम्र में ऐसा असर नहीं दिखा.
तम्बाकू यूजर्स में दिमाग के कई हिस्सों का साइज छोटा दिखा, खासकर ग्रे मैटर.&amp;nbsp;
तम्बाकू से सूजन और नुकसान बढ़ सकता है, जबकि गांजा में मौजूद सीबीडी थोड़ा बचाव कर सकता है.
दोनों को साथ लेने पर अभी बहुत कम रिसर्च है और कोई साफ नतीजा नहीं मिला है.

रिसर्च का निष्कर्ष
यह पहली ऐसी स्टडी है जिसमें गांजा और तम्बाकू के असर को दिमाग के साइज से जोड़ा गया है. इसमें पाया गया कि तम्बाकू यूज से दिमाग के उन हिस्सों में कमी देखी गई जो मेमोरी और इमोशन से जुड़े होते हैं, जबकि गांजा के लिए सबूत उतने साफ नहीं थे.तम्बाकू के नतीजे ज्यादा भरोसेमंद रहे, लेकिन कुछ और कारण भी हो सकते हैं. यह रिसर्च बताती है कि दोनों के साथ इस्तेमाल पर और रिसर्च की जरूरत है और इनके नुकसान को लेकर जागरूकता जरूरी है.
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 08:57:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Silent Heart Attack Risk: 80% मरीज &amp;apos;लो&#45;रिस्क&amp;apos; थे, फिर भी आया हार्ट अटैक! जानें क्यों फेल हो रहे विदेशी मेडिकल फॉर्मूले?</title>
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<description><![CDATA[ Why Heart Attacks Are Rising In Indians: दिल का दौरा हमेशा उन लोगों को ही आए, जिनमें पहले से साफ चेतावनी संकेत हों कि यह धारणा अब बदलती नजर आ रही है. हाल ही में एक भारतीय अध्ययन ने दिखाया है कि कई ऐसे मरीज भी हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं, जिन्हें पहले लो-रिस्क माना गया था. दिल्ली के जीबी पंत &amp;nbsp;में डॉ. मोहित दयाल गुप्ता के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में 5,000 से अधिक मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों को पहली बार हार्ट अटैक आया, उनमें से करीब 80 प्रतिशत को पहले से हाई-रिस्क कैटेगरी में नहीं रखा गया था.&amp;nbsp;
भारतीय में जोखिम की पहचान नहीं हुई
आमतौर पर डॉक्टर जिन ग्लोबल रिस्क कैलकुलेटर्स का इस्तेमाल करते हैं, वे यह तय करने में मदद करते हैं कि किसे इलाज या दवा की जरूरत है. लेकिन इस स्टडी में सामने आया कि ये मॉडल भारतीय मरीजों के जोखिम को सही तरीके से नहीं पहचान पा रहे हैं. अलग-अलग मॉडल्स के अनुसार सिर्फ 11 प्रतिशत से 20 प्रतिशत मरीजों को ही हाई-रिस्क बताया गया, जबकि सभी को बाद में हार्ट अटैक हुआ.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. गुप्ता के मुताबिक, भारतीय मरीजों का पैटर्न पश्चिमी देशों से अलग है. वहां दिल की बीमारी आमतौर पर ज्यादा उम्र में होती है, जबकि भारत में यह कम उम्र में ही देखने को मिल रही है. स्टडी में मरीजों की औसत उम्र सिर्फ 54 साल पाई गई, जो इस बात का संकेत है कि हार्ट डिजीज अब पहले से ज्यादा जल्दी असर डाल रही है. रिसर्च में यह भी सामने आया कि भारतीयों में एक खास साउथ एशियन फेनोटाइप देखा जाता है. इसमें सामान्य वजन होने के बावजूद डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंस का खतरा रहता है. इसके अलावा कोलेस्ट्रॉल का पैटर्न भी अलग होता है HDL कम और ट्राइग्लिसराइड्स ज्यादा, जबकि LDL हमेशा ज्यादा नहीं होता.
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इन चीजों से भी बढ़ता है खतरा
कई लोगों में पेट के आसपास छिपी हुई चर्बी होती है, जो BMI से पकड़ में नहीं आती. इसके साथ ही स्मोकिंग, मानसिक तनाव और अन्य पारंपरिक जोखिम कारक भी मिलकर खतरे को बढ़ाते हैं. समस्या यह है कि ज्यादातर ग्लोबल मॉडल उम्र और LDL को ज्यादा महत्व देते हैं, जिससे युवा भारतीयों का जोखिम कम आंका जाता है. कई मरीज &amp;ldquo;इंटरमीडिएट रिस्क&amp;rdquo; कैटेगरी में चले जाते हैं, जहां इलाज अक्सर टल जाता है.
इसके अलावा, ये मॉडल कुछ अहम फैक्टर्स को शामिल ही नहीं करते, जैसे इंसुलिन रेसिस्टेंस, लिपोप्रोटीन(a), ApoB, सेंट्रल ओबेसिटी और क्रॉनिक किडनी डिजीज. यही वजह है कि असली खतरा छिपा रह जाता है और इलाज तब शुरू होता है, जब स्थिति गंभीर हो चुकी होती है. &amp;nbsp;इस स्टडी के बाद एक्सपर्ट्स &amp;nbsp;ने भारत के लिए अलग रिस्क कैलकुलेटर विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 08:57:22 +0530</pubDate>
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<title>Good vs Bad Cholestrol: गुड और बैड कोलेस्ट्रॉल का खेल, क्या आप जानते हैं असली जोखिम कहां है?</title>
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<description><![CDATA[ Good vs Bad Cholestrol: खाने के शौकीन लोगों में अक्सर कोलेस्ट्रॉल की शिकायत देखी जाती है, जो उनकी अनहेल्दी फूड और अनियमित डाइट का नतीजा होती है. इन सब के बीच लोगों ने एक आसान सा निष्कर्ष निकाल लिया है, जिसमे कोलेस्ट्रॉल को दो हिस्सों में बांट दिया गया है- गुड और बैड. इसमें LDL को बैड और HDL को गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है. अपनी रिपोर्ट में HDL का नंबर देखकर लोग खुश हो जाते हैं, लेकिन क्या यह धारणा सच है या इसके पीछे की सच्चाई कुछ और है? आइए जानते हैं.
कोलेस्ट्रॉल क्या है?
कोलेस्ट्रॉल एक वैक्स जैसा फैट होता है, जो हमारे शरीर में सेल, विटामिन D और हार्मोन बनाने में मदद करता है. हमारा लिवर शरीर की जरूरत के अनुसार कोलेस्ट्रॉल बनाता है, लेकिन हम खाने-पीने की चीजों के द्वारा भी इसे काफी मात्रा में लेते हैं. वैसे तो यह जरूरी होता है, लेकिन जब इसका स्तर बढ़ जाता है तो यह धमनियों (आर्टरी) की दीवारों में प्लाक जमा कर देता है, जिससे दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है.
क्या LDL वाकई बैड कोलेस्ट्रॉल है?
LDL को अक्सर दिल की बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन हर LDL एक जैसा नहीं होता, कुछ LDL कण बड़े और हल्के होते हैं, जबकि कुछ छोटे और घने होते हैं. छोटे और घने कण ही धमनियों में जाकर प्लाक बनने में ज्यादा भूमिका निभाते हैं. एशियन हॉस्पिटल के डॉ. दिवाकर कुमार के अनुसार, &amp;ldquo;हर LDL नुकसानदायक नहीं होता, सिर्फ LDL का एक नंबर पूरी तस्वीर नहीं बताता. दो लोगों में LDL का स्तर समान होकर भी उसका असर अलग-अलग हो सकता है.&amp;rdquo;
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क्या HDL सच में गुड कोलेस्ट्रॉल है?
HDL को आमतौर पर गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है क्योंकि यह खून से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को हटाने में मदद करता है, लेकिन इसका ज्यादा होना हमेशा सुरक्षित होने की गारंटी नहीं देता. डॉ. कुमार के अनुसार, &amp;ldquo;अगर HDL का स्तर बहुत ज्यादा है तो यह भी चिंता का कारण हो सकता है, खासकर जब लाइफस्टाइल सही न हो. डॉ. नेहा शाह के अनुसार, &amp;ldquo;यह सही है कि HDL शरीर की रक्षा करता है और LDL जोखिम बढ़ाता है, लेकिन सिर्फ इन नंबरों से पूरी सच्चाई नहीं पता चलती. जैसे- 44 HDL वाले दो लोगों में फर्क हो सकता है अगर उनके ट्राइग्लिसराइड्स अलग हों, एक में 90 और दूसरे में 210, नंबर वही है, लेकिन शरीर की स्थिति पे इसका प्रभाव अलग होता है. LDL में भी यही बात लागू होती है. रिपोर्ट में सिर्फ नंबर दिखता है, लेकिन असली फर्क इसके छोटे और घने कणों से पड़ता है, जो नसों को नुकसान पहुंचाते हैं.
कैसे बचें कोलेस्ट्रॉल के खतरे से?
कोलेस्ट्रॉल आपकी रोजमर्रा की आदतों से प्रभावित होता है. कम नींद, ज्यादा तनाव, स्मोकिंग और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आपको कोलेस्ट्रॉल के खतरे के करीब ला सकते हैं. इससे बचने के लिए नियमित एक्सरसाइज करना फायदेमंद होता है. इसके अलावा रोजाना संतुलित भोजन और हेल्दी डाइट लेना जरूरी है और तनाव कम करने के लिए योग या मेडिटेशन करना भी मददगार हो सकता है.
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&amp;nbsp; ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 08:57:22 +0530</pubDate>
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<title>Dehydration Risks: प्यास लगने पर ही पीते हैं पानी? यह आदत आपकी किडनी को कर रही बीमार, जानें यूरोलॉजिस्ट की राय</title>
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<description><![CDATA[ What Happens If You Don&amp;rsquo;t Drink Enough Water: हममें से ज्यादातर लोग पानी पीने को बहुत साधारण बात मानते हैं. प्यास लगी तो गिलास उठा लिया, नहीं लगी तो छोड़ दिया. लेकिन किडनी इतनी लापरवाही बर्दाश्त नहीं करती. यही छोटे-से अंग खून को साफ करते हैं, शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालते हैं, इलेक्ट्रोलाइट संतुलित रखते हैं और तरल पदार्थों का स्तर कंट्रोल करते हैं. जब शरीर को पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो किडनी को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. यह सिर्फ थकान की बात नहीं, बल्कि लंबे समय में पथरी, यूरिन इन्फेक्शन और क्रॉनिक किडनी डिजीज का खतरा बढ़ सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और हमें किस तरह की सावधानी रखने की जरूरत होती है.&amp;nbsp;
पानी को लेकर लोगों में क्या है गलतफहमी?
कई लोग मानते हैं कि दिनभर चाय, कॉफी या जूस पी लेना काफी है. जबकि कैफीन और शुगर वाले पेय शरीर से पानी तेजी से बाहर निकाल सकते हैं. एक और गलतफहमी है कि प्यास लगे तभी पानी पिएं. सच यह है कि जब प्यास लगती है, तब तक शरीर हल्का-सा डिहाइड्रेट हो चुका होता है और किडनी पर दबाव बढ़ चुका होता है. दूसरी तरफ कुछ लोग जरूरत से ज्यादा पानी पी लेते हैं, यह सोचकर कि ज्यादा पानी हमेशा फायदेमंद है. लेकिन बहुत कम समय में तीन से चार लीटर या उससे अधिक पानी पी लेना खतरनाक हो सकता है. इससे खून में सोडियम का स्तर गिर सकता है, जिसे हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है. गंभीर मामलों में यह दिमाग में सूजन, दौरे या कोमा तक की स्थिति पैदा कर सकता है.
क्या कहते हैं डॉक्टर?
यूरोलॉजिस्ट डॉ. अजय अग्रवाल ने TOI को बताया कि, किडनी को संतुलित मात्रा में पानी की जरूरत होती है. बहुत कम या बहुत ज्यादा, दोनों ही नुकसानदेह हैं. लगातार कम पानी पीने से पेशाब गाढ़ा हो जाता है, जिससे पथरी और इंफेक्शन का खतरा बढ़ता है. वहीं डायबिटीज या हार्ट रोग से जूझ रहे लोगों में जरूरत से ज्यादा तरल लेने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
कितना पानी किसको पीना चाहिए?
एक्सपर्ट &amp;nbsp;का कहना है कि 8 गिलास पानी वाला नियम हर किसी पर लागू नहीं होता. आम तौर पर महिलाओं को करीब 2.2 लीटर और पुरुषों को 3 लीटर तरल की जरूरत होती है, लेकिन यह मौसम, पसीना, व्यायाम और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। पेशाब का रंग अच्छा संकेत देता है, हल्का पीला रंग सही हाइड्रेशन दिखाता है, बहुत गहरा रंग पानी की कमी और बिल्कुल साफ रंग अधिक सेवन का संकेत हो सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 08:57:22 +0530</pubDate>
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<title>Eye Discharge Causes: सावधान! नॉर्मल नहीं होता सुबह आंखों में जमने वाला मैल,  पीला या हरा रंग इस बीमारी का संकेत</title>
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<description><![CDATA[ Why Do I Wake Up With Crusty Eyes: सुबह उठते ही अगर आंखों के कोनों में चिपचिपा या सूखा जमा हुआ पदार्थ नजर आए, तो इसे आमतौर पर आई क्रस्ट या आंखों की मैल कहा जाता है. यह कई बार सामान्य होता है, लेकिन कुछ मामलों में यह किसी समस्या का संकेत भी हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कब आपको सावधान होने की जरूरत होती है और कब यह नॉर्मल होता है.&amp;nbsp;
क्यों निकलता है यह?
&amp;nbsp;हेल्थ जानकारी देने वाली वेबसाइट MedlinePlus के अनुसार, आंखों में बनने वाला यह क्रस्ट असल में डिस्चार्ज होता है, जो सूखकर सख्त या चिपचिपा रूप ले लेता है. कुछ लोगों में यह पीले रंग का और कठोर होता है, जबकि कुछ में यह साफ, पतला या पानी जैसा भी हो सकता है. इसकी एक सामान्य वजह नींद भी होती है। जब हम सोते हैं, तो आंखें बंद रहती हैं और पलकें झपकती नहीं हैं. ऐसे में आंखों का प्राकृतिक डिस्चार्ज कोनों में जमा हो जाता है, जो सुबह उठने पर क्रस्ट के रूप में दिखाई देता है.
इसके अलावा, आंसू की नली में ब्लॉकेज भी इसका कारण बन सकता है. इस स्थिति को नासोलैक्रिमल डक्ट ऑब्स्ट्रक्शन कहा जाता है, जिसमें आंसू सही तरीके से निकल नहीं पाते. इससे आंखों में पानी आना, लालिमा और पीले-हरे रंग का चिपचिपा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है.
एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी वजह
एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी एक बड़ी वजह है. &amp;nbsp;धूल, पालतू जानवरों के बाल या फफूंद जैसे एलर्जन के संपर्क में आने से आंखों में खुजली, पानी आना और सूजन हो सकती है. कई मामलों में इसके साथ हल्का क्रस्ट भी बनता है. ड्राई आई की समस्या में भी आंखों के आसपास म्यूकस जैसा जमा दिखाई दे सकता है. इसमें आंखों में जलन, चुभन, लालिमा और धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण शामिल होते हैं.
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वहीं, बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस में आंखों से ज्यादा मात्रा में डिस्चार्ज निकलता है, जो गाढ़ा और पीले या हरे रंग का हो सकता है. इसके साथ दर्द, खुजली और रोशनी से परेशानी भी हो सकती है. एक और स्थिति ब्लेफराइटिस है, जिसमें पलकों के किनारों पर सूजन और जलन होती है। इससे पलकें चिपचिपी हो जाती हैं और उन पर पपड़ी जमने लगती है.&amp;nbsp;
कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?
कुछ कम मामलों में केराटाइटिस या आंख की कॉर्निया से जुड़ी समस्या और स्टाई (फुंसी) भी इसकी वजह हो सकती है. इन स्थितियों में दर्द, सूजन और पस जैसा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है. डॉक्टर से कब मिलें, यह समझना जरूरी है. अगर आंखों में दर्द, ज्यादा सूजन, धुंधली नजर, रोशनी से परेशानी या गाढ़ा पीला-हरा डिस्चार्ज हो, तो आंखों के एक्सपर्ट से जांच करानी चाहिए. इलाज के तौर पर हल्के मामलों में घर पर ही देखभाल की जा सकती है, जैसे गुनगुने पानी से आंखों की सफाई करना या साफ कपड़े से पपड़ी हटाना, लेकिन अगर समस्या एलर्जी या इंफेक्शन से जुड़ी हो, तो डॉक्टर दवा या आई ड्रॉप्स भी दे सकते हैं.&amp;nbsp;
साफ- सफाई के दौरान क्या ध्यान रखना जरूरी?
साफ-सफाई का ध्यान रखना सबसे जरूरी है. नियमित रूप से हाथ धोना, आंखों को साफ रखना और जरूरत पड़ने पर लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करना इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 08:57:22 +0530</pubDate>
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<title>Fatty Liver Disease: क्या बिना शराब पिए डैमेज हो सकता है लिवर, जानें आपकी रोजाना की कौन&#45;सी गलतियां पड़ रहीं भारी?</title>
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<description><![CDATA[ Can Liver Cirrhosis Happen Without Alcohol: आजकल डॉक्टर एक ऐसे ट्रेंड को लेकर चिंता जता रहे हैं, जो चौंकाने वाला है. लीवर सिरोसिस, जिसे आमतौर पर शराब से जुड़ी बीमारी माना जाता था, अब उन लोगों में भी तेजी से सामने आ रहा है जो बहुत कम या बिल्कुल शराब नहीं पीते. इसकी असली वजह हमारी रोजमर्रा की आदतें हैं, खराब खानपान, बढ़ता वजन, डायबिटीज और लंबे समय तक बैठे रहने वाली लाइफस्टाइल.
साइलेंट किलर होता है यह
इस बीमारी को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है, क्योंकि यह बिना किसी बड़े लक्षण के धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. जब तक इसके संकेत साफ दिखाई देते हैं, तब तक लीवर काफी हद तक डैमेज हो चुका होता है. डॉ. वसीम रमज़ान डार ने TOI को बताया कि पहले सिरोसिस को सिर्फ शराब से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब यह मोटापा, खराब डाइट, डायबिटीज और फैटी लीवर जैसी लाइफस्टाइल बीमारियों से भी जुड़ा हुआ है.
कैसे होती है लिवर सिरोसिस की दिक्कत?
दरअसल, लीवर शरीर का एक बेहद अहम अंग है, जो खाने को पचाने, टॉक्सिन्स को फिल्टर करने और मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने का काम करता है. लेकिन जब इस पर बार-बार दबाव पड़ता है, चाहे वह फैट जमा होने से हो, इंफेक्शन से या किसी और कारण से, तो इसमें धीरे-धीरे स्कार टिश्यू बनने लगता है. यही स्थिति आगे चलकर सिरोसिस बन जाती है. शुरुआती लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे लगातार थकान रहना, भूख कम लगना, पेट में हल्की परेशानी या बिना वजह वजन कम होना. कई लोग इसे स्ट्रेस या नींद की कमी समझकर छोड़ देते हैं. लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, लक्षण भी गंभीर हो जाते हैं. पेट में सूजन, त्वचा या आंखों का पीला पड़ना, बार-बार इंफेक्शन होना और कमजोरी महसूस होना इसके संकेत हो सकते हैं.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. शंकर कुमार गुप्ता के मुताबिक, लीवर सिरोसिस सिर्फ एक अंग की बीमारी नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित करता है. डाइजेशन, इम्युनिटी और ब्लड सर्कुलेशन सभी पर इसका असर पड़ता है. सबसे अहम बात यह है कि अगर समय रहते इसकी पहचान हो जाए, तो स्थिति को काफी हद तक संभाला जा सकता है. इसके लिए लीवर फंक्शन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और फाइब्रोसिस जांच जैसे टेस्ट किए जाते हैं. शुरुआती स्टेज में लाइफस्टाइल में बदलाव करके डैमेज को धीमा या आंशिक रूप से ठीक भी किया जा सकता है.
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भारत में बढ़ रहे हैं मामले
भारत में नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लीवर डिजीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, शहरी इलाकों में हर तीन में से एक व्यक्ति इस समस्या से जूझ सकता है. यही वजह है कि इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. बचाव के लिए बहुत मुश्किल उपायों की जरूरत नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी आदतों को सुधारना ही काफी है. हेल्दी घर का खाना खाना, रोजाना थोड़ी एक्सरसाइज करना, वजन और डायबिटीज को कंट्रोल में रखना, बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयां न लेना और समय-समय पर जांच कराना, ये सभी कदम लीवर को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. &amp;nbsp;डॉक्टरों का कहना है कि अगर बीमारी एडवांस स्टेज में पहुंच जाए, तो इलाज काफी मुश्किल और महंगा हो जाता है. कई मामलों में लीवर ट्रांसप्लांट ही आखिरी विकल्प बचता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<title>Married People Cancer Risk: क्या शादी करने से घट जाता है कैंसर होने का खतरा? कुंवारों को जरूर पढ़नी चाहिए यह रिसर्च</title>
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<title>Fatal love bite: कब जानलेवा हो जाती है &amp;apos;लव बाइट&amp;apos;, जानें कब पार्टनर को रोकना होता है जरूरी?</title>
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<description><![CDATA[ Fatal love bite: कब जानलेवा हो जाती है &#039;लव बाइट&#039;, जानें कब पार्टनर को रोकना होता है जरूरी? ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 08:57:21 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>How accurate is Dhurandhar: The Revenge’s handshake poisoning scene? Experts say ‘highly dramatised’, break down science behind Mercury exposure</title>
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<description><![CDATA[ Dhurandhar 2, starring Ranveer Singh, has emerged as a massive box office success, earning Rs 674.17 crore in its first week and continuing its strong theatrical run. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:30 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>World health day 2026: Yoga techniques to reduce anxiety and enhance mental clarity</title>
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<description><![CDATA[ Yoga is not about physical contortion; it is a state of being. These days, chronic stress disconnects many individuals from their body and breath. Yoga offers a simple yet scientific pathway to restore this balance. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:29 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Are vaccines ineffective against &amp;apos;Cicada&amp;apos; Covid variant? Expert shares key facts on BA 3.2</title>
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<description><![CDATA[ &#039;Cicada&#039; Covid-19 variant has been spreading fast in the US and has been detected in more than 23 countries. As the world grapples with fresh anxiety, an expert busts common myths and also explains whether India should be worried. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:29 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Understanding type 2 diabetes: Study highlights role of diet, lifestyle, and metabolism</title>
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<description><![CDATA[ A recent analysis of multiple studies suggests that type 2 diabetes may not always be a lifelong condition, and remission could be possible in some cases. The findings highlight the role of diet, lifestyle, and underlying metabolic factors in managing and potentially reversing the disease. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:28 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>World Health Day 2026: Struggling with stress or anxiety? Experts reveal yoga techniques to improve mental clarity and emotional well&#45;being</title>
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<description><![CDATA[ Struggling with stress and anxiety? Discover expert-recommended yoga techniques that help improve mental clarity and bring emotional balance naturally. These simple yet powerful practices can calm your mind, enhance focus, and support overall well-being in daily life. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:23 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Soha Ali Khan reveals her &amp;apos;game changer&amp;apos; drink: Check its full recipe and benefits</title>
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<description><![CDATA[ Soha Ali Khan has revealed the morning drink she has been consuming for better gut health. She also shared the recipe of the drink and benefits of what has been a game-changer for her gut. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>How simple daily fitness habits can transform your health and well&#45;being</title>
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<description><![CDATA[ A fit and healthy lifestyle doesn’t require extreme diet restrictions or fitness routines. It just requires consistent small habits to create long-lasting change. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Heatwaves and Health: Who is most at risk and how to stay safe</title>
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<description><![CDATA[ Heatwaves and Health: As the symptoms of dizziness, weakness, and confusion may be similar to those of heat exhaustion, it becomes essential for diabetic patients to be more cautious. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:21 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>World Health Day 2026: Want radiant skin? Experts reveal daily nutrition secrets that actually work</title>
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<description><![CDATA[ Discover simple daily nutrition tips that can naturally boost your skin health. Experts reveal easy diet secrets for radiant, glowing skin this World Health Day 2026. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:21 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Psychology says people who are nice have no close friends, and the reason will shock you</title>
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<description><![CDATA[ They’re kind, helpful, and liked by everyone, yet somehow always alone. The truth behind this quiet loneliness is more common than it seems. Being nice may win approval, but it doesn’t always build real connection, and that’s where the problem begins. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:20 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Obstructive sleep apnea increases cardiovascular risks by 71 per cent: Study</title>
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<description><![CDATA[ OSA is characterised by recurrent upper airway obstruction during sleep and is associated with reduced quality of sleep and life and increased cardiovascular risk. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:19 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Corneal Blindness in India: A Preventable Crisis Demanding Urgent Action</title>
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<description><![CDATA[ Unlike many other causes of blindness, corneal blindness is largely preventable or treatable, making it a critical area for intervention. On World Health Day, expert shares that nearly 95% of corneal blindness cases in certain populations are considered preventable or treatable with timely intervention.   ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:18 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Ahida Sarmai, 15&#45;year&#45;old with down syndrome, acts impressively in Dhurandhar 2: Experts share how performing arts boosts confidence</title>
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<description><![CDATA[ 15-year-old Ahida Sarmai, a talented actor with Down syndrome, shines in Dhurandhar: The Revenge, using her role to build confidence, break stereotypes, and inspire audiences. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:18 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Why Menopause Education Should Start in Your 30s — Not Your 40s</title>
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<description><![CDATA[ In India, the average age of menopause is around 46.6 years. However, what’s less widely understood is perimenopause — the transitional phase leading up to menopause. This phase can last up to 10 years, meaning many women in their late 30s or early 40s may already be experiencing hormonal shifts without realising it. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:17 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>World health day 2026: ILBS promotes health with walkathon and community events</title>
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<description><![CDATA[ Marking World health day 2026, the Institute of Liver and Biliary Sciences (ILBS) conducted a series of high-energy events designed to promote healthy living and scientific awareness. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:16 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>World health day 2026: AIIMS doctor reveals 10 high fibre foods that aren&amp;apos;t vegetables, check list</title>
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<description><![CDATA[ These foods boost fibre intake, can be easily added to your daily diet, and also help prevent other health issues. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:15 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Choosing a generic semaglutide in India</title>
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<description><![CDATA[ With improved access and reduced cost, the launch of generic Semaglutide in India is poised to be a ‘game changer’ in the management of metabolic disease burden. It offers the promise of better metabolic health to a broader population who medically qualify for semaglutide therapy.  ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:14 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Rising incidence of failure of hip and knee replacement due to infection</title>
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<description><![CDATA[ An emerging and concerning challenge is the rising incidence of implant failure due to prosthetic joint infection (PJI). Although relatively uncommon, infection remains one of the most devastating complications following joint replacement. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:14 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Struggling to reduce salt? Here’s why it’s so difficult and what really works to cut sodium intake</title>
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<description><![CDATA[ Reducing salt intake is difficult due to strong taste habits and daily food preferences that make low-salt meals feel less satisfying. However, simple strategies like gradual reduction and using natural flavours can help cut sodium without compromising taste. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:14 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>How to track your meals and calories without making it complicated</title>
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<description><![CDATA[ Calorie-tracking apps can still be useful for those who like structure. They give a rough estimate and help with consistency. But the numbers are only a guide. They are not targets you must hit every day. Read on to know more. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:21:13 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>How Painkillers Work: पेनकिलर खाते ही कैसे खत्म हो जाता है दर्द, कितनी तेजी से काम करती है यह दवा?</title>
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<description><![CDATA[ Why Pain Goes Away After Taking A Painkiller: दर्द हमारे शरीर का एक जरूरी सिग्नल है, जो हमें किसी चोट या अंदरूनी समस्या के बारे में चेतावनी देता है. लेकिन जब यही दर्द ज्यादा तेज या लगातार बना रहता है, तो इसे कम करने के लिए लोग सबसे पहले पेनकिलर का सहारा लेते हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आखिर पेनकिलर खाते ही दर्द कैसे कम होने लगता है और यह दवा कितनी तेजी से असर करती है.
क्या करता है पेनकिलर?
न्यूरोलॉजिस्ट Rebecca Seal और एनेस्थेसियोलॉजिस्ट प्रोफेसर &amp;nbsp;Benedict Alter जिन्होंने पेन के बारे में स्टडी किया था, उनके अनुसार दर्द सीधे उस जगह से नहीं आता जहां चोट लगी होती है, बल्कि शरीर के विशेष नर्व सेल्स चोट या सूजन को महसूस करके दिमाग तक सिग्नल भेजते हैं. दिमाग इन सिग्नल्स को दर्द के रूप में समझता है. यही वजह है कि पेनकिलर का काम दर्द की जड़ पर नहीं, बल्कि इन सिग्नल्स को रोकने पर होता है.
कैसे काम करता है पेनकिलर?
जब आप पेनकिलर लेते हैं, तो दवा पेट में घुलकर खून के जरिए पूरे शरीर में फैल जाती है. आमतौर पर कुछ मिनट के&amp;nbsp; भीतर इसका असर शुरू हो जाता है, जबकि कुछ दवाएं एक घंटे तक का समय ले सकती हैं. ये दवाएं शरीर में बनने वाले उन केमिकल्स को कम करती हैं, जो सूजन और दर्द के लिए जिम्मेदार होते हैं. उदाहरण के तौर पर, इबुप्रोफेन और एस्पिरिन जैसी दवाएं COX एंजाइम को ब्लॉक करके दर्द के सिग्नल को कमजोर कर देती हैं.&amp;nbsp;
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सीधे नर्व सिस्टम पर असर&amp;nbsp;
कुछ पेनकिलर सीधे नर्व सिस्टम पर असर डालते हैं और दिमाग तक पहुंचने वाले दर्द के सिग्नल को धीमा कर देते हैं, जबकि कुछ दवाएं शरीर में मौजूद प्राकृतिक एंडॉर्फिन सिस्टम को सक्रिय कर देती हैं, जिससे दर्द कम महसूस होता है. यही कारण है कि अलग-अलग तरह के दर्द के लिए अलग-अलग दवाएं दी जाती हैं. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि हर पेनकिलर हर तरह के दर्द पर एक जैसा असर नहीं करता. दर्द के कई रास्ते और कारण होते हैं, इसलिए दवाओं का असर भी अलग-अलग हो सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि पेनकिलर तुरंत राहत तो देती हैं, लेकिन इनका जरूरत से ज्यादा या लंबे समय तक इस्तेमाल साइड इफेक्ट्स भी पैदा कर सकता है. इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना दवा लेने से बचना चाहिए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:18:34 +0530</pubDate>
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<title>Body Weight And Nutrition Needs: क्या मोटे लोगों को जरूरी होता है ज्यादा विटामिन सी? आपके होश उड़ा देगी यह स्टडी</title>
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<description><![CDATA[ Do Overweight People Need More Vitamin C: हमारे शरीर के लिए विटामिन सी को लंबे समय से एक जरूरी पोषक तत्व माना जाता है. आमतौर पर लोग इसे सर्दी-जुकाम से बचाव और इम्यूनिटी मजबूत करने से जोड़ते हैं. लेकिन अब नई रिसर्च यह बता रही है कि विटामिन सी का महत्व इससे कहीं ज्यादा हो सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिनका वजन अधिक है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर रिसर्च में क्या निकला.&amp;nbsp;
क्या निकला रिसर्च में?
न्यूजीलैंड के ओटागो विश्वविद्यालय के रिसर्चर ने अपनी स्टडी जिसे क्रिटिकल रिव्यूज इन फूड साइंस एंड न्यूट्रिशन जर्नल में पब्लिश किया गया है, उसमें पाया कि ज्यादा वजन वाले लोगों को मौजूदा स्वास्थ्य मानकों से अधिक विटामिन सी की जरूरत हो सकती है. &amp;nbsp;यह रिजल्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि दुनिया भर में मोटापे के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और कई लोग अनजाने में इस जरूरी पोषक तत्व की कमी से जूझ रहे हो सकते हैं. विटामिन सी शरीर में कई अहम भूमिकाएं निभाता है. यह टिश्यू की मरम्मत करता है, इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है और एंटीऑक्सीडेंट के रूप में काम करता है, जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाता है. इसके अलावा यह त्वचा, घाव भरने और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है.&amp;nbsp;
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सही मात्रा में लेने की सलाह
आमतौर पर स्वास्थ्य दिशानिर्देश सभी लोगों के लिए एक तय मात्रा की सलाह देते हैं. उदाहरण के तौर पर, न्यूजीलैंड में रोजाना 45 मिलीग्राम विटामिन सी लेने की सिफारिश की जाती है, जो लगभग 70 किलो वजन वाले स्वस्थ व्यक्ति के आधार पर तय की गई है. हालांकि, इस स्टडी की प्रमुख रिसर्चर Anitra Carr का कहना है कि यह एक जैसा सभी के लिए वाला तरीका सही नहीं हो सकता. जैसे-जैसे शरीर का वजन बढ़ता है, विटामिन सी की जरूरत भी बढ़ सकती है.&amp;nbsp;
रिसर्च में क्या निकला?
शोध में पाया गया कि हर अतिरिक्त 10 किलो वजन पर शरीर को लगभग 17 से 22 मिलीग्राम अतिरिक्त विटामिन सी की जरूरत पड़ सकती है. यानी जिन लोगों का वजन ज्यादा है, उन्हें अपनी जरूरत के हिसाब से अधिक मात्रा में यह पोषक तत्व लेना चाहिए. इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिकों ने दो बड़े स्टडी के डेटा का एनालिसिस किया, जिनमें हजारों प्रतिभागी शामिल थे.&amp;nbsp;
नतीजों में यह सामने आया कि मौजूदा सिफारिशों के आधार पर तो अधिकांश लोगों में विटामिन सी पर्याप्त लग रहा था, लेकिन जब वजन को ध्यान में रखा गया, तो केवल एक-तिहाई से आधे लोगों में ही इसकी पर्याप्त मात्रा पाई गई. एक्सपर्ट का मानना है कि मोटापे में शरीर में हल्की सूजन &amp;nbsp;बनी रहती है, जिससे विटामिन सी तेजी से खर्च होता है. यही वजह है कि ज्यादा वजन वाले लोगों में इसकी कमी जल्दी हो सकती है.&amp;nbsp;
कैसे कर सकते हैं शरीर में पूर्ति?
अच्छी बात यह है कि विटामिन सी की पूर्ति करना आसान है. संतरा, कीवी, स्ट्रॉबेरी और शिमला मिर्च जैसे फल और सब्जियां इसके अच्छे सोर्स हैं. छोटे-छोटे बदलाव, जैसे रोजाना एक-दो अतिरिक्त फल खाना, इस कमी को पूरा करने में मदद कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:18:33 +0530</pubDate>
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<title>Effects Of Bad Smells On Health: आसपास की बदबू आपको बना रही है बीमार? जानें सेहत पर इसके गंभीर असर</title>
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<description><![CDATA[ Are Bad Smells Harmful To Health: आपके आसपास आने वाली तेज बदबू सिर्फ नाक को परेशान ही नहीं करती, बल्कि इसका असर आपकी सेहत और दिमाग दोनों पर पड़ सकता है. हाल के स्टडी में यह बात सामने आई है कि खराब गंध को अक्सर लोग हल्के में लेते हैं, लेकिन इसके प्रभाव कहीं ज्यादा गंभीर हो सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि इसमें क्या निकला है और कैसे बदबू आपकी सेहत के लिए हानिकारण है.
हमारे शरीर के लिए चेतावनी
स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर Johan Lundstr&amp;ouml;m के मुताबिक, गंध हमारे शरीर के लिए एक चेतावनी संकेत की तरह काम करती है. बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, साइंटिस्ट के मुताबिक, सड़ी-गली चीजों या गंदगी से आने वाली गंध यह संकेत देती है कि वहां बैक्टीरिया या हानिकारक तत्व मौजूद हो सकते हैं. यही कारण है कि हमारा दिमाग बहुत तेजी से गंध को पहचानकर हमें उस जगह से दूर रहने के लिए अलर्ट करता है.
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सेहत पर कैसे होता है असर?
हालांकि, जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक खराब गंध के संपर्क में रहता है, तो इसका सीधा असर उसकी सेहत पर दिखने लगता है. रिसर्च के अनुसार, लगातार बदबू में रहने से सिरदर्द, जी मिचलाना, सांस लेने में दिक्कत और नींद खराब होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इतना ही नहीं, यह मानसिक तनाव और चिड़चिड़ापन भी बढ़ा सकती है. एक्सपर्ट का कहना है कि गंध का असर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी होता है. अगर कोई व्यक्ति किसी बदबू को लेकर ज्यादा चिंतित या परेशान रहता है, तो उसका असर और बढ़ जाता है. यानी गंध के प्रति हमारी प्रतिक्रिया भी हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करती है.&amp;nbsp;
लाइफस्टाइल पर भी प्रभाव
लगातार बदबू वाले माहौल में रहना लोगों की लाइफस्टाइल को भी बदल देता है. कई लोग ऐसी स्थिति में खिड़कियां बंद रखने लगते हैं, बाहर निकलना कम कर देते हैं या सामाजिक गतिविधियों से दूरी बना लेते हैं. इससे उनकी शारीरिक गतिविधि और मानसिक सेहत दोनों पर नकारात्मक असर पड़ता है. दिलचस्प बात यह है कि हर व्यक्ति बदबू को एक जैसा महसूस नहीं करता. उम्र, आदतें, एलर्जी और लाइफस्टाइल जैसे कई फैक्टर तय करते हैं कि किसी को गंध कितनी परेशान करेगी. लेकिन एक बात साफ है कि लंबे समय तक खराब गंध के संपर्क में रहना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता.
एक्सपर्ट मानते हैं कि गंध की हमारी क्षमता भी सेहत से जुड़ी होती है. अच्छी सूंघने की क्षमता न सिर्फ हमें खतरों से बचाती है, बल्कि खाने और जीवन के अन्य अनुभवों का आनंद भी बढ़ाती है. वहीं, जिन लोगों की सूंघने की क्षमता कमजोर होती है, उनके स्वास्थ्य पर भी इसका असर पड़ सकता है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Rajasthan Mystery Illness: किस रहस्यमयी बीमारी ने राजस्थान में रोकीं 6 बच्चों की सांसें, जानें लक्षण और यह कितनी खतरनाक?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:18:33 +0530</pubDate>
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<title>Moringa Leaves Benefits: मोरिंगा के पत्ते खाने से दूर हो जाती हैं ये बीमारियां, आज से ही शुरू कर दें इस्तेमाल</title>
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<description><![CDATA[ What Happens If You Eat Moringa Leaves Daily: मोरिंगा के पत्ते, जिन्हें आम भाषा में सहजन या ड्रमस्टिक लीव्स कहा जाता है, अब धीरे-धीरे एक सुपरफूड के रूप में लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं. &amp;nbsp;एक्सपर्ट का मानना है कि रोजमर्रा की डाइट में इन पत्तों को शामिल करने से कई तरह की बीमारियों से बचाव संभव है. यही वजह है कि स्वास्थ्य से जुड़े जानकार अब इसे नियमित खाने की सलाह दे रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि सेहत के लिए यह कितना फायदेमंद होता है.&amp;nbsp;
सेहत के लिए कितना फायदेमंद?
&amp;nbsp;medanta की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;मोरिंगा के पत्ते पोषक तत्वों का खजाना माने जाते हैं. इनमें प्रोटीन, विटामिन A, C और E, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. &amp;nbsp;साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण शरीर को कई गंभीर बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, मोरिंगा के पत्ते इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं, जिससे शरीर इंफेक्शन और मौसमी बीमारियों से बेहतर तरीके से लड़ पाता है. इसके अलावा यह शरीर में ऊर्जा बढ़ाने और थकान कम करने में भी मददगार साबित होता है.&amp;nbsp;
हार्ट की सेहत के लिए फायदेमंद
&amp;nbsp;हार्ट की सेहत के लिए भी मोरिंगा बेहद फायदेमंद माना जाता है. यह ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को संतुलित रखने में मदद करता है, जिससे हार्ट रोगों का खतरा कम हो सकता है. वहीं, जिन लोगों को ब्लड शुगर की समस्या है, उनके लिए भी यह उपयोगी साबित हो सकता है, क्योंकि यह शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में सहायक होता है. डाइजेशन को बेहतर बनाए रखने में भी मोरिंगा अहम भूमिका निभाता है. इसमें मौजूद फाइबर पेट को स्वस्थ रखने, कब्ज से राहत देने और आंतों के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है. इसके साथ ही यह शरीर से टॉक्सिन्स निकालने में भी सहायक माना जाता है.
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कैसे कर सकते हैं सेवन?
मोरिंगा के पत्तों का सेवन कई तरीकों से किया जा सकता है. इन्हें दाल, सब्जी या सूप में डालकर खाया जा सकता है, वहीं इसका जूस या पाउडर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, एस्पर्ट सलाह देते हैं कि इसकी शुरुआत कम मात्रा से करनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए. अगर आप अपनी डाइट में एक आसान और असरदार बदलाव करना चाहते हैं, तो मोरिंगा के पत्ते एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं, जो आपको लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:18:33 +0530</pubDate>
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<title>AIIMS Dry Eye Treatment: गाय के दूध से दूर होगी ड्राई आइज की दिक्कत, दिल्ली एम्स के ट्रायल में हुआ साबित</title>
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<description><![CDATA[ How Lactoferrin Tablets Help Treat Dry Eyes: आजकल कम उम्र मे ही लोग आंखों की दिक्कत का सामना कर रहे हैं. मोबाइल, लैपटॉप, टीवी आदि के यूज के चलते इसकी समस्या बढ़ती जा रही है. &amp;nbsp;दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में किए गए एक ट्रायल के उत्साहजनक नतीजों के बाद वैज्ञानिक अब ड्राई आई &amp;nbsp;की समस्या के इलाज के लिए एक नई दवा को बाजार में लाने की तैयारी में है. यह दवा दूध से मिलने वाले प्रोटीन लैक्टोफेरिन पर आधारित है, जिसे खासतौर पर आंखों की नमी बनाए रखने और सूजन कम करने के लिए विकसित किया गया है.
कैसे किया गया है इसे तैयार?
दरअसल, यह टैबलेट गाय के कोलोस्ट्रम जिसे पहला दूध कहा जाता है, उससे प्राप्त लैक्टोफेरिन प्रोटीन से तैयार की गई है. कोलोस्ट्रम को पोषक तत्वों और बायोएक्टिव कंपाउंड्स का खजाना माना जाता है, जो शरीर की मरम्मत और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है. इस रिसर्च से जुड़ी वैज्ञानिक डॉ सुजाता शर्मा के मुताबिक, इस दवा को विकसित करने के लिए एक जापानी कंपनी के साथ साझेदारी की गई है. इस ट्रायल पर आधारित रिसर्च पेपर फिलहाल एक साइंटिस्ट जर्नल में प्रकाशन के लिए समीक्षा के दौर में है.
ड्राई आई की दिक्कत
ड्राई आई एक आम लेकिन परेशान करने वाली समस्या है, जो तब होती है जब आंखों में आंसू पर्याप्त मात्रा में नहीं बनते या उनकी गुणवत्ता ठीक नहीं होती. इससे आंखों में जलन, लालपन और भारीपन महसूस होता है. आजकल लंबे समय तक स्क्रीन देखने की आदत इस समस्या को और बढ़ा रही है, क्योंकि इससे पलक झपकने की दर काफी कम हो जाती है. एम्स के आरपी सेंटर में करीब 200 मरीजों पर किए गए इस ट्रायल में, सीनियर आई एक्सपर्ट डॉ नम्रता शर्मा की अगुवाई में मरीजों को तीन महीने तक रोजाना 250 एमजी लैक्टोफेरिन दिया गया..&amp;nbsp;
इससे क्या हुआ सुधार?
&amp;nbsp;इसमें मरीजों की आंखों में आंसू बनने की क्षमता और उनकी गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ. मौजूदा समय में ड्राई आई के इलाज के लिए ज्यादातर लोग आई ड्रॉप्स या कभी-कभी स्टेरॉयड का सहारा लेते हैं, लेकिन ये केवल अस्थायी राहत देते हैं और इनके साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं. इसके मुकाबले लैक्टोफेरिन आधारित यह नई थेरेपी सुरक्षित, असरदार और किफायती विकल्प के रूप में सामने आई है.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें:&amp;nbsp;नाखूनों से पहचानें सेहत का हाल, ये संकेत हो सकते हैं खतरनाक, तुरंत लें मेडिकल सलाह
क्या होता है लैक्टोफेरिन?
लैक्टोफेरिन एक प्राकृतिक प्रोटीन है, जो शरीर में इम्यूनिटी बढ़ाने, सूजन कम करने और सेल्स की मरम्मत में मदद करता है. यही कारण है कि साइंटिस्ट अब इसके अन्य उपयोगों, जैसे एनीमिया के इलाज, पर भी रिसर्च कर रहे हैं. शुरुआत में इस प्रोटीन को मानव दूध से निकालने की कोशिश की गई थी, लेकिन सीमित उपलब्धता और नैतिक कारणों की वजह से यह संभव नहीं हो पाया. इसके बाद गाय के कोलोस्ट्रम को एक प्रभावी और सुलभ विकल्प के रूप में अपनाया गया. फिलहाल, रिसर्चर को उम्मीद है कि जरूरी मंजूरी मिलने के बाद यह दवा जल्द ही बाजार में उपलब्ध हो सकती है, जिससे लाखों लोगों को ड्राई आई की समस्या से राहत मिल सकेगी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:18:33 +0530</pubDate>
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<title>छोटे बच्चों की खांसी हो सकती है इस खतरनाक बीमारी का संकेत</title>
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<description><![CDATA[ Health: अक्सर माता-पिता बच्चों की खांसी को सामान्य सर्दी-जुकाम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. &amp;nbsp;और इससे मामूली खांसी समझ कर घरेलु नुख्से अजमाते है. मगर आपको यह जानकर हैरानी होगी की यह खांसी कोई मामूली &amp;nbsp;खांसी नही बल्कि आपके बच्चे की ज़िन्दगी में आने वाली बड़ी बीमारी का संकेत भी हो सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक, छोटे बच्चों में लगातार बनी रहने वाली खांसी कभी-कभी एक गंभीर बीमारी न्यूमोनिया का शुरुआती संकेत हो सकती है. इसलिए इसको नजरंदाज करना आपके बच्चे के लिए बेहद खतरा बन सकता है.&amp;nbsp;
वहीं अगर बात करें न्यूमोनिया कि तो ये एक ऐसी संक्रमणजनित बीमारी है जो फेफड़ों को प्रभावित करती है और पांच साल से कम उम्र के बच्चों को होती है. खासतौर पर नवजात के लिए ये खतरनाक साबित हो सकती है. एक रिपोर्ट से पता चलता है कि, हर साल लाखों बच्चों की जान इस बीमारी के कारण ही जाती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां समय पर इलाज और जागरूकता की कमी है.
यह भी पढ़ेंः&amp;nbsp;इन बीमारियों की वैक्सीन एकदम फ्री लगाती है सरकार, एक क्लिक में देख लें पूरी लिस्ट
खांसी कब बनती है खतरे का संकेत?
कुछ विशेषज्ञ का मानना है कि अगर बच्चे को लगातार खांसी आ रही है और उसे तेज बुखार, सांस लेने में तकलीफ, छाती का तेजी से ऊपर-नीचे होना, बच्चे का सुस्त पड़ जाना जैसे लक्षण दिखें, तो इसे नजरअंदाज बिलकुल न करें क्योंकि ये सभी संकेत न्यूमोनिया की ओर इशारा करते है. अक्सर देखा जाता है कि छोटे बच्चों में यह बीमारी तेजी से बढ़ती है, इसलिए शुरुआती में ही इसकी पहचान बेहद जरूरी है. कई बार माता-पिता इसे सामान्य वायरल इंफेक्शन समझकर ध्यान नही देते हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है
कैसे होता है न्यूमोनिया?
न्यूमोनिया आमतौर पर बैक्टीरिया, वायरस या फंगस के कारण होता है. बच्चों में इम्यूनिटी कमजोर होने के कारण वे इस संक्रमण की चपेट में जल्दी आ जाते हैं.
कैसे करे बचाव?
डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी से बचाव संभव है, अगर कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखा जाए जैसे&amp;nbsp;&amp;bull; बच्चों को समय-समय पर टीकाकरण जरूर कराएं&amp;bull; ठंड और प्रदूषण से बचाव करें&amp;bull; बच्चे को पौष्टिक आहार दें जैसे हरी सब्जी, फल और मेवे&amp;nbsp;&amp;bull; खांसी या बुखार लंबे समय तक रहे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें
अगर न्यूमोनिया का समय रहते पता चल जाए, तो इसका इलाज संभव है. डॉक्टर दवाइयों, एंटीबायोटिक्स और सही देखभाल से बच्चे को पूरी तरह ठीक कर सकते हैं. लेकिन लापरवाही की स्थिति में यह बीमारी खतरनाक और जानलेवा भी बन सकती है. इसलिए समय पर इलाज और डॉक्टर की सलाह ले लेनी चाहिए.&amp;nbsp;
यह भी पढ़ेंः क्या बिना डॉक्टर से पूछे आप भी डाल लेते हैं आई ड्रॉप? छिन सकती है आंखों की रोशनी ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:18:31 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Small Cell Lung Cancer: लंग कैंसर के मरीजों के लिए नई उम्मीद, AI टूल पहले ही भांप लेगा इलाज का असर</title>
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<description><![CDATA[ How AI predicts chemotherapy response in lung cancer: स्मॉल सेल लंग कैंसर दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने और खतरनाक कैंसर में से एक माना जाता है. अक्सर जब तक इसका पता चलता है, तब तक यह शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुका होता है, जिसे डॉक्टर एक्सटेंसिव-स्टेज कहते हैं. इस स्थिति में इलाज मुश्किल हो जाता है और मरीज की औसत जीवित रहने की अवधि करीब एक साल तक सीमित रह जाती है. अब तक ऐसे मरीजों के इलाज के लिए प्लैटिनम-बेस्ड कीमोथेरेपी के साथ इम्यूनोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता रहा है. हालांकि, यह हर मरीज पर समान रूप से असरदार नहीं होता. &amp;nbsp;सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि डॉक्टर पहले से यह तय नहीं कर पाते कि किस मरीज को इस इलाज से फायदा होगा और किसे नहीं.&amp;nbsp;
नई तकनीक विकसित हुई
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए रोसवेल पार्क कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर (बफेलो, न्यूयॉर्क), &amp;nbsp;एमोरी यूनिवर्सिटी का विनशिप कैंसर इंस्टीट्यूट (अटलांटा, जॉर्जिया) &amp;nbsp;और यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स क्लीवलैंड मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक विकसित की है. यह स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल एनपीजे प्रेसिजन ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित हुई है, जिसमें फेनोपाईसेल &amp;nbsp;नाम के एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल का जिक्र किया गया है.&amp;nbsp;
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कैसे करता है काम
यह टूल उन टिश्यू इमेजेस का एनालिसिस करता है, जो पहले से ही मरीज के डायग्नोसिस के दौरान ली जाती हैं. आमतौर पर इन्हें माइक्रोस्कोप से देखा जाता है, लेकिन यह AI सिस्टम इन इमेजेस में ऐसे पैटर्न पहचान सकता है, जो इंसानी आंख से छूट जाते हैं. रिसर्च में 281 मरीजों के डेटा का इस्तेमाल किया गया, जिसमें पहले से मौजूद बायोप्सी सैंपल्स को एनालाइज किया गया. इस दौरान एआई ने ट्यूमर के आसपास मौजूद इम्यून सेल्स की बनावट और उनकी व्यवस्था का स्टडी किया. ये इम्यून सेल्स शरीर की इम्यून सिस्टम का हिस्सा होते हैं और कैंसर से लड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं.
कैसे रहा इसका रिजल्ट
नतीजे काफी उत्साहजनक रहे. यह टूल इलाज शुरू होने से पहले ही यह अनुमान लगाने में सक्षम रहा कि कौन सा मरीज कीमोथेरेपी पर बेहतर प्रतिक्रिया देगा. जब इन अनुमानों की तुलना वास्तविक परिणामों से की गई, तो पाया गया कि यह तकनीक पारंपरिक तरीकों से ज्यादा सटीक साबित हुई. एक अहम खोज यह रही कि जिन मरीजों में इलाज का असर अच्छा रहा, उनके ट्यूमर के आसपास इम्यून सेल्स ज्यादा और व्यवस्थित रूप में मौजूद था. &amp;nbsp;वहीं, जिन मरीजों में असर कम था, उनमें ये सेल्स कम और बिखरे हुए पाए गए.&amp;nbsp;
रिसर्च का क्या है महत्व
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया इलाज के असर को प्रभावित कर सकती है. अब तक इस बीमारी में ऐसे स्पष्ट बायोलॉजिकल संकेत उपलब्ध नहीं थे, जो इलाज के निर्णय को दिशा दे सकें. फेनोपाईसेल की खास बात यह है कि यह पहले से मौजूद डेटा का उपयोग करता है, जिससे अतिरिक्त जांच या खर्च की जरूरत नहीं पड़ती. इससे मरीजों को अनावश्यक इलाज से बचाया जा सकता है और उन्हें समय रहते बेहतर विकल्पों की ओर ले जाया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:03 +0530</pubDate>
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<title>Pancreatic Cancer Causes: साइलेंट किलर है पेनक्रियाज कैंसर! समय रहते पहचानें पीलिया और पाचन में बदलाव के ये संकेत</title>
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<description><![CDATA[ Digestive Enzyme Deficiency Symptoms: पेनक्रियाज का कैंसर सबसे गंभीर प्रकार के कैंसरों में गिना जाता है, क्योंकि इसका पता अक्सर शुरुआती चरण में नहीं चल पाता. पेनक्रियाज पेट के पीछे स्थित एक छोटा अंग है, जो भोजन पचाने के लिए एंजाइम बनाता है और इंसुलिन जैसे हार्मोन के जरिए ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है. जब इस अंग में कैंसर विकसित होता है, तो शुरुआत में यह बिना किसी स्पष्ट लक्षण के चुपचाप बढ़ता रहता है. यही कारण है कि अधिकतर मामलों का पता तब चलता है, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है और इलाज कठिन हो जाता है.&amp;nbsp;
क्या है इस कैंसर की चुनौती?
पैनक्रियास जर्नल में पब्लिश और अमेरिकन कैंसर सोसाइटी व नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, इस कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती संकेत बहुत सामान्य होते हैं. कई लोगों को हल्का पेट दर्द, पीठ में दर्द या थोड़ी मात्रा में खाना खाने के बाद ही पेट भरा हुआ महसूस होने लगता है. ये लक्षण अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं, क्योंकि ये आम समस्याओं जैसे गैस या तनाव से भी जुड़े हो सकते हैं.
&amp;nbsp;इसे भी पढ़ें- Excessive Yawning Causes: बार-बार आ रही है जम्हाई तो हल्के में न लें, जानें किन-किन बीमारियों का खतरा?
क्या होते हैं लक्षण?
कुछ लोगों को हल्की मतली या पाचन में बदलाव भी महसूस हो सकता है. चूंकि ये लक्षण आते-जाते रहते हैं, इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते. लेकिन अगर ये लगातार बने रहें, तो यह चेतावनी संकेत हो सकते हैं. एक महत्वपूर्ण लक्षण पीलिया है, जिसमें त्वचा और आंखों का सफेद हिस्सा पीला पड़ने लगता है. यह तब होता है, जब शरीर में बिलीरुबिन नामक पदार्थ बढ़ जाता है. ट्यूमर पित्त नली को ब्लॉक कर देता है, जिससे यह समस्या होती है. इसके साथ गहरे रंग का यूरिन, हल्के रंग का मल और त्वचा में खुजली भी हो सकती है.&amp;nbsp;
वजन कम होना भी कारण
बिना कारण वजन कम होना भी एक बड़ा संकेत है. कई मरीजों में महीनों पहले से वजन गिरने लगता है, क्योंकि पेनक्रियाज पर्याप्त एंजाइम नहीं बना पाता और शरीर पोषक तत्वों को सही से अब्जॉर्व नहीं कर पाता. इससे कमजोरी भी बढ़ती है. मल त्याग में बदलाव भी देखा जा सकता है. &amp;nbsp;मल तैलीय, हल्के रंग का या फ्लश करने में कठिन हो सकता है. कुछ लोगों में अचानक डायबिटीज भी विकसित हो सकता है, जो इस बात का संकेत हो सकता है कि पेनक्रियाज प्रभावित हो रहा है.
ये भी होते हैं लक्षण
इसके अलावा थकान, भूख कम लगना और शरीर में असामान्य बदलाव महसूस होना भी संकेत हो सकते हैं. ये लक्षण आम जरूर हैं, लेकिन अगर लगातार बने रहें या एक साथ दिखें, तो सावधान रहना जरूरी है. कुछ जोखिम कारक भी इस बीमारी की संभावना बढ़ाते हैं. धूम्रपान इसका सबसे बड़ा कारण माना जाता है. इसके अलावा मोटापा, पेनक्रियाज में लंबे समय तक सूजन और परिवार में इस बीमारी का इतिहास भी जोखिम बढ़ाते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:03 +0530</pubDate>
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<title>Excessive Yawning Causes: बार&#45;बार आ रही है जम्हाई तो हल्के में न लें, जानें किन&#45;किन बीमारियों का खतरा?</title>
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<description><![CDATA[ Is Excessive Yawning A Sign Of Disease:&amp;nbsp;बार-बार जम्हाई आना अक्सर लोग थकान या नींद की कमी से जोड़कर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन नई रिसर्च यह इशारा कर रही है कि हर बार जम्हाई लेना इतना सामान्य नहीं होता. कई मामलों में यह शरीर के अंदर चल रही गंभीर समस्याओं का संकेत भी हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कब यह आपके सेहत के बारे में बताती है और किन इशारों को इग्नोर नहीं करना चाहिए.&amp;nbsp;
क्या कब होती है दिक्कत?
&amp;nbsp;लगातार और बिना किसी क्लियर कारण के आने वाली जम्हाई को हल्के में नहीं लेना चाहिए. क्लीनिकल रिसर्च में पाया गया है कि ज्यादा जम्हाई लेने का संबंध कुछ न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से भी हो सकता है, जैसे मिर्गी , स्ट्रोक या ब्रेन में घाव. कुछ मामलों में तो &amp;nbsp;जांच में यह भी सामने आया कि बार-बार जम्हाई लेना फ्रंटल लोब सीज़र का हिस्सा हो सकता है,&amp;nbsp;
ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम&amp;nbsp;
इसके अलावा, जम्हाई हमारे ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम से भी जुड़ी होती है, जो शरीर की कई अनैच्छिक कामों, जैसे दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर और पाचन को कंट्रोल करता है. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश रिसर्च में पाया गया है कि ज्यादा जम्हाई आना इस सिस्टम में असंतुलन का संकेत हो सकता है. माइक्रोन्यूरोग्राफी जैसी तकनीक के जरिए यह देखा गया कि जम्हाई के दौरान मांसपेशियों से जुड़े नर्व सिग्नल्स कुछ समय के लिए दब जाते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि शरीर में पैरासिम्पेथेटिक एक्टिविटी बढ़ जाती है.
साइंटिस्ट यह भी मानते हैं कि जम्हाई का संबंध दिमाग के तापमान को नियंत्रित करने से हो सकता है. जब ब्रेन अपने तापमान को संतुलित रखने में संघर्ष करता है, तो जम्हाई के जरिए ठंडी हवा अंदर जाती है और ब्लड फ्लो बढ़ता है. स्ट्रोक के कुछ मरीजों में यह पाया गया कि जहां दिमाग के तापमान को कंट्रोल करने वाले हिस्से प्रभावित होते हैं, वहां ज्यादा जम्हाई देखी जाती है. इससे संकेत मिलता है कि यह शरीर की एक तरह की कूलिंग मैकेनिज्म हो सकती है.
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डोपामिन के असंतुलन का प्रभाव
इतना ही नहीं, जम्हाई का संबंध शरीर के मेटाबोलिज्म और ब्रेन के केमिकल्स से भी जुड़ा हुआ है। JAMA Network में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, जम्हाई का सीधा संबंध डोपामिन नाम के न्यूरोट्रांसमीटर से है, जो मूड, मोटिवेशन और मूवमेंट को नियंत्रित करता है। डोपामिन के असंतुलन की स्थिति में भी ज्यादा जम्हाई आ सकती है.
दूसरे भी होते हैं कारण
हालांकि, हर बार जम्हाई आना खतरे की घंटी नहीं है. नींद की कमी, ज्यादा काम या थकान भी इसका सामान्य कारण हो सकते हैं. लेकिन अगर जम्हाई लगातार आ रही हो, बिना वजह हो, या इसके साथ चक्कर आना, कमजोरी या सोचने-समझने में बदलाव जैसे लक्षण दिखें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Flour Storage: ऐसे करेंगे स्टोर तो ज्यादा दिन तक फ्रेश रहेगा आटा, जानें कमाल के टिप्स
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:03 +0530</pubDate>
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<title>Health Tests In 30s: 30 की उम्र पार करते ही शरीर में पनप सकती हैं ये बीमारियां, भूलकर भी न टालें ये टेस्ट</title>
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<description><![CDATA[ Why Routine Health Tests Are Important In Your 30s: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में 30 की उम्र आते-आते लोग अपने करियर और जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि सेहत को अक्सर पीछे छोड़ देते हैं. बाहर से सब कुछ सामान्य लगता है, लेकिन यही वह उम्र होती है जब कई गंभीर बीमारियां चुपचाप शरीर में विकसित होने लगती हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि अगर समय रहते नियमित जांच शुरू कर दी जाए, तो इन समस्याओं को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सकता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
&amp;nbsp;30 के बाद शरीर में तमाम तरह की दिक्कतें होने लगती हैं. &amp;nbsp;भारत सरकार के एक सर्वे में पाया गया कि इस उम्र से कई बीमारियां जैसे प्रीडायबिटीज, फैटी लिवर और थायरॉयड असंतुलन बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ती हैं. जब तक इनके संकेत दिखते हैं, तब तक इलाज लंबा और जटिल हो सकता है. इसलिए 30 की उम्र को स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि इसी समय से प्रिवेंशन यानी रोकथाम की शुरुआत सबसे ज्यादा असरदार होती है.&amp;nbsp;
ब्लड टेस्ट को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज 
डॉ. अश्वनी कंसल ने TOI को बताया कि खासतौर पर ब्लड टेस्ट को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c जैसे टेस्ट यह बता सकते हैं कि शरीर में शुगर का स्तर किस दिशा में जा रहा है. HbA1c टेस्ट पिछले तीन महीनों का औसत शुगर लेवल दिखाता है, जिससे डायबिटीज के शुरुआती संकेत आसानी से पकड़े जा सकते हैं. इसी तरह लिपिड प्रोफाइल भी बेहद जरूरी है. यह सिर्फ कोलेस्ट्रॉल नहीं, बल्कि दिल की सेहत से जुड़े कई संकेत देता है. कई बार कुल कोलेस्ट्रॉल सामान्य होने के बावजूद ट्राइग्लिसराइड्स या HDL के असंतुलन से दिल का खतरा बढ़ सकता है.
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फैटी लिवर की दिक्कत
फैटी लिवर एक ऐसी समस्या है जो अब तेजी से बढ़ रही है, यहां तक कि उन लोगों में भी जो शराब नहीं पीते। शुरुआती चरण में इसके कोई खास लक्षण नहीं होते, लेकिन समय के साथ यह गंभीर रूप ले सकता है. एक साधारण अल्ट्रासाउंड से इसका पता लगाया जा सकता है, लेकिन लोग अक्सर इसे नजरअंदाज कर देते हैं. वजन को सिर्फ एक नंबर मानना भी सही नहीं है. BMI के साथ-साथ शरीर में फैट और मसल्स का अनुपात जानना भी जरूरी है. कई बार व्यक्ति बाहर से फिट दिखता है, लेकिन शरीर के अंदर छिपी चर्बी भविष्य में बड़ी बीमारियों का कारण बन सकती है.&amp;nbsp;
इन चीजों की जांच जरूरी
दिल और थायरॉयड से जुड़ी जांच भी समय पर करानी चाहिए. कई बार सूजन या थायरॉयड की समस्या शुरुआती स्तर पर बिना लक्षण के रहती है, लेकिन आगे चलकर यह एनर्जी , मूड और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है. इसके अलावा विटामिन डी, बी12 और आयरन की कमी भी आम होती जा रही है, जिसे लोग अक्सर थकान या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. नियमित जांच से इन कमियों का समय पर पता लगाया जा सकता है और उन्हें ठीक किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:02 +0530</pubDate>
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<title>Fruits To Avoid During Periods: पीरियड्स के दौरान महिलाओं का भूलकर भी नहीं खाने चाहिए ये फल, हो सकती है बड़ी दिक्कत</title>
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<description><![CDATA[ Which Fruits Should Be Avoided During Menstruation: पीरियड्स के दौरान महिलाओं को खानपान का खास ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि इस समय शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं. यही बदलाव मूड से लेकर पाचन तक सब कुछ प्रभावित करते हैं. ऐसे में जहां कुछ फल शरीर को राहत देने में मदद करते हैं, वहीं कुछ फल ऐसे भी होते हैं जिन्हें इस दौरान खाने से परेशानी बढ़ सकती है. चलिए आपको हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthfab की रिपोर्ट के अनुसार बताते हैं कि इस दौरान किन फलों को नहीं खाना चाहिए.&amp;nbsp;
अनानास
सबसे पहले बात करें अनानास की, तो यह फल आमतौर पर सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन पीरियड्स के दौरान इसे सीमित मात्रा में ही खाना बेहतर होता है. इसमें मौजूद एंजाइम शरीर में ब्लड फ्लो को बढ़ा सकता है, जिससे जिन महिलाओं को ज्यादा ब्लीडिंग होती है, उनकी समस्या और बढ़ सकती है.&amp;nbsp;
तरबूज
तरबूज भी एक ऐसा फल है जिसे गर्मियों में खूब खाया जाता है, लेकिन पीरियड्स के दौरान यह दिक्कत बढ़ा सकता है. इसमें पानी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, जो शरीर में ब्लोटिंग और पानी रुकने की समस्या को बढ़ा सकती है. पहले से ही इस समय पेट फूलने की समस्या रहती है, ऐसे में तरबूज इसे और बढ़ा सकता है.
खट्टे फल
खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू और ग्रेपफ्रूट भी इस दौरान सावधानी से खाने चाहिए. इनमें एसिड की मात्रा ज्यादा होती है, जो डाइजेशन सिस्टम को प्रभावित कर सकती है. कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान पहले से ही एसिडिटी या मतली की समस्या होती है और ऐसे फल इन लक्षणों को और बढ़ा सकते हैं.
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कच्चा केला
इसके अलावा कच्चा केला भी इस समय परेशानी का कारण बन सकता है. इसमें मौजूद रेजिस्टेंट स्टार्च पचने में कठिन होता है, जिससे कब्ज और पेट भारी होने की समस्या हो सकती है. पीरियड्स के दौरान जब शरीर पहले ही संवेदनशील होता है, तब ऐसी चीजें स्थिति को और असहज बना सकती हैं.
ड्राई फ्रूट्स
ड्राई फ्रूट्स भी आमतौर पर हेल्दी माने जाते हैं, लेकिन जिनमें अतिरिक्त चीनी मिली होती है, उनसे दूरी बनाना बेहतर है. ज्यादा शुगर शरीर में सूजन और मूड स्विंग्स को बढ़ा सकती है, जिससे पीरियड्स के दौरान परेशानी और ज्यादा महसूस हो सकती है.
कौन से फल फायदेमंद?
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी फल नुकसानदायक होते हैं. पके केले, सेब, बेरीज और कीवी जैसे फल इस समय शरीर को राहत देने में मदद करते हैं. ये पाचन को बेहतर रखते हैं, सूजन कम करते हैं और शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी देते हैं. &amp;nbsp;सबसे जरूरी बात यह है कि हर महिला का शरीर अलग होता है. जो चीज एक व्यक्ति को नुकसान पहुंचा सकती है, वही दूसरे के लिए फायदेमंद भी हो सकती है. इसलिए अपने शरीर के संकेतों को समझना और उसी के अनुसार डाइट चुनना सबसे सही तरीका है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:02 +0530</pubDate>
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<title>Ozempic Side Effects: आंखों की रोशनी छीन सकती है डायबिटीज की यह दवा, नई रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा</title>
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<description><![CDATA[ Can Ozempic cause vision loss: डायबिटीज के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक दवा अब नए रिसर्च के बाद चर्चा में आ गई है. हालिया रिसर्च में संकेत मिला है कि यह दवा एक रेयर लेकिन गंभीर आंखों की समस्या का खतरा बढ़ा सकती है, जो स्थायी रूप से नजर कमजोर या खत्म भी कर सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या नई जानकारी निकल कर सामने आई है और कैसे क्यों यह दवा चर्चा में है.&amp;nbsp;
क्यों बढ़ रहा है इसका यूज?
डेनमार्क की साउथ डेनमार्क विश्वविद्यालय &amp;nbsp;के वैज्ञानिकों ने दो बड़े स्टडी में ओजेम्पिक की सुरक्षा का आकलन किया. यह दवा टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों में ब्लड शुगर कंट्रोल करने के साथ-साथ वजन घटाने में भी मदद करती है, जिसके चलते हाल के वर्षों में इसका उपयोग तेजी से बढ़ा है. रिसर्च में जिस समस्या पर फोकस किया गया, उसे नॉन-आर्टेरिटिक एंटीरियर इस्केमिक ऑप्टिक न्यूरोपैथी (NAION) &amp;nbsp;कहा जाता है. यह तब होती है जब आंख के ऑप्टिक नर्व तक ब्लड का फ्लो अचानक कम हो जाता है. ऑप्टिक नर्व आंख से दिमाग तक दृश्य जानकारी पहुंचाने का काम करता है, इसलिए इसके प्रभावित होने पर अचानक दृष्टि जा सकती है, जो कई मामलों में स्थायी होती है.&amp;nbsp;
बेहद रेयर है यह बीमारी
हालांकि NAION एक रेयर बीमारी है, लेकिन इसके गंभीर परिणामों के कारण डॉक्टर इसे बेहद गंभीरता से लेते हैं. मरीजों में एक आंख की रोशनी जा सकती है और कुछ मामलों में दूसरी आंख भी प्रभावित हो सकती है. इस मुद्दे की शुरुआत अमेरिका की एक छोटी स्टडी से हुई थी, जिसमें दावा किया गया था कि ओजेम्पिक लेने से &amp;nbsp;NAION का खतरा दोगुना तक बढ़ सकता है. अब डेनमार्क के बड़े स्तर पर किए गए स्टडी ने इस आशंका को और मजबूती दी है.
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&amp;nbsp;4.24 लाख से ज्यादा टाइप 2 डायबिटीज मरीजों का एनालिसिस
एक स्टडी में 4.24 लाख से ज्यादा टाइप 2 डायबिटीज मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया गया, जिनमें करीब 1.06 लाख लोग Ozempic ले रहे थे। नतीजों में सामने आया कि इस दवा का इस्तेमाल करने वालों में NAION का खतरा अन्य दवाएं लेने वालों की तुलना में लगभग दोगुना था. रिसर्चर ने समय के साथ बदलाव भी नोट किया. 2018 से पहले, जब इस दवा का उपयोग कम था, तब हर साल 60 से 70 NAION के मामले सामने आते थे. हाल के वर्षों में यह संख्या बढ़कर करीब 150 तक पहुंच गई है, और ज्यादातर मामले डायबिटीज मरीजों में देखे गए.
एक दूसरी स्टडी में नए मरीजों की तुलना अन्य दवाओं का उपयोग करने वालों से की गई, जिसमें भी यही पाया गया कि ओजेम्पिक लेने वालों में यह जोखिम करीब दोगुना था. हालांकि, एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि कुल मिलाकर यह जोखिम अभी भी कम है. ज्यादातर मरीजों को यह समस्या नहीं होती, और ब्लड शुगर कंट्रोल करने के फायदे भी काफी महत्वपूर्ण हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:01 +0530</pubDate>
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<title>Eye drops side effects: क्या बिना डॉक्टर से पूछे आप भी डाल लेते हैं आई ड्रॉप? छिन सकती है आंखों की रोशनी</title>
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Eye drops side effects: आज के समय में स्क्रीन पर ज्यादा देर तक काम करने और गेम खेलने के चलते हैं आंखों में कई तरह की दिक्कत हो जाती है. वहीं कई बार हल्की सी आंखों की समस्या होने पर लोग सीधे मेडिकल स्टोर से आई ड्रॉप खरीद कर इस्तेमाल कर लेते हैं. आंखों में होने वाली रेडनेस, जलन या सूखापन जैसी दिक्कतों में बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेना अब नॉर्मल सा हो गया है. लेकिन एक्सपर्ट्स के अनुसार यह आदत आंखों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है. कई बार गलत दवा न सिर्फ असली बीमारी को छुपा देती है, बल्कि आगे चलकर बड़ी समस्या भी खड़ी कर सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या आप बिना डॉक्टर से पूछे आई ड्रॉप डाल लेते हैं तो इससे आपकी आंखों की रोशनी कैसे छीन सकती है?
हर लक्षण एक जैसा नहीं, बीमारी अलग-अलग
आंखों में होने वाली हर परेशानी का कारण अलग-अलग हो सकता है. यह एलर्जी, बैक्टीरिया या वायरल इनफेक्शन, ड्राई आई या फिर ग्लूकोमा जैसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है. ऐसे में बिना जांच के आई ड्रॉप इस्तेमाल करने से सही बीमारी का पता नहीं लग पाता है और इलाज में देरी हो सकती है. डॉक्टर के अनुसार बिना सलाह के वाले आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल सबसे ज्यादा खतरनाक होता है. यह दवाएं तुरंत राहत जरूर देती है. लेकिन लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर आंखों का प्रेशर बढ़ा सकता है, इससे ग्लूकोमा और मोतियाबिंद जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा अगर आंख में पहले से कोई इंफेक्शन है तो स्टेरॉयड उसे और ज्यादा गंभीर बना सकता है.
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एंटीबायोटिक और रेडनेस ड्रॉप्स का गलत इस्तेमाल
अक्सर लोग आंख लाल होने पर एंटीबायोटिक ड्रॉप्स इस्तेमाल कर लेते हैं, जबकि हर बार यह बैक्टीरियल इन्फेक्शन नहीं होता, वायरल या एलर्जी में यह दवाएं बेअसर रहती है. ऐसे में बार-बार इस्तेमाल से एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढ़ सकता है. यानी दावों का असर धीरे-धीरे खत्म होने लगता है. वहीं रेडनेस रिलीफ ड्रॉप्स कुछ समय के लिए आराम देती है, लेकिन इनके ज्यादा इस्तेमाल से आंखों में दोबारा ज्यादा लालिमा और सूखापन हो सकता है. वहीं आर्टिफीशियल टीयर्स जैसे ड्रॉप्स को लोग सुरक्षित मानते हैं, लेकिन अगर इन्हें बार-बार इस्तेमाल करना पड़ रहा है तो यह किसी बड़ी समस्या का संकेत हो सकते हैं. खासकर कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वालों को बिना सलाह कोई भी ड्रॉप इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे कॉर्निया को नुकसान पहुंच सकता है.
आंखों के लिए कब जरूरी है डॉक्टर से मिलना?
अगर आपकी आंखों में तेज दर्द हो, रोशनी चुभे, धुंधला दिखाई दे, चोट लगे या फिर 2 से 3 दिन में समस्या ठीक न हो तो तुरंत आई स्पेशलिस्ट से कांटेक्ट करना चाहिए. ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है. वहीं डॉक्टरों का कहना है कि आंख शरीर का बहुत संवेदनशील हिस्सा है और गलत तरीके, गलत दवा का असर सीधे नजर पर पड़ सकता है. कई आई ड्रॉप सिर्फ लक्षणों को दबाते हैं, लेकिन बीमारी को खत्म नहीं करते हैं. ऐसे में बिना सलाह के दवा लेने से कंडीशन और बिगड़ सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 17:07:01 +0530</pubDate>
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<title>Heart Blockage Symptoms: धमनियों में जमा प्लाक बढ़ा सकता है मुसीबत, कार्डियोलॉजिस्ट से जानें हार्ट ब्लॉकेज की वॉर्निंग</title>
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<description><![CDATA[ Early Symptoms Of Heart Artery Blockage: हार्ट ब्लॉकेज यानी कोरोनरी आर्टरी डिजीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें दिल तक खून पहुंचाने वाली आर्टरीज संकरी या ब्लॉक होने लगती हैं. ऐसा आमतौर पर आर्टरीज में प्लाक जमा होने की वजह से होता है, जिससे हार्ट तक ऑक्सीजन युक्त ब्लड फ्लो कम हो जाता है. यह स्थिति आगे चलकर हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ा सकती है. अक्सर लोग दिल की बीमारी को अचानक होने वाले तेज सीने के दर्द से जोड़कर देखते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसके कई शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं और लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
कार्डियक साइंसेज के एक्सपर्ट डॉक्टर प्रवीण रमण मिश्रा ने &amp;nbsp;TOI को बताया कि हार्ट की धमनियों में ब्लॉकेज होने पर सबसे सामान्य लक्षण सीने में दर्द या दबाव हो सकता है. कई लोग इसे सीने में भारीपन, जकड़न या जलन जैसा महसूस करते हैं. हालांकि यह दर्द हमेशा तेज नहीं होता, बल्कि कई बार आता-जाता रहता है, खासकर जब व्यक्ति फिजिकल एक्टिविटी करता है या तनाव में होता है. इसके अलावा सांस फूलना भी एक अहम संकेत हो सकता है. कुछ लोगों को सीढ़ियां चढ़ते समय, थोड़ी दूरी चलने पर या सामान्य काम करते हुए भी सांस लेने में कठिनाई महसूस होने लगती है.
क्या होते हैं लक्षण?
डॉक्टर बताते हैं कि हार्ट ब्लॉकेज होने पर असामान्य थकान भी महसूस हो सकती है. जब हार्ट तक पर्याप्त ऑक्सीजन वाला खून नहीं पहुंचता, तो शरीर में लगातार कमजोरी और थकान महसूस होती है. कई मामलों में दर्द सिर्फ सीने तक सीमित नहीं रहता बल्कि हाथों, गर्दन, जबड़े या पीठ तक फैल सकता है. लोग अक्सर इसे मसल्स के दर्द या गैस-एसिडिटी समझ लेते हैं. इसके अलावा चक्कर आना, मतली महसूस होना या बिना किसी खास वजह के ज्यादा पसीना आना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं, खासकर जब ये लक्षण फिजिकल एक्टिविटी के दौरान दिखाई दें.
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कैसे कर सकते हैं कंट्रोल?
एक्सपर्ट के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान, हाई कोलेस्ट्रॉल और किसी तरह की शारीरिक एक्टिविटी का न होना हार्ट की आर्टरीज में ब्लॉकेज का खतरा बढ़ा सकती है. इसलिए दिल की सेहत बनाए रखने के लिए रेगुलर व्यायाम, संतुलित आहार और समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना बेहद जरूरी है. अगर इसके लक्षण बार-बार दिखाई दें या बढ़ने लगें, तो तुरंत कार्डियोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर माना जाता है, ताकि समय रहते गंभीर दिक्कतों से बचा जा सके. अगर आप इन लक्षणों कोे इग्नोर करेंगे, तो हो सकता है कि आगे चलकर आपको दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 31 Mar 2026 15:09:24 +0530</pubDate>
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<title>Blood Clots In Legs Causes: पैरों में क्यों जमा हो जाते हैं खून के थक्के? वैज्ञानिकों ने बता दी डराने वाली वजह</title>
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<description><![CDATA[ Why Do Blood Clots Form In Legs: पैरों में अचानक दर्द, सूजन या भारीपन महसूस होना कई बार साधारण समस्या लग सकता है, लेकिन इसके पीछे खून के थक्के बनने जैसी गंभीर वजह भी हो सकती है. मेडिकल भाषा में इसे वेनस थ्रॉम्बोसिस कहा जाता है, जिसमें खून गाढ़ा होकर नसों में जमने लगता है और ब्लॉकेज पैदा कर देता है. अगर यही थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा स्थिति यानी पल्मोनरी एम्बोलिज्म का कारण बन सकता है.
क्या निकली है दिक्कत?
हाल ही में लुंड विश्वविद्यालय के साइंटिस्ट की एक रिसर्च में इस समस्या को लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है. इस स्टडी में पाया गया कि सिर्फ लाइफस्टाइल ही नहीं, बल्कि कुछ खास जीन भी खून के थक्के बनने के खतरे को काफी बढ़ा सकते हैं. यह रिसर्च &quot;माल्मो डाइट एंड कैंसर स्टडी&quot; के तहत करीब 30 हजार लोगों के डेटा पर की गई. इसमें वैज्ञानिकों ने 27 ऐसे जीन का अध्ययन किया, जो ब्लड क्लॉटिंग से जुड़े होते हैं. &amp;nbsp;एनालिसिस के बाद तीन प्रमुख जीन ABO, F8 और VWF की पहचान की गई, जो इस खतरे को बढ़ाते हैं.
रिसर्च के अनुसार, इनमें से हर एक जीन अकेले 10 से 30 प्रतिशत तक जोखिम बढ़ा सकता है. लेकिन अगर किसी व्यक्ति में ऐसे कई जेनेटिक फैक्टर एक साथ मौजूद हों, तो खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है. जिन लोगों में पांच तक ऐसे जोखिम कारक पाए गए, उनमें ब्लड क्लॉट बनने का खतरा 180 प्रतिशत तक ज्यादा देखा गया. यह खोज इस बात को समझने में मदद करती है कि कुछ लोग बिना किसी स्पष्ट वजह के भी इस समस्या का शिकार क्यों हो जाते हैं. साइंटिस्ट ने यह भी बताया कि &quot;फैक्टर V लीडेन&quot; नाम का एक जेनेटिक म्यूटेशन पहले से जाना जाता है, जो खून के थक्के बनने की प्रवृत्ति को बढ़ाता है.
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लाइफस्टाइल की अहम भूमिका
हालांकि, सिर्फ जीन ही नहीं, लाइफस्टाइल भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना, जैसे लंबी फ्लाइट या सर्जरी के बाद बेड रेस्ट, ब्लड फ्लो को धीमा कर देता है और थक्के बनने का खतरा बढ़ा देता है. इसके अलावा मोटापा, बढ़ती उम्र और ज्यादा लंबाई भी इस जोखिम को बढ़ाने वाले कारक माने गए हैं. खानपान भी इसमें भूमिका निभा सकता है. कुछ स्टडीज में यह संकेत मिला है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ज्यादा खाने से खतरा बढ़ सकता है, जबकि फलों, सब्जियों और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर डाइट जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है.
इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है
एक्सपर्ट का मानना है कि भविष्य में इस तरह की जेनेटिक जानकारी के आधार पर इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है. इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस मरीज को कितने समय तक ब्लड थिनर दवाओं की जरूरत है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 31 Mar 2026 15:09:24 +0530</pubDate>
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<title>Lancet Maternal Death Report: दुनिया की हर 10 में से एक मां की मौत भारत में! लैंसेट की रिपोर्ट ने उड़ाई नींद, जानें पूरा मामला</title>
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<description><![CDATA[ India Accounts For Maternal Deaths Globally: दुनियाभर में हर साल लाखों महिलाएं गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी वजहों से जान गंवा रही हैं, और इन आंकड़ों में भारत की हिस्सेदारी अब भी बड़ी बनी हुई है. हाल ही में द लैंसेट ऑब्स्टेट्रिक्स, गायनेकोलॉजी, और महिला स्वास्थ्य में प्रकाशित एक स्टडी &amp;nbsp;ने इस चिंता को फिर सामने ला दिया है. चलिए आपको बताते हैं कि इस रिपोर्ट में क्या निकला है और भारत के लिए चिंता क्यों जाहिर की गई है.&amp;nbsp;
क्या निकला रिपोर्ट में?
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2023 में दुनिया भर में करीब 2.4 लाख महिलाओं की मौत गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी दिक्कतों के कारण हुई. इनमें से लगभग 24,700 मौतें भारत में दर्ज की गईं. यानी वैश्विक स्तर पर हर 10 मातृ मौतों में से लगभग एक भारत से जुड़ी है, जो स्थिति की गंभीरता को दिखाती है. हालांकि, तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है. बीते तीन दशकों में भारत ने इस दिशा में बड़ी प्रगति की है. 1990 में जहां मातृ मृत्यु का आंकड़ा करीब 1.19 लाख था, वह 2015 तक घटकर 36,900 और 2023 में 24,700 तक पहुंच गया. इसी तरह, मातृ मृत्यु दर &amp;nbsp;1990 में 508 से घटकर 2023 में 116 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गई है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सुधार अभी अधूरा है. डॉ. आभा मजूमदार ने TOI को बताया कि देश में मातृ मृत्यु दर में गिरावट जरूर आई है, लेकिन यह सभी राज्यों में समान नहीं है. केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य वर्ल्ड मानकों के करीब पहुंच चुके हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अब भी हालात चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं. स्टडी में यह भी सामने आया कि मातृ मृत्यु के प्रमुख कारण अब भी वही हैं, जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है. इनमें प्रसव के दौरान अत्यधिक ब्लड फ्लो, हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी दिक्कतों, और इंफेक्शन पहले से मौजूद बीमारियों के कारण होने वाली दिक्कतें शामिल हैं.
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कोविड का भी रोल
इसके अलावा, समय पर इलाज न मिल पाना, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में अंतर और ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों के बीच असमानता भी बड़ी वजह बन रही है. यही कारण है कि सुधार की रफ्तार 2015 के बाद धीमी पड़ गई है, जबकि इससे पहले 2000 से 2015 के बीच तेज गिरावट दर्ज की गई थी. वर्ल्ड लेवल पर भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है. 2023 में दुनिया का औसत मातृ मृत्यु दर 190 प्रति एक लाख जीवित जन्म रहा, जो संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स के 70 के लक्ष्य से काफी ज्यादा है. एक्सपर्ट का कहना है कि कोविड-19 महामारी ने भी इस समस्या को बढ़ाया, क्योंकि उस दौरान मातृ स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 31 Mar 2026 15:09:24 +0530</pubDate>
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<title>Floaters And Flashes In Eyes: क्या आपकी आंखों में भी नजर आते हैं धब्बे? तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना...</title>
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<description><![CDATA[ When Eye Floaters Are Dangerous: क्या आपकी आंखों के सामने छोटे-छोटे धब्बे, लकीरें या तैरती हुई आकृतियां नजर आती हैं? अगर हां, तो इसे हल्के में लेना ठीक नहीं है. आमतौर पर यह समस्या सामान्य मानी जाती है, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकती है. आंखों में दिखाई देने वाले इन धब्बों को मेडिकल भाषा में &quot;आई फ्लोटर्स&quot; कहा जाता है. ये अक्सर उम्र बढ़ने या नजर कमजोर होने के साथ दिखाई देते हैं.&amp;nbsp;
छोटी रेखाओं या धुंधले धब्बों की तरह दिखना
कई बार ये छोटी-छोटी रेखाओं या धुंधले धब्बों की तरह नजर आते हैं, जो आंखों के सामने तैरते हुए महसूस होते हैं. आमतौर पर पलक झपकाने पर ये कम हो जाते हैं और दिमाग भी इन्हें नजरअंदाज कर देता है, &amp;nbsp;लेकिन हाल ही में Radboud University Medical Center की एक स्टडी में इन फ्लोटर्स को लेकर चेतावनी दी गई है. मार्च 2026 में सामने आई इस रिसर्च के मुताबिक, अगर ये धब्बे लगातार दिखने लगें या अचानक बढ़ जाएं, तो यह आंखों की गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;
किस दिक्कत की चेतावनी?
यह रिसर्च Annals of Family Medicine में प्रकाशित हुई है, जिसमें करीब 42 हजार मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि जिन लोगों को बार-बार फ्लोटर्स, रोशनी की फ्लैश या दोनों लक्षण दिखाई दिए, उनमें से कुछ मामलों में रेटिना डिटैचमेंट जैसी गंभीर समस्या सामने आई. रेटिना डिटैचमेंट एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें आंख की अंदरूनी परत अपनी जगह से अलग होने लगती है. यह आंख का बेहद अहम हिस्सा होता है, जो रोशनी को पहचानने का काम करता है. अगर समय पर इसका इलाज न हो, तो यह नजर जाने तक की स्थिति पैदा कर सकता है.
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किन लोगों में बढ़ता है जोखिम?
स्टडी में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को फ्लोटर्स के साथ-साथ फ्लैश दिखाई देते हैं, उनमें जोखिम और बढ़ जाता है. हालांकि यह खतरा हर किसी में नहीं होता, लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी सही नहीं माना जाता. ब्रिटेन की हेल्थ सर्विस NHS के मुताबिक, कई बार यह समस्या &quot;पोस्टीरियर विट्रियस डिटैचमेंट&quot; के कारण होती है, जो आमतौर पर नुकसानदेह नहीं होती. इसमें आंख के अंदर मौजूद जेल जैसी संरचना में बदलाव होता है और कोलेजन के छोटे-छोटे गुच्छे बन जाते हैं. फिर भी, अगर ये धब्बे अचानक ज्यादा दिखने लगें, लगातार बने रहें या इसके साथ रोशनी की चमक, छाया या नजर धुंधली होने जैसी दिक्कतें हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 31 Mar 2026 15:09:23 +0530</pubDate>
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<title>Causes Of Premature Ageing: 8 घंटे से ज्यादा बैठना स्मोकिंग जितना खतरनाक! जानें वे 8 आदतें, जो समय से पहले बना रहीं बूढ़ा</title>
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<description><![CDATA[ Everyday Habits That Make You Age Faster: आजकल हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना ट्रेंड बन गया है. लोग शराब छोड़ रहे हैं, जंक फूड से दूरी बना रहे हैं और फिट रहने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद एक सच्चाई ऐसी है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, वह है कि हमारी रोजमर्रा की कुछ आदतें धीरे-धीरे उम्र बढ़ाने का काम कर रही होती हैं. एजिंग सिर्फ झुर्रियों या सफेद बालों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर के अंदर, सेल्स के स्तर पर भी होती है. चलिए इनके बारे में बताते हैं.&amp;nbsp;
लंबे समय तक बैठे रहना
सबसे पहली आदत है लंबे समय तक बैठे रहना. 13 स्टडीज पर आधारित यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक मेटा-एनालिसिस, जिसमें 10 लाख से ज्यादा लोग शामिल थे, यह दिखाता है कि जो लोग रोज 8 घंटे से ज्यादा बैठते हैं और एक्सरसाइज नहीं करते, उनमें मृत्यु का खतरा मोटापे या स्मोकिंग जितना हो सकता है. हालांकि, रोज 60-75 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी इस खतरे को कम कर सकती है। लंबे समय तक बैठे रहने से मेटाबॉलिज्म धीमा होता है और शरीर के डीएनए के टेलोमीयर तेजी से छोटे होते हैं, जो एजिंग को बढ़ाते हैं.&amp;nbsp;
नींद की कमी
दूसरी बड़ी वजह है नींद की कमी. अगर आप सोचते हैं कि 5 घंटे की नींद काफी है, तो यह शरीर के साथ समझौता है. नेशनल हार्ट लंग्स एंड ब्लड इंस्टिट्यूट के अनुसार, उम्र के हिसाब से नींद की जरूरत अलग-अलग होती है और इसकी अनदेखी लंबे समय में स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ा सकती है. &amp;nbsp;नींद के दौरान शरीर खुद को रिपेयर करता है, हार्मोन बैलेंस करता है और एनर्जी को रिस्टोर करता है. &amp;nbsp;लगातार नींद पूरी न होने से स्किन, इम्यूनिटी और याददाश्त पर असर पड़ता है.
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तनाव में रहने की आदत
तीसरी आदत है लगातार तनाव में रहना, जब तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है, जो त्वचा को नुकसान पहुंचाता है और झुर्रियों को जल्दी लाता है। इसके अलावा यह दिल, डाइजेशन और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता है.&amp;nbsp;
स्क्रीन टाइम और कम पानी पीने की समस्या
चौथी समस्या है जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम. मोबाइल और लैपटॉप का अधिक इस्तेमाल नींद के चक्र को बिगाड़ता है और ब्लू लाइट के कारण स्किन पर भी असर डाल सकता है. देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत एजिंग को तेज कर सकती है. पांचवीं आदत है पानी कम पीना. डिहाइड्रेशन से त्वचा बेजान दिखती है और शरीर के कई जरूरी फंक्शन धीमे पड़ जाते हैं. पानी शरीर को डिटॉक्स करने और सही तरीके से काम करने में मदद करता है.
ये भी आदतें शामिल
छठी आदत है ज्यादा चीनी और प्रोसेस्ड फूड का सेवन. ज्यादा शुगर शरीर में ग्लाइकेशन प्रक्रिया को बढ़ाती है, जिससे त्वचा की इलास्टिसिटी कम हो जाती है और झुर्रियां जल्दी आती हैं. सातवीं आदत है स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को नजरअंदाज करना. उम्र के साथ मसल्स कम होते हैं और अगर एक्सरसाइज न की जाए तो यह प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे शरीर कमजोर और सुस्त हो सकता है. आठवीं और अहम आदत है सोशल कनेक्शन को नजरअंदाज करना. रिसर्च में पाया गया है कि अकेलापन और सामाजिक दूरी समय से पहले मौत के खतरे को बढ़ा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 31 Mar 2026 15:09:23 +0530</pubDate>
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<title>Benefits Of Eating Figs: क्या आप भी अंजीर को समझते हैं मामूली मेवा? हड्डियों से दिल तक इसके फायदे उड़ा देंगे आपके होश!</title>
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<description><![CDATA[ Benefits Of Soaked Figs In The Morning: आजकल सुपरफूड्स की चर्चा में अक्सर महंगे और विदेशी विकल्प छा जाते हैं, लेकिन एक साधारण सा फल अंजीर भी हमारी सेहत के लिए उतना ही फायदेमंद हो सकता है. डॉ.&amp;nbsp; शुभम वात्स्य ने हाल ही में इस पर ध्यान दिलाते हुए अपने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि लोग अंजीर के पोषण को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह शरीर के लिए कई तरह से लाभकारी है. चलिए आपको बताते हैं कि उन्होंने इसके बारे में क्या बताया और यह हमारे लिए कैसे फायदेमंद है.&amp;nbsp;
किस तरह हमारे लिए फायदेमंद?
फोर्ट हॉस्पिटल वसंत कुंज के सीनियर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. वात्स्य के मुताबिक, अंजीर खास तौर पर डाइजेशन के लिए बेहद फायदेमंद है। इसमें घुलनशील और अघुलनशील दोनों तरह का फाइबर पाया जाता है, जो इसे अन्य फलों से अलग बनाता है. यही वजह है कि यह कब्ज की समस्या में राहत देने में मदद करता है और मल को नरम बनाकर पाचन प्रक्रिया को आसान करता है. लेकिन अंजीर के फायदे सिर्फ पाचन तक सीमित नहीं हैं. यह शरीर को कई और जरूरी पोषक तत्व भी देता है. उदाहरण के तौर पर, इसमें कैल्शियम की अच्छी मात्रा होती है, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करती है. जिन लोगों को बोन डेंसिटी की समस्या है, उनके लिए अंजीर एक नेचुरल विकल्प बन सकता है.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;Panic Attack Treatment: क्या होता है पैनिक अटैक, जानें इससे निपटने के लिए क्या हैं सबसे आसान तरीके?
एनर्जी का अच्छा विकल्प
इसके अलावा, अंजीर में मौजूद आयरन शरीर की एनर्जी को बढ़ाने में मदद करता है. यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करता है, जिससे दिनभर एक्टिव रहने में आसानी होती है. वहीं, इसमें मौजूद पोटैशियम, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स दिल की सेहत के लिए फायदेमंद माने जाते हैं. ये तत्व ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करते हैं और हार्ट को स्वस्थ बनाए रखते हैं.&amp;nbsp;
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कोलेस्ट्रॉल को करता है कंट्रोल
डॉ. वात्स्य आगे बताते हैं कि अंजीर का फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में भी मदद करता है. नियमित सेवन से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम हो सकता है, जिससे हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा घटता है. अंजीर खाने का सही तरीका भी उतना ही जरूरी है। सूखे अंजीर को सीधे खाने के बजाय रातभर पानी में भिगोकर सुबह खाने की सलाह दी जाती है. इससे यह नरम हो जाता है और पाचन में आसानी होती है। रोजाना 2 से 3 भीगे हुए अंजीर लेना पर्याप्त माना जाता है. अगर अंजीर का सही तरीके से सेवन किया जाए, तो यह रोजमर्रा की डाइट में एक उपयोगी हिस्सा बन सकता है.
इसे भी पढ़ें -&amp;nbsp;&amp;nbsp;New Covid Variant: 75 म्यूटेशन के साथ आया कोरोना का नया वैरिएंट, जानें इससे डरने की जरूरत कितनी?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 31 Mar 2026 15:09:23 +0530</pubDate>
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<title>Why Acharya Balkrishna calls raw bananas a hidden superfood for gut health and daily nutrition</title>
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<description><![CDATA[ Acharya Balkrishna reveals how raw bananas, often overlooked in kitchens, are packed with essential nutrients that boost immunity, energy, and overall health. From improving digestion to supporting gut health, this simple ingredient can quietly transform your daily diet. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:45 +0530</pubDate>
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<title>Zakir Khan admitted to Lilavati Hospital: Experts warn of long&#45;term burnout, sleep deprivation, and lifestyle&#45;related health risks</title>
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<description><![CDATA[ Zakir Khan was recently seen hospitalized amid health concerns, prompting him to take a long break from work to focus on recovery after years of intense touring and burnout. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:45 +0530</pubDate>
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<title>Glaucoma myths vs truth: Eye experts bust common myths about the ‘Silent thief of sight’</title>
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<description><![CDATA[ Glaucoma often progresses silently, damaging vision before you even notice a problem. Experts warn that believing common myths can delay diagnosis and increase the risk of irreversible blindness. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:44 +0530</pubDate>
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<title>Chaitra Navratri 2026 Fasting Guide: What to eat and avoid during the 9&#45;Day fast for health, energy and spiritual benefits</title>
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<description><![CDATA[ Chaitra Navratri 2026 fasting is not just about devotion but also about following the right diet for health and energy. Know what foods to eat and avoid during the 9-day fast for a balanced and spiritually fulfilling experience. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:44 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Common mistakes people make after noticing vision problems and how to avoid them</title>
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<description><![CDATA[ Waiting for weeks or months after noticing vision problems and thinking it will go away on its own is risky because some conditions, like retinal detachments, glaucoma, or infections, worsen quickly. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:43 +0530</pubDate>
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<title>Does use of non&#45;stick cookware cause health problems? After Shoaib Ibrahim&amp;apos;s question, experts weigh in</title>
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<description><![CDATA[ Convenience and ease of cooking are the reasons why non-stick cookware, primarily coated with polytetrafluoroethylene (PTFE) or &quot;Teflon,&quot; became a daily kitchen staple. However, concerns regarding its safety often arise from chemicals used in the manufacturing process. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:43 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Toothache to immunity boost: Acharya Balkrishna reveals why ginger is a powerful everyday superfood</title>
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<description><![CDATA[ Acharya Balkrishna shares how ginger, a humble kitchen staple, is packed with powerful healing properties that go far beyond flavour. From easing tooth pain to reducing inflammation and boosting overall wellness, this ancient herb proves why it deserves a daily spot in your routine. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:42 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Want a sharper mind? Acharya Balkrishna reveals why walnuts are perfect for brain health and mental clarity</title>
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<description><![CDATA[ Acharya Balkrishna highlights how walnuts, often overlooked in daily diets, are packed with essential nutrients that support brain function, memory, and overall well-being. From boosting focus to protecting brain cells, this simple dry fruit offers a natural and effective solution for modern-day mental fatigue. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:42 +0530</pubDate>
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<title>Could eating less protein actually slow down liver cancer in people with damaged livers?</title>
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<description><![CDATA[ Something as everyday as protein intake can shift the balance in a damaged liver, turning a normal waste product into something that quietly feeds malignancy. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:41 +0530</pubDate>
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<title>Struggling with heart palpitations? Acharya Balkrishna reveals why desi rose is a blessing for heart health</title>
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<description><![CDATA[ Acharya Balkrishna highlights how the humble desi rose, often seen as a symbol of love, holds powerful medicinal benefits in Ayurveda. From calming heart palpitations to boosting mood, digestion, and skin health, this fragrant flower may be your next natural wellness secret.
  ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:41 +0530</pubDate>
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<title>AI outperforms conventional diagnosis for certain types of heart attacks, reveals study</title>
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<description><![CDATA[ This single-centre prospective study included 1,490 patients who had symptoms suggestive of ACS but without an ST elevation on the initial ECG. AI-based ECG interpretation ruled out occlusive MI in 1,382 patients and detected it in 108 patients. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:40 +0530</pubDate>
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<title>Surviving meningitis could haunt you for years, new study reveals hidden dangers</title>
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<description><![CDATA[ What’s even more concerning is how deeply these after-effects ripple into everyday life. Many survivors struggled to hold down jobs, continue studying, or maintain relationships. The resulting isolation and frustration often triggered anxiety, depression, and in some cases, a significantly higher risk of suicidal thoughts. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:39 +0530</pubDate>
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<title>Your phone is secretly messing with your eating habits and it’s worse than you think</title>
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<description><![CDATA[ A major review of 35 different studies, covering more than 52,000 people (mostly young adults), found a worrying connection between problematic smartphone use and signs of disordered eating. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:39 +0530</pubDate>
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<title>Feeling completely overwhelmed? These 5 simple exercises can help you regulate your emotions fast</title>
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<description><![CDATA[ Sometimes, just a few simple and practical exercises are enough to help you regulate your nervous system. They can help you feel more in control and clear your mind from the constant overstimulation. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:38 +0530</pubDate>
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<title>Struggling with stubborn belly fat? This 20&#45;minute workout at home might be the solution you need</title>
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<description><![CDATA[ Losing stubborn belly fat at home is possible with a simple 20-minute daily workout and a consistent routine. Combine these exercises with a healthy lifestyle to see effective and lasting results. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:37 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>New COVID variant ‘Cicada’ in the US: Will it affect India? Know symptoms, precautions, and vaccine protection</title>
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<description><![CDATA[ A new COVID-19 variant, ‘Cicada’ is spreading in the US, raising concerns about its symptoms, transmission, and vaccine effectiveness. Here’s everything you need to know about its possible impact on India and the precautions to stay safe ]]></description>
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<title>High blood sugar risk: Study links Type 1 diabetes with higher chances of dementia</title>
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<description><![CDATA[ It must be noted that the findings show only an association and do not prove that diabetes causes dementia. Type 1 diabetes is relatively rare, accounting for about 5% of all diabetes cases. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:37 +0530</pubDate>
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<title>Rahul Ramakrishna’s brother allegedly dies after Paraquat poisoning: Experts warn why this herbicide is so deadly</title>
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<description><![CDATA[ Telugu actor Rahul Ramakrishna’s brother tragically died after ingesting the highly toxic herbicide paraquat. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:36 +0530</pubDate>
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<title>Too much screen time? 8 early signs of eye strain that could be damaging your eyes</title>
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<description><![CDATA[ Spending too much time on screens can lead to early signs of eye strain, such as dryness, headaches, and blurred vision. Identifying these symptoms early can help protect your eyes and prevent long-term damage. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:36 +0530</pubDate>
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<title>Why blood in stool is often misdiagnosed as piles: Overlooked symptoms of colorectal cancer</title>
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<description><![CDATA[ One of the reasons colorectal cancers often go undetected in the early stages is that the symptoms overlap with relatively visible conditions like piles or fissure in ano. Patients often delay consultation because the bleeding is painless or intermittent, believing it to be harmless. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:13:35 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Liver Disease Symptoms: क्या आपकी हथेलियां भी रहती हैं लाल? डॉक्टर ने दी चेतावनी, लिवर की बीमारी का हो सकता है संकेत</title>
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<description><![CDATA[ How Hands Reveal Liver Damage: लिवर हमारे शरीर में हर दिन चुपचाप सैकड़ों अहम काम करता है. खून को साफ करना, पाचन में मदद करना और हार्मोन को संतुलित रखना, ये सब जिम्मेदारियां इसी अंग पर होती हैं. लेकिन जब लिवर की सेहत बिगड़ने लगती है, तो वह हमेशा तेज लक्षणों के जरिए चेतावनी नहीं देता. कई बार इसके शुरुआती संकेत बहुत साधारण होते हैं और अक्सर लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. हैरानी की बात यह है कि लिवर से जुड़ी कुछ अहम जानकारियां आपके हाथों में भी छिपी हो सकती हैं.
हथेलियों का लाल होना, त्वचा में खुजली, नाखूनों का पीला या कमजोर होना, या उंगलियों में हल्का कंपन, ये सभी फैटी लिवर, हेपेटाइटिस या सिरोसिस जैसी बीमारियों के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. अगर इन बदलावों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो गंभीर मुश्किलों से बचाव संभव है.
हाथ कैसे बताते हैं लिवर की सेहत का हाल?
डॉक्टरों के अनुसार, हाथ हमारे अंदरूनी स्वास्थ्य का आईना होते हैं. हथेलियों का रंग, नाखूनों की बनावट और उंगलियों की मूवमेंट से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि लिवर सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं. Journal of Clinical and Experimental Hepatology में पब्लिश स्टडी के मुताबिक, लाल हथेलियां और नाखूनों में बदलाव, क्रॉनिक लिवर डिजीज की प्रगति से जुड़े हो सकते हैं. &amp;nbsp;इसके लक्षण कुछ इस तरह होते हैं-&amp;nbsp;
उंगलियों का मुड़ना या अकड़ना&amp;nbsp;
अगर आपकी उंगलियां धीरे-धीरे अंदर की ओर मुड़ने लगें या हथेली में खिंचाव महसूस हो, तो यह ड्यूप्यूट्रेन कॉन्ट्रैक्चर हो सकता है. यह समस्या तब होती है, जब हथेली के नीचे की त्वचा मोटी और सख्त होने लगती है. यह सिरोसिस जैसी क्रॉनिक लिवर बीमारियों और ज्यादा शराब पीने वालों में ज्यादा देखी जाती है.
सफेद नाखून और ऊपर गुलाबी लाइन
अगर नाखून ज्यादातर सफेद दिखें और उनके सिरे पर हल्की गुलाबी या लाल पट्टी नजर आए, तो यह टेरीज नेल्स हो सकते हैं. यह बदलाव लिवर सिरोसिस में खून के प्रवाह और प्रोटीन लेवल में गड़बड़ी के कारण होता है.
नाखूनों का उभरा और गोल होना
नाखूनों और उंगलियों का गोल और फूला हुआ दिखना आमतौर पर फेफड़ों या दिल की बीमारी से जुड़ा माना जाता है, लेकिन यह लंबे समय से चली आ रही लिवर बीमारी में भी देखा जा सकता है. लगातार ऐसा दिखे तो मेडिकल जांच जरूरी है.
हाथों में फड़फड़ाहट या कंपन
अगर हाथ फैलाने पर उनमें अनियंत्रित झटके या फड़फड़ाहट हो, तो इसे एस्टेरिक्सिस कहा जाता है. यह एडवांस लिवर डिजीज की गंभीर स्थिति हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी का संकेत हो सकता है और तुरंत इलाज की जरूरत होती है.
हथेलियों और तलवों में लगातार खुजली
बिना किसी रैश के हथेलियों और पैरों के तलवों में तेज खुजली होना बाइल के जमाव का संकेत हो सकता है. यह समस्या रात में या गर्म पानी से नहाने के बाद ज्यादा बढ़ सकती है.
कब डॉक्टर से मिलना जरूरी?
अगर हाथों में ऐसे बदलाव दिखें जैसे लाल हथेलियां, नाखूनों का अजीब रंग, कंपन या लगातार खुजली, तो इन्हें नजरअंदाज न करें. समय पर जांच से लिवर को होने वाले गंभीर नुकसान को रोका जा सकता है.
ये भी पढ़ें-क्या होती है हाथी पांव वाली बीमारी, क्या इसमें सच में हाथी जैसा हो जाता है पैर?
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:31 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Work From Home Problems: डाइनिंग टेबल या सोफे पर करते हैं ऑफिस का काम तो हो जाएं सावधान, जल्दी बदल लें WFH की यह आदत</title>
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<description><![CDATA[ Sitting Posture While Working From Home: वर्क फ्रॉम होम अब अपवाद नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है. जो व्यवस्था कभी अस्थायी समाधान के तौर पर शुरू हुई थी, आज कई लोगों के लिए वही स्थायी ऑफिस बन गई है. न ट्रैफिक का झंझट, न तय समय की पाबंदी और घर के आराम में काम करने की आजादी, यह सब सुनने में जितना आसान लगता है, उतना ही आकर्षक भी है. लेकिन इसी आराम के बीच एक ऐसी आदत पनप रही है, जिस पर लोग ध्यान नहीं दे रहे, घर से काम करने का गलत तरीका.
सोफा, बेड, डाइनिंग टेबल या फिर फर्श पर बैठकर लैपटॉप पर काम करना अब आम बात हो गई है. मोबाइल देखते समय घंटों गर्दन झुकाए रखना, लैपटॉप गोद में रखकर काम करना या आधी लेटी अवस्था में मीटिंग अटेंड करना शुरुआत में भले ही आरामदेह लगे, लेकिन शरीर इसे चुपचाप सहन करता रहता है, असर धीरे-धीरे दिखता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
सीनियर स्पाइन सर्जन डॉ. नवीन पंडिता ने TOI को बताया कि वर्क फ्रॉम होम अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन गलत पॉस्चर और खराब बैठने की आदतें रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुंचा रही हैं. उनके मुताबिक, अब पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा लोग गर्दन और पीठ दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं.
असल दिक्कत यह है कि घर का फर्नीचर ऑफिस के लिए बना ही नहीं होता. डाइनिंग चेयर लंबे समय तक बैठने के लिए नहीं होती, बेड पीठ को कोई सपोर्ट नहीं देता और सोफा रीढ़ की हड्डी को गलत एंगल में मोड़ देता है. रोज कई घंटे इसी तरह बैठने से गर्दन में जकड़न, कमर दर्द, कंधों में खिंचाव, सिरदर्द और आंखों में जलन जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं.
इन दिक्कतों के बढ़ रहे मामले 
डॉक्टरों के अनुसार, अब 20 और 30 की उम्र के युवाओं में भी क्रॉनिक लोअर बैक पेन और सर्वाइकल पेन के मामले बढ़ रहे हैं. कंप्यूटर स्क्रीन अक्सर आंखों की ऊंचाई से नीचे होती है, जिससे लोग आगे की ओर झुककर बैठते हैं और रीढ़ पर जरूरत से ज्यादा दबाव पड़ता है. समस्या यह है कि दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है, इसलिए लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते. पॉस्चर खराब होने का असर सिर्फ मांसपेशियों तक सीमित नहीं रहता. इससे सांस लेने की प्रक्रिया, ब्लड सर्कुलेशन, पाचन और यहां तक कि एकाग्रता पर भी असर पड़ता है. जब शरीर असहज होता है, तो दिमाग भी पूरी तरह फोकस नहीं कर पाता.
अच्छी बात यह है कि इसके लिए महंगे ऑफिस सेटअप की जरूरत नहीं. स्क्रीन को आंखों की सीध में रखना, पैरों को ज़मीन पर टिकाकर बैठना, कमर के पीछे तौलिया या कुशन का सहारा लेना और हर 30 से 40 मिनट में उठकर थोड़ा चलना या स्ट्रेच करना काफी मददगार हो सकता है. डॉ. पंडिता सलाह देते हैं कि अगर दर्द चार से छह हफ्तों तक बना रहे, बढ़ता जाए या सुन्नपन और कमजोरी महसूस हो, तो खुद से इलाज करने के बजाय डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट से मिलना चाहिए. समय रहते छोटी आदतों में सुधार कर लिया जाए, तो वर्क फ्रॉम होम से जुड़ी बड़ी समस्याओं से आसानी से बचा जा सकता है.
कैसे कर सकते हैं ठीक?
डॉक्टर बताते हैं कि अब 20 और 30 की उम्र के लोग भी क्रॉनिक लोअर बैक पेन, गर्दन दर्द और कंधों की जकड़न के साथ आ रहे हैं. स्क्रीन नीचे होने से लोग आगे की ओर झुककर बैठते हैं, जिससे रीढ़ पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. अच्छी बात यह है कि इसके लिए महंगे फर्नीचर की जरूरत नहीं. स्क्रीन को आंखों की सीध में रखना, पैरों को जमीन पर टिकाकर बैठना, कमर के पीछे तौलिया रखकर सपोर्ट देना और हर 30 से 40 मिनट में उठकर स्ट्रेच करना काफी मददगार हो सकता है.
ये भी पढ़ें-HIV से बचने के लिए शख्स ने AI से पूछकर खाई दवाई, हो गया जानलेवा स्टीवन्स जॉनसन सिंड्रोम; यह कितना खतरनाक?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:31 +0530</pubDate>
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<title>Vitamin B12 Deficiency Symptoms: उत्तर भारत के 47% लोग इस &amp;apos;साइलेंट&amp;apos; बीमारी के शिकार, कहीं आपकी थकान भी तो नहीं है बड़ा संकेत?</title>
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<description><![CDATA[  How To Identify Vitamin B12 Deficiency Early: जिस हिसाब से इंसान के लाइफस्टाइल में बदलाव हो रहा है, उसी तरह उसे तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. आजकल बहुत से लोग सही खानपान के बावजूद लगातार थकान, कमजोरी और फोकस की कमी महसूस करते हैं. इसके पीछे एक बड़ी वजह विटामिन B12 की कमी हो सकती है, जो अक्सर नजरअंदाज हो जाती है. &amp;nbsp;Indian Journal of Endocrinology and Metabolism में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, उत्तर भारत में करीब 47 प्रतिशत लोगों में इसकी कमी पाई गई है. चलिए आपको बताते हैं कि इसकी कमी को कैसे दूर कर सकते हैं.&amp;nbsp;
क्यों जरूरी है विटामिन B12?
विटामिन B12 शरीर के लिए बेहद जरूरी है. यह रेड ब्लड सेल्स बनाने, नर्वस सिस्टम को मजबूत रखने और खाने को ऊर्जा में बदलने में मदद करता है. इसकी कमी होने पर शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है और लंबे समय में गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं. इसकी कमी सिर्फ खाने से ही नहीं, बल्कि शरीर में सही तरीके से अब्जॉर्ब न होने के कारण भी हो सकती है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, शाकाहारी लोगों में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है, क्योंकि B12 मुख्य रूप से एनिमल-बेस्ड फूड में पाया जाता है. इसके अलावा, उम्र बढ़ने और कुछ दवाओं के लंबे इस्तेमाल से भी इसकी कमी हो सकती है.&amp;nbsp;
कमी के क्या होते हैं लक्षण?
शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के होते हैं, जैसे हमेशा थका रहना, ध्यान न लगना या हल्की सांस फूलना. लेकिन समय के साथ यह समस्या बढ़कर हाथ-पैरों में झुनझुनी, याददाश्त कमजोर होना और बैलेंस बिगड़ने तक पहुंच सकती है. यही वजह है कि इन संकेतों को समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है.&amp;nbsp;
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&amp;nbsp;किन चीजों में यह मिलती है?
डाइट की बात करें तो नॉन-वेज लोगों के लिए अंडे, मछली, चिकन और डेयरी प्रोडक्ट्स अच्छे सोर्स माने जाते हैं. वहीं, शाकाहारी लोगों को दूध, दही, पनीर के साथ-साथ फोर्टिफाइड फूड्स जैसे सीरियल्स और प्लांट-बेस्ड मिल्क को अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए, क्योंकि सामान्य वेज फूड्स में B12 बहुत कम होता है. कुछ मामलों में सिर्फ खानपान से कमी पूरी नहीं हो पाती.
एक्सपर्ट के अनुसार, अगर B12 की कमी लंबे समय तक बनी रहे, तो यह शरीर में कमजोरी, ब्रेन फॉग और स्थायी न्यूरोलॉजिकल नुकसान का कारण बन सकती है. ऐसे में डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट्स या इंजेक्शन लेना जरूरी हो सकता है. रेगुलर जांच, संतुलित आहार और सही समय पर इलाज से इस समस्या को आसानी से रोका जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:31 +0530</pubDate>
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<title>Heart Changes After 30: सावधान! 30 की उम्र पार करते ही &amp;apos;बूढ़ा&amp;apos; होने लगा आपका दिल, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलतियां?</title>
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<description><![CDATA[ How To Keep Your Heart Healthy After 30: 30 की उम्र पार करना अक्सर एक सामान्य पड़ाव लगता है, लेकिन इसी समय शरीर के अंदर, खासकर दिल में, कई छोटे बदलाव शुरू हो जाते हैं. ये बदलाव तुरंत महसूस नहीं होते, लेकिन आगे चलकर दिल की सेहत पर गहरा असर डाल सकते हैं. अगर इन्हें समय रहते समझ लिया जाए, तो भविष्य में हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है.&amp;nbsp;
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिपिन कुमार दुबे ने TOI को बताया कि 30 के बाद जिंदगी की रफ्तार तेज हो जाती है, काम का दबाव बढ़ता है, जिम्मेदारियां बढ़ती हैं और लाइफस्टाइल बदलने लगती है. ऐसे में शरीर के अंदर धीरे-धीरे बदलाव शुरू होते हैं, जिनका असर दिल पर भी पड़ता है, भले ही बाहर से सब सामान्य लगे. डॉक्टर अक्सर &quot;हार्ट एज&quot; का जिक्र करते हैं, जो बताता है कि आपका दिल आपकी असली उम्र से कितना ज्यादा बूढ़ा हो चुका है. कई लोगों में यह उम्र 5-8 साल तक ज्यादा हो सकती है, खासकर अगर ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा या स्मोकिंग जैसे रिस्क फैक्टर मौजूद हों. इसका मतलब है कि दिल सिर्फ उम्र से नहीं, बल्कि आपकी लाइफस्टाइल से भी तेजी से प्रभावित होता है.
30 के बाद क्या होने लगती है दिक्कत?
30 के बाद मेटाबॉलिज्म धीरे-धीरे कम होने लगता है और खराब आदतों का असर ज्यादा दिखने लगता है. नींद की कमी, तनाव, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और अनहेल्दी खानपान ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और वजन को प्रभावित करने लगते हैं. ये सभी फैक्टर मिलकर दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं. इस उम्र के बाद दिल में कुछ स्ट्रक्चरल बदलाव भी होने लगते हैं. दिल की मांसपेशियां थोड़ी सख्त हो सकती हैं, जिससे उसकी काम करने की क्षमता कम होती है. इसके साथ ही शरीर में हल्की-फुल्की सूजन &amp;nbsp;बढ़ने लगती है, जो धीरे-धीरे आर्टरीज में बदलाव ला सकती है. यही बदलाव आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर और ब्लॉकेज जैसी समस्याओं की वजह बन सकते हैं.
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये बदलाव अक्सर बिना किसी लक्षण के होते हैं. हाई ब्लड प्रेशर, खराब कोलेस्ट्रॉल या प्री-डायबिटीज जैसी स्थितियां लंबे समय तक चुपचाप शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती हैं और जब तक पता चलता है, तब तक समस्या गंभीर हो चुकी होती है. हालांकि अच्छी बात यह है कि 30 की उम्र दिल को स्वस्थ रखने के लिए सबसे सही समय भी होती है. रोजाना कम से कम 30 मिनट की वॉक, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव को कंट्रोस करना दिल की सेहत को बेहतर बनाए रख सकता है. इसके साथ ही कुछ जरूरी जांचों पर ध्यान देना भी जरूरी है, जैसे नियमित ब्लड प्रेशर चेक कराना, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर की जांच कराना.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:30 +0530</pubDate>
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<title>Burning and Tingling Sensation in Feet: पैरों में हर वक्त महसूस होती है जलन और झुनझुनी, जानें किस बीमारी का है ये संकेत</title>
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<description><![CDATA[ पैरों में लगातार जलन या झुनझुनी होना एक आम समस्या लगती है, लेकिन यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी तो हो सकता है. अक्सर लोग इसे थकान या कमजोरी से होने वाली समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. हालांकि, यह शरीर के अंदर हो रही किसी गंभीर समस्या का इशारा भी हो सकता है. इसलिए जब भी आपकी ऐसी समस्या ज्यादा हो तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.
पैरों में जलन और झुनझुनी का कारण

इस समस्या का सबसे आम कारण Peripheral Neuropathy हो सकता है. यह एक नसों से संबंधित समस्या है, इसमें पैरों में जलन, सुन्न होना और झुनझुनाहट महसूस होती है. यह ज्यादातर शुगर (डायबिटीज) के मरीजों में होती है, क्योंकि अधिक समय तक शुगर लेवल बढ़ा रहने से नसों को नुकसान होता है और इस प्रकार के लक्षण दिखाई देते हैं
इसके अलावा एक अन्य समस्या Sciatica हो सकती है, जो रीढ़ की हड्डी से निकलने वाली सबसे लंबी नर्व (साइटिक नर्व) पर दबाव के कारण होता है. नस दब जाती है, जिससे दर्द, जलन और झुनझुनी पैरों तक पहुंच जाती है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत पोश्चर या भारी वजन उठाना इस समस्या को और अधिक बढ़ा सकता है.
Restless Legs Syndrome भी इस समस्या का कारण हो सकता है, ऐसे में लेटते या आराम करते वक्त पैरों में अजीब सी जलन और झुनझुनी महसूस होती है, बार-बार पैर हिलाने का मन करता है और अलग सी ही बेचैनी होने लगती है. यह समस्या ज्यादातर रात के समय होती है, जिससे सोने में भी काफी समस्या आती है
इस प्रकार की समस्या का एक कारण विटामिन्स की कमी भी हो सकती है, खासकर विटामिन B12 की कमी, जो नसों को नुकसान पहुंचाती है और जिसके कारण हाथों और पैरों में काफी अधिक जलन और झुनझुनी महसूस होने लगती है. यह समस्या गलत खानपान की आदत, कम पोषण वाला भोजन और जंक फूड का अधिक सेवन करने से हो सकती है, इसलिए संतुलित और पोषण वाला आहार लेना चाहिए.

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हो सकती है किडनी से जुडी बीमारी&amp;nbsp;
अगर आपको किडनी और थायरॉयड से जुड़ी समस्या है तो ऐसे में भी आपको ये लक्षण देखने को मिल सकते हैं. शरीर के टॉक्सिन्स नसों पर काफी गहरा असर डालते हैं. इस समस्या से बचाव के लिए सबसे पहले अपनी जीवनशैली में सुधार लाना जरूरी है, इसलिए नियमित व्यायाम करें, संतुलित आहार लें और जरूरत के अनुसार पानी पिएं. विटामिन और मिनरल्स से भरपूर डाइट अपनाएं. लंबे समय तक एक ही जगह बैठने से बचें और समय-समय पर स्ट्रेचिंग भी करते रहें. अगर झुनझुनी लगातार बनी रहे, दर्द असहनीय हो जाए तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें. सही समय पर जांच और इलाज से समस्या को बढ़ने से पहले ही रोका जा सकता है. कुल मिलाकर, पैरों में जलन और झुनझुनी को नजरअंदाज करना सही नहीं है, क्योंकि यह शरीर का एक चेतावनी हो सकती है.
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:30 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>Knee Clicking Sound Causes: घुटना मोड़ने पर आ रही कट&#45;कट की आवाज, क्या आ गया रिप्लेसमेंट का टाइम?</title>
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<description><![CDATA[ Why Does My Knee Make Clicking Sounds When Bending: घुटना मोड़ते समय अगर कट-कट या चटकने की आवाज आने लगे, तो अक्सर लोग घबरा जाते हैं और सोचते हैं कि कहीं अब घुटना बदलवाने यानी रिप्लेसमेंट का समय तो नहीं आ गया. लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हर बार ऐसी आवाज किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती. चलिए आपको बताते हैं कि कब यह गंभीर बीमारी का संकेत होता है और कब आपको घबराने की जरूरत नहीं होती है.&amp;nbsp;
क्यों आती है आवाज?
हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर इस तरह की आवाज को &quot;क्रेपिटस&quot; कहते हैं. &amp;nbsp;यह आवाज तब सुनाई देती है जब आप घुटना मोड़ते, सीधा करते या सीढ़ियां चढ़ते-उतरते हैं. &amp;nbsp;इसमें पॉपिंग, क्लिकिंग, ग्राइंडिंग या खड़कने जैसी आवाज शामिल हो सकती है. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में यह स्थिति सामान्य होती है और किसी बड़े खतरे का संकेत नहीं होती. कई लोगों को बिना किसी दर्द के भी ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं. रिसर्च में भी पाया गया है कि केवल आवाज आने से मूवमेंट या लाइफस्टाइल पर ज्यादा असर नहीं पड़ता.
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कब होती है दिक्कत?
हालांकि, कुछ मामलों में यह ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी समस्या से जुड़ा हो सकता है. अगर आवाज के साथ सूजन, दर्द, जकड़न, घुटने को मोड़ने-सीधा करने में दिक्कत, मांसपेशियों की कमजोरी या घुटने का अस्थिर होना जैसे लक्षण भी दिखें, तो यह संकेत हो सकता है कि अंदरूनी समस्या है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि सिर्फ आवाज आने पर आमतौर पर इलाज की जरूरत नहीं होती. लेकिन अगर इसके साथ दर्द भी हो, तो डॉक्टर जांच करके सही कारण पता लगाते हैं और उसी के अनुसार इलाज तय किया जाता है. अगर ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी समस्या सामने आती है, तो इसके लिए कई तरह के इलाज उपलब्ध हैं. इसमें वजन कंट्रोल करना, नियमित एक्सरसाइज करना, दर्द कम करने वाली दवाओं का इस्तेमाल, फिजियोथेरेपी और जरूरत पड़ने पर इंजेक्शन जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं.
क्या बदलवाने की जरूरत होती है?
सबसे अहम सवाल यही होता है कि क्या ऐसी आवाज आने का मतलब घुटना बदलवाने की जरूरत है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, सिर्फ आवाज के आधार पर ऐसा फैसला नहीं लिया जाता. घुटना रिप्लेसमेंट तब ही जरूरी होता है जब दर्द बहुत ज्यादा हो, चलना-फिरना मुश्किल हो जाए और बाकी इलाज असर न कर रहे हों. इसलिए अगर घुटना मोड़ने पर आवाज आ रही है, लेकिन दर्द नहीं है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. वहीं, अगर इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है, ताकि समय रहते सही इलाज किया जा सके.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:30 +0530</pubDate>
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<title>क्या शुगर के मरीज पी सकते हैं गन्ने का जूस, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?</title>
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<description><![CDATA[ आजकल की लाइफस्टाइल में डायबिटीज एक आम बीमारी बन गई है. यह बीमारी ऐसी है, जिसमें खाने-पीने को लेकर बहुत सी सावधानियां रखनी पड़ती हैं.&amp;nbsp; गर्मियां चल रही हैं और ऐसे में ठंडा-ठंडा गन्ने का जूस पर किसका दिल नहीं आता. यह न सिर्फ दिमाग और पेट को राहत देता है, बल्कि हाइड्रेट रखने का काम भी करता है.&amp;nbsp;
हालांकि, शुगर के मरीजों के मन में अक्सर यह सवाल आता है कि क्या वे इसे पी सकते हैं या नहीं? कहा जाता है कि गन्ने का जूस ज्यादा मीठा होता है और शुगर रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है, ऐसे में आइए समझते है की इस पर एक्सपर्ट्स की क्या राय है.&amp;nbsp;
एक्सपर्ट की क्या राय है?
एक्सपर्ट्स की बात मानें तो कुछ डायबिटीज पेशेंट के लिए गन्ने के रस का सेवन करना संभव हो सकता है, लेकिन उन्हें नियंत्रित मात्रा में ही इसका सेवन करना चाहिए. एक्सपर्ट कहते हैं कि शुगर के मरीजों के लिए अच्छा यह है कि वह गन्ने के रस की जगह गन्ना खा सकते हैं, क्योंकि इसमें ज्यादा फाइबर और प्रोटीन पाया जाता है, जो आपके ब्लड शुगर लेवल को बढ़ने नहीं देता.&amp;nbsp;
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गन्ने के रस में कितनी शुगर होती है
फार्माकोग्नॉसी रिव्यूज में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक, गन्ने के रस में 70-75% पानी, 13-15% सुक्रोज और 10-15% फाइबर होता है. इसके अलावा भारत में पीलिया, रक्तस्राव, पेशाब में जलन, पेशाब में जलन और टॉयलेट संबंधी बीमारी के इलाज में गन्ने का रस बेहद कारगर है. वैसे तो गन्ने का जूस प्राकृतिक होता है, लेकिन इसमें शुगर की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जो शरीर में जल्दी घुलता है और ब्लड में शुगर लेवल को तेजी से बढ़ा सकता है. आपको बता दें कि एक छोटा गिलास गन्ने के रस यानी 240 एमएल गन्ने के रस में करीब 50 ग्राम चीनी होती है यानी 10 चम्मच चीनी.&amp;nbsp;
कुछ &amp;nbsp;बातों का रखें ध्यान
चाहे डाइबीटीज पेशेंट हो या आम आदमी सबको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कभी भी खाली पेट गन्ने का जूस बिल्कुल न पिएं. ध्यान रखें कि एक बार में ज्यादा मात्रा में गन्ने का जूस ना लें, इससे शरीर में सुगर लेवल तेजी से बढ़ता है. साथ ही डाइबीटीज पेशेंट को डॉक्टर की सलाह के बिना इसे डाइट में शामिल नहीं करना चाहिए. शुगर के मरीजों के लिए गन्ने के जूस के अलावा कुछ हेल्दी ऑप्शनस भी हैं जैसे नारियल पानी, बिना चीनी के नींबू पानी, छाछ और ग्रीन टी.
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:30 +0530</pubDate>
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<title>BA.3.2 Covid Variant: कैसे हैं Cicada कोविड स्ट्रेन के लक्षण, जिसकी वजह से तेजी से बढ़ रहे कोरोना के केस?</title>
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<description><![CDATA[ Vaccine Effectiveness Against New Variant: अमेरिका में एक नया कोविड-19 वेरिएंट तेजी से चर्चा में आ गया है, जिसे &#039;सिकाडा&#039; नाम दिया गया है. साइंटफिक भाषा में इसे BA.3.2 स्ट्रेन कहा जा रहा है, जो ओमिक्रॉन का ही एक सब-वेरिएंट है. हेल्थ एजेंसियों के मुताबिक, यह वेरिएंट अब अमेरिका के कई राज्यों में फैल चुका है और दुनियाभर के कई देशों में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है. चलिए आपको बताते हैं कि यह कितना खतरनाक है और इसका प्रभाव कहां तक है.&amp;nbsp;
कहां मिले इसके लक्षण?
सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, इस वेरिएंट के संकेत वेस्टवॉटर सैंपल्स में भी मिले हैं, जिससे इसके फैलाव का अंदाजा लगाया जा रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, कैलिफोर्निया, फ्लोरिडा, न्यूयॉर्क और इलिनॉय जैसे राज्यों में इसके लक्षण मिले हैं. पहली बार यह केस जून 2025 में सामने आया था, जब नीदरलैंड्स से आए एक यात्री में यह इंफेक्शन पाया गया. इस नए स्ट्रेन को सिकाडा नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि यह लंबे समय तक अंडरग्राउंड रहने के बाद अचानक सामने आया, ठीक वैसे ही जैसे सिकाडा नाम के कीड़े सालों बाद जमीन से बाहर आते हैं. साइंटिस्ट का कहना है कि यह वेरिएंट काफी ज्यादा म्यूटेटेड है और इसमें 70 से 75 तक म्यूटेशन पाए गए हैं, जो इसे बाकी वेरिएंट्स से अलग बनाते हैं.
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इसके लक्षण और प्रभाव
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसके लक्षण क्या हैं और क्या यह ज्यादा खतरनाक है. फिलहाल एक्सपर्ट का कहना है कि इसके लक्षण बाकी कोविड वेरिएंट्स जैसे ही हैं. इसमें खांसी, बुखार या ठंड लगना, गले में खराश, नाक बंद होना, सांस लेने में दिक्कत, स्वाद और गंध का चले जाना, थकान, सिरदर्द और पेट से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं. Andrew Pekosz, जो जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ का कहना है कि इस वेरिएंट में इतनी ज्यादा म्यूटेशन हैं कि यह इम्यून सिस्टम के लिए अलग तरह से दिखाई दे सकता है. &amp;nbsp;वहीं, एपिडेमियोलॉजिस्ट Syra Madad के मुताबिक, अभी तक ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है कि यह वेरिएंट ज्यादा गंभीर बीमारी पैदा कर रहा है.
एंटीबॉडी से बच निकलने की क्षमता
हालांकि, शुरुआती स्टडीज में यह सामने आया है कि यह स्ट्रेन एंटीबॉडी से बच निकलने की क्षमता रखता है, जिससे यह सवाल उठता है कि वैक्सीन इसकी कितनी प्रभावी सुरक्षा दे पाएगी. इस पर अभी रिसर्च जारी है और वैज्ञानिक लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं। फिलहाल, स्वास्थ्य एजेंसियां लोगों को सतर्क रहने की सलाह दे रही हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि लक्षण भले ही सामान्य हों, लेकिन इंफेक्शन के फैलाव को देखते हुए सावधानी बरतना जरूरी है, ताकि किसी भी संभावित खतरे से समय रहते निपटा जा सके.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:29 +0530</pubDate>
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<title>Python Weight Loss: खतरनाक अजगर कम करेगा आपका वजन? वैज्ञानिकों ने खून में खोजा &amp;apos;जादुई तत्व&amp;apos;, जो मिटा देगा आपकी भूख!</title>
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<description><![CDATA[ Can Python Blood Help In Weight Loss: मोटापे को कम करने के लिए अब एक नया और दिलचस्प रास्ता सामने आया है. साइंटिस्ट ने बर्मीज अजगर के खून में एक ऐसे खास तत्व की पहचान की है, जो भविष्य में वजन घटाने की दवाओं के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है. इस खोज ने मोटापे से जूझ रही दुनिया के लिए नई उम्मीद जगाई है, क्योंकि यह भूख को कंट्रोल करने का एक अलग तरीका दिखाती है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे अजगर आपका वजन कम करने वाला है.&amp;nbsp;
अजगर को क्यों चुना गया?
नेचर मेटाबॉलिज्म में पब्लिश स्टडी में बताया गया कि अजगर अपने खाने के अनोखे तरीके के लिए जाने जाते हैं. ये अपने शरीर के बराबर बड़े शिकार को खा सकते हैं और फिर महीनों तक बिना खाए रह सकते हैं. साइंटिस्ट ने पाया कि जब अजगर खाना खाते हैं, तो उनके खून में कुछ खास तत्व अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं, जो उनके मेटाबॉलिज्म को संतुलित रखने में मदद करते हैं. इस स्टडी को स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक जोनाथन लॉन्ग की टीम ने किया. उन्होंने छोटे अजगरों के खून के सैंपल खाने से पहले और बाद में जांचे. इसमें 200 से ज्यादा ऐसे तत्व मिले, जिनका स्तर खाने के बाद काफी बढ़ गया. इनमें से एक खास तत्व pTOS था, जो 1000 गुना से भी ज्यादा बढ़ गया.&amp;nbsp;
क्या होता है यह?
यह खास तत्व आंत में मौजूद बैक्टीरिया द्वारा बनता है और दिलचस्प बात यह है कि यह इंसानों में भी बहुत कम मात्रा में पाया जाता है. इसके असर को समझने के लिए साइंटिस्ट ने मोटापे से ग्रसित चूहों पर इसका टेस्ट किया. रिसर्च के नतीजे काफी चौंकाने वाले थे. जिन चूहों को pTOS दिया गया, उन्होंने कम खाना शुरू कर दिया और करीब 28 दिनों में उनका वजन लगभग 9 प्रतिशत तक कम हो गया. यानी यह तत्व सीधे तौर पर भूख को कम करने में मदद करता है.
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अब तक की दवाओं से कितना अलग?
अब तक जो वजन घटाने की दवाएं इस्तेमाल होती हैं, जैसे Wegovy, वे पेट के खाली होने की प्रक्रिया को धीमा करके काम करती हैं और कई बार इससे मतली जैसे साइड इफेक्ट भी होते हैं. लेकिन pTOS का तरीका अलग है. यह सीधे दिमाग के उस हिस्से पर असर डालता है, जिसे हाइपोथैलेमस कहा जाता है और जो भूख को कंट्रोल करता है. स्टडी से जुड़े वैज्ञानिक लेस्ली लेनवैंड का कहना है कि यह खोज भूख को नियंत्रित करने का एक नया और बेहतर तरीका दिखाती है, जिसमें मौजूदा दवाओं की तरह साइड इफेक्ट्स कम हो सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:29 +0530</pubDate>
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<title>Hepatitis in India: देश में हेपेटाइटिस के साथ जी रहे करोड़ों, बिन लक्षण कैसे छलनी कर रहा लिवर? जानें एक्सपर्ट की राय</title>
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<description><![CDATA[ How Common Is Hepatitis In India: भारत में लाखों लोग हेपेटाइटिस बी या सी के साथ जी रहे हैं, लेकिन उन्हें इसका अंदाजा तक नहीं है. वे रोज काम पर जाते हैं, सामान्य जीवन जीते हैं, फिर भी एक वायरस चुपचाप उनके लिवर को नुकसान पहुंचाता रहता है. जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक अक्सर स्थिति गंभीर हो चुकी होती है, जैसे लिवर सिरोसिस, लिवर फेल्योर या यहां तक कि लिवर कैंसर तक का खतरा बढ़ जाता है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
मेदांता अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के डॉ. सौरदीप चौधरी ने TOI को बताया कि, भारत में हेपेटाइटिस वायरस का बोझ काफी ज्यादा है. अनुमान है कि देश की लगभग 3-4 प्रतिशत आबादी हेपेटाइटिस बी से संक्रमित है, जबकि 0.5- 1 प्रतिशत लोगों में हेपेटाइटिस सी पाया जाता है. यानी करीब एक करोड़ से अधिक लोग क्रॉनिक इंफेक्शन के साथ जी रहे हैं. समस्या यह है कि दोनों वायरस वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकते हैं, इसलिए अधिकांश लोग तब तक जांच नहीं कराते जब तक लिवर को गंभीर नुकसान न हो जाए.
बड़ी संख्या में आते हैं मरीज
भारत में हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई, इन पांचों प्रकार के वायरस बड़ी संख्या में मामले दर्ज करते हैं. हेपेटाइटिस ए आमतौर पर खराब स्वच्छता वाले इलाकों में 10- 30 प्रतिशत तीव्र मामलों के लिए जिम्मेदार है, जबकि हेपेटाइटिस ई 10-40 प्रतिशत तीव्र हेपेटाइटिस और 15-45 प्रतिशत तीव्र लिवर फेल्योर से जुड़ा पाया गया है, खासकर गर्भवती महिलाओं में. &amp;nbsp;जागरूकता की कमी भी बड़ी समस्या है। कई लोग मानते हैं कि लिवर की बीमारी सिर्फ शराब पीने वालों को होती है, जबकि यह पूरी तरह सही नहीं है. &amp;nbsp;कुछ लोगों को यह भी भ्रम है कि हेपेटाइटिस सामान्य संपर्क से साथ खाना खाने, गले मिलने या खांसने से फैलता है, जो कि गलत धारणा है.
कैसे फैल सकता है?
हेपेटाइटिस बी और सी का संक्रमण अक्सर असुरक्षित इंजेक्शन, बिना जांचे गए रक्त चढ़ाने, असुरक्षित सर्जरी या डेंटल प्रक्रिया, इंफेक्टेड सुई से टैटू या पियर्सिंग और प्रसव के दौरान मां से बच्चे में फैल सकता है. अगर हेपेटाइटिस बी या सी का इलाज न कराया जाए तो यह धीरे-धीरे लिवर में फाइब्रोसिस और सिरोसिस का कारण बन सकता है, जो आगे चलकर लिवर कैंसर में बदल सकता है. अच्छी बात यह है कि हेपेटाइटिस सी का इलाज अब संभव है और 8 से 12 हफ्तों की दवा से इसे ठीक किया जा सकता है. हालांकि, हेपेटाइटिस बी के अधिकांश मामलों में लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ती है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:11:29 +0530</pubDate>
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<title>Kidney Stones Prevention: क्या ज्यादा से ज्यादा पानी पीने से नहीं होता किडनी में स्टोर? आपकी गलतफहमी दूर कर देगी यह स्टडी</title>
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<description><![CDATA[ Does Drinking More Water Prevent Kidney Stones: किडनी स्टोन यानी गुर्दे की पथरी एक आम लेकिन बेहद दर्दनाक समस्या है. जिन लोगों को यह होती है, वे अक्सर बताते हैं कि इसका दर्द सबसे ज्यादा तकलीफ देने वाला होता है. यह न सिर्फ रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है, बल्कि कई बार अस्पताल तक जाने की नौबत भी आ जाती है. आंकड़ों के मुताबिक, काफी बड़ी संख्या में लोग जीवन में कभी न कभी इस समस्या का सामना करते हैं और कई मामलों में यह दोबारा भी हो सकती है.&amp;nbsp;
पर्याप्त पानी पीने की सलाह
इसी वजह से डॉक्टर हमेशा ज्यादा पानी पीने की सलाह देते हैं. माना जाता है कि पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से यूरिन पतला रहता है, जिससे मिनरल्स आपस में चिपककर पथरी नहीं बना पाते. लेकिन समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इस आदत को लंबे समय तक बनाए नहीं रख पाते. इसी बात को समझने के लिए हाल ही में एक बड़ी स्टडी की गई, जिसे Urinary Stone Disease Research Network ने संचालित किया और Duke Clinical Research Institute ने कोऑर्डिनेट किया. यह रिसर्च प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित हुई, जिससे इसकी विश्वसनीयता और भी बढ़ जाती है.
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किन लोगों को इसमें शामिल किया गया?
इस स्टडी में अमेरिका के छह बड़े मेडिकल सेंटर से कुल 1,658 लोगों को शामिल किया गया, जिनमें किशोर और वयस्क दोनों थे. रिसर्च का मकसद यह जानना था कि क्या लोगों को ज्यादा पानी पीने के लिए खास तरीके से मोटिवेट करने पर किडनी स्टोन को दोबारा बनने से रोका जा सकता है. प्रतिभागियों को दो ग्रुप में बांटा गया. एक ग्रुप को सामान्य सलाह दी गई, जबकि दूसरे ग्रुप को एक खास &quot;हाइड्रेशन प्रोग्राम&quot; में शामिल किया गया. इस प्रोग्राम के तहत स्मार्ट बोतल, रिमाइंडर मैसेज, पर्सनल टारगेट और कोचिंग जैसी सुविधाएं दी गईं, ताकि लोग ज्यादा पानी पी सकें.
क्या निकला रिजल्ट?
करीब दो साल तक चले इस अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने इस प्रोग्राम को फॉलो किया, उन्होंने पानी पीने की मात्रा जरूर बढ़ाई. लेकिन यह बढ़ोतरी इतनी नहीं थी कि किडनी स्टोन के दोबारा बनने के खतरे को पूरी तरह कम किया जा सके. रिसर्चर्स का कहना है कि असली चुनौती लोगों का लंबे समय तक इस आदत को बनाए रखना है. भले ही लोग फायदे जानते हों और उन्हें सपोर्ट भी मिले, फिर भी रोजाना ज्यादा पानी पीना आसान नहीं होता. इसके अलावा, यह भी सामने आया कि हर व्यक्ति के लिए एक जैसा टारगेट सही नहीं हो सकता. शरीर की बनावट, लाइफस्टाइल, मौसम और हेल्थ कंडीशन जैसे कई फैक्टर यह तय करते हैं कि किसी को कितनी मात्रा में पानी की जरूरत है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 15:47:40 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>संजय बांगर की बेटी अनाया ने कराई जेंडर अफर्मिंग सर्जरी, जानिए क्या होती है यह प्रक्रिया?</title>
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<description><![CDATA[ संजय बांगर की बेटी अनाया ने कराई जेंडर अफर्मिंग सर्जरी, जानिए क्या होती है यह प्रक्रिया? ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 15:47:39 +0530</pubDate>
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<title>Type 1 Diabetes And Memory Loss: टाइप 1 डायबिटीज है तो पढ़ लें यह रिसर्च, मेमोरी लॉस होने का बड़ा खतरा</title>
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<description><![CDATA[ Can Type 1 Diabetes Cause Memory Loss: जैसे-जैसे टाइप 1 डायबिटीज के मरीज अब पहले से ज्यादा उम्र तक जी रहे हैं, वैसे-वैसे इसके लंबे असर भी सामने आने लगे हैं. एक बड़ी नई रिसर्च में पाया गया है कि टाइप 1 डायबिटीज से पीड़ित लोगों में डिमेंशिया यानी याददाश्त कमजोर होना का खतरा सामान्य लोगों के मुकाबले लगभग तीन गुना ज्यादा हो सकता है. इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि यह बीमारी समय के साथ दिमाग पर कैसे असर डालती है.&amp;nbsp;
क्या निकला रिसर्च में?
न्यूरोलॉजी जर्नल में पब्लिश इस स्टडी में करीब 2.8 लाख लोगों का डेटा देखा गया. इनमें से 5,442 लोगों को टाइप 1 डायबिटीज थी. इस ग्रुप में से 144 लोगों को बाद में डिमेंशिया हुआ, यानी करीब 2.6 प्रतिशत लोगों को. वहीं जिन लोगों को डायबिटीज नहीं थी, उनमें यह आंकड़ा सिर्फ 0.6 प्रतिशत था. उम्र और पढ़ाई जैसे फैक्टर को ध्यान में रखने के बाद भी टाइप 1 डायबिटीज वालों में खतरा लगभग तीन गुना ज्यादा पाया गया. टाइप 2 डायबिटीज में भी ऐसा ही ट्रेंड दिखा, लेकिन वहां खतरा करीब दो गुना था. हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह डेटा हेल्थ रजिस्ट्री से लिया गया था, इसलिए कुछ मामलों में गलत या अधूरी जानकारी भी हो सकती है.
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क्यों होता है ऐसा खतरा?
अब सवाल यह है कि टाइप 1 डायबिटीज में ऐसा क्यों होता है? इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यह बीमारी अक्सर कम उम्र में ही शुरू हो जाती है. यानी व्यक्ति लंबे समय तक इस बीमारी के साथ जीता है, जिससे दूसरी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. दूसरी अहम वजह है ब्लड शुगर का बार-बार ऊपर-नीचे होना. &amp;nbsp;टाइप 1 डायबिटीज में शुगर लेवल बहुत तेजी से गिरता और बढ़ता है. खासकर लो ब्लड शुगर ब्रेन के लिए खतरनाक होता है, क्योंकि इससे ब्रेन सेल्स पर दबाव पड़ता है. इतना ही नहीं, जब लो शुगर के बाद अचानक हाई शुगर हो जाती है, तो यह दिमाग के उस हिस्से को ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है, जो याददाश्त और सीखने से जुड़ा होता है.&amp;nbsp;
इंसुलिन की भी अहम भूमिका
इंसुलिन भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है. शरीर में एक एंजाइम होता है, जो इंसुलिन और एक खास प्रोटीन दोनों को तोड़ता है. &amp;nbsp;यही प्रोटीन अल्जाइमर से जुड़ा होता है. जब शरीर में इंसुलिन ज्यादा होता है, तो यह एंजाइम पहले इंसुलिन को तोड़ने में लग जाता है और एमाइलॉयड बीटा दिमाग में जमा होने लगता है. यह जमा हुआ प्रोटीन दिमाग में प्लाक बनाता है, जिससे ब्रेन सेल्स के बीच कम्युनिकेशन खराब होता है और धीरे-धीरे याददाश्त कमजोर होने लगती है. टाइप 1 डायबिटीज वाले लोगों में अल्जाइमर और वेस्कुलर डिमेंशिया दोनों का खतरा बढ़ जाता है.&amp;nbsp;
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 15:47:39 +0530</pubDate>
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<title>Nuclear Attack Survival: परमाणु हमला हो जाए तो कैसे बचेगी जान, रेडिएशन फॉलआउट से कैसे बचा सकते हैं अपना पूरा परिवार?</title>
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<description><![CDATA[ What To Do During A Nuclear Attack: अगर आपके शहर पर कभी परमाणु हमला हो जाए, तो घबराने के बजाय सही जानकारी और तुरंत लिए गए फैसले आपकी और आपके परिवार की जान बचा सकते हैं. ऐसे हालात में सबसे बड़ा खतरा सिर्फ धमाका नहीं, बल्कि उसके बाद फैलने वाला रेडिएशन फॉलआउट होता है, जो हवा, पानी और जमीन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है. सबसे पहले समझना जरूरी है कि परमाणु विस्फोट के बाद छोटे-छोटे रेडियोएक्टिव कण हवा में फैल जाते हैं और धीरे-धीरे जमीन पर गिरते हैं. यही फॉलआउट सबसे ज्यादा खतरनाक होता है. इसलिए बचाव के तीन सबसे अहम तरीके हैं डिस्टेंस, शील्डिंग और टाइम .&amp;nbsp;
हमले के बाद क्या करना चाहिए?
American Red Cross की रिपोर्ट के अनुसार, &amp;nbsp;हमले की स्थिति में जितनी जल्दी हो सके किसी मजबूत इमारत के अंदर चले जाएंय अगर संभव हो तो बेसमेंट या जमीन के नीचे वाली जगह सबसे सुरक्षित मानी जाती है. अगर नीचे जाने का विकल्प न हो, तो इमारत के बीच वाले हिस्से में रहें, जहां खिड़कियां कम हों और दीवारें मोटी हों. ईंट, कंक्रीट और मोटी दीवारें रेडिएशन से बचाने में मदद करती हैं.
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किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
ध्यान रखें कि बाहर की हवा सबसे ज्यादा खतरनाक होती है, इसलिए घर या शेल्टर में जाकर दरवाजे-खिड़कियां बंद कर लें. पंखे, एसी या ऐसी मशीनें बंद कर दें जो बाहर की हवा अंदर लाती हैं. शुरुआती समय में रेडिएशन का स्तर सबसे ज्यादा होता है, इसलिए कम से कम 24 घंटे तक अंदर रहना जरूरी होता है, हालांकि कुछ मामलों में यह समय और भी ज्यादा हो सकता है .
बाहर होने पर क्या करें?
अगर आप हमले के समय बाहर फंस जाएं, तो तुरंत जमीन पर लेट जाएं और सिर को ढक लें. किसी मजबूत चीज के पीछे छिपने की कोशिश करें. मुंह और नाक को कपड़े या मास्क से ढक लें ताकि रेडियोएक्टिव कण शरीर के अंदर न जा सकें. जैसे ही मौका मिले, तुरंत किसी सुरक्षित जगह पर पहुंच जाएं, क्योंकि ये कण हवा के साथ दूर-दूर तक फैल सकते हैं. अगर आप बाहर थे और फिर अंदर आए हैं, तो खुद को साफ करना भी बेहद जरूरी है. अपने कपड़े बदलें और उन्हें अलग करके पैक कर दें. नहाने का मौका मिले तो साबुन और पानी से शरीर और बाल अच्छी तरह साफ करें. इससे शरीर पर जमे खतरनाक कण काफी हद तक हट सकते हैं.&amp;nbsp;
निर्देशों का पालन करें
इस दौरान आधिकारिक निर्देशों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. रेडियो, टीवी या मोबाइल के जरिए मिलने वाली जानकारी को फॉलो करें और बिना निर्देश के बाहर न निकलें.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 15:47:39 +0530</pubDate>
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<title>Indoor Air Pollution: घर में इस कॉमन दिक्कत से हर साल 40 लाख लोग गंवा रहे जान, कहीं आप भी तो नहीं करते यह गलती?</title>
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<description><![CDATA[ Why Indoor Air Pollution Is Dangerous: घर के अंदर की हवा भी कितनी खतरनाक हो सकती है, इस पर हाल ही में सामने आई एक स्टडी ने गंभीर चिंता जताई है. &amp;nbsp;इस रिसर्च से जुड़े एपिडेमियोलॉजिस्ट विक्रम निरंजन ने इसे &quot;ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी तक बता दिया है और इस पर तुरंत कार्रवाई की जरूरत बताई है. Thecooldown में पब्लिश यह स्टडी 1990 से 2021 के बीच 204 देशों में घरेलू वायु प्रदूषण के असर को समझने के लिए किया गयाय इसमें पाया गया कि दुनिया के कई हिस्सों में आज भी लोग खाना बनाने के लिए लकड़ी, कोयला और गोबर जैसे पारंपरिक ईंधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो घर के अंदर की हवा को बेहद जहरीला बना देते हैं.
हर साल होती है इतने लाख लोगों की मौत
हालांकि समय के साथ इन ठोस ईंधनों का उपयोग कुछ हद तक कम हुआ है, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई. खासकर अफ्रीका और दक्षिण एशिया के कई क्षेत्रों में आज भी साफ और सुरक्षित ईंधन तक लोगों की पहुंच सीमित है. वहीं, विकसित देशों में बेहतर विकल्प मिलने के कारण इस समस्या में कमी आई है. यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि इनडोर एयर पॉल्यूशन कई गंभीर बीमारियों से जुड़ा हुआ है. रिसर्च के मुताबिक, बचपन में प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से सांस से जुड़ी समस्याएं, दिमागी विकास पर असर और लंबे समय तक रहने वाली स्वास्थ्य परेशानियां हो सकती हैं. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार, हर साल करीब 40 लाख लोगों की मौत समय से पहले सिर्फ घर के अंदर की प्रदूषित हवा के कारण हो जाती है.
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किन जगहों पर होती है दिक्कत?
समस्या सिर्फ गरीब देशों तक सीमित नहीं है. गैस चूल्हे भी एक बड़ा कारण बन रहे हैं, क्योंकि ये घर के अंदर बेंजीन और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें छोड़ते हैं. एक हालिया स्टडी में यह भी सामने आया कि अमेरिका में बच्चों के अस्थमा के हर आठ में से एक केस के पीछे गैस स्टोव जिम्मेदार हो सकते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए साफ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ना जरूरी है.
इंडक्शन स्टोव जैसे विकल्प बेहतर माने जा रहे हैं, क्योंकि ये न सिर्फ कम ऊर्जा खर्च करते हैं, बल्कि हानिकारक गैसें भी नहीं छोड़ते. कुछ देशों में सरकारें लोगों को ऐसे उपकरण अपनाने के लिए सब्सिडी और छूट भी दे रही हैं. विक्रम निरंजन का कहना है कि सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को मिलकर ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिससे हर व्यक्ति तक साफ ईंधन की पहुंच सुनिश्चित हो सके.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 15:47:39 +0530</pubDate>
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<title>Hair Extensions Side Effects: क्या हेयर एक्सटेंशन कराने से हो जाता है ब्रेस्ट कैंसर, जानें यह कितना खतरनाक?</title>
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<description><![CDATA[ &amp;nbsp;Can Hair Extensions Cause Breast Cancer: दुनियाभर में लाखों महिलाएं हेयर एक्सटेंशन का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन एक हालिया शोध ने इससे जुड़े संभावित खतरों को लेकर चिंता बढ़ा दी है. इस स्टडी में पाया गया कि हेयर एक्सटेंशन में ऐसे केमिकल मौजूद हो सकते हैं जो ब्रेस्ट कैंसर, हार्मोन असंतुलन और रिपोडेक्शन स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं. अमेरिकन केमिकल सोसाइटी के जर्नल में प्रकाशित इस रिसर्च में साइंटिस्ट ने कई तरह के एक्सटेंशन, जैसे विग, ब्रेडिंग हेयर, क्लिप-इन और वेव्स का एनालिसिस किया. करीब हर सैंपल में दर्जनों खतरनाक केमिकल पाए गए.
क्या निकला रिसर्च में?
रिसर्च की लीड ऑथर डॉ. एलिसिया फ्रैंकलिन के मुताबिक, सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन प्रोडक्ट्स में मौजूद कई केमिकल्स की जानकारी पूरी तरह सामने ही नहीं आती. कई बार कंपनियां सभी इंग्रीडिएंट्स का खुलासा नहीं करतीं, जिससे यूजर्स अनजाने में जोखिम उठा रहे होते हैं. हेयर एक्सटेंशन को खासतौर पर इसलिए भी खतरनाक माना जा रहा है क्योंकि ये लंबे समय तक स्कैल्प, गर्दन और त्वचा के संपर्क में रहते हैं. ऐसे में इनमें मौजूद केमिकल धीरे-धीरे शरीर में प्रवेश कर सकते हैं और लंबे समय में नुकसान पहुंचा सकते हैं.&amp;nbsp;
कैंसर के लक्षण
स्टडी में कुल 43 सैंपल्स की जांच की गई, जिनमें करीब 170 केमिकल्स पाए गए. इनमें से कई ऐसे थे जो कार्सिनोजेनिक, एंडोक्राइन डिसरप्टर्स हार्मोन पर असर डालने वाले और टॉक्सिक पदार्थों की कैटेगरी में आते हैं. खासतौर पर फ्थेलेट्स, ऑर्गेनोटिन और कुछ इंडस्ट्रियल केमिकल्स जैसे तत्व सामने आए, जो शरीर के हार्मोन सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं. ये वही सिस्टम है जो प्रजनन, विकास और कई जरूरी बॉडी फंक्शन्स को कंट्रोल करता है.
ब्रेस्ट कैंसर के भी लक्षण
चौंकाने वाली बात यह रही कि कुछ सैंपल्स में ब्रेस्ट कैंसर से जुड़े केमिकल्स भी पाए गए. साइंटिस्ट का कहना है कि ये पदार्थ शरीर में ऐसे बदलाव ला सकते हैं, जो समय के साथ कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं. दिलचस्प बात यह भी है कि सिर्फ सिंथेटिक ही नहीं, बल्कि 100 प्रतिशत नैचुरल या मानव बालों से बने एक्सटेंशन में भी खतरनाक केमिकल्स पाए गए. यानी सिर्फ नेचुरल लेबल होने से प्रोडक्ट पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाता.
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इसके अलावा, कई एक्सटेंशन को स्टाइल करते समय गर्म किया जाता है या उबाले गए पानी में डुबोया जाता है, जिससे जहरीली गैसें निकल सकती हैं. ये गैसें सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकती हैं और यूजर्स के साथ-साथ हेयर स्टाइलिस्ट्स को भी प्रभावित कर सकती हैं. कुछ लोगों ने इनके इस्तेमाल के बाद खुजली, जलन, स्किन रिएक्शन और सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्याएं भी बताई हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि इस इंडस्ट्री में स्पष्ट नियमों की कमी है, जिससे उपभोक्ताओं की सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो पा रही है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:32:38 +0530</pubDate>
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<title>Navratri Fasting Diet: नवरात्रि का व्रत रख रही हैं तो ऐसी रखें डाइट, प्रोटीन का इनटेक बार&#45;बार नहीं लगने देगा भूख</title>
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<description><![CDATA[ How To Avoid Weakness During Navratri Fasting: नवरात्रि भारत के सबसे प्रमुख और भव्य रूप से मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है, जिसे लोग पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैंय. यह पर्व देवी दुर्गा को समर्पित होता है और नौ दिनों तक चलने वाला यह उत्सव पवित्रता, अनुशासन और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है. इस वर्ष चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से हो रही है और यह 26 मार्च तक चलेगा. इस दौरान कई भक्त व्रत रखते हैं और सात्विक आहार का पालन करते हैं, जिसमें प्याज, लहसुन और सामान्य अनाज शामिल नहीं होते.&amp;nbsp;
नवरात्रि व्रत में क्या खाया जाता है?
नवरात्रि के व्रत में खाया जाने वाला भोजन सादा होने के साथ-साथ पोषण से भरपूर भी होता है. इसमें कुट्टू का आटा, सिंहाड़े का आटा, आलू, साबूदाना, दूध, दही और मेवे जैसे पदार्थ शामिल होते हैं. हालांकि, लगातार नौ दिनों तक व्रत रखने पर कई बार शरीर में ऊर्जा की कमी महसूस होने लगती है, खासकर जब खानपान सही तरीके से प्लान न किया जाए. ऐसे में प्रोटीन युक्त चीजों का सेवन बेहद जरूरी हो जाता है.
प्रोटीन वाली डाइट
प्रोटीन शरीर को ताकत देने के साथ-साथ लंबे समय तक पेट भरा हुआ रखने में मदद करता है और जल्दी थकान महसूस नहीं होने देता. पनीर, मूंगफली, मखाना, दूध और दही जैसे खाद्य पदार्थ व्रत में आसानी से शामिल किए जा सकते हैं और ये प्रोटीन के अच्छे सोर्स भी हैं. अगर इन्हें रोज़ाना के आहार में संतुलित तरीके से शामिल किया जाए, तो आप पूरे नवरात्रि के दौरान खुद को एक्टिव और ऊर्जावान बनाए रख सकते हैं.
कैसे कर सकते हैं डाइट प्लान?
व्रत को आसान और हेल्दी बनाने के लिए आप अपने डाइट प्लान में कुछ आसान और प्रोटीन से भरपूर रेसिपीज शामिल कर सकते हैं. चलिए आपको नौ व्यंजन के बारे में बताते हैं, जिन्हें आप नवरात्रि के नौ दिनों में शामिल कर सकते हैं.
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इनको कर सकते हैं आप ट्राई
शुरुआत करें पनीर टिक्की से, जो बाहर से क्रिस्पी और अंदर से सॉफ्ट होती है. हल्के व्रत वाले मसालों के साथ बनी यह टिक्की शाम के नाश्ते के लिए एक बेहतरीन विकल्प है. वहीं, कुछ मीठा खाने का मन हो तो मखाना खीर ट्राई कर सकते हैं. दूध और मखाने से बनी यह खीर हल्की होने के साथ-साथ काफी संतोषजनक भी होती है. नाश्ते के लिए पनीर से भरी कुट्टू की चीला एक अच्छा विकल्प है, जो लंबे समय तक पेट भरा रखता है और धीरे-धीरे एनर्जी देता है. आप मखाना, मूंगफली और तिल से बना शेक भी ले सकते हैं, जो सुबह या दिन के बीच में एनर्जी बूस्ट देने का काम करता है.
लंच के लिए ऑप्शन
लंच या डिनर के लिए पनीर टिक्का स्वादिष्ट और हेल्दी ऑप्शन है. वहीं, मूंगफली चाट हल्की-फुल्की और ताजगी से भरपूर होती है, जो शाम की भूख को शांत करने में मदद करती है. पनीर भुर्जी भी एक आरामदायक और पेट भरने वाला व्यंजन है, जिसे व्रत वाली रोटी के साथ खाया जा सकता है. इसके अलावा आलू-पनीर की सब्जी एक संतुलित और पौष्टिक विकल्प है, जो शरीर को एनर्जी और प्रोटीन दोनों देता है. मखाना और सिंहाड़े के आटे से बनी रोटी भी घी में सेंककर खाई जा सकती है, जो स्वाद और सेहत दोनों के लिहाज से बेहतरीन है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:32:38 +0530</pubDate>
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<title>Gut Bacteria And Cancer: सावधान! आपकी आंतों में छिपा है &amp;apos;कैंसर का विलेन&amp;apos;, वैज्ञानिकों ने किया चौंकाने वाला खुलासा</title>
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<description><![CDATA[ How Gut Bacteria Cause Colon Cancer: कैंसर के मामले दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे हैं. अब इसको अमेरिका के साइंटिस्ट ने एक अहम खोज की है, जो बताती है कि आंत में रहने वाले कुछ बैक्टीरिया किस तरह कोलन कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं. यह स्टडी जर्नल साइंस में पब्लिश हुई है और इसमें पहली बार साफ तौर पर समझाया गया है कि ये बैक्टीरिया शरीर के डीएनए को कैसे नुकसान पहुंचाते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे होता है आपको कैंसर का खतरा
बैक्टीरिया कैसे पहुंचाते हैं नुकसान?
दरअसल, आंत में मौजूद कुछ बैक्टीरिया एक टॉक्सिन बनाते हैं, जिसे कोलिबैक्टिन कहा जाता है. यह टॉक्सिन खास तरह के E. coli बैक्टीरिया द्वारा बनाया जाता है. आमतौर पर ये बैक्टीरिया हमारे गट माइक्रोबायोम का हिस्सा होते हैं और डाइजेशन में मदद करते हैं, लेकिन कुछ स्थितियों में ये नुकसानदेह भी साबित हो सकते हैं. साइंटिस्ट पहले से जानते थे कि कोलिबैक्टिन डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है और इसका संबंध कोलोरेक्टल कैंसर से हो सकता है. लेकिन इस टॉक्सिन का स्टडी करना आसान नहीं था, क्योंकि यह बहुत अस्थिर होता है और जल्दी टूट जाता है.
क्या निकला नई स्टडी में?
नई स्टडी में रिसर्चर ने आधुनिक तकनीकों जैसे मास स्पेक्ट्रोमेट्री और न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस की मदद से इस टॉक्सिन को विस्तार से समझा. उन्होंने पाया कि कोलिबैक्टिन डीएनए को रैंडम तरीके से नहीं, बल्कि खास हिस्सों पर निशाना बनाता है. यह टॉक्सिन डीएनए के उन हिस्सों पर असर करता है, जहां एडेनिन और थाइमिन ज्यादा मात्रा में मौजूद होते हैं. कोलिबैक्टिन डीएनए की दोनों स्ट्रैंड्स को आपस में जोड़ देता है, जिसे वैज्ञानिक &quot;इंटरस्ट्रैंड क्रॉस-लिंक&quot; कहते हैं. इससे डीएनए सही तरह से कॉपी या रिपेयर नहीं हो पाता, जो कैंसर का कारण बन सकता है.
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क्यों जरूरी है यह रिसर्च?
रिसर्च में यह भी सामने आया कि यह टॉक्सिन डीएनए के माइनर ग्रूव नाम के हिस्से में जाकर चिपकता है. इसकी केमिकल बनावट ऐसी होती है कि यह बिल्कुल सही जगह फिट होकर ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है. साइंटिस्ट ने इसे &quot;लॉक-एंड-की&quot; मैकेनिज्म जैसा बताया है. यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कोलोरेक्टल कैंसर के मरीजों में एक जैसे डीएनए बदलाव क्यों दिखाई देते हैं.
टेस्ट डिवेलप करने की तैयारी
एक्सपर्ट का मानना है कि भविष्य में इस जानकारी के आधार पर ऐसे टेस्ट विकसित किए जा सकते हैं, जो आंत में मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया की पहचान कर सकें. इसके साथ ही, ऐसे इलाज भी संभव हो सकते हैं जो इस टॉक्सिन को बनने से रोकें या डीएनए से जुड़ने से पहले ही खत्म कर दें. इसके अलावा, डाइट, प्रोबायोटिक्स और अन्य तरीकों से गट माइक्रोबायोम को संतुलित कर जोखिम कम करने की दिशा में भी काम किया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:32:38 +0530</pubDate>
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<title>मां बनने से पहले ही शुरू हो रही तैयारी, जानिए Trimester Zero क्यों बन रहा है ट्रेंड?</title>
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<description><![CDATA[ मां बनने से पहले ही शुरू हो रही तैयारी, जानिए Trimester Zero क्यों बन रहा है ट्रेंड? ]]></description>
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<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:32:37 +0530</pubDate>
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<title>Constipation Relief Tips: क्या सुबह&#45;सुबह पानी पीने से सच में बन जाता है प्रेशर, कितनी सच है यह बात?</title>
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<description><![CDATA[ Drinking Water In The Morning Benefits: सुबह उठते ही पानी पीने की आदत को लेकर अक्सर कहा जाता है कि इससे पेट साफ होने में मदद मिलती है और प्रेशर बनता है. लेकिन क्या यह सच है? दरअसल, यह बात पूरी तरह मिथ नहीं है. इसका सीधा संबंध डाइजेशन सिस्टम और शरीर में पानी की भूमिका से जुड़ा हुआ है. कब्ज एक आम समस्या है, जो तब होती है जब मल सख्त हो जाता है और उसे बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है. ज्यादातर लोगों को जीवन में कभी न कभी इसका सामना करना पड़ता है. कई बार इसकी वजह शरीर में पानी की कमी और फाइबर की कमी होती है. ऐसे में सुबह पानी पीना इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है.&amp;nbsp;
पानी पीने से क्या प्रेशर बनता है?
Apecwater की रिपोर्ट के अनुसार, असल में जब आप सुबह खाली पेट पानी पीते हैं, तो यह आपकी आंतों को एक्टिव करता है. इसे मेडिकल भाषा में &#039;गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स&quot; कहा जाता है, जिसमें खाना या पानी पेट में जाते ही बड़ी आंत की गतिविधि तेज हो जाती है. यही वजह है कि कई लोगों को सुबह पानी पीने के बाद टॉयलेट का प्रेशर महसूस होता है. पाचन प्रक्रिया को समझें तो जब खाना छोटी आंत से बड़ी आंत में पहुंचता है, तब तक उसमें से पोषक तत्व निकल चुके होते हैं. बड़ी आंत का काम उस बचे हुए पदार्थ से पानी सोखकर उसे ठोस मल में बदलना होता है. अगर शरीर में पानी की कमी होती है, तो आंत ज्यादा पानी सोख लेती है, जिससे मल सख्त और सूखा हो जाता है और कब्ज की समस्या बढ़ जाती है.
इसे भी पढ़ें-&amp;nbsp;Gut Bacteria And Cancer: सावधान! आपकी आंतों में छिपा है &#039;कैंसर का विलेन&#039;, वैज्ञानिकों ने किया चौंकाने वाला खुलासा
पानी का क्या होता है रोल?
यहीं पर पानी की अहम भूमिका सामने आती है. पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से मल में नमी बनी रहती है, जिससे वह मुलायम होता है और आसानी से बाहर निकलता है. इसलिए कहा जाता है कि पानी कब्ज में राहत देने में मदद करता है. हालांकि, सिर्फ पानी पीना ही काफी नहीं है। अगर आप पर्याप्त फाइबर नहीं लेते, तो पानी का असर सीमित हो सकता है. बेहतर परिणाम के लिए पानी के साथ-साथ फल, सब्जियां और फाइबर से भरपूर आहार लेना जरूरी है. एक्सपर्ट के अनुसार, अगर आपको कब्ज की समस्या रहती है तो दिनभर में कम से कम 8-10 गिलास पानी जरूर पीना चाहिए. कुछ मामलों में इससे ज्यादा पानी पीना भी फायदेमंद हो सकता है, खासकर अगर शरीर में डिहाइड्रेशन की समस्या हो. ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि शराब और ज्यादा कैफीन वाले पेय पदार्थ शरीर को डिहाइड्रेट कर सकते हैं, जिससे कब्ज की समस्या बढ़ सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:32:37 +0530</pubDate>
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<title>माउथवॉश मिथ्स: क्या यह सच में मुंह को स्वस्थ बनाता है या सिर्फ बुरी सांस छुपाता है?</title>
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<description><![CDATA[ आजकल माउथवॉश हर किसी के घर में आम हो गया है. दुकानों में कई तरह के माउथवॉश मिलते हैं. कुछ सांस ताजा करने वाले, कुछ दांत मजबूत करने वाले और कुछ सिर्फ खुशबू वाले, लेकिन सवाल यह है कि क्या माउथवॉश सच में हमारी ऑरल हेल्थ के लिए जरूरी है या यह सिर्फ बुरी सांस छुपाने का ब्यूटी प्रोडक्ट है. डेंटल स्पेशलिस्ट कहते हैं कि इसका जवाब थोड़ा मुश्किल है और इसे समझने के लिए हमें माउथवॉश और मुंह के स्वास्थ्य के बारे में थोड़ा जानना चाहिए. तो आइए जानते हैं कि क्या माउथवॉश सच में मुंह को स्वस्थ बनाता है या सिर्फ बुरी सांस छुपाता है.&amp;nbsp;
क्या माउथवॉश सच में मुंह को स्वस्थ बनाता है?
माउथवॉश का मुख्य काम मुंह की बदबू को अस्थायी रूप से कम करना और कभी-कभी प्लाक या बैक्टीरिया को कम करना है, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि माउथवॉश ब्रश करने और फ्लॉस करने का ऑप्शन नहीं है. यह सिर्फ इनकी मदद के लिए है. विशेषज्ञ मानते हैं कि सही तरीके से और सही समय पर इस्तेमाल करने से ही माउथवॉश फायदेमंद हो सकता है.&amp;nbsp;
मुंह में सूक्ष्मजीव और उनका महत्व
हमारे मुंह में 700 से ज्यादा तरह के सूक्ष्मजीव रहते हैं. ये हमारे लिए अच्छे भी होते हैं और कुछ हानिकारक भी, यह एक नाजुक संतुलन बनाए रखते हैं और हमारी इम्यूनिटी में मदद करते हैं, अगर यह संतुलन टूट जाए, तो मुंह में सूखापन, स्वाद में बदलाव और समय के साथ मुंह की कई बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए हर रोज बहुत ज्यादा माउथवॉश का इस्तेमाल करना सही नहीं है.&amp;nbsp;
इसे भी पढ़ें- सोशल मीडिया पर छाया कैस्टर ऑयल बेली पैच ट्रेंड, जानिए क्या सच में देता है फायदा?
कौन सा माउथवॉश उपयोगी है?
डेंटल स्पेशलिस्ट के अनुसार, माउथवॉश का चयन सही फॉर्मूलेशन के अनुसार करना चाहिए.जैसे चिकित्सीय माउथवॉश क्लोरहेक्सिडाइन या एसेंशियल ऑयल युक्त माउथवॉश प्लाक और मसूड़ों की सूजन कम करने में मदद करते हैं. फ्लोराइड माउथवॉश दांतों के इनेमल को मजबूत करते हैं और कैविटी रोकते हैं. कई माउथवॉश सिर्फ अस्थायी सांस ताजा करने के लिए हैं, इनसे स्वास्थ्य लाभ कम मिलता है.&amp;nbsp;
माउथवॉश का सही इस्तेमाल
डेंटल स्पेशलिस्ट कहते हैं कि माउथवॉश को दिन में सिर्फ एक बार, दांत ब्रश करने के बाद ही इस्तेमाल करना चाहिए. लंबे समय तक या बार-बार इस्तेमाल करना मुंह के माइक्रोबायोटा को असंतुलित कर सकता है. इसलिए अल्कोहल-मुक्त फॉर्मूलेशन का इस्तेमाल करना बेहतर है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:32:36 +0530</pubDate>
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<title>सोशल मीडिया पर छाया कैस्टर ऑयल बेली पैच ट्रेंड, जानिए क्या सच में देता है फायदा?</title>
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<title>Medicine Price Rise India: ईरान जंग के बीच क्या महंगी हो जाएगी पैरासिटामोल? मरीजों पर पड़ सकता है बड़ा असर</title>
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<description><![CDATA[ Why Medicine Prices Are Rising In India: ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव अब भारत के हेल्थकेयर सेक्टर पर भी असर डालने लगा है. दवा कंपनियां सप्लाई चेन में रुकावट, कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और उत्पादन लागत में अचानक उछाल को लेकर चिंता जता रही हैं. अगर यह स्थिति लंबी चली, तो इसका असर सीधे मरीजों तक पहुंच सकता है. दवाओं की कमी, देरी और महंगे इलाज के रूप में. चलिए आपको बताते हैं कि किन दवाओं पर असर पड़ेगा.&amp;nbsp;
किन दवाओं पर पड़ेगा असर?
सबसे ज्यादा चिंता रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाओं को लेकर है. बुखार, इंफेक्शन, डायबिटीज और दिल की बीमारियों के इलाज में काम आने वाली दवाएं इस संकट की चपेट में आ सकती हैं. उद्योग से जुड़े लोग मानते हैं कि अगर लागत ऐसे ही बढ़ती रही, तो कंपनियों के लिए उत्पादन जारी रखना मुश्किल हो सकता है. उदाहरण के तौर पर पैरासिटामोल जैसी आम दवा, जो हर घर में इस्तेमाल होती है, महंगी हो सकती है या आसानी से उपलब्ध नहीं रहेगी. यही स्थिति एंटीबायोटिक्स, डायबिटीज और दिल की दवाओं के साथ भी बन सकती है. ऐसे में मरीजों को दवा बदलनी पड़ सकती है, डोज मिस हो सकती है या ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं.&amp;nbsp;
क्यों बढ़ेंगे दाम?
दरअसल, इस संकट की जड़ में कच्चे माल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी है. फार्मा इंडस्ट्री के मुताबिक, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स, सॉल्वेंट्स और अन्य जरूरी पदार्थों की कीमतें महज 15 दिनों में 200 से 300 फीसदी तक बढ़ गई हैं. पैरासिटामोल बनाने की लागत भी लगभग दोगुनी हो गई है, करीब 250 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 450 रुपये तक पहुंच गई है.
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समस्या यह भी है कि पैरासिटामोल समेत कई जरूरी दवाएं सरकारी प्राइस कंट्रोल के तहत आती हैं. इनकी कीमतें पहले से तय होती हैं, ऐसे में कंपनियां बढ़ती लागत के बावजूद दाम नहीं बढ़ा सकतीं, जिससे उत्पादन बनाए रखना मुश्किल हो जाता है. सिर्फ कच्चा माल ही नहीं, बल्कि पैकेजिंग की लागत भी तेजी से बढ़ रही है. दवाओं की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाले एल्यूमिनियम फॉइल, प्लास्टिक और ग्लास कंटेनर महंगे हो गए हैं. ये चीजें दवाओं की सुरक्षा और स्टोरेज के लिए जरूरी होती हैं, इसलिए इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
कैसे पड़ रहा असर?
मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के कारण शिपिंग रूट प्रभावित हुए हैं, जिससे ट्रांसपोर्ट महंगा हो गया है और सप्लाई धीमी पड़ गई है. आमतौर पर कंपनियां 3 से 6 महीने का स्टॉक रखती हैं, लेकिन मौजूदा हालात में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है. इसका सबसे ज्यादा असर छोटे और मझोले फार्मा निर्माताओं पर पड़ रहा है. ये कंपनियां कम मार्जिन पर काम करती हैं और सस्ती दवाओं की सप्लाई का बड़ा हिस्सा संभालती हैं. बढ़ती लागत के कारण कई कंपनियां उत्पादन घटाने या कुछ दवाएं बंद करने पर विचार कर रही हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. ]]></description>
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<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:32:36 +0530</pubDate>
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<title>आप का हेल्थ कवर उपलब्ध  कराए हेल्थ आपके क्यों खराब होती है उसके बारे में सही जानकारी और सही तरीका अपनाएं</title>
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<description><![CDATA[ हेल्थ हमारा क्यों बिगाड़ा रहता है उसके बारे में हमको पूरी जानकारी मिलनी चाहिए और गाइड नेशन से हमारे शरीर बिगड़ जाती है और खराब हो जाती है सही तरीके से हमें सब कुछ ज्ञान मिले तो हमारा सही रहता है अगर हम अच्छी तरीके से काम करेंगे तो शरीर की हर दुख दर्द दूर हो जाए ]]></description>
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<pubDate>Thu, 12 Mar 2026 13:13:12 +0530</pubDate>
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<title>आज हम बताने वाले हैं बीमारियों का इलाज भी और बीमारियों से कैसे बचते हैं जल्द ही हमारे इस वेबसाइट पर लिए और हम सब संपर्क भी करिए इलाज आपको फ्री मुक्त मिलेगा जानकारी का कोई पैसा नहीं</title>
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<description><![CDATA[ कभी भी बीमार ना पड़े इसके लिए जरूर यह उपचार देखें और एक एक पॉइंट का आप केयर करिए हमेशा आप चुस्त और तंदुरुस्त रहेंगे आपके शरीर में कभी भी कोई भी परेशानी नहीं होगी और हमारे साथ आप संपर्क करने के लिए तेज रफ्तार न्यूज़ के वेबसाइट पर जाइए वहां पर ]]></description>
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<pubDate>Fri, 20 Feb 2026 09:48:27 +0530</pubDate>
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<title>पकड़ा_गया_साध्वी_प्रेम_बाईसा_का_कातिल,_पुलिस_के_उड़े_होश।_CCTV_ने_खोली_पूरी_पोल!</title>
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<description><![CDATA[ क्या कर रहे हो जी आप को भी बहुत बहुत बधाई हो भाई आप लोग भी हैं क्या आप को ]]></description>
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<pubDate>Tue, 03 Feb 2026 09:30:04 +0530</pubDate>
<dc:creator>Admin</dc:creator>
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<title>आज के मुख्य समाचार पत्र लिखकर दुनियाभर के पाठकों से शेयर करें</title>
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<title>Today_Breaking_News_!_आज_2_अगस्त_2025_के_मुख्य_समाचार_बड़ी_खबरें,_PM_Modi,_UP,_Bihar,_Delhi,_SBI</title>
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<title>Corona_Virus_India_Update__कोरोना_मामले_डरा_रहे_एक्टिव_केस_2700_के_पार_Delhi_में_पहली_मौत___</title>
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<pubDate>Sun, 01 Jun 2025 06:38:35 +0530</pubDate>
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