बांग्लादेश में अभी कितनी है हिंदुओं की आबादी, नई सरकार बनने के बाद इन पर क्या पड़ेगा असर?
12 फरवरी की वोटिंग ने बांग्लादेश की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी मैदान से बाहर है और सत्ता की दौड़ अब नए चेहरों के हाथ में दिख रही है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय को लेकर उठ रहा है कि क्या नई सरकार उनके लिए राहत लेकर आएगी या अनिश्चितता बढ़ेगी? बदलते राजनीतिक माहौल के बीच यह सवाल अब देश और दुनिया दोनों के लिए अहम हो गया है. आइए जान लेते हैं.
क्या चुनाव से बदलेगा सियासी समीकरण
बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव के लिए मतदान हुआ. करीब 12 करोड़ मतदाताओं ने नई सरकार चुनने के लिए अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया. इस बार चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग चुनाव मैदान में नहीं थी. प्रतिबंध के कारण पार्टी हिस्सा नहीं ले सकी.
मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी के बीच माना जा रहा है. बीएनपी का नेतृत्व तारिक रहमान कर रहे हैं, जो लंदन से वापसी के बाद सक्रिय राजनीति में लौटे हैं. चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने प्रशासनिक सुधार और आर्थिक बदलाव का वादा किया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नई सरकार का स्वरूप देश की दिशा तय करेगा.
बांग्लादेश में हिंदुओं की मौजूदा आबादी
2022 की आधिकारिक जनगणना, जो 2023-24 में जारी की गई, उसके अनुसार बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी लगभग 1.31 करोड़ यानी 13.1 मिलियन है. यह देश की कुल आबादी लगभग 16.51 करोड़ का 7.95 प्रतिशत है. मुस्लिम बहुसंख्यक देश में हिंदू दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय हैं.
भारत और नेपाल के बाद बांग्लादेश में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी हिंदू आबादी रहती है. हिंदू समुदाय मुख्य रूप से उत्तरी, दक्षिण-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी इलाकों में केंद्रित है. 1947 के विभाजन के समय पूर्वी बंगाल में हिंदुओं की हिस्सेदारी कहीं ज्यादा थी, लेकिन दशकों में उनका प्रतिशत घटता गया है.
नई सरकार के बाद हिंदुओं का क्या होगा?
राजनीतिक बदलाव के बाद अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है. कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मीडिया रिपोर्टों में यह सामने आया है कि राजनीतिक अस्थिरता के दौर में मंदिरों और घरों पर हमलों की घटनाएं बढ़ीं. कई जगह तोड़फोड़ और डर का माहौल देखने को मिला. आरोप यह भी लगे कि हिंदुओं को पूर्व सरकार के समर्थक ‘वोट बैंक’ के रूप में देखा गया, जिससे वे विरोधी गुटों के निशाने पर आए. हालांकि प्रशासन की ओर से शांति बनाए रखने और दोषियों पर कार्रवाई के दावे भी किए गए हैं.
रिपोर्ट्स बताती हैं कि नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था को मजबूत करना और अल्पसंख्यकों में भरोसा कायम करना होगी. अगर सरकार सख्त कदम उठाती है तो हालात संभल सकते हैं, लेकिन ढिलाई से असुरक्षा की भावना और गहराएगी.
पलायन और भविष्य
पिछले कुछ वर्षों में असुरक्षा और आर्थिक कारणों से हिंदू समुदाय के कुछ हिस्सों में पलायन की प्रवृत्ति देखी गई है. जनसांख्यिकीय आंकड़े बताते हैं कि 1947 के बाद से प्रतिशत में गिरावट लगातार दर्ज की गई है. हालांकि यह गिरावट केवल हालिया घटनाओं से नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक और राजनीतिक बदलावों से जुड़ी रही है. नई सरकार की नीतियां तय करेंगी कि अल्पसंख्यक समुदाय खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है. यदि प्रशासन निष्पक्षता और समान अधिकारों की गारंटी देता है तो स्थिरता संभव है. वहीं अगर कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव बढ़ता है तो दबाव भी बढ़ सकता है.
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