मुस्लिमों में जैसे कयामत की रात का जिक्र, क्या हिंदुओं में भी कुछ है ऐसा?
दुनिया का अंत कब होगा? क्या कोई ऐसी रात आएगी जब सब कुछ खत्म हो जाएगा? अलग-अलग धर्मों में इस सवाल का जवाब अपने-अपने तरीके से दिया गया है. इस्लाम में ‘कयामत’ का जिक्र है. हाल ही में सीएम योगी ने एक बयान दिया कि बाबरी ढांचे का दोबारा निर्माण कभी नहीं होगा और कयामत तक भी यह मस्जिद नहीं बन पाएगी. इस बयान के बाद यह चर्चा फिर तेज हुई है कि क्या मुस्लिमों में कयामत की रात की तरह हिंदुओं में कुछ ऐसा होता है? आइए समझें.
कयामत क्या होती है?
इस्लाम में कयामत को आखिरी दिन या अंतिम फैसला कहा जाता है. कुरआन और हदीसों में इसका जिक्र मिलता है, लेकिन इसकी सटीक तारीख या समय किसी को नहीं बताया गया है. माना जाता है कि यह अचानक आएगी और पूरी दुनिया की व्यवस्था खत्म हो जाएगी. सूरज, चांद, धरती-सब कुछ बदल जाएगा. इंसानों के कर्मों का हिसाब होगा और उसी के आधार पर जन्नत या जहन्नम का फैसला होगा.
कुछ हदीसों में यह जरूर कहा गया है कि आखिरी घड़ी शुक्रवार के दिन आएगी, लेकिन यह निश्चित समय नहीं है. कुल मिलाकर इस्लामी मान्यता में कयामत एक अंतिम और एकमात्र घटना है, जिसके बाद दुनिया का मौजूदा रूप खत्म हो जाएगा.
हिंदू धर्म में क्या है समान अवधारणा?
हिंदू धर्म में कयामत जैसा शब्द नहीं है, लेकिन ‘प्रलय’ और ‘महाप्रलय’ की अवधारणा जरूर मिलती है. सनातन परंपरा के अनुसार सृष्टि एक चक्र में चलती है- सृजन, पालन और संहार. जब अधर्म बढ़ जाता है और धर्म कमजोर पड़ जाता है, तब बदलाव आता है.
हिंदू मान्यता के अनुसार चार युग होते हैं- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग. अभी कलियुग चल रहा है. मान्यता है कि कलियुग के अंत में भगवान विष्णु का दसवां अवतार ‘कल्कि’ प्रकट होगा. वह अधर्म का नाश करेंगे और फिर से धर्म की स्थापना होगी. इसके बाद नया युग शुरू होगा. इसे पूर्ण विनाश नहीं, बल्कि परिवर्तन का दौर माना जाता है.
महाप्रलय और कल्प का चक्र
पुराणों और अन्य ग्रंथों में ‘महाप्रलय’ का भी जिक्र मिलता है. यह तब होता है जब एक पूरा ‘कल्प’ समाप्त होता है. कल्प को ब्रह्मा के एक दिन के बराबर माना जाता है, जिसकी अवधि बहुत लंबी बताई गई है. महाप्रलय में पूरी सृष्टि का अंत होता है, लेकिन फिर दोबारा सृजन भी होता है. यानी हिंदू दर्शन में अंत के बाद नई शुरुआत का विचार जुड़ा हुआ है.
समानता और अंतर
दोनों धर्मों में एक बात समान है कि जब अन्याय और पाप बढ़ते हैं, तो अंत या परिवर्तन की घड़ी आती है. दोनों ही मान्यताओं में अच्छे और बुरे कर्मों का महत्व बताया गया है. फर्क यह है कि इस्लाम में कयामत एक अंतिम और निर्णायक दिन है, जबकि हिंदू धर्म में प्रलय एक चक्र का हिस्सा है, जिसके बाद नई सृष्टि होती है.
यह भी पढ़ें: किस रात को माना जाता है कयामत की रात, कब तक आ सकती है यह रात?
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