एक पत्थर रास्ते में पड़ा हुआ था वह कोई वहां से हटा नहीं रहा था किसी के पास ले गया कहीं पर भी लगे इस कहानी के आधार पर स्टोरी है
पत्थर में जो चोट लगती है तो क्या तुम मूर्ति बनती है या हो कचरे में जाती है अगर मूर्ति बनती तो सब पूछते हैं कचरे में गए तो मिट्टी बन जाती है मूर्ति की खासियत है
*🌳🦚आज की कहानी।🦚🌳*
*💐💐पत्थरों पर लिखी जीत।💐💐*
घने जंगलों और ऊँचे पर्वतों के बीच बसे एक प्राचीन गुरुकुल में दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा लेने आते थे। उसी गुरुकुल में एक दुबला-पतला, शांत स्वभाव का बालक भी पढ़ता था—नाम था वरद।
लेकिन बाकी बच्चों से वह बिल्कुल अलग था। जहाँ दूसरे शिष्य कठिन श्लोक पलभर में याद कर लेते, वहीं वरद एक साधारण पाठ भी ठीक से नहीं समझ पाता था।
गुरुकुल के बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते—
“अरे, इसे तो ‘मंदबुद्धि वरद’ कहना चाहिए!”
उनकी हँसी उसके दिल को तीर की तरह चुभती।
गुरु आचार्य सोमदेव ने भी उसे बहुत समझाया, बार-बार पढ़ाया, पर परिणाम वही रहा।
एक दिन आचार्य ने भारी मन से कहा—
“बेटा, हर व्यक्ति हर काम के लिए नहीं बना होता। शायद विद्या तुम्हारे भाग्य में नहीं है। घर लौट जाओ।”
यह सुनते ही वरद की आँखें भर आईं।
उस रात उसने अकेले नदी किनारे बैठकर बहुत रोया। अगले ही सुबह वह अपना छोटा-सा झोला उठाकर घर की ओर निकल पड़ा।
दोपहर की तपती धूप… सुनसान रास्ता… और कई कोस चलने के बाद उसे तेज प्यास लगी। तभी दूर उसे एक पुराना कुआँ दिखाई दिया।
वह वहाँ पहुँचा तो कुछ महिलाएँ रस्सी से पानी खींच रही थीं।
थके हुए वरद ने पानी पिया और जैसे ही लौटने लगा, उसकी नजर पत्थर पर पड़े गहरे निशानों पर पड़ी।
वह चौंक गया।
“इतने कठोर पत्थर पर ये गहरे कटाव कैसे?” उसने आश्चर्य से पूछा।
एक बूढ़ी महिला मुस्कुराई—
“बेटा, ये किसी हथियार के निशान नहीं हैं। वर्षों से रस्सी के बार-बार रगड़ खाने से पत्थर भी घिस गया।”
वरद स्तब्ध रह गया।
उसके भीतर जैसे बिजली कौंध गई।
“यदि एक मुलायम रस्सी लगातार प्रयास से पत्थर को काट सकती है… तो क्या मैं अभ्यास से अपनी कमजोरी नहीं मिटा सकता?”
उसकी आँखों में फिर चमक लौट आई।
वह तुरंत वापस गुरुकुल की ओर दौड़ पड़ा।
गुरुकुल पहुँचते ही उसने गुरुजी के चरण पकड़ लिए—
“गुरुदेव! मुझे एक आखिरी अवसर दीजिए। मैं हार नहीं मानूँगा।”
उस दिन के बाद वरद बदल चुका था।
जब सारे विद्यार्थी सो जाते, तब भी उसकी कुटिया में दीपक जलता रहता।
वह रात-रात भर अभ्यास करता।
गलती करता… फिर दोहराता… फिर सीखता।
धीरे-धीरे शब्द उसके मित्र बनने लगे।
श्लोक उसके मन में उतरने लगे।
जिस बालक को सब मूर्ख समझते थे, वही अब सबसे कठिन प्रश्नों का उत्तर देने लगा।
साल बीतते गए…
एक दिन पूरे राज्य में घोषणा हुई—
“महान संस्कृत आचार्य वरदराज पधार रहे हैं!”
वही वरद, जिसे कभी गुरुकुल से निकाल दिया गया था, अब विद्या का सूर्य बन चुका था। उसके लिखे ग्रंथ दूर-दूर तक पढ़े जाने लगे। राजा भी उसका सम्मान करने लगे।
सभा में अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए वरदराज ने कहा—
“भाग्य इंसान को अवसर देता है, लेकिन अभ्यास उसे महान बनाता है। याद रखो—लगातार गिरने वाली पानी की बूंद भी पत्थर में छेद कर देती है।”
उस दिन पूरा गुरुकुल तालियों से गूंज उठा…
और पत्थरों पर पड़े रस्सी के निशान एक अमर सीख बन गए।
*शिक्षा*
दोस्तो अभ्यास की शक्ति का तो कहना ही क्या हैं। यह आपके हर सपने को पूरा करेगी। अभ्यास बहुत जरूरी है चाहे वो खेल मे हो या पढ़ाई में या किसी ओर चीज़ में। बिना अभ्यास के आप सफल नहीं हो सकते हो।
अगर आप बिना अभ्यास के केवल किस्मत के भरोसे बैठे रहोगे, तो आखिर मैं आपको पछतावे के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगेगा। इसलिए अभ्यास के साथ धैर्य, परिश्रम और लगन रखकर आप अपनी मंजिल को पाने के लिए जुट जाए।
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏
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