बांग्लादेश की संसद और भारत की संसद में क्या है अंतर, दोनों किस तरह करती हैं काम?

Feb 13, 2026 - 17:01
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बांग्लादेश की संसद और भारत की संसद में क्या है अंतर, दोनों किस तरह करती हैं काम?

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के प्रमुख तारिक रहमान ने देश के 13वें संसदीय चुनाव में अपनी पार्टी को जीत दिलाई है. पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी की नेता बेगम खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान ने 9 जनवरी को, उनके देहांत के कुछ ही समय बाद, आधिकारिक तौर पर पार्टी की कमान अपने हाथ में ली थी.  

भारत और बांग्लादेश दो पड़ोसी देश, दोनों लोकतंत्र, दोनों में संसदीय व्यवस्था. फिर भी संसद की बनावट, चुनाव का तरीका, सीटों का बंटवारा और काम करने की शैली-सब कुछ अलग. एक तरफ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत, जहां दो सदन मिलकर कानून बनाते हैं. दूसरी तरफ बांग्लादेश, जहां एक ही सदन पूरे देश की राजनीति का केंद्र है. ऐसे में सवाल यह है कि दोनों संसदें किस तरह काम करती हैं और उनमें क्या फर्क है.

भारत और बांग्लादेश- एक सदन बनाम दो सदन

भारत की संसद द्विसदनीय है. यहां दो सदन हैं- लोकसभा और राज्यसभा. लोकसभा में अधिकतम 552 सदस्यों का प्रावधान है, लेकिन वर्तमान में 543 सदस्य चुने जाते हैं. राज्यसभा की अधिकतम संख्या 250 है, जिनमें से 238 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से चुने जाते हैं और 12 सदस्यों को राष्ट्रपति नामित करते हैं. 

इसके उलट बांग्लादेश की संसद एकसदनीय है, जिसे ‘जातीय संसद’ कहा जाता है. यहां कुल 350 सदस्य होते हैं. इनमें 300 सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं, जबकि 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं.

यहीं से दोनों देशों की संसदीय संरचना का सबसे बड़ा अंतर साफ दिखने लगता है.

चुनाव और सीटों का गणित

भारत में लोकसभा चुनाव ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ प्रणाली से होते हैं. यानी जिस उम्मीदवार को अपने क्षेत्र में सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वही जीतता है. राज्यसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते, बल्कि राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य उन्हें चुनते हैं.

बांग्लादेश में भी 300 सीटों पर ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ प्रणाली लागू है. लेकिन 50 आरक्षित महिला सीटों का चुनाव सीधे जनता नहीं करती है. आम चुनाव के बाद, संसद में दलों की संख्या के अनुपात में इन सीटों का बंटवारा होता है और पार्टियां अपने प्रतिनिधि चुनती हैं. सरकार बनाने के लिए बांग्लादेश में 300 निर्वाचित सीटों में से कम से कम 151 सीटें जीतना जरूरी है. महिला आरक्षित सीटें सरकार के गठन का आधार नहीं बनतीं, बल्कि बाद में भरी जाती हैं. 

राज्यों की भूमिका में अंतर

भारत एक संघीय व्यवस्था वाला देश है. यहां केंद्र और राज्य दोनों के अपने-अपने अधिकार हैं. हर राज्य में विधानसभा होती है, मुख्यमंत्री होता है और राज्य सरकार अपने दायरे में फैसले लेती है. संसद राष्ट्रीय स्तर के कानून बनाती है, जबकि राज्यों को भी संविधान के तहत कई विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है.

बांग्लादेश में ऐसी संघीय संरचना नहीं है. वहां कोई राज्य सरकार या मुख्यमंत्री नहीं होता है. पूरा प्रशासनिक ढांचा केंद्र के अधीन काम करता है. इसलिए वहां संसद की भूमिका और भी ज्यादा केंद्रीय और प्रभावशाली हो जाती है.

अध्यक्ष और प्रधानमंत्री की भूमिका

भारत में लोकसभा का अध्यक्ष सदन की कार्यवाही चलाता है, जबकि राज्यसभा के सभापति भारत के उपराष्ट्रपति होते हैं. प्रधानमंत्री लोकसभा में बहुमत के आधार पर चुने जाते हैं और वही सरकार के प्रमुख होते हैं.

बांग्लादेश में संसद का अध्यक्ष सांसदों में से चुना जाता है. दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में वही कार्यवाहक राष्ट्रपति की भूमिका भी निभा सकता है. प्रधानमंत्री वहां भी सरकार के प्रमुख होते हैं और संसद में बहुमत के आधार पर सरकार चलाते हैं.

कानून बनाने की प्रक्रिया

भारत में किसी भी कानून को पारित करने के लिए दोनों सदनों से मंजूरी जरूरी होती है (कुछ अपवादों को छोड़कर, जैसे मनी बिल). लोकसभा और राज्यसभा के बीच संतुलन की व्यवस्था बनाई गई है, ताकि जल्दबाजी में कानून न बने.

बांग्लादेश में चूंकि एक ही सदन है, इसलिए कानून पारित करने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सीधी है. बिल संसद में पेश होता है, बहस होती है और बहुमत से पारित हो जाता है.

कार्यकाल 

दोनों देशों में सांसदों का कार्यकाल पांच साल का होता है. भारत में लोकसभा भंग हो सकती है और समय से पहले चुनाव हो सकते हैं. राज्यसभा स्थायी सदन है, जिसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं.

बांग्लादेश की संसद का कार्यकाल भी पांच साल का है और इसे भी भंग किया जा सकता है.

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Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला