देश में कितने SC, ST और OBC जज, जानें किस अदालत में इनकी संख्या सबसे ज्यादा?
देश की अदालतों में न्याय देने वाले जज किस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, यह सवाल पहले भी उठता रहा है. अब पहली बार संसद में पेश आंकड़ों ने इस तस्वीर को काफी हद तक साफ कर दिया है. कुछ राज्यों में आरक्षित वर्गों की भागीदारी चौंकाने वाली है, तो कुछ जगह यह बेहद कम नजर आती है. आखिर जिला और निचली अदालतों में किस वर्ग का कितना प्रतिनिधित्व है और उच्च अदालतों में स्थिति क्यों अलग है, यही इस रिपोर्ट में आज हम आपको बताने जा रहे हैं.
संसद से सामने आए अहम आंकड़े
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने गुरुवार को राज्यसभा में देश की न्यायिक व्यवस्था से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण आंकड़े शेयर किए हैं. उन्होंने बताया कि देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जिला और अधीनस्थ अदालतों में कार्यरत कुल 20,833 जजों में से 9,534 जज अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं. यह संख्या कुल कार्यरत जजों का लगभग 46 प्रतिशत है. इन आंकड़ों से साफ है कि निचली अदालतों में आरक्षित वर्गों की भागीदारी अब एक बड़ी सच्चाई बन चुकी है.
लिस्ट में तमिलनाडु सबसे आगे
अगर राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु इस मामले में सबसे आगे नजर आता है. यहां जिला और निचली अदालतों में कुल 1,234 जजों की स्वीकृत संख्या में से 1,205 जज SC, ST और OBC वर्ग से हैं. यानी करीब 97.6 प्रतिशत जज आरक्षित वर्गों से आते हैं. यह आंकड़ा न सिर्फ देश में सबसे ज्यादा है, बल्कि न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व की दिशा में एक अनोखा उदाहरण भी माना जा रहा है.
दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर की मजबूत मौजूदगी
तमिलनाडु के पड़ोसी केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भी यही तस्वीर दिखती है, जहां 88.5 प्रतिशत जज आरक्षित वर्गों से हैं. कर्नाटक में यह आंकड़ा 88 प्रतिशत से अधिक है, जहां 1,129 में से 996 जज SC, ST और OBC समुदाय से जुड़े हैं. तेलंगाना में 445 जजों में से 307 यानी करीब 69 प्रतिशत जज आरक्षित वर्गों से आते हैं. पूर्वोत्तर राज्य मेघालय में यह आंकड़ा और भी ज्यादा है. वहां कुल 57 जजों में से 54, यानी लगभग 95 प्रतिशत जज आरक्षित वर्ग से हैं, जो राज्य की जनजातीय संरचना को दर्शाता है.
अन्य राज्यों की क्या है स्थिति?
दक्षिण और मध्य भारत के कुछ अन्य राज्यों में भी आरक्षित वर्गों की भागीदारी मजबूत है. आंध्र प्रदेश में यह अनुपात 64 प्रतिशत है, छत्तीसगढ़ में 63 प्रतिशत और केरल में करीब 59 प्रतिशत जज SC, ST और OBC वर्ग से आते हैं. इन आंकड़ों से साफ होता है कि कई राज्यों में निचली न्यायपालिका सामाजिक विविधता को काफी हद तक दिखा रही है.
दिल्ली और दूसरे राज्यों में कितना प्रतिनिधित्व?
वहीं दूसरी ओर कुछ राज्यों और क्षेत्रों में आरक्षित वर्गों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम नजर आती है. दिल्ली में जिला और निचली अदालतों में कार्यरत 837 जजों में से सिर्फ 108 जज ही SC, ST और OBC वर्ग से हैं. गुजरात और हिमाचल प्रदेश में यह अनुपात करीब 29 प्रतिशत है, जबकि हरियाणा में 31 प्रतिशत जज इन वर्गों से आते हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में न्यायिक प्रतिनिधित्व की तस्वीर एक जैसी नहीं है.
हिंदी पट्टी में क्या हाल है?
उत्तरी और हिंदी भाषी राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में स्थिति अपेक्षाकृत संतुलित दिखाई देती है. यहां जिला और अधीनस्थ अदालतों में कुल 2,640 जजों में से 1,414 जज यानी करीब 54 प्रतिशत आरक्षित वर्गों से आते हैं. मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा 49 प्रतिशत है, राजस्थान में 45 प्रतिशत और पंजाब में लगभग 40 प्रतिशत जज SC, ST और OBC समुदाय से जुड़े हैं.
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में क्यों अलग तस्वीर?
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह भी साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए संविधान में किसी भी जाति या वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है. इसी वजह से इन अदालतों में सामाजिक वर्गों के आधार पर प्रतिनिधित्व का कोई सेंट्रलाइज्ड डेटा नहीं है. यानी शीर्ष अदालतों में यह तय व्यवस्था नहीं है कि किस वर्ग के कितने जज होंगे.
2018 के बाद क्या बदला?
हालांकि वर्ष 2018 से एक अहम बदलाव जरूर किया गया है. हाईकोर्ट के जजों की सिफारिश के दौरान अब उम्मीदवारों को अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि की जानकारी एक तय फॉर्मेट में देनी होती है. यह फॉर्मेट सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेकर तैयार किया गया है. इसी जानकारी के आधार पर हाल के वर्षों के आंकड़े सामने आए हैं.
हालिया नियुक्तियों की तस्वीर क्या कहती है?
2018 से अब तक हाईकोर्ट में नियुक्त हुए 847 जजों में से 33 जज अनुसूचित जाति से, 17 अनुसूचित जनजाति से और 104 अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं. इसके अलावा 46 जज अल्पसंख्यक वर्ग से जुड़े हैं. इस अवधि में करीब 130 महिलाओं को भी हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्त किया गया, जिसे लैंगिक प्रतिनिधित्व की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.
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