कौन थीं अरुणा शानबाग, जिनके लिए सबसे पहले हुई थी इच्छामृत्यु की मांग? 43 साल तक झेले थे दरिंदगी के जख्म

Mar 12, 2026 - 09:12
 0  0
कौन थीं अरुणा शानबाग, जिनके लिए सबसे पहले हुई थी इच्छामृत्यु की मांग? 43 साल तक झेले थे दरिंदगी के जख्म

भारत में इच्छामृत्यु को लेकर समय-समय पर बहस होती रहती है. हाल ही में यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है क्योंकि Supreme Court of India ने लंबे समय से अचेत अवस्था में पड़े एक युवक के मामले में पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है. यह मामला Ghaziabad के रहने वाले Harish Rana से जुड़ा है, जो करीब 13 साल से बिस्तर पर बेहोशी की हालत में पड़े हैं. इच्छामृत्यु को लेकर भारत में सबसे चर्चित और ऐतिहासिक मामला एक नर्स अरुणा शानबाग का रहा है. उनकी जिंदगी एक दर्दनाक हादसे के बाद ऐसी बदल गई कि वह पूरे 42–43 साल तक बिस्तर पर अचेत अवस्था में पड़ी रहीं. उनकी हालत को देखकर कुछ लोगों ने अदालत से यह मांग की थी कि उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए, ताकि उनकी पीड़ा खत्म हो सके. तो आइए जानते हैं कि अरुणा शानबाग कौन थीं और उनके साथ ऐसा क्या हुआ जिसने पूरे देश को झकझोर दिया. 

अरुणा शानबाग कौन थीं?

अरुणा शानबाग का जन्म कर्नाटक में एक साधारण परिवार में हुआ था. अरुणा शानबाग अपनी शुरुआती पढ़ाई गांव में पूरी करने के बाद अरुणा आगे की पढ़ाई के लिए मुंबई चली गई. वहां उन्होंने नर्सिंग की पढ़ाई शुरू की और बाद में मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (KEM) अस्पताल में नौकरी करने लगीं. 1971 में उन्हें इस अस्पताल में नर्स के रूप में पहली नौकरी मिली. अरुणा अपने काम में बहुत ईमानदार और मेहनती थीं, इसलिए अस्पताल के स्टाफ के बीच उनकी अच्छी पहचान बन गई थी.

शादी से पहले हुआ जिंदगी बदल देने वाला हादसा

शादी से सिर्फ एक महीने पहले, 27 नवंबर 1973 को एक ऐसी घटना हुई जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी.  उस रात अस्पताल के वार्ड बॉय सोहनलाल वाल्मीकि ने अरुणा के साथ अस्पताल के अंदर ही दरिंदगी की, उसने अरुणा का यौन उत्पीड़न किया और फिर पकड़े जाने के डर से कुत्ते की चेन से उनका गला घोंट दिया.  हमले के कारण उनके दिमाग तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गया और उनका ब्रेन बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया. आरोपी उन्हें मरा हुआ समझकर वहां से भाग गया, लेकिन अरुणा की मौत नहीं हुई. वह गहरे कोमा में चली गईं और फिर कभी सामान्य जिंदगी में वापस नहीं आ सकीं. 

42 साल तक बिस्तर पर पड़ी रहीं अरुणा

उस घटना के बाद अरुणा शानबाग कोमा की हालत में चली गईं. वह बोल नहीं सकती थीं, चल नहीं सकती थीं और खुद से कोई काम नहीं कर सकती थीं. इसके बावजूद मुंबई के KEM अस्पताल की नर्सें और स्टाफ उन्हें लगातार संभालते रहे. उन्होंने अरुणा की देखभाल अपने परिवार के सदस्य की तरह की,  लगभग 42 साल तक अरुणा अस्पताल के एक बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच झूलती रहीं. 

अरुणा के लिए उठी इच्छामृत्यु की मांग

साल 2011 में अरुणा की हालत को देखते हुए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई. इसमें मांग की गई कि अरुणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए, क्योंकि वह कई दशकों से अचेत अवस्था में हैं और ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है. मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड से अरुणा की जांच करवाई. साथ ही KEM अस्पताल के स्टाफ और नर्सों से भी राय ली गई. अस्पताल की नर्सों ने अदालत से कहा कि वे अरुणा की देखभाल करना चाहती हैं और उन्हें जिंदा रखना चाहती हैं. 7 मार्च 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए अरुणा को इच्छामृत्यु की अनुमति देने से इंकार कर दिया. 

यह भी पढ़ें - क्या सरकारी कर्मचारियों को शेयर मार्केट में पैसा लगाने से रोक सकती है सरकार, जानें क्या हैं नियम?

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

अदालत ने अरुणा के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी, लेकिन इस फैसले में पहली बार भारत में पैसिव इच्छामृत्यु को कुछ शर्तों के साथ मान्यता दी गई.  पैसिव इच्छामृत्यु का मतलब है कि किसी गंभीर रूप से बीमार और अचेत मरीज के इलाज या लाइफ सपोर्ट को हटाने की अनुमति दी जा सकती है, अगर डॉक्टर और परिवार ऐसा उचित समझें.  इस फैसले ने भारत में इच्छामृत्यु से जुड़ी कानूनी बहस को एक नया मोड़ दिया.

आखिरकार 2015 में हुई मौत

अरुणा शानबाग करीब 42 साल तक कोमा में रहीं. मई 2015 में उन्हें निमोनिया हो गया. बीमारी बढ़ने के बाद आखिरकार 18 मई 2015 को उनकी मौत हो गई. उनकी जिंदगी एक ऐसी दर्दनाक कहानी बन गई, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया और इच्छामृत्यु को लेकर बड़ी कानूनी और नैतिक बहस छेड़ दी. 

यह भी पढ़ें - यह है दुनिया का सबसे महंगा चावल, जानें क्या-क्या हैं इसकी खासियत?

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0
Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला