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TRNDKB : 🟣 पाइल्स 🟣
बवासीर या पाइल्स को मेडिकल भाषा में हेमरॉइड्स के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें ऐनस के अंदरूनी और बाहरी क्षेत्र और रेक्टम के निचले हिस्से की शिराओं में सूजन आ जाती है।
♦️पेट में दर्द♦️
इसकी वजह से ऐनस के अंदर और बाहर या किसी एक जगह मस्से जैसी स्थिति बन जाती है, जो कभी अंदर रहते हैं और कभी बाहर भी आ जाते हैं। करीब 70 फीसदी लोगों को अपने जीवन में किसी न किसी वक्त पाइल्स की समस्या रही है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ पाइल्स की समस्या बढ़ सकती है। अगर परिवार में किसी को यह समस्या रही है तो इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। आनुवांशिक समस्या है।
♦️कारण♦️
बवासीर होने का प्रमुख कारण है लम्बे समय तक कठोर कब्ज बना रहना।
सुबह-शाम शौच न जाने या शौच जाने पर ठीक से पेट साफ न होना।
शौच के समय जोर लगाना
टॉयलेट में काफी देर तक बैठना
हेरिडिटि (वन्शानुगत कारण)
डायरिया की समस्या।
भोजन में पोषक तत्तवों की कमी के कारण।
अधिक तला या मसालेदार भोजन खाने से।
अत्यधिक दवाओं के सेवन से।
ओवरवेट होने के कारण विशेषकर पेट व श्रोणी पर ज्यादा वजन पड़ता है जिससे श्रोणी के नसों पर दबाव बढ़ जाता है।
प्रसव के दौरान बवासीर होने का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि एनस क्षेत्र पर ज्यादा दबाव पड़ता है।
ज्यादा दिनों तक हृदय व लीवर से संबंधित बीमारी होने से बवासीर का खतरा हो सकता है।
♦️लक्षण♦️
आमतौर पर पाइल्स बहुत ज्यादा गंभीर नहीं होते और तीन-चार दिन में अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। कई बार तो लोगों को पता भी नहीं चलता कि उन्हें पाइल्स हैं। वैसे पाइल्स के यह लक्षण हो सकते हैं
ऐनस के इर्द-गिर्द एक कठोर गांठ जैसी महसूस हो सकती है। इसमें ब्लड हो सकता है, जिसकी वजह से इनमें काफी दर्द होता है।
टॉयलेट के बाद भी ऐसा महसूस होना कि पेट साफ नहीं हुआ है।
शौच के वक्त लाल चमकदार रक्त का आना।
शौच के वक्त म्यूकस का आना
और दर्द का अहसास होना।
ऐनस के आसपास खुजली होना और उस क्षेत्र का लाल और सूजन आ जाना।
बवासीर रोग जिसे पाइल्स भी कहा जाता है आमतौर पर यह रोग गुदा या मलाशय में मौजूद 'वेरिकोज वेन्स' रोग होता है। बवासीर मलाशय के अंदरूनी हिस्से या गुदा के बाहरी हिस्सो में भी हो सकता है।
यह मल त्याग के दौरान अधिक ज़ोर लगाने के कारण या गर्भावस्था के दौरान गुदा की नसों में दबाव के कारण हो सकता है।
बवासीर की समस्या होने पर कई प्रकार के लक्षण देखे जा सकते है।
1 दर्दनाक मल त्याग जिससे मलाशय या गुदा को चोट पहुंच सकती है।
2 मल त्याग के दौरान ब्लीडिंग होना।
3 गुदा से एक बलगम जैसा स्त्राव होना।
4 गुदा के पास एक दर्दनाक सूजन या गांठ या मस्से का होना।
5 गुदा क्षेत्र में खुजली,जो लगातार या रुक रुक कर हो सकती है।
पाइल्स के इन लक्षणों को बिल्कुल भी अनदेखा न करे।
क्योंकि यह लक्षण आगे चलकर गंभीर समस्याए पैदा कर सकते है।
यदि आप या कोई आपका अपना इस रोग से ग्रसित है तो आप हमसे संपर्क करे।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
अगर आपको पाइल्स की समस्या है और आप सर्जरी से बचना चाहते हो और सालों साल दवाई खाने से बचना चाहते हो तब 45 डेज का ये कोर्स करके आप ठीक हो जाएअच्छा और सही उपचार से।। मंगवाने के लिए अपनी समस्या व्हाट्सप कर दीजिए जी
किसी भी जानकारी के लिए या ट्रीटमेंट के लिए आप पहले हमें अपनी प्रॉब्लम व्हाट्सप्प कर दीजिये समय मिलते ही आपको जवाब दिया जायेगा...
सभी सुखी और निरोगी रहे
शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर
TRNDKB : बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) कम करने का देसी घरेलू फार्मूला
सामग्री
लहसुन – 100 ग्राम
मेथी दाना – 100 ग्राम
अलसी (फ्लैक्ससीड) – 100 ग्राम
अर्जुन की छाल – 50 ग्राम
आंवला सूखा – 100 ग्राम
हल्दी – 50 ग्राम
♦️बनाने की विधि♦️
सभी सामग्री को साफ करके 1 दिन धूप में सुखा लें
फिर सभी चीजों को अलग-अलग हल्का भून लें (बिना जलाए)
अब सबको मिलाकर बारीक पाउडर बना लें
तैयार पाउडर को कांच के जार में सुरक्षित रखें
♦️ सेवन / उपयोग विधि♦️
सुबह खाली पेट 1 चम्मच पाउडर गुनगुने पानी के साथ
रात को भोजन के बाद 1 चम्मच गर्म पानी से लीजिए।।
♦️संभावित लाभ♦️
बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक
हार्ट ब्लॉकेज के खतरे को कम करने में मदद
रक्त संचार बेहतर करता है
शरीर की चर्बी घटाने में सहायक
♦️ आवश्यक सूचना♦️
यह घरेलू रेमेडी सहायक उपाय है
हृदय रोगी डॉक्टर की सलाह से ही सेवन करें
एलोपैथिक दवा बिना पूछे बंद न करें
बीपी और शुगर वाले सावधानी रखें
नियमित जांच जरूरी है
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TRNDKB : 🟣🟣🟣🟣🟣
(पौरुष ग्रन्थि वृद्धि)
प्रॉस्टेट का बढ़ना
♦️PROSTATE
♦️यह रोग पुरुषों में 40- 50 वर्ष की उम्र के बाद होता है, सभी में नहीं होता हैं ।
♦️कारण
♦️मूत्राशय की थैली के नीचे मूल नलिका के चारों ओर पुरुष गन्धि (प्रोस्टेट) होती है। यह ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती है त्यों-त्यों हार्मोन्स के असन्तुलन के कारण बढ़ने लगती है तथा मूत्र नलिका को दबाव देकर शनैः शनैः बन्द कर देती है।
♦️लक्षण
♦️प्रारम्भ में पेशाब बार-बार आने लगता है तथा पेशाब करते समय जलन भी महसूस होती है। ज्यों-ज्यों बीमारी बढ़ती जाती है, पेशाब करने में परेशानी होने लगती है। पेशाब के लिए बैठने पर पेशाब आना प्रारंभ होने में एक मिनट का समय लग जाता है। पेशाब की धार पतली होने लगती है तथा जोर लगाने पर धारा और कम हो जाती है। रोग की चरम अवस्था में बूंद- बूंद करके मूत्र आने लगता है तथा रुक जाता है।
♦️चिकित्सा
(1) गोक्षरू चूर्ण एक चम्मच, वरुण चूर्ण एक चम्मच
प्रातः, सायं जल से।
(2)अश्वगंधा चूर्ण आधा चम्मच, मधुयष्टी चूर्ण आधा चम्मच, आमलकी चूर्ण आधा चम्मच सुबह, सायं दुग्ध के साथ।
बचाव और परहेज बहुत जरूरी हैं....
♦️बूँद बूँद कर के पेशाब आता हो तो यह कौनसा रोग है और इसका घरेलू ईलाज़ क्या है?
इसके मुख्यतया दो कारण हो सकते हैं अगर उम्र पचास वर्ष से अधिक है तो पहली सम्भावना है की पौरुष ग्रंथि जिसे प्रॉस्टेट कहते हैं वह बढ़ गई हो और पेशाब के मार्ग को अवरुद्ध कर रही हो।
दूसरा कारण यू॰टी॰आई॰ संक्रमण यानी पेशाब के मार्ग में कहीं भी संक्रमण हो। दोनो ही अवस्था में डॉक्टर से सलाह करनी चाहिए। प्रॉस्टेट बढ़ने का ज़रूर कुछ देशी या घरेलू ईलाज़ हो सकता है। लेकिन सबसे पहले डॉक्टर से सलाह लें।
पचास की उम्र के बाद लगभग पचास प्रतिशत लोगों की प्रॉस्टेट बढ़ जाती है और चिकित्सा विज्ञान इसका कारण आजतक नही खोज पाया है।
यह ज़रूरी नही की जिसकी प्रॉस्टेट बढ़ी हो उन सबको पेशाब की समस्या आएगी।
निष्कर्ष यह है की तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए क्योंकि संक्रमण हुआ तो उसका समय पर ईलाज़ बहुत ज़रूरी है।
♦️♦️♦️♦️♦️♦️
♦️गदूद का इलाज आयुर्वेदिक दवाई से किया जाता है
♦️प्रोस्टेट(गदूद) से पीड़ित मरीजों को अब ऑपरेशन कराने की जरूरत नहीं है, बल्कि दवाओं से भी यह ठीक हो सकता है।
♦️पूरे जीवनकाल में 70-80 प्रतिशत व्यक्ति इस बीमारी के शिकार होते हैं।
♦️40 वर्ष की आयु के बाद लोगों में यह बीमारी पैर पसारने लगती है। खास बात यह है कि प्रोस्टेट की अनदेखी करने पर किडनी फेल होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
♦️प्रोस्टेट(गदूद) से पीड़ित मरीजों को अब ऑपरेशन कराने की जरूरत नहीं है, बल्कि दवाओं से भी यह ठीक हो सकता है। पूरे जीवनकाल में 70-80 प्रतिशत व्यक्ति इस बीमारी के शिकार होते हैं।
♦️40 वर्ष की आयु के बाद लोगों में यह बीमारी पैर पसारने लगती है। खास बात यह है कि प्रोस्टेट की अनदेखी करने पर किडनी फेल होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
♦️कब हो सकती है किडनी फेल
प्रोस्टेट का नॉर्मल साइज 18 से 20 ग्राम होता है। हर साल इसके आकार में 2.3 ग्राम की बढ़ोतरी होती है। यदि इस बीमारी से ग्रस्त किसी व्यक्ति का प्रोस्टेट का आकार 100 ग्राम से ज्यादा बढ़ जाए तो यह किडनी के लिए घातक होता है। चार से पांच साल तक इसकी अनदेखी करने पर पीड़ित व्यक्ति की किडनी फेल होने की संभावना बढ़ जाती है।
♦️ऑपरेशन के बाद ये आती हैं दिक्कतें ...
♦️ऑपरेशन के बाद, 100 में से 99 लोगों का सेक्स के दौरान वीर्य नहीं निकलता है, बल्की पेशाब की थैली में चला जाता है। दो प्रतिशत लोगों में नपुंसकता के चांसेज भी बढ़ जाते हैं।
♦️इसके आलाव ऑपरेशन के बाद यदि इंटरनल स्पींटर कट गया तो यूरिन रुकने की समस्या पैदा हो जाती है।
♦️प्रोस्टेट बढ़ने के लक्षण..♦️
♦️बार-बार यूरिन का आना
♦️शौच करते समय यूरिन का टपकना
♦️यूरिन करने के बाद दोबारा यूरिन की संका होना
♦️रात में चार से पांच बार यूरिन परित्याग करने के लिए जाना
♦️यूरिन में खून का आना
♦️मसाने के अंदर पत्थर का बनना
♦️किडनी का फेल होना
♦️काफी देर तक बाथरूम के समय यूरिन का बाहर नहीं निकलना...
♦️कंपलीकेशन के समय प्रोस्टेट के लक्षण...
♦️बार-बार यूरिन में इनफेक्शन, खून, दोनों गुर्दो का सूजना
♦️एज ग्रुप के हिसाब से गदूद से पीड़ित व्यक्तियों का आंकड़ा..
♦️40 वर्ष की उम्र में 8 प्रतिशत
♦️50-60 वर्ष की उम्र में 50 प्रतिशत
♦️70 वर्ष की उम्र में 70 प्रतिशत
♦️80 वर्ष की उम्र आते-आते मरीजों का आंकड़ा 100 प्रतिशत तक पहुंच जाता हैं...
♦️रोलॉजिस्ट का कहना है कि ऑपरेशन कराने के बाद लोगों को तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। मेडिकल साइंस के आकड़ों के अनुसार, यदि व्यक्ति 60 वर्ष से ज्यादा उम्र का है तो 90प्रतिशत चांस दवाओं से ठीक होने की संभावना रहती है।..
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️
♦️प्रॉस्टेट फीडबैक ♦️
पेशेंट नाम = नरपत लाल
एड्रेस =
नाम..नरपत लाल
गली और मोहल्ला..कुम्हारों का वास, तिलक द्वार के अंदर,जालोर
गाँव /कस्बा / सिटी..जालोर शहर
जिला..जालोर
पिन कोड़..343001
राज्य..राजस्थान
प्रॉब्लम = प्रोटेस्ट की तकलीफ..6 माह से ऊपर हो गए है..उम्र 56
समस्या = रात के 3..4 बार पेशाब करने उठना पड़ता है
पेशाब धीरे धीरे आता है..खुलकर नही आता..कभी कभी बून्द बून्द आता है
एलो पथिक इलाज = डॉ ने तुरंत सर्जरी बताई
आयुर्वेदिक शिवाय सेंटर से इलाज कराने पर क्या फायदा हुआ =100%
आयुर्वेदिक शिवाय सेंटर डॉ रोहित गुप्ता जी से 2 माह की दवाई से प्रॉस्टेट का साइज 10 ग्राम कम हुआ जो की अदभुत रिजल्ट है और सारी तकलीफ ठीक हो गयी जैसे बार बार बाथरूम जाना बंद हो गया रात को बाथरूम करने नहीं उठने पड़ता.
अब बाथरूम करते वक्त जलन दर्द नहीं होता
बाथरूम खुल क़र आता है
प्रॉस्टेट का साइज जो बहुत बढ़ गया था वॉल्यूम 65 ML
अब वो एक कोर्स से 55 हो गया...
डॉ रोहित जी की प्रॉस्टेट की दवाई लेने से हमारा सर्जरी का खरचा बच गया और सर्जरी होने से बच गयी...
ट्रीटमेंट अभि कंटिन्यू है....
फीडबैक + रिपोर्ट न्यू + ओल्ड स्क्र्रीनशॉट मे पढ़े...
♦️♦️♦️♦️♦️
आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट
♦️हमारे सेंटर द्वारा बनाया गया प्रॉस्टेट ट्रीटमेंट आपकी सब समस्या को हल करके बड़े हुए प्रॉस्टेट का साइज नार्मल करके आपको सर्जरी से बचा लेता है...
♦️अब तक हज़ार लोग इस किट से ठीक हो चुके है...
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शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर
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संग्रहणी
IBS
संग्रहणी रोग के कारण लक्षण और घरेलू उपचार....
संग्रहणी रोग को श्वेतातिसार रोग या स्प्रू रोग भी कहते हैं, अंग्रेजी में इस रोग का नाम Collectible disease है । संग्रहणी रोग में मरीज को सुबह बिना किसी दर्द के हल्का और फेन दार खडि़या (मिट्टी के) रंग का पानी के समान पतला दस्त आता है। जैसे-जैसे रोग बढ़ता है वैसे-वैसे सायंकाल भी भोजन के बाद तुरंत दस्त भी आने लगता है। लेकिन इससे रोगी को तुरंत कोई कष्ट महसूस नही होता है, इसके बाद पेट फूलना और बद हजमी आदि जैसे लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं। इससे मरीज बहुत कमजोर भी हो जाता है । आज हम जानते हैं कि संग्रहणी रोग के कारण लक्षण और घरेलू उपचार
संग्रहणी रोग (Collectible disease) के कारण
हम लोगों का जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि हमारे पास स्वयं के लिए भी समय नहीं रह गया है। इसी वजह से लोग पोषण रहित फास्टफूड का सेवन कर पेट तो भर लेते हैं, किंतु यह नहीं समझते कि इससे स्वास्थ्य की कितनी हानि हो रही है। ऐसे पदार्थों के नियमित सेवन से धीरे-धीरे पाचक अग्नि विकृत हो जाती है, जो अधिकांश रोगों का मूल कारण बनती है । संग्रहणी रोग पाचन संस्थानगत रोगों में प्रमुख रोग है । पाचन संस्थान के अन्य रोगों के समान इस रोग का प्रधान कारण भी मंदाग्नि है । मुख से लेकर गुदा तक पाचन प्रणाली के सारे अवयव इस रोग में विकृत हो जाते हैं, किंतु प्रधान रूप से ग्रहणी की विकृति से ही यह रोग होता है ।
संग्रहणी पाचक अग्नि का प्रधान केंद्र है। संग्रहणी शब्द से छोटी आंत का प्रारंभिक भाग या केवल छोटी आंत का ही अर्थ लेना चाहिए। आंत के इस भाग में ही मुख्य रूप से आहार का पाचन होता है। इसी स्थान पर लिवर द्वारा स्रवित पित्त एवं आन्याशय द्वारा स्त्रवित अग्न्यायिक रस आहार के साथ मिलकर उसका पाचन करते हैं। वसा के पाचन का भी यही प्रधान केंद्र है। संग्रहणी का सामान्य कार्य पाचन के लिए अनपचे अन्न का धारण करना एवं पाचन के बाद बचे हुए अंश को आंत में आगे की ओर सरका देना है। (संग्रहणी रोग के कारण लक्षण और घरेलू उपचार)
संग्रहणी का यह कार्य अग्नि के बल पर निर्भर है । प्रारंभ से ही जिनकी अग्नि मंद हो या अतिसार के कारण जिनकी अग्नि मंद हो गई हो, ऐसे व्यक्ति यदि अपथ्य का सेवन करते हैं, तो उनकी अग्नि पुनः अधिक मंद एवं विकृत होकर संग्रहणी को भी दूषित कर आहार को कभी अर्धपक्वावस्था में, कभी पक्वावस्था में अनेक बार त्यागती है। इससे मल दुर्गन्धित, कभी बंधा, कभी तरल, अनेक बार पीड़ा के साथ निकलता है । यह ग्लूकोज वसा तथा विटामिन के अवशोषण में अवरोध उत्पन्न हो जाने से होने वाला रोग है ।
संग्रहणी रोग में आंत की श्लेष्मिक कला में सूजन आ जाने से अधिक स्राव होने लगता है, जिससे पाचक रस आहार पर सम्यक क्रिया नहीं कर पाते और आहार बिना पचे ही आंत में आगे की ओर सरकते हुए आंव के रूप में बाहर निकल जाता है। आहार का उचित पाचन नहीं होने से विटामिन, कैल्शियम, ग्लूकोज, वसा आदि का भी सम्यक पाचन एवं शोषण नहीं हो पाता । पोषण अभाव से व्यक्ति कालान्तर में अति दुर्बल हो जाता है, वजन घटने लगता है, उसे अपच हो जाता है, वसायुक्त दस्त आने लगते हैं। संग्रहणी रोग को उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारण आहार-विहार होता है, इस रोग के प्रमुख कारण निम्न लिखित हैं
अधिक व दूषित आहार
आहार मात्रा (भूख) से अधिक, अत्यंत रूखे, दूषित, गरिष्ठ, तीखे, गर्म, ठंडे या बासी भोजन का सेवन, अपनी प्रकृति विरुद्ध आहार का सेवन, दूषित जल या अन्य रासायनिक पेय तथा चरस, गांजा, अफीम आदि नशीले पदार्थों के सेवन से अग्नि मंद होकर ग्रहणी रोग को उत्पन्न करती है।
विहार
रात्रि जागरण, दिन में सोना, भोजन के तुरंत बाद स्नान या मैथुन करना , मल-मूत्र आदि वेगों को जबरदस्ती से रोक कर रखना, पंचकर्म का मिथ्या योग या अति योग आदि संग्रहणी रोग को उत्पन्न करते हैं।
संग्रहणी रोग (Collectible disease) के लक्षण
संग्रहणी रोग में निम्न लक्षण होते हैं
भोजन से अरुचि होना ।
स्वाद की अनुभूति नहीं होना।
लार अधिक आना।
प्यास अधिक लगना।
हाथ-पैरों में सूजन आना ।
संधियों में दर्द होना।
सिरदर्द होना ।
खट्टी डकारें आना।
उल्टी होना।
बुखार आना ।
मूर्छा होना ।
आंखों के सामने अंधेरा छा जाना ।
शरीर दुबला होना ।
आलस्य आना ।
बल का नाश होना ।
आहार का देर से पचना।
प्यास अधिक लगना।
शरीर में भारीपन होना ।
संग्रहणी रोग के प्रकार
संग्रहणी रोग मुख्यता 5 प्रकार की होती है
1- वातज संग्रहणी
वातज संग्रहणी रोगी बहुत देर में कष्ट पूर्वक कभी रूखा, कभी द्रव, आम एवं फेन युक्त मल का त्याग करता है। इसमें पाचक रसों के स्राव एवं आंत की गति को नियमित करने वाली वातनाडियों की क्रिया में विकृति आ जाने से मल अपक्व या अर्धपक्व अवस्था में ही निकल जाता है। सभी धातुओं में व्याप्त आमदोष, रक्ताल्पता और वात विकृति से हदय प्रदेश, गर्दन, कंधे, पीठ, पिंडलियों आदि में दर्द होता है । गुदा में कैंची से काटने के समान पीड़ा होती है। रोगी को मीठे, खट्टे, नमकीन, कड़वे, तीखे, कसैले के सेवन की प्रबल इच्छा होती है। भोजन के तुरंत बाद रोगी स्वस्थता का अनुभव करता है, किंतु भोजन पचते समय एवं भोजन पच जाने पर वायु की वृद्धि होने से पेट फूल जाता है। (संग्रहणी रोग के कारण लक्षण और घरेलू उपचार)
2- पित्तज संग्रहणी
इसमें रोगी नीले या पीले रंग के पतले मल का जलन के साथ त्याग करता है। साथ ही हृदय प्रदेश, गुदा, पार्श्व, पेट एवं सिर में भी दाह होता है । दूषित पित्त की अतिवृद्धि से खट्टी एवं दुर्गंधयुक्त डकारें आती हैं तथा भोजन में अरुचि, प्यास अधिक लगना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
3- कफज संग्रहणी
कफज संग्रहणी में रोगी आम एवं श्लेष्मा मिश्रित ढीले एवं गुरु मल का बारंबार त्याग करता है। रोगी को हृदय प्रदेश, गुदा, पार्श्व, पेट एवं सिर में भारीपन महसूस होता है । इसके अतिरिक्त उल्टी, अरुचि, मुंह मीठा रहना, लार अधिक आना, मीठी डकारें आना, सर्दी-खांसी होना, बार-बार थूकने की प्रवृत्ति आदि लक्षण भी प्रकट होते हैं।
4- कफज संग्रहणी
कफज संग्रहणी में जीवनीय अंश की कमी एवं जलीय अंश की अधिकता होने से हाथ-पैरों में सूजन आ जाती है तथा धातुओं का सम्यक पोषण न होने से रोगी दुर्बलता का अनुभव करता है।
5-त्रिदोषज संग्रहणी
त्रिदोषज संग्रहणी में उक्त चारों दोषों के मिले-जुले लक्षण प्रकट होते हैं।
संग्रहणी रोग के घरेलू उपचार
संग्रहणी रोग के घरेलू उपचार निम्न प्रकार से कर सकते हैं
बेल के कच्चे फल को आग में सेंक कर उसका गुदा निकाल कर, दस ग्राम गुदे में थोड़ी सी चीनी मिलाकर सेवन करते रहने से इस रोग से लाभ होता है ।
दो ग्राम भांग को भूनकर तीन ग्राम शहद में मिलाकर चाटने से इस रोग में शीघ्र लाभ होता है।
छह ग्राम खजूर के फल को गाय के दूध से बनी बीस ग्राम दही के साथ सेवन करने से बच्चों को संग्रहणी रोग से लाभ होता है।
पचास ग्राम मीठे आम के रस में मीठी दही दस बीस ग्राम तथा एक चम्मच अदरक का रस रोज दिन में दो से तीन बार लगातार पिलाने से कुछ दिन के बाद इस लोग में चमत्कारिक रूप से लाभ होता है।
पिप्पली, भांग तथा सोंठ के चूर्ण तथा पुराना गुड़ छह-छह ग्राम एकत्र कर के इन्हे खरल कर तीन ग्राम की मात्रा में दिन में तीन- चार बार लेने से संग्रहणी में लाभ होता है।
बड़ी इलायची के दाने दस ग्राम, सौंफ साठ ग्राम, नौसादर बीस ग्राम सभी को तवे पर भून कर चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें तथा इसे एक-एक ग्राम की मात्रा में सेवन करने से इस रोग में लाभ होता है।
खाना बनाते समय उसमें दालचीनी, पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, मरिच, कैथ का गूदा, मोचरस, पंचकोल, नागरमोथा आदि का प्रयोग करना लाभ दायक होता है।
♦️संग्रहणी रोग में परहेज♦️
इस रोग में परहेज रखना अति आवश्यक है, क्योंकि जरा सी भी बदपरहेजी इस रोग को लक्षणों को तुरंत पुन: से उभार देती है। इस रोग में निम्न परहेज रखना आवश्यक होता है
चिकनाई युक्त पदार्थ ।
गरिष्ठ पदार्थ।
रिफाइंड तेल ।
पसालेदार भोजन।
अरबी, भिंडी आदि लसदार सब्जियां।
मांसाहार जैसे मीट मछली आदि
सभी मादक एवं उत्तेजक पदार्थों का सेवन ।
किसी भी तरह का भारी परिश्रम आदि ।
संग्रहणी रोग में फायदा करने वाले पदार्थ
संग्रहणी रोग में निम्न पद्रार्थों का सेवन लाभ प्रद रहता है
गेहूं, ज्वार या बाजरे की रोटी।
पुराना चावल।
मूंग, मसूर या कुलथी की दाल।
लौकी, कद्दू, तुरई, परवल की सब्जी।
बकरी का दूध,।
गाय का घी, तिल का तेल, दही, मट्ठा, मक्खन।
शहद का सेवन ।
कैथ, बेल, अनार, संतरा, केला, पपीता का सेवन ।
धान के लावे का मांड।
सिंघाडा का सेवन आदि
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
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पेट में जलन और पित्त बढ़ना तुरंत असर करने वाले घरेलू उपाय
सर्दियों की मीठी धूप हो या गर्मियों की तपीश
पेट में जलन (Acidity) और पित्त बढ़ना (Excess Acid & Heat in Body)
आज हर उम्र के व्यक्ति की आम समस्या बन चुकी है। आयुर्वेद इसे अम्ल पित्त, आधुनिक विज्ञान इसे हाइपर एसिडिटी कहता है।
कारण वही
पेट में आग का बढ़ना! तेज जलन, खट्टा डकार, मुँह कड़वा होना, सीने में सुलगन और सूख लगने पर ये संकेत बताते हैं कि आपका शरीर में पित्त दोष बढ़ चुका है।
♦️पित्त क्यों बढ़ता है?♦️
आयुर्वेद बताता है कि पित्त अग्नि का प्रतिनिधि है, और जब ये बढ़ता है तो पेट में मौजूद अम्ल का उत्पादन बढ़ जाता है जिससे जलन और असहजता होने लगती है।
♦️मुख्य कारण♦️
गलत भोजन संयोजन
खाली पेट चाय–कॉफी
बहुत तीखा, खट्टा, तला हुआ खाना
देर रात भोजन
तनाव और नींद की कमी
तेज गर्मी और सूखे मौसम
धूप और गर्म वातावरण में अधिक रहना
इसकी जलन, आयुर्वेदिक शोध भी बताता है कि जंक फूड, ऑयली खाने और अनियमित आदतें पेट की श्लेष्मा झिल्ली को कमजोर कर देती हैं, जिससे जलन तेजी से बढ़ती है।
Quick-Relief Remedies (जो 5 मिनट में राहत दें)
1) ठंडा दूध + मिश्री — पेट की आग बुझाने का रामबाण
दूध की नैचुरल प्रोटीनस परत और मिश्री की शीतल ऊर्जा मिलकर तत्काल पित्त को नीचे गिराती है।
1 गिलास ठंडा दूध + 1 चम्मच मिश्री
5 मिनट में सीने की जलन शांत।
2) सौंफ + मिश्री + ठंडा पानी ठंडक वाला नेचुरल “कूलर”
सौंफ में मेथाइल चाविकोल गैस को शांत करता है और acidity को तुरंत कम करता है।
1 चम्मच सौंफ + ½ चम्मच मिश्री ठंडे पानी में
हर भोजन के बाद लें या जलन में 2 बार पिएँ।
3 नारियल पानी — शरीर की गर्मी को तुरंत नीचे लाता है
नारियल पानी शरीर से Heat को Neutralize करके pH बैलेंस करता है।
1 गिलास नारियल पानी
मुँह की सूखापन और जलन गायब!
4) मुलेठी पाउडर — पेट की झिल्ली को बनाता है ढाल
मुलेठी में एंटी–अल्सर कंपाउंड होते हैं।
½ चम्मच मुलेठी + 1 कप गुनगुना पानी
जैसे ही पीएँ, जलन शांत — पित्त को तुरंत शांत करने वाला टॉनिक।
5) एलोवेरा जूस — पेट की Heat Detox करता है
एलोवेरा पेट की आग को 20–30% तक तुरंत कम करता है।
20 ml एलोवेरा जूस 30% ठंडे पानी में
भोजन से पहले पिएँ — pH लेवल संतुलित।
6) मिश्री + सौंफ — मीठी ठंडक + गैस कंट्रोल
गैस शरीर में गर्मी भरती है और सीधे पाचन को बिगाड़ती है, मिश्री–सौंफ इसे तुरंत रोकती है।
मिश्री जितना गुड़ + एलाची सौंफ
सीने की जलन और खट्ठेयापन मिटने में राहत।
7) तुलसी के पत्ते — अम्लता का नेचुरल Neutralizer
तुलसी माइक्रो एंटी–एसिडिक की तरह काम करती है।
4–5 ताजे पत्ते चबाएँ!
गैस, एसिडिटी और जलन सब शांत।
8) नींबू पानी — गर्मी को जड़ से काटने वाला शीतलकार
नींबू शरीर की Heat को Detox करता है।
1 चम्मच नींबू पाउडर पानी में
क्रॉनिक acidity में बेहद असरदार।
कैसे पहचानें कि आपका पित्त बढ़ रहा है?
बार-बार खट्टा डकार
मुँह कड़वा होना
सीने में जलन
पेट फुलना/चिड़चिड़ापन
आँखों में गर्माहट
सर भारी महसूस होना
ये सभी संकेत बताते हैं कि शरीर का ‘पित्त स्तर’ बढ़ा हुआ है।
अगर आप भी सालों से सब तरह की पैथी अलग अलग डॉक्टर का इलाज करा करा कर निराश हो चुके हो फीस भरते भरते थक चुके हो और समय के साथ बीमारी ठीक होने की बजाय बढ़ रही हो और आपकी दवाई बंद ही नहीं हो रही हो और छोटी छोटी समस्या ला इलाज हो चुकी हो
तब आपको सही डॉ और सही ट्रीटमेंट की आवश्यकता है वो आपको मिलेगा शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर में।।
और आपकी ला इलाज़ बीमारी जड़ से ठीक होगी जी।।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
किसी भी जानकारी के लिए या ट्रीटमेंट के लिए आप पहले हमें अपनी प्रॉब्लम व्हाट्सप्प कर दीजिये समय मिलते ही आपको जवाब दिया जायेगा...
सभी सुखी और निरोगी रहे
शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर
आयुर्वेदिक डॉ रोहित गुप्ता
TRNDKB : सिर के फंगल इंफेक्शन के उपाय
रूखेपन से अक्सर सिर पर फंगल इंफेक्शन हो जाता है। इस इंफेक्शन की वजह से बालों में खुजली और अत्यधिक रूसी हो जाती है। फंगस पैदा करने वाले बैक्टीरिया आमतौर पर मानसून में पैदा होते हैं और बारिश के बाद भी इनका प्रभाव ख़त्म नहीं होता। इस दौरान लोग डैंड्रफ से भी काफी परेशान रहते हैं।
फंगल इंफेक्शन से परेशान हैं तो आपके घर में मौजूद कुछ चीज़ों से आप इससे छुटकारा पा सकते हैं। कुछ ऐसी चीज़ें जिनकी मदद से आप डैंड्रफ और फंगस इंफेक्शन से बच सकते हैं।
1 नीम
फंगल इंफेक्शन नीम की पत्तियों या इसके तेल से भी दूर किया जा सकता है। इसके लिए घर में नीम की पत्तियों का पेस्ट बना लें और उसमें थोडा सा नींबू का रस और थोड़ी हल्दी मिला लें। इस पेस्ट को बालों की जड़ो में 30 मिनट तक लगाकर छोड़ दें। जल्दी ही आपका इंफ्केशन दूर हो जाएगा।
2 दही
फंगल इंफेक्शन को रोकने के लिए दही काफी मददगार साबित हो सकता है। दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स लैक्टिक एसिड बनाता है, जो फंगल इंफेक्शन की रोकथाम में मददगार होता है।
3 बेकिंग सोडा
स्कैल्प के फंगल इंफेक्शन को दूर करने के लिए बेकिंग सोड़ा बड़े काम की चीज़ है। ये सिर में फंगल को कम कर राहत दिलाता है। बेकिंग सोडा को पानी में मिक्स कर थोड़ी देर के लिए मसाज करें और बाद में शैम्पू की बजाय सिर को सादे पानी से ही धो लें।
4 एलोवेरा जेल
संजीवनी बूटी से कम नहीं है एलोवेरा।
क्या आप जानते हैं कि सिर में होने वाले इंफेक्शन को दूर करने में एलोवेरा जेल काफी कारगर साबित होता है। इसे बालों में लगाने से जलन, खुजली और रैशेज़ से राहत मिल सकती है। इंफेक्शन होने पर बालों की जड़ों में एलोवेरा जेल 30 मिनट तक लगाकर छोड़ दें। जल्दी ही आपको इस समस्या से मुक्ति मिल जाएगी।
5 एप्पल साइडर विनेगर
फंगल इंफेक्शन को दूर करने के लिए एप्पल साइडर विनेगर से बेहतर और कुछ नहीं। विनेगर इन्फेक्शन पैदा करने वाली फंगी पर वार करता है। एप्पल विनेगर को पानी में मिला लें और फिर इसे धीरे-धीरे सिर पर डाले।
6 टी-ट्री ऑयल
टी-ट्री ऑयल किसी भी तरह के फंगल इंफेक्शन की समस्या को दूर करने में मदद करता है। अगर आपके भी स्कैल्प पर फंगल इंफेक्शन है तो टी-ट्री ऑयल को ऑलिव और बादाम के तेल के साथ मिलाकर सिर पर मालिश करें। इससे जल्द ही आपको इस समस्या से छुटकारा मिलेगा।
♦️फीडबैक♦️
रोगी का नाम = सुशील यादव
समस्या = फंगल इन्फेक्शन
समय =काफी सालों से ठीक नहीं होता था
एड्रेस =Sushil yadav
Telangana state
Khammam district
Pindlapalli railway station
हमसे 45 दिन का कोर्स लिया
रिजल्ट्स =100%
फेस पर निशान और स्किन एलर्जी ठीक हो गई।
कान के पास जो स्किन समस्या थी वो ठीक होकर स्किन साफ हो गई।।
रोगी का पूर्ण रूप से ट्रीटमेंट हुआ और कम समय और खर्चे में बीमारी जड़ से ठीक हुई।।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
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WHITE DISHCHARGE
♦️श्वेत प्रदर (सफ़ेद पानी)♦️
ल्यूकोरिया या प्रदर रोग महिलाओं में होने वाला एक गंभीर रोग है. इस रोग में महिला की योनी से सफ़ेद रंग का स्राव निकलता रहता है जो महिला को शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर बना देता है..
सफ़ेद पानी की समस्या से पीड़ित महिला गर्भ धारण करने में सक्षम नहीं हो पाती एवं साथ ही उसके शरीर से धातुओं का क्षय होता रहता है जो उसे शारीरिक रूप से बेहद कमजोर बना देतें है..
♦️आयुर्वेदानुसार श्वेत प्रदर ♦️
संहिताओं में इसका वर्णन श्लेष्मिक प्रदर या श्लेष्मजा योनी नाम से मिलता है. सामान्य अवस्था में महिला के प्रजनन अंगो एवं भग प्रदेश आदि से प्राय: सफ़ेद रंग का एवं गंधहिन पानी जैसा स्राव निकलता रहता है, जो उस भाग को गीला बनाये रखता है.. इस स्राव की मात्रा उतनी ही होती है जितने में वह अंग गीला रहे | मानसिक विकार जैसे काम, क्रोध एवं वासना आदि के कारण यह मात्रा बढ़ भी जाती जो एक समय पश्चात सामान्य हो जाती है.. कभी कभार दुर्बलता, कुपोषण, आहार विहार एवं व्याधियों के कारण यह मात्रा अधिक हो जाती है जो लम्बे समय तक परेशान करती है | इसी अवस्था को श्वेत प्रदर कहते है..
आयुर्वेद चिकत्सानुसार महिलाओं में सफ़ेद पानी की समस्या को 5 प्रकार की माना है..
भगज श्वेत प्रदर
योनिज
ग्रीवीय एवं
ग्रभास्यज श्वेत प्रदर
श्वेत प्रदर (सफ़ेद पानी) के कारण
पांडू रोग / खून की कमी
मानसिक विकार जैसे क्रोध, भय एवं चिंता आदि
अधिक सम्भोग
अपच एवं अजीर्ण
कब्ज
मूत्राशय में सुजन
अतृप्त कामवासन
भावनात्मक कष्ट आदि
श्वेत प्रदर की पहचान या लक्षण
योनिमार्ग से सफ़ेद जलीय चिपचिपे पदार्थ का बाहर निकलना.
योनी में खुजली एवं जलन.
जांघों में भारीपन
शारीरिक दुर्बलता
आलस्य
भोजन का ठीक प्रकार से पाचन न होना
कब्ज हो जाना
सिर दर्द
चक्कर आना
भोजन में अरुचि होना आदि लक्षण सफ़ेद पानी की समस्या होने पर दिखाई देते है
♦️श्वेत प्रदर के कारगर घरेलु इलाज.♦️
श्वेत प्रदर नाशक त्रिफला योग
♦️सामग्री ♦️
आंवले का बक्कल, हरड का बक्कल, एवं बहेड़ा इन तीनो को 1 -1 तोला(10 ग्राम) एवं जल आधा kg
♦️विधि ♦️
सबसे पहले इन तीनो द्रव्यों को कूटपीस कर दरदरा कर लें | अब रात्रि के समय इन्हें एक मिट्टी के बर्तन में रखकर ऊपर से पानी डाल दें..रात्रि भर अच्छी तरह भीगने के बाद सुबह इसे आंच पर चढ़ा कर काढ़ा तैयार कर लें यह योग सभी प्रकार के प्रदर रोग में उपयोगी है..
इसके उपयोग से पुराने से पुराना प्रदर रोग ठीक हो जाता है | साथ ही वेदना आदि में भी आराम मिलता है..
♦️उपयोग की विधि ♦️
इस काढ़े का उपयोग योनी में एनिमा देने के लिए किया जाता है | योनी में ड्यूस एवं पिच्चु को धारण करना चाहिए एवं साथ ही योनिमार्ग को इस काढ़े से धोना चाहिए | लगातार कुछ दिनों के प्रयोग से शीघ्र ही श्वेत प्रदर की समस्या नष्ट हो जाती है |
आयुर्वेद में त्रिफला क्वाथ से योनी प्रक्षालन को उपयुक्त चिकित्सा माना गया है..
गुलर योग
सामग्री
गुलर के पक्के फल का 50 ग्राम चूर्ण और 100 ग्राम मिश्री |
♦️विधि ♦️
गुलर के फलों को को टुकड़े टुकड़े करके सुखा लें | जब एक दम सुख जाए तब कूट पीसकर कर कपड़छन चूर्ण कर लें | इस चूर्ण में मिश्री मिलाकर अच्छी तरह ढक कर रखें |
♦️उपयोग एवं गुण ♦️
10 ग्राम तक की मात्रा में इस चूर्ण को खाकर ऊपर से गाय या बकरी का दूध ग्रहण करना चाहिए | अगर रक्त प्रदर की समस्या हो तो अशोकारिष्ट के साथ सेवन करना चाहिए | हमेशा ठन्डे जल के साथ ही इसका सेवन करना चाहिए | दिन में दो बार सुबह एवं शाम लिया जा सकता है | इसके उपयोग से सभी प्रकार के प्रदर रोग ठीक हो जाता है |
♦️श्वेत प्रदर (सफ़ेद पानी) के घरेलु नुस्खें..♦️
मुलहठी एवं चीनी 10 ग्राम एवं 20 ग्राम प्रत्येक को दोनों को पीसकर चूर्ण बना लें | आधा चम्मच चूर्ण सुबह और आधा चम्मच शाम को दूध के साथ सेवन करें.
सूखे हुए चमेली के पते 4 ग्राम और सफ़ेद फिटकरी 2 ग्राम दोनों को खूब महीन पिसलें | इसमें से 2 ग्राम चूर्ण शक्कर में मिलाकर रात के समय फांककर ऊपर से दूध पी लें | इसके प्रयोग से श्वेत प्रदर ठीक हो जाता है |
पके हुए केले के अन्दर फिटकरी का चूर्ण भरकर इसे दोपहर के समय खूब चबा चबा कर खाएं | इसके सेवन से सफ़ेद पानी की समस्या से राहत मिलती है |
पेट पर ठन्डे पानी का कपडा रोज 10 मिनट रखना चाहिए |
अशोक के पेड़ की छाल को 50 ग्राम की मात्रा में लें | इसे 1 किलो पानी में पकाएं जब पानी आधा रहे तब इसे आंच से निचे उतार कर छान कर दूध में मिलाकर सेवन करना श्वेत प्रदर के रोग में फायदेमंद रहता है |
अनार के छिलकों को ठन्डे पानी के साथ सेवन करने से फायदा मिलता है |
मूली का सेवन भी फायदेमंद रहता है | मूली के पतों का रस निकाल कर सेवन करने से भी लाभ मिलता है |
गुलाब के फुल की पत्तियों को मिश्री के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है |
अगर आपको ये समस्या है सफेद पानी की और दवाई लेने के बाद भी समस्या ठीक नहीं हो रही तब तुरंत अपना डॉ और उपचार बदल दो यानी हमारे द्वारा बनाई गई 30 डेज की मेडिसिन इस्तेमाल कीजिए और पूर्ण रूप से सफेद पानी की समस्या ठीक करके स्वस्थ हो जाओ।।।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
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♦️अपेंडिक्स ♦️
हमारे शरीर में कई ऐसे अंग हैं जिन्हें हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, लेकिन जब वे समस्या देते हैं तो पूरा शरीर प्रभावित हो जाता है। ऐसा ही एक अंग है — अपेंडिक्स (Appendix)।
यह एक छोटी सी ट्यूबनुमा थैली होती है जो बड़ी आंत (Large Intestine) के आरंभिक हिस्से सीकम (Cecum) से जुड़ी होती है। इसकी लंबाई लगभग 8 से 10 सेंटीमीटर होती है और यह पेट के निचले दाएँ हिस्से (Right Lower Abdomen) में स्थित रहती है।
आयुर्वेदिक दृष्टि से अपेंडिक्स का अर्थ और कार्य
आयुर्वेद में अपेंडिक्स को “अन्नवह स्रोतस” (Digestive Channel) का भाग माना गया है, जो अन्न रस (Food Essence) के पाचन और अवशोषण में सहायक होता है।
पुराने समय में इसे “अनुपयोगी” समझा जाता था, लेकिन आधुनिक शोध बताते हैं कि यह शरीर के रोग-प्रतिरोधक तंत्र (Immune System) में भूमिका निभाता है।
अपेंडिक्स हमारी आंतों में अच्छे बैक्टीरिया को स्टोर करने का काम करता है, जो संक्रमण या डायरिया के बाद दोबारा बैलेंस बहाल करने में मदद करते हैं।
इसलिए अब वैज्ञानिक इसे “Safe House of Good Bacteria” कहते हैं।
अपेंडिक्स की मुख्य बीमारी
♦️अपेंडिसाइटिस♦️ (Appendicitis)
जब अपेंडिक्स में सूजन या संक्रमण हो जाता है, तो इसे Appendicitis कहा जाता है। यह अचानक हो सकता है और तेज़ दर्द के साथ शुरू होता है।
♦️मुख्य लक्षण♦️
पेट के निचले दाएँ हिस्से में तीव्र दर्द
मिचली या उल्टी
बुखार
भूख में कमी
पेट फूलना या गैस
कभी-कभी मल त्याग में कठिनाई
अगर अपेंडिसाइटिस का इलाज समय पर न किया जाए, तो यह फट (Rupture) सकता है, जिससे संक्रमण पूरे पेट में फैल जाता है — जिसे Peritonitis कहते हैं, जो जानलेवा भी हो सकता है।
आधुनिक और आयुर्वेदिक उपचार
Modern Medicine
अधिकतर मामलों में डॉक्टर सर्जरी (Appendectomy) की सलाह देते हैं — यानी अपेंडिक्स को निकाल देना।
आयुर्वेद कहता है कि अपेंडिसाइटिस वात-पित्त दोष की वृद्धि से होता है। प्रारंभिक अवस्था में अगर दर्द बहुत अधिक न हो, तो कुछ घरेलू और आयुर्वेदिक उपाय राहत दे सकते हैं।
♦️♦️आयुर्वेदिक देखभाल और घरेलू उपाय
♦️त्रिफला चूर्ण (Triphala♦️♦️ Powder)
हर रात एक चम्मच गुनगुने पानी के साथ लेने से आंतें साफ रहती हैं और सूजन कम होती है।
♦️अदरक और हल्दी♦️
दोनों प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी हैं। अदरक का रस और चुटकीभर हल्दी गुनगुने पानी में मिलाकर पीने से पेट की सूजन और दर्द में आराम मिलता है।
♦️कच्चे केले का सेवन♦️
यह पाचन को सहज बनाता है और अपेंडिक्स पर दबाव कम करता है।
♦️कैस्टर ऑयल पैक♦️
पेट पर हल्का गर्म कैस्टर ऑयल लगाकर 15 मिनट तक रखें — यह सूजन और दर्द को कम करता है।
♦️हल्का भोजन♦️
अपेंडिक्स की समस्या में मसालेदार, तला-भुना और अधिक प्रोटीन वाला भोजन न लें।
दलिया, मूंग की खिचड़ी, नारियल पानी और उबली सब्ज़ियाँ सबसे बेहतर रहती हैं।
Lifestyle Care Tips (जीवनशैली से बचाव)
नियमित भोजन समय रखें।
तनाव से बचें — यह पाचन को प्रभावित करता है।
रोज़ाना हल्का व्यायाम और योग करें।
पानी की पर्याप्त मात्रा पिएँ।
भोजन में फाइबर (सब्ज़ियाँ, फल, साबुत अनाज) शामिल करें।
Rare but True Facts About Appendix (कम ज्ञात लेकिन सच्चे तथ्य)
अपेंडिक्स इम्यून सिस्टम का हिस्सा है — यह gut bacteria को संरक्षित रखता है।
2007 के एक शोध में पाया गया कि जिन लोगों का अपेंडिक्स हटा दिया गया, उनमें gut infection दोबारा होने की संभावना ज़्यादा रहती है।
आयुर्वेद के अनुसार, अपेंडिक्स अग्नि (Digestive Fire) को संतुलित करने में मदद करता है।
यह माना गया है कि मानव शरीर में यह अंग Evolutionary Remnant है, लेकिन अब यह माइक्रोबियल बैलेंस में सक्रिय भूमिका निभाता है।
जिन लोगों की डाइट संतुलित और फाइबर-युक्त होती है, उनमें अपेंडिसाइटिस का खतरा बहुत कम होता है।
♦️निष्कर्ष♦️
अपेंडिक्स भले ही छोटा अंग हो, लेकिन इसका काम बड़ा है यह हमारी आंतों की सुरक्षा और प्रतिरक्षा संतुलन बनाए रखता है। आयुर्वेद सिखाता है कि अगर हम अपनी आग्नि (पाचन शक्ति) और स्रोतस (body channels) को संतुलित रखें, तो अपेंडिक्स जैसी बीमारियाँ स्वाभाविक रूप से दूर रहती हैं।
इसलिए अपनी रसोई की औषधियाँ — अदरक, हल्दी, त्रिफला — को अपना रोज़मर्रा साथी बनाएँ, और शरीर के हर छोटे अंग का सम्मान करें — क्योंकि हर एक का अपना गहरा अर्थ है।
अगर आप भी सालों से सब तरह की पैथी अलग अलग डॉक्टर का इलाज करा करा कर निराश हो चुके हो फीस भरते भरते थक चुके हो और समय के साथ बीमारी ठीक होने की बजाय बढ़ रही हो और आपकी दवाई बंद ही नहीं हो रही हो और छोटी छोटी समस्या ला इलाज हो चुकी हो
तब आपको सही डॉ और सही ट्रीटमेंट की आवश्यकता है वो आपको मिलेगा शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर में।।
और आपकी ला इलाज़ बीमारी जड़ से ठीक होगी जी।।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
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रीढ़ की हड्डी में दर्द कारण निवारण और उपचार
हमारी पीठ की इंजिनियरी जबरदस्त है,इसमें लोच है,इसके बोझा उठाने वाले बिंदु सदा सक्रिय रहते हैं । और हमारे पोस्चर को ठीक रखते हैं । एक बार मे एक ही काम करना चाहिए । अक्सर लोग हड़बड़ाहट में यह दोनों एक साथ कर बैठते हैं । और दर्द झेलना पड़ता है । वैसे ज्यादातर मामलों में गर्दन व पीठ का दर्द अपने आप ही मिट जाता है और कोई बड़ी समस्या नहीं बन पाता परंतु अचानक झटका लगने , भारी सामान उठाने , अचानक झुकने या मुड़ने के कारण पीठ में दर्द हो सकता है।
♦️रीढ़ की हड्डी का दर्द
नई तकनीकी खोजों , शारीरिक व्यायाम की कमी और आरामदायक जीवन - शैली से सिरदर्द,चक्कर आना और पीठ दर्द जैसी कई परेशानियाँ पैदा कर दी हैं। ज्यादातर ऑफिस जाने वाले लोग घंटों कुर्सी पर बैठ कर काम करते हैं वे अपने शरीर को ज्यादा कष्ट नहीं देना चाहते । वहीं दूसरी ओर महिलाएं घरेलू कामकाज के लिए मिक्सर , ग्राइंडर और वाशिंग मशीन जैसे उपकरणों का इस्तेमाल करती हैं । इन सब वजह से किसी न किसी प्रकार से दर्द झेलना पड़ता है।
♦️अपने आप रोग पहचाने
अगर आप किसी आदमकद शीशे के सामने खड़े हो कर नीचे लिखे प्रश्नों का उत्तर दें तो अपनी रीढ़ की सही हालत का अंदाजा अपने आप लगा सकते हैं
क्या आपके सिर का झुकाव एक ओर रहता है ?
क्या गर्दन के बीचों-बीच बल पड़ता है ?
क्या एक कंधा दूसरे कंधे से ऊँचा है ?
क्या एक नितंब दूसरे नितंब से ऊँचा है ?
क्या एक नितंब दूसरे नितंब की तुलना में उभरा हुआ है?
क्या आपको अपना सिर, आगे - पीछे और दाएं - बाएँ घुमाने में कठिनाई होती है ?
क्या आपको आगे और पीछे की ओर मुड़ने में तकलीफ होती है?
क्या आपकी खड़ी हुई मुद्रा, एक ओर को झुकी दिखाई देती है ?
अगर आपने इनमें से किसी एक भी प्रश्न का उत्तर ' हाँ ' में दिया है तो इसका अर्थ होगा कि आपकी रीढ़ सही आकार में नहीं है जो अलग अलग अंगों में दर्द पैदा करने की वजह बन सकती है ।
🟣सर्वाइकल क्षेत्र में दर्द
♦️सर्वाइकल स्पांडिलायसिस
चालीस साल की उम्र के बाद सर्वाइकल स्पाइन में आने वाले डिजेनेरेटिव बदलाव सवाईकल,स्पांडिलायसिस कहलाते हैं,65 वर्ष के बाद ये बदलाव सभी व्यक्तियों में पाए जाते हैं,यही गर्दन तथा कंधों में दर्द का सबसे बड़ा कारण होता है,इन बदलावों के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है,हिलाने में दिक्कत हो सकती है, या मांसपेशियाँ कमजोर पड़ सकती है, कभी कभी किसी एक ही व्यक्ति में एक या एक से अधिक लक्षण पाए जाते हैं, कई बार इसका संबंध व्यवसाय की प्रकृति से भी होता है, जैसे एक कार के ड्राइवर को लगातार अपनी गर्दन इधर - उधर मोड़नी पड़ती है और ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर सहने पड़ते हैं । इससे उसकी डिस्क के अंदरूनी हिस्से पर चोट पहुँचती है और उसे सहारा देने वाला पदार्थ कम हो जाता है । तनाव, आरामदायक जीवन - शैली और कसरत की कमी से मांसपेशियाँ ढीली पड़ जाती हैं, और मेरुदंड को नुकसान झेलना पड़ता है।
♦️निम्न कारणों से भी गर्दन में दर्द पैदा हो सकता है
जोड़ों के क्षतिग्रस्त लिगामेंट, लिगामेंट के ज्यादा खिंचाव से गर्दन अकड़ जाती है, ऑस्टियोफाइटस भी स्नायु पर दबाव डालते हैं, कई बार यह दर्द स्नायु से फैल कर दूसरे अंगों में भी पहुँच जाता है, अक्सर मरीज गर्दन व कंधे के साथ - साथ छाती की मांसपेशियों में तकलीफ की शिकायत भी करते हैं, नस पर किस जगह से दबाव पड़ रहा है,यह जान कर इलाज किया जा सकता है । इसके कारण अंगों में झनझनाहट या सुन्न होने की स्थिति भी हो सकती है।
♦️सर्वाइकल स्पांडिलायसिस गंभीर रूप ले ले तो यह पीछे की ओर जा कर मेरुदंड रज्जु पर दबाव डाल सकता है, जिससे शरीर के पूरी निचले भाग में कमजोरी या बोध की कमी हो सकती है, कभी-कभी डिस्क दो कशेरुकों के बीच से खिसक कर नाड़ी पर दबाव डालती है जिससे दर्द होने लगता है,एम.आर.आई और सी.टी.स्केन जैसे टेस्टों से ऐसी हालत का पता लगा कर इलाज किया जा सकता है । डिस्क के आगे की ओर उभरने वाली गंभीर स्थितियों में इसे शल्य क्रिया द्वारा हटाया जा सकता है।ताकि स्नायु पर पड़ने वाला दबा कम हो जाए।
♦️सिरदर्द
जब सर्वाइकल वर्टिबरे में से होकर गुजरने वाली नाड़ियाँ उत्तेजित हो जाती हैं तो गर्दन में जकड़न और शरीर के ऊपरी अंगों के सुन्न होने की शिकायत हो सकती है । यह सिर दर्द का प्रमुख कारण होता है । वैसे तो अधेड़ उम्र में सिरदर्द की ज्यादा शिकायत होती है । लेकिन आजकल बच्चों में भी यह समस्या पाई जाने लगी है । अनेक ऐसे मामले भी देखे गए हैं जहाँ युवाओं में सिर दर्द व चक्कर आने की शिकायत पाई जाती है । उनके एक्स - रे से भी कुछ पता नहीं चलता । ऐसे में रोगी को मनोरोगी मान कर मनोचिकित्सक के पास भेज दिया जाता है । वह भी रोग का कोई मानसिक कारण नहीं खोज पाता जबकि यह मेरुदंड में होने वाली उत्तेजना की वजह से होता है । कीरोप्रक्टिक पद्धति से इस रोग का इलाज में किया जा सकता है । ब्रेन ट्यूमर , अपच , मानसिक कारणों , दाँत में इंफेक्शन या दिमाग पर असर डालने वाले दूसरे रोगों के कारण भी सिरदर्द हो सकता है
♦️चक्कर आना
सर्वाइकल क्षेत्र से निकलने वाली नाड़ियों की उत्तेजना के कारण ही चक्कर आते हैं । इसका इलाज दवाओं से किया जाए तो रक्त के प्रवाह में सुधार होता है , अस्थायी आराम मिलता है परंतु रोग जड़ से नहीं जाता।
♦️माइग्रेन
माइग्रेन में रोगी को अचानक तेज सिरदर्द का दौरा पड़ता है । उसे उल्टी करने इच्छा होती है या उल्टी आ जाती है । यह दर्द इतना तेज होता है रोगी जरा सा भड़काने पर उत्तेजित हो जाता है और बाहरी दुनिया से बच कर अपने खोल में छिप जाता है । यह दौरा कुछ घंटों से लेकर कुछ दिन तक का हो सकता है । माइग्रेन का दवाओं से किया जाने वाला इलाज अधूरा और असंतोषजनक है । क्योंकि इसमें नाड़ियों की उत्तेजना शांत कराने का उपाय नहीं किया जाता जो कि इस रोग की जड़ है ।
♦️थोरेसिक ( छाती ) क्षेत्र में दर्द होना
इंटरकोस्टल नसों पर दबाव पड़ने से छाती में तेज दर्द होता है । इसे डॉक्टरी भाषा में इंटरकोस्टल न्यूरोलाजिया ( Intercostal neuralgia ) कहते हैं । मेरुदंड रज्जु और पसलियों के बीच निकलने वाली तंत्रिकाओं में उत्तेजना की वजह से ऐसा होता ऐसी हालत में मरीजों को दर्द निवारक दवायाँ लेने की सलाह दी जाती है , जिनसे थोड़ी देर के लिए दर्द घटता है और दवा का असर मिटते ही हालत वैसी ही हो जाती है । कई बार इसे गलती से हृदय रोग मान कर उसी तरह इलाज कर दिया जाता है । कशेरुकों को सही स्थान पर बिठाने से यह दर्द ठीक हो सकता है । वैसे इस क्षेत्र से जुड़ी तकलीफें कम ही देखने में आती हैं ।
♦️लम्बर ( कमर ) क्षेत्र में दर्द होना
कई बार हम पीठ दर्द की वजह आस्टियोआर्थराइटिस , स्लिप डिस्क या मेरुदंड को बैठाते हैं जबकि कारण कुछ और ही होता है । यह दर्द अनेक जटिल कारणों से टो सकता है क्योंकि पीठ में अनेक हड्डियाँ , लिगामेंट , मांसपेशियाँ नाडियाँ और रक्त नलिकाएँ हैं जो*सलाह भी दी जाती है । कभी - कभी गंभीर मामलों में रोगी को पैर का लकवा भी मार सकता है जिससे वह न तो पैर उठा पाता है । और न ही चल पाता है । हालांकि ऐसे मामले बहुत कम होते हैं ।
♦️प्रोलैप्स्ड डिस्क ( prolapsed disc ) के कारण दर्द होना
जब भी मरीजों की पीठ में असहनीय दर्द होता है तो वे इसे ' स्लिप डिस्क का नाम दे देते हैं । यह एक गलतफहमी है । डिस्क नहीं खिसकती । दबाव पड़ने या झटका लगने के कारण यह एक बिंदु पर बाहर की ओर उभर आती है । यदि आम भाषा में कहें तो यह कमजोर मांसपेशियों के कारण आगे चल कर खिसक सकती है । अचानक झटका लगने के कारण के केंद्र में भरा नरम जैली जैसा पदार्थ अचानक झटका लगने के कारण डिस्क के केंद्र में भरा नरम जैली जैसा पदार्थ ( न्यूक्लियस पलपोसस ) बाहरी घेरे को तोड़ कर बाहर आ जाता है जिससे तंत्रिका तंत्र पर दबाव पड़ने लगता है । और तेज दर्द होने लगता है । डिस्क एक नरम और भंगुर पदार्थ है जो शरीर में शॉक एब्जावर ( shock absorber ) का काम करती है । चौबीस हड्डियों के ढांचे में डिस्क के 23 सैट होते हैं । केवल भारी सामान उठाने से ही यह तकलीफ नहीं होती । कभी - कभी छोटी सी वजह भी प्रोलैप्स डिस्क का कारण बन जाती है । जमीन से हल्का सा भार उठान , कार से सामान उतारने या तेजी से व्यायाम करने से भी डिस्क में दरार पड़ सकती है । कई बार सट किया लम्बे समय तक ( वर्षों तक ) चल अगर दर्द बना रहता है । यहाँ तक कि एक स्वस्थ व्यक्ति भी इस तरह के दर्द का शिकार हो सकता है । इस समय उसे डॉक्टर , कीरोप्रेक्टर या फिजियोथैरेपिस्ट की मदद लेनी चाहिए ।
♦️शियाटिका
अधेड़ उम्र में अक्सर जाँघों व टाँगों में सनसनाहट महसूस होती है । इसे ' शियाटिका ' कहते हैं । शियाटिका इस बात का लक्षण है । कि शरीर के किसी अंग के ठीक काम न करने या चोट लगने की वजह से तंत्रिका तंत्र पर दबाव पड़ रहा है या उत्तेजना पैदा हो रही है । शियाटिका स्नायु शरीर में सबसे लंबे और बड़े होते है जो कि नितंबों की दाईं ओर से ले कर , जाँघों के पीछे , पाँवों तक फैले होते हैं । शियाटिका का असर इसकी लम्बाई पर निर्भर करता है वैसे ज्यादातर मामलों में यह जाँघ के पीछे दर्द जलन या झनझनाहट के रूप में महसूस होता है । यह पीठ - दर्द के साथ भी उभर सकता है । जब कोई व्यक्ति लगातार झुक कर काम करता है तो हालत और भी बदतर हो जाती है । यहाँ तक कि खाँसने और छींकने से भी तेज दर्द होता है । गठिया , चोट लगना , कूल्हे का कोई रोग , गर्भधारण के दौरान दबाव पड़ना , सिफलिस , सर्दी लगना व मदिरापान आदि शियाटिका के मुख्य कारण हो सकते हैं । शियाटिका स्नायु पर दबाव पड़ने या चोट लगने से जलन महसूस हो सकती है ।
♦️इन सभी रोगों का इलाज कैसे हो ?
♦️इतिहास
किसी भी रोग के सफल इलाज के लिए मरीज की केस हिस्टरी पता होना बहुत जरूरी है । यह जानना जरूरी होता के दर्द कहाँ व किस हिस्से में है , कितने समय से है , दर्द गिरने की वजह से हुआ या किसी दुर्घटना की वजह से आदि । कई बार वजन बढ़ने या किसी तरह के संक्रमण ( इंफेक्शन ) के कारण भी दर्द हो सकता है । जांच - पड़ताल डॉक्टर को देखना चाहिए कि रोगी दोनों ओर ठीक तरह से गर्दन हिला रहा है या नहीं । उसके ऊपरी अंगों में किसी तरह की जकड़न तो नहीं हैं । इस तरह पता चल जाएगा कि दर्द किस हिस्से में है ।
♦️रीढ़ की हड्डी में दर्द का इलाज
दर्द किस हिस्से में है , कितने समय से हो रहा है , मांसपेशियों की दशा और movement पर विचार करने के बाद ही इलाज शुरू किया जाता है । कुछ इलाज नीचे बताए गए हैं।
♦️कमर दर्द के लिए एक्यूपंचर एक बेजोड़ इलाज है । इस पद्धति मे मांसपेशियों को आराम देने के लिए कई तरह की । सुईयँ इस्तेमाल की जाती हैं । छोटे बच्चों के लिए एक्यूपंचर इस तरह होता है , जिससे उन्हें दर्द का एहसास न हो
♦️कई बार लोकल एनस्थीसिया जाइलोकेन (1%) देने से भी मांसपेशियों को आराम मिल जाता है । वैसे बिगड़े हुए मामलों में ही इसका प्रयोग होता है इस पद्धति को ' न्यूरल थैरेपी कहते है ।
♦️गुनगुने आयुर्वेदिक तेल से की गई मालिश से भी शरीर खुलता है और दर्द भी नस्ट होता है
♦️कीरोप्रेक्टर भी समस्या को हल कर सकता है बशर्ते अनाड़ी हाथों से न किया जाए । यह पद्धति ‘आस्टियोपैथी' कहलाती है ।
♦️ओजोन थैरेपी में ओजोन का इंजेक्शन दिया जाता है । बहुत गंभीर मामलों में जब रोगी गर्दन हिलाने की हालत में न हो और कंधे की मांसपेशियाँ अकड़ कर दर्द करने लगे तो एक्यूपंचर , गर्म तेल की मालिश , लोकल एनस्थीसया और ओजोन थैरेपी को मिला कर इलाज करना पड़ता है । जब एक - दो दिन में मांसपेशियों को आराम आ जाए तो सभी जोड़ों को सही जगह आराम से बिठाना चाहिए । गलत तरीके से इलाज करने पर परेशानी बढ़ भी सकती है । रोगी को इलाज के लिए कितनी बार आना होगा यह उसके दर्द पर निर्भर करता है, इसके बाद रोगी को दोबारा डॉक्टर के पास दिखाने अवश्य जाना चाहिए और लगातार एक-दो सप्ताह तक गर्म आयुर्वेदिक तेल से हल्की मालिश करनी चाहिए ।
♦️रीढ़ की हड्डी में दर्द के घरेलू उपचार
♦️सोंठ
सोंठ का चूर्ण या अदरक का रस , 1 चम्मच नारियल के तेल में पकाकर फिर इसे ठंडा करके दर्द कमर पर लगभग 15 मिनट तक मालिश करें । इससे रीढ़ की हड्डी में दर्द , कमर दर्द में आराम मिलता है।
♦️सहजन
सहजन की फलियों की सब्जी खाने से रीढ़ की हड्डी में दर्द में फायदा होता है ।
♦️मेथी
मेथी दाने के लड्डू बनाकर 3 हफ्ते तक सुबह - शाम सेवन करने और मेथी के तेल को दर्द वाले अंग पर मलते रहने से पूर्ण आराम मिलता है
♦️अजवाइन
अजवाइन को 1 पोटली में । रखकर उसे तवे पर गर्म करें । फिर इस पोटली से कमर को सेंकें इससे आराम होगा
♦️छुहारा
सुबह - शाम 1 - 1 छुहारा खायें । इसके सेवन से रीढ़ की हड्डी में दर्द व कमर दर्द मिट जाता है ।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
किसी भी जानकारी के लिए या ट्रीटमेंट के लिए आप पहले हमें अपनी प्रॉब्लम व्हाट्सप्प कर दीजिये समय मिलते ही आपको जवाब दिया जायेगा...
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शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर
TRNDKB : डायबिटीज़ में नसों की जलन (Neuropathy) अगर समय पर संभाल ली जाए, तो बढ़ने से रोकी जा सकती है।
घरेलू उपाय अलग-अलग और पूरा सेफ प्लान
नसों की जलन क्यों होती है? (संक्षेप में)
लंबे समय तक शुगर ज़्यादा रहना
Vitamin B12 / D की कमी
उम्र के साथ नसों की कमजोरी
पैरों में ब्लड सर्कुलेशन कम होना
घरेलू उपाय (रोज़ करने योग्य)
1 पैरों की सही देखभाल (सबसे ज़रूरी)
गुनगुने पानी से पैर धोएँ (गरम नहीं)
अच्छे से सुखाएँ
रात को नारियल तेल / तिल का तेल हल्का सा लगाएँ
नंगे पाँव बिल्कुल न चलें।
2 डाइट से नसों को ताक़त
दूध / दही
हरी सब्ज़ियाँ
मूंग दाल
अखरोट (1–2)
अलसी (1 चम्मच)
शराब, तंबाकू = नसों की सबसे बड़ी दुश्मन
3 हल्की एक्सरसाइज़
20–30 मिनट धीमी वॉक
कुर्सी पर बैठकर पैर ऊपर-नीचे
पंजों को गोल-गोल घुमाना
ब्लड फ्लो बढ़ता है = जलन कम होती है।
4 रात की जलन में राहत
सोने से पहले पैर ऊँचे रखें
ठंडी हवा सीधे पैरों पर न लगे
ढीले कॉटन मोज़े पहनें।
मेडिकल उपाय (डॉक्टर की सलाह से)
1 Vitamin सपोर्ट
Vitamin B12 / B-Complex
Vitamin D (अगर कमी हो)
B12 की कमी में जलन बहुत बढ़ जाती है।
2 नसों की दवाएँ
3 शुगर का स्थिर कंट्रोल
HbA1c 7–7.5% (60+ में)
बहुत कम शुगर भी नसों को नुकसान देती है
क्या न करें
गरम पानी में पैर डुबोना
हीटर / गरम बोतल पैरों पर लगाना
दर्द सहते रहना
खुद से दवा बदलना
कब तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ?
जलन रोज़ बढ़ रही हो
सुन्नपन बढ़ने लगे
पैरों में छाले / घाव
रात में नींद न आए
कमजोरी या चलने में लड़खड़ाहट
7-दिन का आसान “नसों की देखभाल रूटीन”
सुबह: हल्की वॉक
दोपहर: संतुलित खाना
शाम: पैर की एक्सरसाइज़
रात: तेल से हल्की मालिश + पैर ऊँचे
याद रखने का गोल्डन नियम
“शुगर कंट्रोल + विटामिन + पैर की देखभाल = नसों की सुरक्षा”
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
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TRNDKB : ♦️भगंदर ♦️
Fistula को हिंदी में भगंदर कहा जाता है।
भगंदर (Fistula) क्या होता है?
भगंदर एक प्रकार का असामान्य नाल (passage) होता है जो शरीर के किसी अंग की भीतरी सतह को त्वचा की बाहरी सतह से जोड़ता है। यह आमतौर पर मलद्वार (anus) और उसके आस-पास की त्वचा के बीच बनता है। इसे Anal Fistula (गुदा भगंदर) कहा जाता है।
♦️मुख्य लक्षण♦️
मलद्वार के पास पस (पीप) आना
दर्द और सूजन
जलन या खुजली
बुखार
मल त्याग करते समय दर्द
♦️कारण♦️
• पेरिनियल एब्सेस (फोड़ा)
• क्रोहन रोग (Crohn’s disease
• टीबी
• कैंसर या रेडिएशन थेरेपी
♦️उपचार♦️
• सर्जरी (Fistulotomy)
• लेजर ट्रीटमेंट
•आयुर्वेद या होम्योपैथी उपचार
अगर आपको या किसी को समस्या है, तो सही निदान और उपचार के लिए हमसे परामर्श अवश्य लें।
♦️फीडबैक ♦️
नाम - nitesh sharda
गली और मोहल्ला - 180, gopi krishna vihar, guro ka talab road, adarsh vatika ke pass
गाँव /कस्बा / सिटी - jodhpur city
जिला - jodhpur
पिन कोड़ - 342001
राज्य - rajasthan
प्रॉब्लम = fistula-in-ano (भगन्दर)
नीतीश जी जोधपुर राजस्थान के रहने वाले है इन्होंने हमसे अक्टूबर महीने में संपर्क किया और बताया कि डॉ साहब मुझे भगंदर की बीमारी है लंबे समय से जी हमने सब ट्रीटमेंट करा चुके जी पर समस्या ठीक नहीं हुई।।
नीतीश जी ने बताया उनको गुदा द्वार के अंदर ज़ख्म घाव है जो बहुत परेशान करता है भरता नहीं है और उससे पीप निकलता है जिस कारण इनको काफी समस्या रहती है।।
इन्होंने सभी समस्या बता कर आयुर्वेदिक शिवाय सेंटर से ट्रीटमेंट लिया और एड्रेस भेज कर उपचार की दवाई घर पर मंगवाई।।
अक्टूबर/2025 के पहले सफ्ताह से इन्होंने उपचार शुरू किया 45 दिनों का
इन्होंने हमारे द्वारा भेजे गए निम्न दवाई नियम और परहेज से ली
भगंदर पावडर 1
भगंदर पावडर 2
भगंदर लेप ( जख्म पर लगाने के लिए)
रेड ऑयल( जख्म भरने के लिए)
TRNDKB
45 दिनों के बाद कोर्स पूरा हुआ और इन्होंने कॉल करके बताया कि डॉ साहब ट्रीटमेंट करा कर पूरी तरह ठीक हो चुका हो जी जख्म भी भर गया है 100%
बस गुदा द्वार में खुजली आ रही है।।
इस प्रकार इनकी भगंदर की समस्या आयुर्वेदिक उपचार से बिल्कुल ठीक हुई ऑपरेशन कराने से बच गए और एक कोर्स दोबारा कराकर इनका उपचार पूरा करके इलाज बंद कर दिया जाएगा ।।
इनका रिजल्ट्स इनके द्वारा दिए गए फीडबैक में आप पड़ सकते हो।।
किसी भी जानकारी के लिए या ट्रीटमेंट के लिए आप पहले हमें अपनी प्रॉब्लम व्हाट्सप्प कर दीजिये समय मिलते ही आपको जवाब दिया जायेगा...
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शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर
आयुर्वेदिक डॉ रोहित गुप्ता
TRN LIVE : 🟣🟣🟣🟣🟣🟣
♦️VITAMIN B 12♦️
विटामिन B12 क्या है, शरीर में इसका महत्व, शाकाहारी स्रोत और दुर्लभ तथ्य
विटामिन B12 को “नसों और रक्त का रक्षक” कहा जाए तो गलत नहीं होगा। आज के समय में थकान, चक्कर, याददाश्त कमजोर होना और झनझनाहट जैसी समस्याओं के पीछे अक्सर एक ही कारण छिपा होता है— विटामिन B12 की कमी। चौंकाने वाली बात यह है कि भारत में शाकाहारी आबादी में इसकी कमी सबसे अधिक पाई जाती है।
♦️विटामिन B12 क्या है?♦️
विटामिन B12 एक वॉटर-सॉल्युबल विटामिन है, जिसे कोबालामिन भी कहा जाता है। यह शरीर में खुद नहीं बनता, बल्कि भोजन या सप्लीमेंट से ही मिलता है। यह डीएनए निर्माण, रेड ब्लड सेल्स बनने और नर्व सिस्टम के सही काम के लिए अनिवार्य है।
शरीर में विटामिन B12 का महत्व
B12 सिर्फ खून के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे नर्वस सिस्टम के लिए जीवनरेखा है।
यह नसों की मायलिन शीथ को सुरक्षित रखता है
मस्तिष्क को ऑक्सीजन पहुंचाने वाले RBCs के निर्माण में मदद करता है
हार्मोन संतुलन और मूड स्टेबिलिटी में योगदान देता है
थकान, डिप्रेशन और ब्रेन फॉग को कम करता है
आयुर्वेद में इसे मज्जा धातु पोषक तत्व के रूप में देखा जाता है।
विटामिन B12 की कमी से क्या होता है?
कमी धीरे-धीरे शरीर को अंदर से कमजोर करती है।
लगातार थकान और कमजोरी
हाथ-पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन
याददाश्त कमजोर होना
चक्कर आना, सांस फूलना
जीभ में जलन और मुंह के छाले
लंबे समय तक कमी रहने पर नसों को स्थायी नुकसान भी हो सकता है।
♦️♦️♦️♦️♦️♦️
शाकाहारी लोगों के लिए विटामिन B12 के स्रोत
यह सच है कि B12 मुख्यतः एनिमल फूड्स में पाया जाता है, लेकिन कुछ शाकाहारी विकल्प भी उपलब्ध हैं
दूध और दही सीमित मात्रा में
पनीर और चीज़
फोर्टिफाइड अनाज और सोया मिल्क
मक्खन (सीमित मात्रा)
फोर्टिफाइड न्यूट्रिशनल यीस्ट
♦️ ध्यान दें♦️
सब्जियों में प्राकृतिक रूप से B12 लगभग नहीं होता।
रोज़ कितनी मात्रा चाहिए?
वयस्क व्यक्ति को औसतन 2.4 माइक्रोग्राम प्रतिदिन विटामिन B12 की आवश्यकता होती है।
गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को थोड़ी अधिक मात्रा चाहिए।
♦️आयुर्वेदिक दृष्टिकोण♦️
आयुर्वेद के अनुसार B12 की कमी अग्नि मंदता और धातु क्षय से जुड़ी होती है।
सही पाचन, गुनगुना दूध, और समय पर भोजन B12 के अवशोषण में मदद करता है।
दुर्लभ लेकिन सत्य तथ्य (Rare but True Facts)
🔹शरीर B12 को 5–7 साल तक स्टोर कर सकता है
🔹 B12 की कमी से डिप्रेशन और एंग्जायटी भी हो सकती है
🔹 सिर्फ खाने से नहीं, एब्जॉर्प्शन प्रॉब्लम से भी कमी होती है
🔹 उम्र बढ़ने के साथ B12 का अवशोषण कम हो जाता है
🔹 एसिडिटी की दवाएं लंबे समय तक लेने से B12 घट सकता है
♦️समाधान क्या है?♦️
शाकाहारी लोग नियमित रूप से फोर्टिफाइड फूड लें
फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ (Fortified Foods) वे होते हैं जिनमें विटामिन और खनिज जैसे पोषक तत्व मिलाए जाते हैं, ताकि उनका पोषण मूल्य बढ़ जाए और लोगों में पोषक तत्वों की कमी (जैसे आयरन, विटामिन डी) को पूरा किया जा सके. ये भोजन में स्वाभाविक रूप से कम या अनुपस्थित पोषक तत्वों को जोड़ने या उन्हें फिर से जोड़ने की प्रक्रिया है, जिससे समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है।।
जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लें
पाचन को मजबूत रखें
अत्यधिक चाय-कॉफी से बचें
♦️निष्कर्ष♦️
विटामिन B12 की कमी को नजरअंदाज करना भविष्य की बड़ी बीमारियों को न्योता देना है। समय पर जांच, सही आहार और जागरूकता से इस समस्या से आसानी से बचा जा सकता है।
अगर आप भी सालों से सब तरह की पैथी अलग अलग डॉक्टर का इलाज करा करा कर निराश हो चुके हो फीस भरते भरते थक चुके हो और समय के साथ बीमारी ठीक होने की बजाय बढ़ रही हो और आपकी दवाई बंद ही नहीं हो रही हो और छोटी छोटी समस्या ला इलाज हो चुकी हो
तब आपको सही डॉ और सही ट्रीटमेंट की आवश्यकता है वो आपको मिलेगा शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर में।।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
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सभी सुखी और निरोगी रहे
शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर
TRNDKB : बलगम, कफ और अस्थमा छूमंतर करने का रामबाण नुस्खा ।।
बलगम एक बहुत बुरी व्याधि हैं, इसकी वजह से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सफ़ेद बाल आदि रोग झेलने पड़ते हैं। थोड़ा सा सर्दी खांसी ज़ुकाम होने के बाद बलगम बहुत आने लगती हैं, कभी कभी तो ये इतनी होती हैं के बोलते बोलते मुंह में ही आ जाती हैं। ऐसे में ये घरेलु उपाय थोड़े दिन में ही बलगम से मुक्ति दिला देगा। ये प्रयोग बलगम रेशा को दूर कर खांसी
ज़ुकाम, अस्थमा, साइनस, ब्रोंकाइटिस, कब्ज आदि सब बीमारियो में रामबाण की तरह हैं। और ये हर उम्र के रोगी के लिए उपयोगी हैं।
♦️नुस्खे की जरूरी सामग्री♦️
मेथी दाना 10 ग्राम
काली मिर्च 15 ग्राम
बुरा शक्कर 50 ग्राम
बादाम गिरी 100 ग्राम.
♦️नुस्खा बनाने की विधि ♦️
इन सब पदार्थो को अलग अलग पीसकर एक साथ मिला लीजिये। हर रोज़ रात को गर्म दूध के साथ (दूध अगर देशी गाय का हो तो बेस्ट है) एक चम्मच इस मिश्रण का सेवन करे।
इससे बलगम, रेशा, खांसी, ज़ुकाम, साइनस, ब्रोंकाइटिस, कब्ज आदि में बहुत लाभ होता हैं।
ज़रुरतानुसार 1 से 3 महीने तक लीजिये। सर्दियों में तो ये नित्य लेने से अत्यंत लाभ होता हैं। गर्मियों में अगर सेवन से गर्मी महसूस हो तो इसकी मात्रा आधी लीजिये।
♦️ फीडबैक ♦️
रोगी का नाम = सुनीता सिंह
एड्रेस = नाम = सुनीता सिंह
सिटी = भटगांव
जिला = सूरजपुर
पिन कोड = 497235
राज्य = छत्तीसगढ़
प्रॉब्लम = सर सांस फूलता है तो' भास लेती हूं तो,, कफ ज्यादा निकलता है और शरीर में कमजोरी लगता है, पूरा शरीर दर्द देता है, और घूटना में बहुत दर्द होता है , जिसके कारण में चल नहीं पाती हूं और ना खड़ी हो पाती हूं'' और गैस होता है ज्यादा, और जो दवाई का फोटो भेजी हूं उसको भी दे दीजिएगा धन्यवाद''
सांस फूलता है तो 'भाप लेती हूं तो कफ ज्यादा निकलता है और शरीर में कमजोरी लगता है 'पूरा शरीर दर्द देते रहता है : खड़ी नहीं हो पाती हूं ,ना चल पाती है
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️
शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर द्वारा ट्रीटमेंट द्वारा रिजल्ट्स =100%
60 डेज ट्रीटमेंट लेने के बाद रोगी 90% से ज्यादा ठीक हो चुका है।।
इनका रिजल्ट्स इनके द्वारा आप वीडियो में देख सकते हो
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
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सभी सुखी और निरोगी रहे
शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर
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♦️थायराइड ♦️
थायरॉइड क्या है, इसकी समस्याएँ और इन्हें ठीक करने की आयुर्वेदिक उपाय
आज भारत में हर चौथे व्यक्ति को किसी न किसी रूप में थायरॉइड असंतुलन की समस्या है—चाहे वह हाइपोथायरॉइड हो, हाइपरथायरॉइड, या थायरॉइड-संबंधी सूजन। विशेषज्ञों का मानना है कि जीवनशैली, तनाव, अनियमित नींद और आयोडीन-असंतुलित आहार इस समस्या को तेजी से बढ़ा रहे हैं। पर अच्छी खबर है आयुर्वेद में थायरॉइड को संतुलित करने वाली कुछ प्रमाणित, समय-परीक्षित और वैज्ञानिक रूप से समर्थित जड़ी-बूटियाँ मौजूद हैं, जिन्हें सही तरीके से इस्तेमाल करने पर बेहतर परिणाम मिलते हैं।
♦️थायरॉइड क्या है?♦️
गले के सामने स्थित तितली के आकार का ग्रंथि—थायरॉइड—हमारी पूरी बॉडी की मेटाबॉलिक स्पीड, ऊर्जा, हार्मोन संतुलन, दिल की धड़कन, वजन, मूड और गर्मी-ठंड सहने की क्षमता को नियंत्रित करता है।
यह दो प्रमुख हॉर्मोन बनाता है:
T3 (Tri-iodothyronine)
T4 (Thyroxine)
जब ये कम बनें—तो Hypothyroid
जब ज्यादा बनें—तो Hyperthyroid
♦️थायरॉइड के प्रमुख लक्षण♦️
हाइपोथायरॉइड (हार्मोन कम होने पर)
• थकान, कमजोरी
• वजन बढ़ना
• ठंड ज़्यादा लगना
• बाल झड़ना
• कब्ज
• त्वचा शुष्क होना
• मूड डाउन होना
♦️♦️ हाइपरथायरॉइड (हार्मोन बढ़ने पर)
• धड़कन तेज
• वजन कम होना
• भूख बढ़ना
• हाथ कांपना
• न नींद आना
• अत्यधिक पसीना
थायरॉइड को संतुलित करने के साबित और तथ्य-आधारित आयुर्वेदिक उपाय
नीचे दिए गए सभी उपाय आयुर्वेदिक ग्रंथों तथा आधुनिक फिटो-न्यूट्रिशन अध्ययनों में प्रमाणित फायदे दिखाते हैं।
♦️1 कंचनार गुग्गुल ♦️
थायरॉइड ग्लैंड को डिटॉक्स करने की सबसे प्रभावी औषधि
कंचनार की छाल और गुग्गुल का संयोग थायरॉइड की सूजन, Hypothyroid Nodules और गले के टॉक्सिन निकालने में वैज्ञानिक रूप से प्रभावी माना गया है।
कैसे लें
डाइटिशियन/वैद्य की सलाह से—2 टैबलेट × 2 बार भोजन बाद।
♦️2 अश्वगंधा ♦️
T4 को T3 में बदलने में मददगार
आधुनिक शोधों में साबित हुआ कि अश्वगंधा थायरॉइड-हार्मोन के कन्वर्शन को सुधारती है और Stress-Axis पर काम कर के हार्मोन संतुलन लाती है।
कैसे लें
500 mg रात को गर्म दूध के साथ।
♦️3 वरुणादि काढ़ा ♦️
मेटाबॉलिज्म सुधारने वाला प्राचीन नुस्खा
यह काढ़ा थायरॉइड को नियंत्रित करने में मदद करता है, खासकर जब साथ में कब्ज या गैस की समस्या भी हो।
कैसे लें
20 ml काढ़ा + 20 ml पानी, दिन में 2 बार।
♦️4 समुद्री सिवार ♦️(Sea Kelp) प्राकृतिक आयोडीन स्रोत
Hypothyroid के लिए आवश्यक आयोडीन की प्राकृतिक, सुरक्षित आपूर्ति करता है।
कब न लें
Hyperthyroid मरीज बिल्कुल न लें।
♦️5 कोलियस फोर्स्कोली♦️ (Pashanbheda Vriksha का अर्क)
वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया कि यह थायरॉइड के TSH स्तर को संतुलित करने में मदद कर सकता है।
कैसे लें
वैद्य की सलाह से 150–300 mg/day।
6♦️ हल्दी + काली मिर्च ♦️
सूजन व हार्मोनल इंफ्लेमेशन को घटाने वाली जोड़ी
यह संयोजन थायरॉइड ग्रंथि में होने वाली सूजन (Thyroiditis) को कम करता है।
कैसे लें
सुबह खाली पेट 1/4 चम्मच हल्दी + एक चुटकी काली मिर्च गुनगुने पानी से।
7♦️ नारियल तेल♦️ (Virgin Coconut Oil)
इसमें मौजूद मीडियम-चेन फैटी एसिड (MCFA) Hypothyroid में ऊर्जा और मेटाबॉलिक रेट सुधारते हैं।
कैसे लें
1 चम्मच सुबह; खाना पकाने में भी उपयोग।
थायरॉइड ठीक करने के 5 लाइफ़स्टाइल नियम (तथ्य-आधारित)
रात 11 बजे से पहले सोएं थायरॉइड हार्मोन रात में रिले होते हैं।
चीनी, मैदा और डीप-फ्राइड चीजें कम करें – ये हार्मोन असंतुलन बढ़ाते हैं।
धूप 15 मिनट रोज लें
Vitamin D सीधे थायरॉइड फंक्शन से जुड़ा है।
पानी पर्याप्त पिएं – निर्जलीकरण से T3/T4 कन्वर्शन कम होता है।
Stress-Management करें – प्राणायाम थायरॉइड नाड़ी को स्थिर करता है।
🟣 सार🟣
थायरॉइड कोई डरने वाली बीमारी नहीं—बल्कि एक संतुलन का विज्ञान है। आयुर्वेद गले की इस छोटी-सी ग्रंथि को स्वस्थ रखने के लिए बेहद शक्तिशाली, प्रमाणित और प्राकृतिक समाधान देता है। बस नियमितता, सही आहार और तनाव-नियंत्रण की आदत इसे पूरी तरह संतुलित कर सकती है।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
किसी भी जानकारी के लिए या ट्रीटमेंट के लिए आप पहले हमें अपनी प्रॉब्लम व्हाट्सप्प कर दीजिये समय मिलते ही आपको जवाब दिया जायेगा...
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शिवाय आयुर्वेदिक सेंटर
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♦️साइटिका पेन
♦️SCIATICA
सबसे आम समस्या जो लोगो में डॉक्टर्स को देखने को मिलती है वो है सियाटिका
साइटिका (sciatica) नाडी, जिसका उपरी सिरा लगभग 1 इंच मोटा होता है, प्रत्येक नितंब के नीचे से शुरू होकर टाँग के पिछले भाग से गुजरती हुई पाँव की एडी पेर ख़त्म होती है| इस नाडी का नाम इंग्लीश में साइटिका नर्व है| इसी नाडी में जब सूजन ओर दर्द के कारण पीड़ा होती है तो इसे वात शूल अथवा साइटिका का दर्द कहते है...
इस रोग का आरंभ अचानक ओर तेज दर्द के साथ होता है| 30 से 40 साल की उम्र के लोगो में ये समस्या आम होती है |साइटिका का दर्द एक समय मे सिर्फ़ एक ही टाँग मे होता है| सर्दियों के दिनो में ये दर्द और भी बढ़ जाता है |रोगी को चलने मे कठिनाई होती है| रोगी जब सोता या बैठता है तो टाँग की पूरी नस खींच जाती है ओर बहुत तकलीफ़ होती है|
♦️इसके कई कारण हो सकते है
जैसे सर्दी लगने(कोल्ड स्ट्रोक), अधिक चलने से, मलावरोध (शोच न होना),स्त्रियॉं में गर्भ की अवस्था,या गर्भाशय का अर्बुद (Tumour),तथा मेरुदंड (spine) की विकृतियाँ, आदि से, किसी तंत्रिका या तंत्रिका मूलों (नर्व रूट) पर पड़ने वाले दबाव से उत्पन्न होता है। कभी-कभी यह नसों की सूजन (तंत्रिकाशोथ Neuritis) से भी होता है।
♦️सियाटिका का इलाज..
How to cure sciatica?
♦️सामग्री..
4 लहसुन की कलियाँ 200 ml दूध
♦️तैयार करने की विधि ♦️
लहसुन को काट कर दूध में डाल दें | दूध को कुछ मिनट तक उबालें | उबालने के बाद इसे मीठा करने के लिए थोडा शहद मिला लें | इस दूध का रोजाना सेवन करें जब तक दर्द खत्म न हो जाये.....
♦️♦️♦️♦️♦️
साइटिका का दर्द
गृध्रसी दर्द
Sciatica
साइटिका का दर्द, यह दर्द कूल्हे से एड़ी तक खींचता हुआ लगता है।
घी, मैदा लकड़ी, आमा हल्दी, मिश्री सब चीजें 10 ग्राम। ये पंसारी के मिलती है। इनको पीसकर दूध और पानी (दोनों चीजें ढाई सौ ग्राम) में उबालें। पानी जल जाने पर छानकर गरम-गरम पीए और कुछ ओढ़ कर लेट जाए। पसीना आने पर अंदर ही अंदर पोछतें रहे, हवा बिल्कुल ना लगने दे। यह उपाय दिन में तीन बार करें और खाए कुछ भी नहीं। 4 दिन में साइटिका में आराम आ जाएगा।
साइटिका का दर्द होने पर एरण्ड के बीज की 5 मिंगी, दूध में पीस कर पीने से लाभ होता है। यह उपाय कमर दर्द में भी उपयोगी है।
15 ग्राम और एक चम्मच नमक ले और दोनों को 1 किलो पानी में तेज उबाले। इसमें एक कपड़ा भिगोकर दर्द वाले स्थान पर सेक करें। इस प्रकार रोज दो बार करें। लगभग 15 दिन में साइटिका का दर्द ठीक हो जाएगा।
साइटिका के दर्द में एक चम्मच अदरक के रस में आधा चम्मच घी मिलाकर पीना चाहिए। यह उपाय वात और कमर व जाँघ के दर्द में भी लाभप्रद है।
आयुर्वेदिक चिकित्सा
आप हमारे द्वारा बनाई गयी साइटिका की मेडिसिन का इस्तेमाल करके इस प्रॉब्लम को जड़ से ठीक क़र सकते हो मात्र 16 दिन का कोर्स है...
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
किसी भी जानकारी के लिए या ट्रीटमेंट के लिए आप पहले हमें अपनी प्रॉब्लम व्हाट्सप्प कर दीजिये समय मिलते ही आपको जवाब दिया जायेगा...
सभी सुखी और निरोगी रहे
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TRNDKB : ♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️
समय से जागो बीमारी के बढ़ने से पहले ।।
किडनी चुपचाप खराब होती है… और पता तब चलता है जब देर हो जाती है
♦️क्या आप जानते हैं?♦️
डायबिटीज और हाई BP में किडनी सबसे पहले असर में आती है
शुरुआत में कोई दर्द, कोई लक्षण नहीं
और नुकसान धीरे-धीरे बढ़ता रहता है
यही वजह है कि Kidney Function Test (KFT) बेहद ज़रूरी है
♦️KFT क्या बताता है?♦️
किडनी खून को ठीक से फ़िल्टर कर रही है या नहीं
शरीर से ज़हरीले वेस्ट सही से निकल रहे हैं या नहीं
दवाएँ किडनी पर असर तो नहीं डाल रहीं
KFT में क्या-क्या शामिल होता है?
Serum Creatinine
Blood Urea (BUN)
eGFR
Sodium–Potassium
Urine Albumin / Protein
♦️♦️
KFT कौन जरूर कराए?
डायबिटीज वाले
हाई BP वाले
लंबे समय से दवाएँ लेने वाले
पैरों/चेहरे में सूजन, थकान, पेशाब की समस्या वाले
♦️सलाह♦️
हर 3–6 महीने में KFT
और साथ में HbA1c ज़रूर कराएँ
♦️याद रखिए ♦️
अगर कई सालों के बाद में
शुगर कंट्रोल हो जाए, BP ठीक हो जाए…
लेकिन किडनी बिगड़ गई तो सब बेकार!
आज जांच कराइए, कल पछतावे से बचिए।
Medical Disclaimer
यह पोस्ट केवल जागरूकता के लिए है। जांच और इलाज डॉक्टर की सलाह से ही कराएँ।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
किसी भी जानकारी के लिए या ट्रीटमेंट के लिए आप पहले हमें अपनी प्रॉब्लम व्हाट्सप्प कर दीजिये समय मिलते ही आपको जवाब दिया जायेगा...
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TRNDKB : चार मगज़’ एक आयुर्वेदिक संज्ञा है जिसका अर्थ है – चार प्रकार के बीजों का मिश्रण। ये बीज हैं
♦️तरबूज़ के बीज (Watermelon Seeds)
♦️कद्दू के बीज (Pumpkin Seeds)
♦️ककड़ी के बीज (Cucumber Seeds)
♦️खरबूज़े के बीज (Musk Melon Seeds)
इन सभी बीजों का गूदा (Magaz) निकालकर सुखाया जाता है और फिर इन्हें पीसकर या साबुत इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में इन्हें मस्तिष्क, हृदय, तंत्रिका तंत्र, और प्रजनन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है।
♦️आयुर्वेदिक दृष्टिकोण♦️
चार मगज़ को आयुर्वेद में "बुद्धि वर्धक", "बल्य", "वीर्य वर्धक" और "रसायन" श्रेणी में रखा गया है। यह शरीर के तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करता है और विशेषकर धातुओं की पुष्टि में सहायक है।
♦️गुणधर्म (Properties)♦️
रस = मधुर
गुण =स्निग्ध, गुरु
वीर्य = शीतल
विपाक = मधुर
दोष प्रभाव = वात-पित्त शामक
चार मगज़ के जबरदस्त फायदे (Benefits of Char Magaz)
1 दिमाग और याददाश्त के लिए अमृत
चार मगज़ मस्तिष्क की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।
उपयोग
1 चम्मच चार मगज़ पाउडर + शहद या दूध सुबह लें।
लाभ
याददाश्त तेज होती है, चिंता और तनाव घटते हैं।
2 शारीरिक दुर्बलता में बलवर्धक टॉनिक
यह शरीर में ऊर्जा व मांसपेशियों की मजबूती देता है।
उपयोग
चार मगज़, बादाम, खजूर और मिश्री को मिलाकर पाउडर बनाएं और रोज़ लें।
3 हृदय स्वास्थ्य में सहायक
बीजों में मौजूद फैटी एसिड्स हृदय को मजबूत रखते हैं।
उपयोग: चार मगज़ का दूध या गाढ़ा शरबत गर्मी में पिएं।
4 पाचन सुधारक और भूख बढ़ाने वाला
उपयोग
भोजन से पहले थोड़ा चार मगज़ चूर्ण + सौंफ लें।
लाभ
पाचन ठीक होता है, गैस व अपच से राहत मिलती है।
5 प्रजनन क्षमता और वीर्य वर्धन
पुरुषों के लिए यह एक उत्कृष्ट टॉनिक है।
उपयोग
चार मगज़, कौंच बीज और अश्वगंधा मिलाकर दूध में उबालकर लें।
6 त्वचा और बालों के लिए पोषक
चार मगज़ में मौजूद जिंक, विटामिन E और प्रोटीन त्वचा को नमी और बालों को मजबूती देते हैं।
उपयोग
फेस पैक में मिलाकर या तेल में डालकर इस्तेमाल करें।
7 नींद ना आने की समस्या में फायदेमंद
उपयोग
चार मगज़ पाउडर + गर्म दूध सोने से पहले लें।
लाभ
तंत्रिका तंत्र को शांत करता है, नींद में सुधार होता है।
घरेलू नुस्खे (Home Remedies with Char Magaz)
1 बच्चों की बुद्धि बढ़ाने के लिए
चार मगज़ + बादाम + मिश्री मिलाकर हर सुबह 1 चम्मच दें।
2 गर्मी में शीतलता और ताजगी के लिए
चार मगज़ का शरबत बनाकर दोपहर में पिएं — शरीर ठंडा और ऊर्जावान रहेगा।
3 पुरुषों की कमजोरी में
चार मगज़ + शुद्ध शिलाजीत + दूध के साथ लें — वीर्य की मात्रा व गुणवत्ता सुधरती है।
4 त्वचा की नमी के लिए
चार मगज़ का पेस्ट + दूध + हल्दी मिलाकर फेस पैक की तरह लगाएं।
5 स्मरणशक्ति के लिए
1 चम्मच चार मगज़ पाउडर + ब्राह्मी अर्क के साथ लें।
पोषक तत्व (Nutritional Value)
♦️प्रोटीन♦️
हेल्दी फैट्स (Omega 3, 6)
जिंक
मैग्नीशियम
आयरन
विटामिन E और B-कॉम्प्लेक्स
यह सारे तत्व मस्तिष्क, हड्डी, त्वचा, और यौन स्वास्थ्य के लिए रामबाण हैं।
कब और कैसे लें? (Best Time & Way to Use)
♦️समय मात्रा विधि♦️
सुबह खाली पेट 1 चम्मच दूध/शहद के साथ
रात को सोने से पहले 1 चम्मच गुनगुने दूध के साथ
गर्मी में दोपहर 1 गिलास चार मगज़ का शरबत
♦️ सावधानियाँ♦️
(Precautions)
अधिक मात्रा में सेवन से अपच या भारीपन हो सकता है।
डायबिटिक मरीज़ शहद या मिश्री के बिना लें।
हमेशा शुद्ध, बिना नमक वाले बीजों का उपयोग करें।
बीजों को अच्छी तरह सुखाकर ही स्टोर करें।
आयुर्वेद कहता है
"मगजं चतुर्विधं बल्यं, स्मृतिवर्धनमुत्तमम्।
शीतलं हृद्यशमकं, वातपित्तविनाशनम्॥"
अर्थ: चार मगज़ बलवर्धक, स्मरणशक्ति बढ़ाने वाला, शीतल, हृदय को ताजगी देने वाला और वात-पित्त नाशक है।
♦️निष्कर्ष♦️
चार मगज़ कोई साधारण बीजों का मिश्रण नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण आयुर्वेदिक टॉनिक है — जो बुद्धि, बल, सौंदर्य और प्रजनन सभी क्षेत्रों में चमत्कारी लाभ देता है। यदि आप मानसिक थकावट, कमजोरी या त्वचा-बाल की समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो चार मगज़ को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
अगर आप भी सालों से सब तरह की पैथी अलग अलग डॉक्टर का इलाज करा करा कर निराश हो चुके हो फीस भरते भरते थक चुके हो और समय के साथ बीमारी ठीक होने की बजाय बढ़ रही हो और आपकी दवाई बंद ही नहीं हो रही हो और छोटी छोटी समस्या ला इलाज हो चुकी हो।
इसका संयोग से एक छोटा सा योग भी बना सकते हैं जो बहुत ही फायदेमंद है।
चारों मगज 100 -100 ग्राम
छोटी इलायची 20 ग्राम
खसखस 30 ग्राम
अनारदाना 50 ग्राम
अलसी 80 ग्राम
छुहारा बीज रहित 50 ग्राम
सभी को बारीक पीसकर देसी घी में भून लेना है उसके पश्चात एलोवेरा का मीठा जेल लेकर करीब डेढ़ किलो स्वाद अनुसार देसी खांड मिलकर मंद अग्नि पर हलवे की तरह बनाकर किसी कांच के पात्र में सुरक्षित रख लें।
यह हलवा 6 महीने तक खराब नहीं होता है।
इसे #मगज़घीक्वार #हलवा कहते हैं।।।।
: 🟣 पाइल्स 🟣
बवासीर या पाइल्स को मेडिकल भाषा में हेमरॉइड्स के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें ऐनस के अंदरूनी और बाहरी क्षेत्र और रेक्टम के निचले हिस्से की शिराओं में सूजन आ जाती है।
♦️पेट में दर्द♦️
इसकी वजह से ऐनस के अंदर और बाहर या किसी एक जगह मस्से जैसी स्थिति बन जाती है, जो कभी अंदर रहते हैं और कभी बाहर भी आ जाते हैं। करीब 70 फीसदी लोगों को अपने जीवन में किसी न किसी वक्त पाइल्स की समस्या रही है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ पाइल्स की समस्या बढ़ सकती है। अगर परिवार में किसी को यह समस्या रही है तो इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। आनुवांशिक समस्या है।
♦️कारण♦️
बवासीर होने का प्रमुख कारण है लम्बे समय तक कठोर कब्ज बना रहना।
सुबह-शाम शौच न जाने या शौच जाने पर ठीक से पेट साफ न होना।
शौच के समय जोर लगाना
टॉयलेट में काफी देर तक बैठना
हेरिडिटि (वन्शानुगत कारण)
डायरिया की समस्या।
भोजन में पोषक तत्तवों की कमी के कारण।
अधिक तला या मसालेदार भोजन खाने से।
अत्यधिक दवाओं के सेवन से।
ओवरवेट होने के कारण विशेषकर पेट व श्रोणी पर ज्यादा वजन पड़ता है जिससे श्रोणी के नसों पर दबाव बढ़ जाता है।
प्रसव के दौरान बवासीर होने का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि एनस क्षेत्र पर ज्यादा दबाव पड़ता है।
ज्यादा दिनों तक हृदय व लीवर से संबंधित बीमारी होने से बवासीर का खतरा हो सकता है।
♦️लक्षण♦️
आमतौर पर पाइल्स बहुत ज्यादा गंभीर नहीं होते और तीन-चार दिन में अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। कई बार तो लोगों को पता भी नहीं चलता कि उन्हें पाइल्स हैं। वैसे पाइल्स के यह लक्षण हो सकते हैं
ऐनस के इर्द-गिर्द एक कठोर गांठ जैसी महसूस हो सकती है। इसमें ब्लड हो सकता है, जिसकी वजह से इनमें काफी दर्द होता है।
टॉयलेट के बाद भी ऐसा महसूस होना कि पेट साफ नहीं हुआ है।
शौच के वक्त लाल चमकदार रक्त का आना।
शौच के वक्त म्यूकस का आना
और दर्द का अहसास होना।
ऐनस के आसपास खुजली होना और उस क्षेत्र का लाल और सूजन आ जाना।
बवासीर रोग जिसे पाइल्स भी कहा जाता है आमतौर पर यह रोग गुदा या मलाशय में मौजूद 'वेरिकोज वेन्स' रोग होता है। बवासीर मलाशय के अंदरूनी हिस्से या गुदा के बाहरी हिस्सो में भी हो सकता है।
यह मल त्याग के दौरान अधिक ज़ोर लगाने के कारण या गर्भावस्था के दौरान गुदा की नसों में दबाव के कारण हो सकता है।
बवासीर की समस्या होने पर कई प्रकार के लक्षण देखे जा सकते है।
1 दर्दनाक मल त्याग जिससे मलाशय या गुदा को चोट पहुंच सकती है।
2 मल त्याग के दौरान ब्लीडिंग होना।
3 गुदा से एक बलगम जैसा स्त्राव होना।
4 गुदा के पास एक दर्दनाक सूजन या गांठ या मस्से का होना।
5 गुदा क्षेत्र में खुजली,जो लगातार या रुक रुक कर हो सकती है।
पाइल्स के इन लक्षणों को बिल्कुल भी अनदेखा न करे।
क्योंकि यह लक्षण आगे चलकर गंभीर समस्याए पैदा कर सकते है।
यदि आप या कोई आपका अपना इस रोग से ग्रसित है तो आप हमसे संपर्क करे।
अगर आपको किसी बीमारी का इलाज करवाना हो तो आप बीमारी के बारे में बताकर या परेशानी के बारे मे बता कर आयुर्वेदिक औषधियां मंगवा सकते हैं।..
किसी भी जानकारी के लिए या ट्रीटमेंट के लिए आप पहले हमें अपनी प्रॉब्लम व्हाट्सप्प कर दीजिये समय मिलते ही आपको जवाब दिया जायेगा...
सभी सुखी और निरोगी रहे
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वैद्य रोहित गुप्ता
: बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) कम करने का देसी घरेलू फार्मूला
♦️सामग्री♦️
लहसुन – 100 ग्राम
मेथी दाना – 100 ग्राम
अलसी (फ्लैक्ससीड) – 100 ग्राम
अर्जुन की छाल – 50 ग्राम
आंवला सूखा – 100 ग्राम
हल्दी – 50 ग्राम
♦️बनाने की विधि♦️
सभी सामग्री को साफ करके 1 दिन धूप में सुखा लें
फिर सभी चीजों को अलग-अलग हल्का भून लें (बिना जलाए)
अब सबको मिलाकर बारीक पाउडर बना लें
तैयार पाउडर को कांच के जार में सुरक्षित रखें
♦️सेवन / उपयोग विधि♦️
सुबह खाली पेट 1 चम्मच पाउडर गुनगुने पानी के साथ
रात को भोजन के बाद 1 चम्मच गुनगुने पानी के साथ
नियमित सेवन करें
संभावित लाभ
बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक
हार्ट ब्लॉकेज के खतरा को कम करने में मदद
रक्त संचार बेहतर करता है
शरीर की चर्बी घटाने में सहायक
आवश्यक सूचना
यह घरेलू रेमेडी सहायक उपाय है
हृदय रोगी डॉक्टर की सलाह से ही सेवन करें
एलोपैथिक दवा बिना पूछे बंद न करें
बीपी और शुगर वाले सावधानी रखें
नियमित जांच जरूरी है
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