'मेरी मां ने मुझे यह घर...', ममता बनर्जी के लिए क्यों इतनी खास है भवानीपुर सीट, जानें क्या है इसका इतिहास?

Mar 24, 2026 - 15:50
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'मेरी मां ने मुझे यह घर...', ममता बनर्जी के लिए क्यों इतनी खास है भवानीपुर सीट, जानें क्या है इसका इतिहास?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में कुछ ही निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व भवानीपुर जितना है. इस सीट का चुनावी सफर राज्य में कांग्रेस के प्रभुत्व से लेकर टीएमसी के उदय तक के परिवर्तन को दर्शाता है. ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ माना जाने वाला भवानीपुर हमेशा से टीएमसी का इतना मजबूत गढ़ नहीं था. 

भवानीपुर को लेकर क्या बोलीं ममता
तृणमूल सुप्रीमो और सीएम ममता बनर्जी ने हाल ही में पार्टी बैठक में नेताओं से अलर्ट रहने को कहा है. ममता बनर्जी ने कहा कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है. 3 दिनों में 50 लोगों को हटाया जा चुका है. इसके अलावा उन्होंने कई पार्षदों की भूमिका पर भी नाराजगी जताई. अपने निर्वाचन क्षेत्र भवानीपुर के बारे में बात करते हुए ममता बनर्जी ने कहा, "भवानीपुर में हर कोई मुझे जानता है. घर बदलने की बात होने के बावजूद मैंने भवानीपुर नहीं छोड़ा. मेरी मां ने मुझे यह घर बदलने नहीं दिया.

भवानीपुर विधानसभा सीट का इतिहास
PTI के मुताबिक देश की आजादी के बाद दशकों तक दक्षिण कोलकाता की ये सीट कांग्रेस का गढ़ और राज्य के कुछ सबसे प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों का गृह क्षेत्र रही. पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में और बाद में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में इस सीट से चुनाव लड़ा और जीता. मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार जैसे अन्य कांग्रेसी दिग्गजों ने भी इस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, जिससे भवानीपुर की प्रतिष्ठा पार्टी के प्रमुख शहरी गढ़ों में से एक के रूप में मजबूत हुई. 

भवानीपुर कई सालों तक कांग्रेस के प्रभाव में मजबूती से बना रहा. वामपंथी केवल 1969 में थोड़े समय के लिए ही इस सीट पर कब्जा कर पाए. जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट निर्वाचन क्षेत्र कर दिया गया. सीपीआई (एम) नेता साधन गुप्ता 1953 में इसी सीट से भारत के पहले दृष्टिबाधित सांसद बने. भवानीपुर की राजनीतिक यात्रा ने 1972 में एक अप्रत्याशित मोड़ लिया, जब परिसीमन के बाद यह निर्वाचन क्षेत्र चुनावी मानचित्र से गायब हो गया. 

लगभग 4 दशकों तक यह सीट केवल राजनीतिक स्मृति में ही मौजूद रही. 2011 के परिसीमन में इसे फिर से जीवित किया गया. उस दौरान बंगाल की राजनीति में नाटकीय उथल-पुथल मची थी. उसी साल वाम मोर्चे के 34 वर्षीय शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी युग की शुरुआत हुई.

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Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला