आप का हेल्थ कवर उपलब्ध कराए हेल्थ आपके क्यों खराब होती है उसके बारे में सही जानकारी और सही तरीका अपनाएं
हेल्थ हमारा क्यों बिगाड़ा रहता है उसके बारे में हमको पूरी जानकारी मिलनी चाहिए और गाइड नेशन से हमारे शरीर बिगड़ जाती है और खराब हो जाती है सही तरीके से हमें सब कुछ ज्ञान मिले तो हमारा सही रहता है अगर हम अच्छी तरीके से काम करेंगे तो शरीर की हर दुख दर्द दूर हो जाए
TRN LIVE: Shubhprabhat Subhashita 😊🌞
*कर्तव्यमेव कर्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि।*
*अकर्तव्यं न कर्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि॥*
जो भी हमारा कर्तव्य है उस का पालन हमें प्राण कण्ठगत (मृत्यु संकट उपस्थित होने की स्थिति) होने पर भी करना चाहिये, और जो निषिद्ध कार्य हैं उन्हें भी मृत्यु संकट उपस्थित होने पर भी नहीं करना चाहिये।
Whatever Be Our Duty We Should Perform It Even On The Face Of A Grave Danger To Our Life,
And Likewise We Should Never Do Any Forbidden Action Even On A Similar Danger To Our Life 🙏
Wishing You A Virtuous Day 👍
TRN LIVE: *🌥️विशेष - अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
*🔹अमृततुल्य गोदुग्ध के अनुपम लाभ (भाग-१)🔹*
*🔸भारतीय नस्ल की गाय के दूध को क्यों कहा गया है अमृत ? क्या कारण है कि चिकित्सक इसे सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए पौष्टिक भोजन के रूप में तथा विभिन्न रोगों से रक्षा के लिए सेवन करने का सुझाव देते हैं ? स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन व तेजस्वी बुद्धि के लिए क्यों आवश्यक माना जाता है यह दूध ?*
*🔸क्यों यह माँ के दूध के बाद बच्चों के लिए सबसे प्रशस्त माना गया है ? इस दूध की कुछ विशेषताएँ :*
*🔸(१) इसमें ऐसे अनुपम गुण होते हैं कि इसे खाद्य पदार्थों में उत्तम माना जाता है । खाद्य पदार्थों को पचाने में जितनी ऊर्जा व्यय होती है उससे कम ऊर्जा इसे पचाने में व्यय होती है । इसे शरीर की सभी धातुओं की वृद्धि करनेवाला मधुर रस भी कहा गया है ।*
*🔸(२) यह आहारमात्र नहीं है, आयुर्वेद में इसे प्रकृति-प्रदत्त रसायन (टॉनिक) माना गया है जो दुर्बल तथा रोगियों को नवजीवन प्रदान करता है ।*
*🔸(३) यह पोषक तत्त्वों से भरपूर व सात्त्विक होने से माँ के दूध के बाद बच्चों के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है । बालकों के शरीर को अच्छी तरह पोषित करता है और उन्हें तंदुरुस्त बनाता है ।*
*🔸(४) ओज के दस गुणों से युक्त होने से यह जीवनीय शक्ति को बढ़ानेवाले द्रव्यों में सबसे श्रेष्ठ है । रोगी मनुष्य को सबल और पुष्ट करता है तथा वृद्धावस्था को दूर रखता है ।*
*🔸(५) मस्तिष्क और ज्ञानतंतुओं को पोषण देकर बुद्धि, स्मृति, बल तथा स्फूर्ति बढ़ाने में यह बेजोड़ है ।*
*🔸(६) यह वात-पित्तजनित रोगों का शमन करता है ।क्षयरोग (T.B.), पुराना बुखार, पेट के रोग, योनिरोग, मूत्रकृच्छ (पेशाब में जलन एवं रुकावट), रक्तपित्त (शरीर के किसी भाग से खून निकलना), भूख-प्यास की अधिकता, मानसिक रोग तथा थकान को दूर करने वाला है ।*
*🔸(७) बालक, वृद्ध तथा कम वजन एवं प्रदीप्त जठराग्नि वाले व्यक्तियों को इसका सेवन अत्यंत हितकर है । इससे शीघ्र ही वीर्य की वृद्धि होती है और वीर्य गाढ़ा होता है ।*
*🔸(८) इसके नित्य सेवन से शरीर के विकास के लिए आवश्यक विटामिन ए, बी १, बी २, बी ३, बी ६, बी १२ एवं डी के साथ कैल्शियम, मैग्नेशियम, फॉस्फोरस एवं पोटैशियम आदि खनिज तत्त्वों की पूर्ति सहजता से हो जाती है ।*
*🔸(९) इसमें प्रोटीन की मात्रा बहुत होती है । प्रोटीन शरीर में नयी कोशिकाओं का निर्माण करके शरीर की वृद्धि एवं विकास करने में सहायक है ।*
*🔸जिन्हें कफ की समस्या है उन्हें कफ-शमन हेतु दूध में २-३ काली मिर्च तथा आधा से एक ग्राम सोंठ का चूर्ण मिला के सेवन करना विशेष लाभकारी है ।*
*🔸गाय का दूध सात्त्विक होने से बुद्धि अच्छे विचार तथा अच्छे कर्मों की ओर प्रवृत्त होती है । इससे परिशुद्ध भावना उत्पन्न होती रहती है । इन सभी गुणों के कारण इसे 'धरा का अमृत' कहा जाता है । इसलिए मनुष्यों को नित्य गाय के शुद्ध दूध का सेवन करना चाहिए ।*
*🔹सावधानी : नया बुखार, त्वचा रोग, दस्त, कृमि, गठिया तथा दमा (asthma), खाँसी आदि कफ-संबंधी एवं आमजनित समस्याओं में दूध का सेवन नहीं करना चाहिए 🔹*
TRN LIVE: खतरनाक संकेत आपके पैरों से जिन्हें आपको कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
पैरों में लगातार ठंडे रहना, सूजन, फटी एड़ियां, सुन्नता, दर्द, जलन या काले धब्बे गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं जैसे खराब रक्त संचार, डायबिटीज, थायराइड, या पोषण की कमी के संकेत हो सकते हैं। इनकी नियमित जांच, उचित मॉइस्चराइजेशन और पौष्टिक आहार से बचाव संभव है।
🦵ठंडे पैर : खराब रक्त संचार हाइपोथायरायडिज्म, या एनीमिया।✅
🦵सूजे हुए पैर और टखने : किडनी की समस्या, हृदय रोग, या नसों की कमजोरी ✅
👠फटी एड़ियां : पानी की कमी , थायराइड, या जिंक/ओमेगा-3 की कमी।✅
🦶सुन्न होना या झुनझुनी :मधुमेह , परिधीय न्यूरोपैथी, या विटामिन B12 की कमी।✅
😩लगातार पैर दर्द : गठिया , गाउट, या स्ट्रेस फ्रैक्चर।✅
🔥जलन की भावना : तंत्रिका क्षति या मधुमेह।✅
💅नाखूनों के नीचे काले धब्बे : रक्ताल्पता, मधुमेह, या गंभीर संक्रमण। ✅
बचाव के उपाय:
✅पैरों को रोजाना धोएं और मॉइस्चराइज करें।
✅संतुलित और पौष्टिक आहार लें।
✅पर्याप्त पानी पिएं (Dehydration से बचें)।
✅लगातार समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लें।
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TRN LIVE: 🌿 *रक्तचाप केवल एक संख्या नहीं — यह हृदय, मन और पाचन के संतुलन का प्रतिबिंब है।*
*प्रश्न:*
क्या रक्तचाप को संतुलित रखने के लिए ऐसी प्राकृतिक जड़ी-बूटी रेसिपी संभव है जिससे केवल BP ही नहीं बल्कि हृदय, मानसिक शांति, पाचन और शरीर की ऊर्जा को भी सहयोग मिल सके?
*उत्तर:*
हाँ। आयुर्वेद के अनुसार बढ़ा हुआ रक्तचाप अक्सर केवल हृदय की समस्या नहीं होता, बल्कि मानसिक तनाव, कमजोर पाचन और शरीर के असंतुलन से भी जुड़ा हो सकता है।
इसी कारण यदि हृदय पोषण, मानसिक शांति, पाचन संतुलन और शरीर की शक्ति—इन चारों को साथ में संतुलित किया जाए तो शरीर को अधिक स्थायी सहयोग मिल सकता है।
*यह मिश्रण विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी माना जाता है जिन्हें BP, तनाव या पाचन संबंधी असंतुलन की प्रवृत्ति रहती हो।*
🌿 *प्राकृतिक BP संतुलन सहायक मिश्रण*
(लगभग 60 दिन के लिए)
*हृदय पोषण के लिए*
• अर्जुन छाल चूर्ण – 60 ग्राम
(अर्जुन का चूर्ण कपड़छान होना बेहतर माना जाता है)
*मानसिक संतुलन के लिए*
• ब्राह्मी चूर्ण – 40 ग्राम
• शंखपुष्पी चूर्ण – 40 ग्राम
• जटामांसी चूर्ण – 20 ग्राम
*शरीर की शक्ति के लिए*
• अश्वगंधा चूर्ण – 30 ग्राम
• गिलोय चूर्ण – 25 ग्राम
• आंवला चूर्ण – 30 ग्राम
*पाचन संतुलन के लिए*
• सौंफ चूर्ण – 20 ग्राम
• जीरा चूर्ण – 20 ग्राम
• धनिया चूर्ण – 20 ग्राम
*शीतल प्रभाव हेतु*
• गुलाब पंखुड़ी चूर्ण – 20 ग्राम
*मल संतुलन के लिए*
• त्रिफला चूर्ण – 20 ग्राम
कुल मिश्रण लगभग
325–340 ग्राम
🌿 *मिश्रण बनाने की विधि*
सभी जड़ी-बूटियों का बारीक चूर्ण बनाकर अच्छी तरह मिला लें।
इसे काँच के सूखे और हवाबंद जार में सुरक्षित रखें।
🥄 *सेवन विधि*
*प्रारम्भ*
• पहले 5–7 दिन
सुबह – ¼ छोटा चम्मच
*इसके बाद*
• सुबह – ½ छोटा चम्मच
• शाम – ½ छोटा चम्मच
*सेवन का समय*
• सुबह – खाली पेट
• शाम – भोजन से लगभग 30–40 मिनट पहले
गुनगुने पानी के साथ लें।
🔄 *कोर्स अवधि*
लगभग 60 दिन सेवन करें → फिर 7–10 दिन का विराम लें → आवश्यकता अनुसार दोबारा शुरू करें।
🌟 *संभावित सहयोग*
• हृदय और रक्त संचार को समर्थन
• मानसिक शांति और बेहतर नींद
• पाचन संतुलन और गैस-एसिडिटी में राहत
• शरीर की ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता को सहयोग
नियमित और संतुलित सेवन से सामान्यतः
3–6 सप्ताह में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव हो सकते हैं।
✨ *सहायक जीवनशैली*
• साधारण नमक की जगह सेंधा नमक का उपयोग करें
• प्रतिदिन 15–20 मिनट हल्की सैर करें
• रात को समय पर सोने का प्रयास करें
• भ्रामरी प्राणायाम और गहरी श्वास अभ्यास सहायक हो सकते हैं
⚠ *सावधानी*
• रक्तचाप सप्ताह में 2 बार अवश्य जाँचें
• अत्यधिक कमजोरी, चक्कर या BP बहुत कम लगे तो सेवन रोककर चिकित्सक से परामर्श लें
• जो लोग पहले से BP की दवा ले रहे हैं, वे बिना चिकित्सकीय सलाह दवा बंद न करें
• दीर्घकालिक दवा लेने वाले पहले चिकित्सक से सलाह लें
📌 *यह जानकारी स्वास्थ्य जागरूकता हेतु है। यह व्यक्तिगत चिकित्सा परामर्श नहीं है।*
📱 *प्राकृतिक मार्गदर्शन हेतु WhatsApp करें:*
👉 8960068501
👨👩👧 *परिवार में जो BP या हृदय संबंधी चिंता से जूझ रहे हों — उन्हें यह जानकारी अवश्य भेजें।*
🌿 *प्राकृतिक संपदा परिवार*
प्रकृति के सरल उपाय
स्वास्थ्य की स्थायी दिशा
TRN LIVE: सफेद पलाश प्रतीक है समृद्धि का: कहते हैं कि इसमें माता अन्नपुर्णा का वास है। दावा किया जाता है कि इसके नीचे जाने पर दिन में तारे दिखाई देने लगते हैं।
सफेद पलाश एक बहुत ही दुर्लभ, चमत्कारिक और रहस्यमई वनस्पति है। इसमें बारे में जितने मुँह उतनी ही बातें सुनाई देती हैं। मेरी दिलचस्पी सफेद पलाश पर इसीलिए भी है कि अब तक कई रहस्यमई पौधों को ढूंढकर उनकी पहचान की है या फिर उनके विषय में कही सुनी बातों के पीछे के तर्क -वितर्क और कारण समझकर विज्ञान से उनका संबंध समझा है। बचपन में ही घाट छिंदवाड़ा - जबलपुर मार्ग पर घाट परासिया के समीप सफेद पलाश देख चुका हूँ तो इसके अस्तित्व को नकारने की गलती भी नहीं कर सकता। अभी तक सामान्य केसरिया, गहरा केसरिया, हल्का पीला, गहरा पीला, क्रीम (पीला-केसरिया) रंग के पलाश खोज चुका हूँ तो हौसला और भी बढ़ गया कि अभी भी घने जंगलों के बीच कहीं न कहीं सफेद पलाश के वृक्ष अवश्य बचे हैं। आइए जानते हैं कि सफेद पलाश आखिर इतना रहस्यमई क्यों है...?
सभी पलाश की तरह सफेद पलाश भी एक झाड़ीदार वृक्ष है। लेकिन सफेद पलाश की ही बात करूं तो यह भी 4 किस्म का होता है।
1) एक तो अन्य रंगों के पलाश की ही तरह लेकिन इनके पुष्प बाहर से देखने पर रोएंदार आवरण के कारण सफेद दिखाई देते हैं जबकि भीतर से हल्के पीले या नारंगी रंग का होता है।
2) दूसरा हल्के नारंगी रंग की आभा लिए होता है किंतु इनके पेड़ विशाल लताओं के रूप में होते हैं। ये पुष्प झाड़ीदार पलाश से आकार में कुछ छोटे होते हैं।
3) तीसरा पूरी तरह से सफेद पलाश जो मैने बचपन में देखा था, सड़क निर्माण में अब वह पेड़ समाप्त हो चुका है, बिल्कुल वैसी ही एक फोटो Anjney Sharma जी की पोस्ट से लेकर एल्बम में शामिल की है।
4) इन सबके अलावा जो चौथा सफेद पलाश है उसके पुष्प काफी छोटे होते हैं, वास्तव में यह पलाश नहीं है, लेकिन हूबहू पलाश की तरह दिखाई देता है। गांव देहात में इसे तिनसा के नाम से जाना जाता है।
ऊपर वर्णित 4 में से 3 प्रकार के सफेद पलाश आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। चौथे लता पलाश में अभी पुष्प आने शेष हैं जल्द ही उसकी अलग और विस्तृत पोस्ट करूंगा। कोलाज में शामिल केवल एक को छोड़कर सभी फोटो मेरे द्वारा ही संकलित और खींची गई हैं अतः शंका की कोई गुंजाइश नहीं है। केवल एक फोटो जो मैने स्वयं नहीं खींची है, उसकी सत्यता की गारंटी में नहीं दे सकता। आइए अब रंगो और पहचान की दुनिया से दूर सफेद पलाश की रहस्यमई चर्चा वाली दुनिया में कदम रखते हैं।
कहते हैं पलाश वृक्ष में त्रिदेव की शक्ति होती है। तंत्र शक्ति के जानकारों का तो मानना है कि इससे धन वर्षा तक की सकती है। लेकिन मेरी दादी माँ कहती है- इसमें देवी अन्नपूर्णा का वास है, उन्होंने भी शायद इसे उनकी दादी माँ से सुना होगा। पीढ़ी दर पीढ़ी यह ज्ञान इसी तरह निरंतर आगे बढ़ रहा है।
केसरिया पलाश की खूबसूरती से भला कौन परिचित नहीं होगा? ये पलाश पुष्प तो जैसे होली का पर्याय ही बन गए है। पहले गाँव देहात में खुशियों का उत्सव होली पलाश के फूल से ही मनाया जाता था। धीरे धीरे रासायनिक रंगों ने रायता फैला दिया और लोग रंग खेलने से कतराने लगे। लेकिन चर्चाओं के बाजार की बात करें तो सबसे मजेदार है सफेद पलाश की चर्चा, इसके कुछ किस्से रोचक हैं तो कुछ विवादास्पद। लेकिन यकीन मानिये कि जिसे कोई एक सही कहेगा उसे दूसरा गलत ठहरा देगा, और दूसरा जिसे सही समझेगा पहला उसे गलत साबित कर देगा। अब ये तो आपको तय करना है कि आप किसके पक्ष में खड़े हैं...
वैसे पलाश सिर्फ सुंदर और धार्मिक महत्व वाला पेड़ नही है, बल्कि यह बेशकीमती और उपयोगी भी है। इसके औषधीय गुणों का तो कोई तोड़ ही नही है। इसकी गोंद कमरकश कहलाती है। सफेद पलाश की कमरकश बेशकीमती है। यह प्रसव के बाद ढीली पड़ चुकी मांसपेशियों में पहले जैसी कसावट लाने का कार्य करती है। कमर दर्द और जोड़ों के दर्द की भी यह रामबाण औषधि है।
पंद्रह से बीस बरस पहले पलाश की छाल मजबूत रस्सियाँ बनाने का बेहतरीन स्त्रोत थी, जिससे कृषि उपयोग के कार्यों में प्रयोग लिया जाता था। अरे भाई #कुची याद है न...? दीवाली के समय चूने और गेरू की पुताई के लिए बनाये जाने वाले हर्बल ब्रश/ कूची इसी पेड़ की जड़ों से बनाये जाते है। और इसकी लकड़ियों से तैयार फावड़े, गैंती के बेंसो का तो कोई तोड़ ही नही था। इतना ही नही ठनका लगने पर यही शांति देता था। अब आप पूछेंगे ये ठनका क्या है, देहाती लब्ज है साहेब, पेशाब में जलन नही बल्कि रुक रुक कर थोड़ी मात्रा में मूत्र विसर्जन को ठनका कहते हैं। बहुत बैचेन कर देने वाली अवस्था होती है। इसकी छाल या पत्तियों का काढ़ा इसकी बेहतरीन औषधी है। इसके पत्तों पर चिकोड़ी पापड़ बनते थे, जो हमारा क्षेत्रीय पारंपरिक व्यंजन है। पापड़ के खौलते हुए मिश्रण में इन पत्तों के रस के रसायन मिलकर जरूर कोई न कोई औषधीय गुण हमारे शरीर मे पहुँचाते रहे होंगे, तभी तो इनके रहते कोई बड़ी बीमारियां गाँव देहात में जाने से परहेज करती रही।
जितना यह वृक्ष अपनी खूबसूरती के लिये चर्चा में है, उससे कहीं ज्यादा यह तांत्रिक प्रयोगों के लिए जाना जाता है। हालांकि इसके हजारों औषधीय महत्व भी हैं, किंतु आजकल ये उपयोग में नहीं रह गए हैं। ज्यादातर लोग सफेद पलाश ढूंढते हैं, वो भी इसीलिये कि इसके मिल जाने से वे धनवर्षा करवा लेंगे। इससे मैं सहमत नही हूँ, लेकिन धार्मिक परिवेश में मेरी परवरिश हुयी है, तो बचपन से सुनता आया हूँ। कि इसके पेड़ के नीचे बनाया गया भोजन कभी कम नही पड़ता है, मतलब अन्नपूर्णा देवी का वरदान है इसमें, इसीलिए यह समृद्धि का प्रतीक भी है। घर मे इसे लगाकर नित्य पूजन करने से अच्छा भाग्य, सकारात्मक विचार और मन को शांति मिलती है।
इसके विषय में एक और मान्यता है - कहते हैं कि सफेद पलाश के नीचे जाने पर दिन में भी तारे दिखने लगते हैं। असली तारे का तो पता नही, परंतु मेरा आंकलन यह है कि इसकी छाल के बीच के गढ्ढो पर एक विशेष प्रकार की चमचमाते रंग के पंखों वाली मक्खी आराम फरमाती है, जब कोई इसे स्पर्श करता है, तो वे छोटी छोटी मख्खियाँ उड़ने लगती हैं, जिनके पंख बिल्कुल छोटे लाइट या आईने की तरह चमकने लगते हैं। अन्य शब्दो मे कहें तो तारों की तरह चमकते हैं, शायद इसी वजह से भ्रम उत्पन्न हो गया होगा। यह कीट इसके पेड़ में निवास के लिए एक बायोलॉजिकल इंडिकेटर हो, ऐसी भी संभावना है।
पलास की लगभग सभी प्रजातियों में चाहे वह, लाल हो, सफेद हो, पीला हो या क्रीम रंग का, सभी मे पत्तियाँ "ढाक के तीन पात " वाली कहावत को चरितार्थ करती हैं। कबीर दास जी भी पलास के मोह से बच न सके थे, उन्होंने इसे अपने दोनों में प्रयोग किया था। आपसे साझा कर रहा हूँ...
कबीरा गरब न कीजिए, इस जोबन की आस।
टेसू फूले दिवस दस, खांखर भया पलास।।
ब्रम्हा-विष्णु-महेश त्रिदेवों की शक्तियाँ समेटे यह वृक्ष आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कभी सड़क के दोनो ओर का क्षेत्र इनका आवास हुआ करता था, किन्तु आजकल कुछ अपरिपक्व हरियाली योद्धा विदेशी मूल के जल्दी विकसित होने वाले ऐसे पौधे रोप रहे हैं जिनमे कई तो विदेशी वनस्पतियाँ भी शामिल हैं। इसीलिए अब देशी वनस्पतियाँ समाप्त हो रही हैं। इन पढ़े लिखे आधुनिक विद्वानों ने सबसे अधिक नुकसान पलास पेड़ का ही किया है। उनकी इन हरकतों का दुष्परिणाम भी अब धीरे धीरे देखने को मिल रहा है। विदेशी पौधे अर्थात एलियन स्पीसीज के पौधे आजकल सड़क के दोनो किनारों पर खूब दिख रहे हैं। स्वर्गीय गुरूदेव डॉ. Deepak Acharya जी ने कई बार इस विषय को उठाया लेकिन लोगों पर आधुनिकता का भूत सवार है, तो फिर भला कौन सीधे? 😥
यह जानकारी आपको कैसी लगी बताइएगा...
फिर मिलेंगे, काले पलाश और लता पलाश के साथ...
धन्यवाद
डॉ विकास शर्मा
प्राध्यापक वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिंदवाड़ा (म.प्र.)
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TRN LIVE: हमारा शरीर अक्सर छोटी-छोटी समस्याओं के जरिए हमें अंदरूनी गड़बड़ियों के संकेत देता है, इसलिए इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जैसे पैरों में झनझनाहट नसों की समस्या या डायबिटीज से जुड़ी हो सकती है, होंठों का बार-बार फटना आयरन या जिंक की कमी का संकेत हो सकता है, और नाभि से दुर्गंध आना फंगल इंफेक्शन या डायबिटीज से जुड़ा हो सकता है। इसी तरह नाखूनों का पीला पड़ना लीवर या फेफड़ों की समस्या, त्वचा का पीलापन एनीमिया या लीवर से जुड़ी परेशानी, बालों का अचानक झड़ना थायरॉयड या तनाव, तथा हाथ-पैर ठंडे रहना खराब ब्लड सर्कुलेशन का संकेत हो सकता है। आंखों के नीचे काले घेरे नींद की कमी या शरीर पर अधिक तनाव दिखा सकते हैं, बार-बार सिरदर्द माइग्रेन या हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ा हो सकता है, जबकि मुंह से दुर्गंध पेट या लीवर की समस्या का संकेत हो सकती है। अचानक वजन बढ़ना या घटना हार्मोनल असंतुलन, लगातार थकान एनीमिया या थायरॉयड, जोड़ों में दर्द यूरिक एसिड या कैल्शियम की कमी, पेट में जलन गैस्ट्रिक समस्या और त्वचा पर खुजली एलर्जी या शरीर में टॉक्सिन बढ़ने का संकेत हो सकती है। इसलिए यदि ऐसे लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो उन्हें हल्के में लेने के बजाय सही खान-पान, अच्छी दिनचर्या और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी होता है।
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T: Vata Obesity Ayurveda - वात प्रकृति के साथ मोटापा: क्या करें? आयुर्वेद में शरीर की प्रकृति को समझना बहुत जरूरी माना गया है। इसी विषय पर पहले भी कई Post और जानकारी दी जा चुकी है, जहां वात, पित्त और कफ प्रकृति के बारे में विस्तार से बताया गया है।
आमतौर पर कहा जाता है कि जिन लोगों की वात प्रकृति होती है, वे अक्सर दुबले-पतले, फुर्तीले और चंचल स्वभाव के होते हैं।
लेकिन बहुत से लोगों का एक अलग सवाल सामने आया। उनका कहना है कि उनके अंदर वात प्रकृति के लगभग सारे लक्षण मौजूद हैं, जैसे जल्दी-जल्दी काम करना, गैस बनना, जोड़ों में दर्द रहना, बेचैनी या चंचलता महसूस होना। लेकिन इसके बावजूद उनका शरीर पतला नहीं है, बल्कि उनका वजन ज्यादा है और मोटापा भी है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही बनता है कि अगर शरीर में वात भी है और मोटापा भी है, तो पहले किसका इलाज किया जाए?
क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि अगर वात को शांत करने वाली चीजें ज्यादा ली जाएं तो वजन बढ़ सकता है। वहीं अगर मोटापा कम करने वाली चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया जाए तो वात की समस्या बढ़ सकती है। इसी वजह से बहुत लोग कंफ्यूजन में पड़ जाते हैं कि आखिर सही रास्ता क्या है।
वात और मोटापा एक साथ क्यों मुश्किल बन जाते हैं
आयुर्वेद के अनुसार कई बार शरीर में मेद यानी फैट ज्यादा होने के कारण वात का प्रवाह रुक जाता है। जब ऐसा होता है तो व्यक्ति को गैस, जोड़ों का दर्द, शरीर में जकड़न, बेचैनी और थकान जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं।
यानी शरीर में एक तरफ चर्बी बढ़ रही होती है और दूसरी तरफ वात भी परेशान कर रहा होता है। ऐसे में इलाज ऐसा होना चाहिए जो दोनों समस्याओं को संतुलित करे।
अगर सही खानपान और जीवनशैली अपनाई जाए तो धीरे-धीरे दोनों समस्याओं को एक साथ नियंत्रित किया जा सकता है।
जौ (Barley) का उपयोग
इस स्थिति में सबसे पहला और बहुत उपयोगी खाद्य पदार्थ है जौ यानी बार्ली। आयुर्वेद में जौ को मोटापा कम करने के लिए काफी प्रभावी माना गया है।
जौ शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी को कम करने में मदद करता है और साथ ही वात को भी संतुलित करने में सहायक होता है।
जौ का उपयोग कई तरीकों से किया जा सकता है। उदाहरण के लिए:
जौ को उबालकर उसका पानी पीना
जौ के आटे की रोटी बनाकर खाना
जौ से हलवा या अन्य भोजन तैयार करना
अगर जौ का पानी बनाना हो तो लगभग 20 से 30 ग्राम जौ को दो लीटर पानी में उबालकर एक लीटर तक रहने दें। फिर इस पानी को दिन भर थोड़ा-थोड़ा करके पी सकते हैं।
अगर जौ की रोटी खाते हैं तो उसमें हल्का सा घी लगाकर खाना बेहतर है, इससे वात संतुलित रहने में मदद मिलती है।
तिल के तेल से मालिश
वात प्रकृति को शांत करने के लिए आयुर्वेद में तेल मालिश को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। खासकर तिल का तेल वात को संतुलित करने के लिए बहुत उपयोगी माना जाता है।
अगर किसी व्यक्ति का स्वभाव बहुत चंचल है, जल्दी-जल्दी काम करने की आदत है, शरीर में जकड़न या जोड़ों का दर्द रहता है, तो रोज स्नान से पहले 10 से 15 मिनट तिल के तेल से पूरे शरीर की मालिश करना फायदेमंद हो सकता है।
संभव हो तो काले तिल का तेल इस्तेमाल करना और भी बेहतर माना जाता है। नियमित मालिश से शरीर की जकड़न कम होती है, वात शांत होता है और शरीर का संतुलन बेहतर बनता है।
शिलाजीत का उपयोग
आयुर्वेद में शिलाजीत को एक शक्तिशाली औषधि और टॉनिक माना जाता है। यह शरीर की ताकत बढ़ाने के साथ-साथ मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने में भी मदद करता है।
शिलाजीत कई रूपों में उपलब्ध होता है जैसे:
टैबलेट
ड्रॉप
पाउडर
अगर सही मात्रा और सही तरीके से इसका सेवन किया जाए तो यह शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी को कम करने में मदद कर सकता है। साथ ही शरीर में होने वाले दर्द और वात से जुड़ी समस्याओं को भी कम करने में सहायक माना जाता है।
आयुर्वेदिक चिकित्सा में गुग्गुल आधारित कुछ औषधियां भी दी जाती हैं, जो वजन कम करने और वात को संतुलित करने में सहायक मानी जाती हैं।
मसालों का सही उपयोग
आयुर्वेद में मोटापे के प्रबंधन के लिए ऐसी चीजों की सलाह दी जाती है जो शरीर के मेटाबॉलिज्म को सक्रिय करें। हमारे रोजमर्रा के कई मसाले इस काम में मददगार होते हैं।
घर में इस्तेमाल होने वाले मसाले जैसे:
हल्दी
जीरा
काली मिर्च
तेजपत्ता
ये सभी शरीर की पाचन शक्ति को बेहतर बनाते हैं और धीरे-धीरे मेटाबॉलिज्म को सक्रिय करने में मदद करते हैं।
उदाहरण के लिए, सुबह खाली पेट थोड़ी मात्रा में हल्दी गुनगुने पानी के साथ लेना कई लोगों के लिए फायदेमंद माना जाता है। इसी तरह जीरे का पानी या भोजन में हल्के मसालों का उपयोग भी शरीर के संतुलन को बेहतर बना सकता है।
संतुलन ही सबसे बड़ा समाधान
जब शरीर में वात प्रकृति के साथ मोटापा भी मौजूद हो, तो यह स्थिति थोड़ी जटिल हो सकती है। क्योंकि दोनों समस्याओं का स्वभाव अलग होता है, इसलिए इलाज में संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है।
अगर सही खानपान, नियमित मालिश, उपयुक्त औषधि और मसालों का संतुलित उपयोग किया जाए तो धीरे-धीरे शरीर में सुधार महसूस हो सकता है।
लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि ऐसे बदलावों का असर तुरंत नहीं दिखता। कई बार इसके लिए छह महीने से एक साल तक नियमित प्रयास करना पड़ता है।
धीरे-धीरे शरीर का संतुलन सुधरता है और स्वास्थ्य बेहतर महसूस होने लगता है।
क्या आपके शरीर में वात के लक्षण भी हैं और वजन भी बढ़ा हुआ है?
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