SIR VS SR: SIR और SR लिस्ट में क्या है अंतर, दोनों में क्या-क्या चीजें होती हैं चेक?
SIR VS SR: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया अभी पूरे भारत के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही है. इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया की इस कोशिश का मकसद यह पक्का करना है कि वोटर रोल सही, ट्रांसपेरेंट और गलतियों से मुक्त हो. इसी बीच आइए जानते हैं कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन और स्पेशल रिवीजन के बीच क्या अंतर है.
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन क्या है
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एक पूरी शुरू से शुरू होने वाली प्रक्रिया है. पुरानी वोटर लिस्ट पर निर्भर रहने के बजाय इलेक्शन कमीशन असल में नए डाटा कलेक्शन के जरिए वोटर रोल को फिर से बनाता है. इस तरीके के तहत बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर सर्वे करते हैं और साथ ही हर घर के लिए नई गिनती के फॉर्म भरते हैं. हर वोटर की डिटेल्स फिर से इकट्ठा की जाती है ताकि समय के साथ जमा हुई गलतियों को खत्म किया जा सके.
यह तरीका आमतौर पर तब अपनाया जाता है जब मौजूदा लिस्ट में बड़ी गड़बड़ी मानी जाती है. साथ ही जब बड़े एडमिनिस्ट्रेटिव या डेमोग्राफिक बदलाव होते हों. उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने ज्यादा से ज्यादा एक्यूरेसी पक्का करने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल किया है.
स्पेशल रिवीजन क्या है
स्पेशल रिवीजन पूरी तरह से रिकंस्ट्रक्शन के बजाय एक अपडेटेड और करेक्शन प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में एडमिनिस्ट्रेशन मौजूदा इलेक्टोरल डेटाबेस पर निर्भर करता है. बूथ लेवल ऑफिसर अपने बूथ एरिया में पहले से रजिस्टर्ड वोटर्स के नाम वाले पहले से भरे हुए वाटर रजिस्टर के साथ काम करते हैं. सभी की दोबारा गिनती करने के बजाय वे डिटेल्स वेरीफाई करते हैं और सिर्फ वहीं बदलाव करते हैं जहां पर गड़बड़ियां पाई जाती हैं.
इस प्रक्रिया का मकसद लिस्ट को पूरी तरह फिर से बनाना नहीं है बल्कि उसे सिर्फ बेहतर और अपडेट करना है. इस तरीके में कम समय लगता है और इसका इस्तेमाल अक्सर तब किया जाता है जब सिर्फ समय-समय पर करेक्शन की जरूरत होती है.
दोनों प्रक्रिया में क्या चेक किए जाते हैं
इन दोनों प्रक्रिया में वोटर लिस्ट की इंटीग्रिटी बनाए रखने के लिए कुछ वेरिफिकेशन चेक जरूरी हैं. पहला कदम यह कंफर्म करना है की वोटर असल में रजिस्टर्ड पते पर रहता है या फिर नहीं. अगर कोई व्यक्ति हमेशा के लिए शिफ्ट हो गया है तो उसका नाम हटाने या ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू की जाती है.
मरे हुए लोगों के नाम पहचानकर हटाए जाते हैं. इससे वाटर रोल का गलत इस्तेमाल रुकता है और फ्रॉड वोटिंग की संभावना कम हो जाती है. इसी के साथ नाम में स्पेलिंग की गलतियां, जेंडर, पिता या पति/पत्नी के नाम की गलतियां या तस्वीरों का मेल ना खाना ठीक किया जाता है. इन बदलावों को आधार कार्ड, बर्थ सर्टिफिकेट या दूसरे ऑफिशियल पहचान के सबूत जैसे डॉक्यूमेंट से वेरीफाई किया जाता है. इस सिस्टम से पक्का होता है कि एक व्यक्ति दो अलग-अलग पोलिंग बूथ या चुनाव क्षेत्र में रजिस्टर्ड ना हो.
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