ओबामा की 'डील' से ट्रंप की 'जिद' तक, कैसे बारूद के ढेर पर बैठा मिडिल ईस्ट? क्या फेल हो गई US की कूटनीति

Apr 27, 2026 - 06:45
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ओबामा की 'डील' से ट्रंप की 'जिद' तक, कैसे बारूद के ढेर पर बैठा मिडिल ईस्ट? क्या फेल हो गई US की कूटनीति

Iran Vs US: अमेरिका और ईरान के बीच हालात बेहद ही तनावपूर्ण हो चुके हैं. सीजफायर के बाद चल रही वार्ता की कोशिशें भी नाकाम हुई हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को कंट्रोल करना चाहते हैं. असल में इसकी पूरी कहानी की शुरआत साल 2018 में हुई. जब डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस डील से बाहर कर दिया. उन्हें लगा कि डील उतनी मजबूत नहीं है.

अमेरिका के डील से बाहर निकलने के बाद ईरान ने न्यूक्लियर गतिविधियों को बढ़ाना शुरू कर दिया. 2015 में बराक ओबामा के समय अमेरिका ने एक न्यूक्लियर डील पर साइन किए थे. इसने 15 सालों तक ईरान की न्यूक्लियर गतिविधियों में रोक लगा दी थी. 2015 में ईरान ने सारा न्यूक्लियर मटीरियल सौंपने पर सहमति दी थी. 

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, ईरान ने अपना 12.5 टन यूरेनियम रूस भेज दिया था. हालांकि, डील के तीन साल बाद ट्रंप इससे अमेरिका को बाहर ले आए. इसे उन्होंने एकतरफा करार दिया. इस पर ट्रंप को खुद अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की आलोचना का सामना करना पड़ा था. 

उम्मीद से ज्यादा ईरान ने निकाला यूरेनियम, है अच्छा खासा स्टॉक

इधर, अमेरिका ने डील से मुंह मोड़ा तो ईरान ने भी उम्मीद से ज्यादा यूरेनियम निकालना शुरू कर दिया. उसने इसका स्टॉक बढ़ा लिया. इससे वह न्यूक्लियर बम बनाने के और भी ज्यादा करीब पहुंच गया. अमेरिकी की तरफ से जांच कर रहे लोगों का कहना है कि ईरान के पास लगभग आधा टन यूरेनियम ऐसा है, जो न्यूक्लियर हथियारों के लिए जरूरी स्तर के बहुत करीब तक एनरिच किया जा चुका है. माना जाता है कि मटीरियल का कुछ हिस्सा जमीन के नीचे बनी सुरक्षित सुरंगों में रखा हुआ है. 

रिपोर्ट्स की मानें तो ईरान के पास कुल 11 टन यूरेनियम है. अगर इसे और रिफाइन किया गया तो इससे 100 न्यूक्लियर बम बनाए जा सकते हैं. बातचीत का मुख्य मुद्दा ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम और उसका यूरेनियम था, लेकिन युद्ध के बढ़ने के साथ-साथ अब मुद्दे मिसाइलों, मीडिल ईस्ट में तनाव और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के मुद्दों तक फैल गए हैं. 

ट्रंप की शर्तों को ईरान मानने से इनकार कर चुका है

इधर, ट्रंप ईरान के साथ नया समझौता करना चाहते हैं. उनका मानना है कि यह 2015 के समझौते से बेहतर होगा. इसके अलावा अमेरिका की दो मुख्य मांगें हैं. पहली ईरान की यूरेनियम संवर्धन को कम करना. दूसरा ईरान को पिछले कई सालों में जमा किए गए अपने परमाणु ईंधन का भंडार सौंप देना चाहिए. ईरान ने अमेरिका की इन दोनों मांगों को ठुकरा दिया है. 

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