बेगूसराय में 8 कुएं पर जमा होता है पूरा गांव:साइकिल के टायर में हवा भरने वाले पाइप से खेलते हैं होली, 2 दिनों तक चलती है प्रतियोगिता

Mar 4, 2026 - 09:54
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बेगूसराय में 8 कुएं पर जमा होता है पूरा गांव:साइकिल के टायर में हवा भरने वाले पाइप से खेलते हैं होली, 2 दिनों तक चलती है प्रतियोगिता
हर ओर रंग और उमंग के त्योहार होली की धूम मची है। बेगूसराय के हर गांव-हर घर में बच्चे और युवा ही नहीं, बुजुर्ग भी होली खेल रहे हैं। हालांकि, बेगूसराय के एक गांव की होली थोड़ी अलग तरीके से मनाई जा रही है। इस होली का लोगों को सालभर से इंतजार रहता है। यहां रंग बाल्टी या ड्रम में नहीं, बल्कि कुआं में ही रंग घोल देने की परंपरा रही है और पूरे गांव के लोग एक जगह जमा होकर रंग डालो प्रतियोगिता करते हैं। कई दशक से हो रहे इस अनोखे होली की इस बार भी व्यापक तैयारी की गई है। मटिहानी गांव में इस चर्चित होली में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। गांव के लोग जहां होली खेलते हैं, वहीं इस अनोखे होली को देखने के लिए दूर-दूर से लोग जमा होते हैं। यहां हजारों लोग एक जगह जुटकर ब्रज की लठमार होली नहीं, बल्कि रंगों के बरसात की प्रतियोगिता में शामिल होते हैं। मटिहानी गांव में यह होली एक दिन नहीं, बल्कि दो दिन मनाई जाती है। अब कुएं की जगह नाद में रंग भरकर लोग खेलते हैं होली सबसे खास बात ये है कि कथित आधुनिकता के युग जहां कुआं विलुप्त हो गया है तो, यहां उसे जिंदा रखा गया है, कुआं पर ही सामूहिक होली खेली जाती है। हालांकि अब रंग कुआं में नहीं घोलकर बड़े-बड़े नाद में घोले जाते हैं। इसके लिए चंडिका स्थान सहित सभी जगहों पर नाद को साफ कर लिया गया है। प्रतियोगिता में शामिल होने वाले सहित अन्य लोग भी अलग-अलग पिचकारी कर चुके हैं। पहले दिन सभी लोग पांच कुआं के नजदीक जमा होते हैं तथा दो कतार में कई ड्रम, नांद एवं अन्य बड़े बर्तन में रंग रखा जाता है। इसके बाद दो पक्ष में बंटकर लोग अलग-अलग कतार में रंग के भरे बर्तन के सामने खड़े होकर तथा एक पक्ष दूसरे पक्ष पर पिचकारी से रंग डालते हैं। जो पक्ष दूसरे को रंग डालकर भागने पर मजबूर कर देगा, वह विजेता घोषित होता। दो खेमों में बंटे गांव के लोग पिचकारी से फेंकते हैं एक दूसरे पर रंग दो खेमों में बंटे गांव वालों ने कोई पिचकारी चलाता है, कोई पानी भरता है, कुछ लोग पूरे मुकाबले में तालमेल बनाए रखते हैं। गांव के बुजुर्ग और महिलाएं निर्णायक बनते हैं। विजेता के चयन का आधार है कि किस टीम ने विरोधी को रंग की धार से पीछे हटाया, किस टीम का पानी ज्यादा देर तक चलता रहा और किस टीम ने बेहतर तालमेल दिखाया। बेहतर प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कार के रूप में पिचकारी दी जाती है। यही सिलसिला होली के दूसरे दिन तीन कुआं पर चलने के बाद विजेता एवं उप विजेता घोषित किया जाता। रंगों की इस बरसात प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए बेहतर पिचकारी की आवश्यकता होती है। बाजार में बिकने वाली बड़ी पिचकारी की बात तो दूर प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए लोगों ने साइकिल में हवा देने वाले पंप एवं बांस की पिचकारी भी तैयार कर लिया है। 150 साल पुरानी है परंपरा, राजस्थान के माड़वार समाज से जुड़ा है इतिहास बुजुर्ग बताते हैं कि इस गांव में करीब 150 वर्ष पहले राजस्थान से आए माड़वार समाज के एक परिवार रहते थे, जो राजस्थान से पिचकारी लेकर यहां आए थे। पहली बार उन्होंने ही दो पक्ष में बांटकर कुआं पर होली की शुरूआत कराई। माड़वार समाज का वह परिवार अब यहां नहीं है। लेकिन परंपरा आज भी चल रहा है। इस होली में हर आम और खास लोग शामिल होते हैं। गांव से बाहर रहने वाले लोग भी होली के अवसर पर गांव पहुंचते हैं। परदेस से आए लोग पर्व के बाद फिर वापस परदेस जाने लगते हैं तो परिवार और समाज के लोग कुछ कहें या ना कहें, अगले होली में फिर आने की बात जरूर कहते हैं। गांव के बुजुर्ग राजेंद्र सिंह कहते हैं कि हम गांव वालों की कोशिश है कि सामाजिक एकता की यह परंपरा सदियों तक चलती रहे। हम अपनी अगली पीढ़ी को इसके ऐतिहासिकता की कहानी सुना रहे हैं। निश्चित रूप से हमारी परंपरा चलती रहेगी। यह होली केवल प्राकृतिक रंगों की होली खेली जाती है। परंपरा के अनुसार पहला मुकाबला मां चंडिका स्थान से शुरू होता है। इसके बाद चुमौना कुआं, हाजीपुर कुआं, पुराना दुनिया राय के दलान और बलदेव दास ठाकुरबाड़ी के पास रंग बरसाओ होली खेली जाती है। यहां बड़ी पिचकारियों का दबाव इतना तेज होता है कि हर कोई उन्हें आसानी से चला नहीं पाता है।

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Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला