PAK की करीबी जमात ए इस्लामी चुनाव क्यों हारी? बांग्लादेश में हिंदुओं ने किसे किया वोट, पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट
बांग्लादेश के आम चुनाव में तारिक रहमान की BNP को बंपर जीत मिली है. बीएनपी अब बांग्लादेश में सरकार बनाने जा रही है और तारिक रहमान बांग्लादेश के अगले प्रधानमंत्री होंगे, लेकिन शफीकुर रहमान की अगुवाई वाला जमात ए इस्लामी गठबंधन बहुत पीछे रह गया है.
जमात ए इस्लामी बांग्लादेश में चुनाव हार गई है. जमात गठबंधन के खाते में 70 के आस-पास सीटें आती दिखाई दे रही हैं. पाकिस्तान की करीबी मानी जाने वाली जमात ए इस्लामी की करारी हार के पीछे कहीं ना कहीं उसकी कट्टर सोच ही ज़िम्मेदार है. जमात ए इस्लामी बांग्लादेश का वही राजनीतिक दल है, जिसने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी का विरोध किया था.
पाक परस्त है जमात ए इस्लामी
जमात ए इस्लामी वही पार्टी है, जिस पर शेख हसीना कई बार कट्टरता फैलाने के आरोप में प्रतिबंध लगा चुकी हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िरकार 90% मुस्लिम आबादी वाले बांग्लादेश में आख़िरकार जमात कैसे हार गई? वो भी तब जब इस्लामी शासन ही जमात का प्रमुख चुनावी एजेंडा रहा है. बांग्लादेश के चुनाव नतीजों में जमात की हार से यह बात साफ है कि बांग्लादेश की आवाम ने पाकिस्तान परस्त सोच को नकार दिया है. बांग्लादेश की जनता एक बार फिर से पाकिस्तान के प्रभाव को देश में स्थापित नहीं होने देना चाहती थी इसीलिए जमात को चुनाव हरा दिया.
भारत को करीब देखना चाहती है बांग्लादेशी आवाम
बांग्लादेशी जनता हमेशा से भारत को अपने करीब देखना चाहती है, न कि पाकिस्तान को. इसीलिए पाकिस्तान परस्त जमात को जनता ने सत्ता तक नहीं पहुंचने दिया. बांग्लादेश की जनता यह भी जानती है कि जमात पाकिस्तान के एजेंडा को हमेशा आगे बढ़ाती है. यह कहा जा सकता है कि बांग्लादेश के चुनाव नतीजों ने पाकिस्तान के छिपे एजेंडे को भी करारी शिकस्त दी है. बांग्लादेशी युवा और महिला दोनों ही जमात के नियम कायदे और क़ानून से डरे हुए नज़र आ रहे थे. उनके मन में यह डर था कि अगर जमात बांग्लादेश में सरकार बनाने में सफल हुई तो यहां इस्लामिक क़ानून लागू हो जाएंगे.
कुछ महिलाओं ने बताया कि उन्हें भय है कि अगर जमात आती तो उनकी आज़ादी पर कई तरह के प्रतिबंध लग जाते. युवा इस बात से चिंतित था कि जमात उनके विकास को प्रभावित कर सकती है और देश में कट्टरता को और ज़्यादा बढ़ा सकती है. इसीलिए बड़ी संख्या में युवा और महिलाओं ने जमात के ख़िलाफ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को वोट किया.
हिंदू मतदाताओं ने किसे किया वोट
बांग्लादेश के अल्पसंख्यक यानि हिंदू मतदाताओं ने बड़ी संख्या में बीएनपी को वोट किया और जमात को नकार दिया. जमात के कई नेता हिंदूओं की पूजा पाठ पद्धति पर ही सवाल उठाते दिखाई दे रहे थे. ऐसे हालात में हिंदू मतदाताओं में भी जमात को लेकर एक अजीब सा डर देखने को मिल रहा था. यही वजह है कि हिंदू मतदाताओं ने एकजुट होकर तारिक रहमान पर भरोसा जताया. बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगभग 9 फ़ीसदी है.
अवामी लीग की ग़ैर मौजूदगी में शेख हसीना के समर्थकों ने भी बीएनपी को वोट किया, क्योंकि शेख हसीना की पार्टी चुनावी मैदान में नहीं थी. अवामी लीग के समर्थक किसी भी क़ीमत पर जमात ए इस्लामी को चुनाव नहीं जीतने देना चाहते थे. यह कहा जा सकता है कि बीएनपी को समर्थन करने से ज़्यादा जमात के खिलाफ बीएनपी को परिस्थितिजन्य वोट किया है. अवामी लीग के एक बड़े समर्थक ने नाम ना लिखने की शर्त पर बताया कि अगर बीएनपी सरकार बनाती है तो अवामी लीग के लिए भविष्य के रास्ते खुले रहेंगे, जबकि जमात के साथ यह क़तई भी संभव नहीं है, क्योंकि जमात पाकिस्तान परस्त है.
बीएनपी के हिंदू उम्मीदवार जीते
बांग्लादेश के आम चुनाव में जमात ए इस्लामी के कई बड़े नेता अपना चुनाव हार गए. जमात ए इस्लामी के सेकंड इन कमांड माने जाने वाले मियां ग़ुलाम परवार भी अपनी सीट नहीं बचा पाए. खुलना 5 संसदीय सीट से मियां ग़ुलाम परवार बीएनपी के अली लोबी से चुनाव हार गए. ढाका 3 से बीएनपी के हिंदू उम्मीदवार गोयेश्वर चंद्र रॉय ने जमात ए इस्लामी गठबंधन के शाहीनुर इस्लाम को चुनाव हरा दिया. यही नहीं खुलना 1 संसदीय सीट से जमात के हिंदू उम्मीदवार कृष्णा नंदी भी बीएनपी के मुस्लिम उम्मीदवार से चुनाव हार गए. इस सीट पर हिंदू मतदाता अच्छी ख़ासी संख्या में हैं. खुलना 1 में जमात के हिंदू उम्मीदवार के हार का संदेश यही है कि बांग्लादेश के हिंदू मतदाता जमात को वोट नहीं कर सकते हैं.
जमात से गठबंधन के कारण बांग्लादेश की जनता में छात्र आंदोलन से उपजी पार्टी NCP को भी किनारे लगा दिया. एनसीपी के अध्यक्ष नाहिद इस्लाम भले ही अपना चुनाव जीत गए, लेकिन इस पार्टी के कई बड़े चेहरे अपना चुनाव हार गए. एनसीपी के सरजिस इस्लाम भी पंचागढ़ 1 संसदीय सीट से चुनाव हार गए. बांग्लादेश की जनता ने जमात को आईना दिखाया है कि कट्टरता और पाकिस्तान प्रेम की राजनीति देश में स्वीकार नहीं है. जमात का हारना भारत के लिए अच्छी ख़बर है.
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