ईरान जंग से बिहार को 500 करोड़ का नुकसान:बंदरगाहों पर सड़ रहा 4 लाख टन चावल, मखाना-सिल्क साड़ी के ऑर्डर कैंसिल

Apr 8, 2026 - 17:10
 0  0
ईरान जंग से बिहार को 500 करोड़ का नुकसान:बंदरगाहों पर सड़ रहा 4 लाख टन चावल, मखाना-सिल्क साड़ी के ऑर्डर कैंसिल
लड़ाई के चलते मखाना निर्यात बंद है। मांग घट गई है। कीमत भी कम हुई है। देश में मांग पहले की तरह है।- अरविंद जैन, मखाना व्यवसायी, दरभंगा ईरान में चल रही लड़ाई के चलते आयात-निर्यात घटा है। बाजार पर इसका असर पड़ रहा है। उम्मीद है कि जल्द स्थिति सुधरेगी।- सुधीर कुमार, ऑपरेशन इंचार्ज, बिहटा ड्राई पोर्ट आयात-निर्यात से जुड़े इन दो लोगों के बयान बानगी हैं कि ईरान की लड़ाई से बिहार किस कदर प्रभावित हो रहा है। राज्य को करीब 500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। होर्मुज स्ट्रेट बंद (ज्यादातर जहाजों के लिए) होने से सिर्फ पेट्रोल-गैस संकट नहीं है। इससे मध्य पूर्व से सामान मंगाना और वहां भेजना भी मुश्किल हो गया है। नतीजा, मखाना, चावल और सब्जी जैसे सामान निर्यात नहीं हो पा रहे। वहीं, ड्राई फ्रूट्स जैसे आयात होने वाले सामान की कीमत बढ़ गई है। दैनिक भास्कर की खास रिपोर्ट में पढ़िए, ईरान की लड़ाई का बिहार पर क्या असर पड़ रहा है? किन सामानों की कीमत बढ़ी है? निर्यात कितना प्रभावित हुआ है? हर शिपमेंट पर 3 लाख रुपए ज्यादा खर्च बिहार के निर्यात और आयात का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व के देशों और वहां से गुजरने वाले शिपिंग रूट्स पर निर्भर है। लड़ाई शुरू होने के बाद ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर नाकाबंदी की है। इससे सऊदी अरब, यूएई, कतर और मध्य पूर्व के दूसरे देशों तक चावल, सब्जी, मखाना और अन्य सामान निर्यात करना मुश्किल हुआ है। हर शिपमेंट पर खर्च 3 लाख रुपए तक बढ़ गया है। इससे मखाना, चावल, भागलपुरी सिल्क, फल और सब्जी का निर्यात घटा है। हजारों टन सामान रास्ते में फंस गए हैं। खराब हो रहे हैं। दूसरी ओर ड्राई फ्रूट्स, खाद और केमिकल का आयात कम हुआ है। मध्य पूर्व को मखाना निर्यात रुका, 300 करोड़ से अधिक का नुकसान लड़ाई का बड़ा असर बिहार के मखाना उद्योग पर पड़ा है। 300 करोड़ रुपए से अधिक के नुकसान का अनुमान है। बिहार में दुनिया का 90% मखाना उत्पादन होता है। यहां करीब 96 हजार टन मखाना पैदा होता है। हर साल करीब 20 हजार टन मखाना विदेश भेजा जाता है। इसका बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व और इस रास्ते यूरोप तक जाता है। 300 रुपए प्रति किलो सस्ता हुआ मखाना निर्यात घटने से मखाना की कीमत घटी है। पटना के मारूफगंज के ड्राई फ्रूट कारोबारी गौरव जैन ने कहा, ‘मखाना की कीमत 300 रुपए प्रति किलो तक कम हुई है। पहले जो मखाना 1100 रुपए प्रति किलो बिकता था आज वह 700-800 रुपए किलो बिक रहा है।’ 4 लाख टन चावल सड़ने की कगार पर बिहार से बड़ी मात्रा में चावल का निर्यात खाड़ी के देशों को होता है। लड़ाई के चलते 4 लाख टन चावल या तो बंदरगाहों पर फंसा हुआ है या रास्ते में अटका हुआ है। रखे-रखे चावल सड़ रहा है। फ्रेट रेट लगभग दोगुना हो गया है, जिससे नए ऑर्डर भी रुक गए हैं। व्यापार ठप पड़ने की स्थिति में है। बिहार का चावल एक्सपोर्ट और फर्टिलाइजर इम्पोर्ट सबसे ज्यादा प्रभावित चैंबर ऑफ कॉमर्स के मुताबिक, बिहार का चावल निर्यात और फर्टिलाइजर आयात सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। निर्यातकों को पहले जहां भुगतान समय पर मिल जाता था, अब उसमें 90 से 180 दिन तक की देरी हो रही है। कंटेनर के देर तक पोर्ट पर रहने से डैमेज और डिटेंशन चार्ज भी लग रहा है। यह कई बार 5 लाख रुपए तक पहुंच जाता है। यह खर्च व्यापारियों को उठाना पड़ रहा है। युद्ध लंबा चलता है तो मखाना, लीची, सब्जियां और हैंडीक्राफ्ट जैसे सेक्टर भी संकट में आ सकते हैं। खाड़ी देशों के खरीददार जोखिम से बचने के लिए दूसरे सप्लायर्स की ओर रुख करने लगेंगे। सिल्क उद्योग पर संकट, विदेशी ग्राहकों ने रद्द किए करोड़ों के ऑर्डर बिहार से सिल्क के कपड़े मध्य पूर्व और वहां से यूरोप जैसे बाजार तक जाते हैं। जंग से भागलपुर का सिल्क उद्योग संकट में है। विदेशी खरीददारों ने करोड़ों रुपए के ऑर्डर रद्द किए हैं। इससे तैयार सामान गोदामों में पड़े हुए हैं। भागलपुर के रेशम व्यापारियों को जंग शुरू होने के बाद से 50-60 लाख रुपए से अधिक का नुकसान हुआ है। भागलपुर में होता है 80 करोड़ रुपए से अधिक का सिल्क व्यापार भागलपुर को 'सिल्क सिटी' के नाम से जाना जाता है। यहां मुख्य रूप से तसर और मलवरी सिल्क से साड़ी और दूसरे कपड़े बनते हैं। जंग के चलते लगभग 20 करोड़ रुपए के ऑर्डर कैंसिल कर दिए गए हैं। अब तक 80 करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबार प्रभावित हुआ है। लड़ाई के कारण बुनकर अपने उत्पाद विदेश नहीं भेज पा रहे हैं। भागलपुरी सिल्क का प्रमुख बाजार खाड़ी के देश हैं। मांग घटने से नाथनगर इलाके में करीब 800 से अधिक पावरलूम बंद पड़े हैं। करीब डेढ़ हजार बुनकर बेरोजगारी की स्थिति का सामना कर रहे हैं। धागे की कीमत बढ़ी, गैस संकट से कपड़ा रंगाई मुश्किल रेशम के धागे की कीमत 230 रुपए प्रति किलोग्राम से बढ़कर 380 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई है। एक ओर लागत बढ़ी है, दूसरी ओर मांग कम हुई है। चंपानगर के बुनकर हेमंत ने कहा, ‘सिल्क साड़ियां विदेश नहीं जा पा रही हैं। धागे की कीमत बढ़ने से स्थिति और खराब हो गई है।’ उन्होंने कहा, ‘मेरा रोजगार छिन गया है। पैसे फंस गए हैं। जिन्होंने कपड़े लिए वे भुगतान नहीं कर रहे, क्योंकि सामान बिका नहीं है। पिछले एक महीने से पावरलूम बंद है। किसी तरह परिवार का भरण-पोषण हो रहा है।’ बुनकर मोहम्मद रफीक ने कहा, ‘कपड़ा प्रिंटिंग के दौरान गर्म पानी की जरूरत होती है, लेकिन कमर्शियल सिलेंडर की बढ़ती कीमतों के कारण काम प्रभावित हो रहा है। जहां पहले रोज डेढ़ से दो साड़ी तैयार हो जाती थीं, अब उत्पादन ठप हो गया है।’ फल और सब्जी निर्यात पर संकट बिहार से हर सप्ताह लगभग 45 टन ताजी सब्जियां मिडिल ईस्ट निर्यात की जाती थी। लड़ाई के चलते इस कारोबार पर संकट आ गया है। फल और सब्जियां जल्दी खराब होने वाले सामान हैं। मध्य पूर्व तक कार्गो जहाजों के जाने में ज्यादा समय लग रहा है, जिससे ये रास्ते में खराब हो जाती हैं। एविएशन फ्यूल की कीमत बढ़ी है, जिससे कार्गो एयरक्राफ्ट से इन्हें भेजना महंगा हो गया है। लीची कारोबारियों को भी हो सकता है करोड़ों का नुकसान बिहार में सालाना 3 लाख टन से अधिक लीची का उत्पादन होता है। इसका बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व के देशों को निर्यात होता है। अभी लीची की फसल नहीं आई है, लेकिन लड़ाई लंबी चली तो इससे राज्य के लीची किसानों और व्यापारियों को करोड़ों रुपए के नुकसान की आशंका है। पिछले सीजन में 830 टन से अधिक लीची निर्यात की गई थी। अब जानिए आयात होने वाले सामान पर क्या असर? बिहार में सूखे मेवों (ड्राई फ्रूट्स) की कीमत बढ़ गई है। किशमिश का रेट घटा है। पहले 500 रुपए किलो किशमिश थी, अब 400 रुपए किलो हो गई है। छुहारा का दाम 50 रुपया बढ़ गया है। मारूफगंज मंडी के दुकानदार एमके गुप्ता ने कहा, ‘मध्य पूर्व से जो सामान पहले एक सप्ताह में आ जाता था, आज 40-50 दिन में आने का अनुमान है। इससे ड्राई फ्रूट्स और डेटस की कीमत बढ़ी है।’ 20% खाद विदेश से होता है इम्पोर्ट लड़ाई के चलते खाड़ी के देशों से फर्टिलाइजर इंपोर्ट घटा है। इससे किसानों के सामने खाद संकट आने का डर है। बिहार में खेती के लिए हर साल करीब 40 लाख टन खाद (फर्टिलाइजर) की जरूरत होती है। सबसे ज्यादा यूरिया इस्तेमाल होता है। लगभग 20% यूरिया और करीब एक-तिहाई कॉम्प्लेक्स खाद (जैसे DAP) विदेशों (खासकर मध्य पूर्व) से आयात किया जाता है। अभी तो पर्याप्त मात्रा में खाद के स्टॉक होने की बातें कही जा रहीं है, लेकिन जंग के लंबे समय तक खिंचने से संकट बढ़ेगा। बीआईए के अध्यक्ष रामलाल खेतान ने बताया कि बिहार में लगभग 2.45 लाख टन यूरिया, 1.46 लाख टन DAP और 2.05 लाख टन NPK उपलब्ध है। सभी केमिकल्स के दाम दोगुना बढ़े बिहार में विदेश से बड़े मात्रा में पेट्रोलियम और रासायनिक उत्पाद आते हैं। 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 9959 करोड़ रुपए का पेट्रोलियम ऑयल और 343 करोड़ रुपए का विस्फोटक प्रणोदक पाउडर शामिल है। केमिकल दुकानदार वीरेंद्र प्रसाद ने बताया कि सभी केमिकल्स के दाम दोगुना हो गया है। सबसे अधिक मरकरी के दाम बढ़े हैं। जो मरकरी क्लोराइड का 100 ग्राम का रेट 7 हजार का था वह अब 13800 का हो गया है। हम मांगना बंद कर दिया है। मरकरी का मेन यूज थर्मामीटर में होता है। कृषि मंत्री ने कहा- अभी नहीं हो पाया है आकलन ईरान की जंग का बिहार के किसानों पर असर को लेकर दैनिक भास्कर ने कृषि मंत्री रामकृपाल यादव से बात की। उन्होंने कहा, ‘युद्ध का असर पूरी दुनिया पर हुआ है। स्वाभाविक है कि भारत पर भी कुछ ना कुछ तो होना है। प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व में बैलेंस करने की कोशिश की गई है। चीजों के दाम नहीं बढ़े है।’ पटना से संस्कृति सिंह, भागलपुर से अमरजीत, दरभंगा से राजन, पूर्णिया से आकाश और बिहटा से निशांत की रिपोर्ट।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0
Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला