उपेंद्र कुशवाहा पर भाजपा में पार्टी विलय का दबाव:मंगल पांडेय की सीट पर बेटे को नहीं बनाया MLC, विधायकों के विद्रोह का डर दिखाया जा रहा

May 1, 2026 - 14:08
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उपेंद्र कुशवाहा पर भाजपा में पार्टी विलय का दबाव:मंगल पांडेय की सीट पर बेटे को नहीं बनाया MLC, विधायकों के विद्रोह का डर दिखाया जा रहा
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अस्तित्व पर एक बार फिर खतरा मंडरा रहा है। खतरा उनकी सहयोगी BJP और अपने ही विधायक से है। सियासी गलियारे में चल रही चर्चा की मानें तो ‌BJP ने कुशवाहा के सामने बेटे को बिहार सरकार में मंत्री बनाने के लिए पार्टी के विलय का शर्त रखा है। दूसरी तरफ उनकी पार्टी के भीतर भी गुटबाजी बढ़ गई है। RLM के 4 विधायक हैं। विधायकों का एक धड़ा चाहता है कि पार्टी का विलय BJP में हो जाए। पार्टी बचाने के लिए उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पत्नी को विधायक और बेटे को मंत्री बनाया था, लेकिन अब स्थिति गंभीर हो गई है। आखिर BJP उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का विलय क्यों चाहती है? उपेंद्र कुशवाहा के सामने क्या विकल्प है? क्या बेटे के करियर के लिए कुशवाहा की पार्टी दांव पर है? पढ़िए रिपोर्ट…। सबसे पहले 2 पॉइंट में समझिए विलय की चर्चा क्यों? 1- दीपक प्रकाश के MLC पद को होल्ड किया 20 नवंबर 2025 को NDA सरकार का शपथ ग्रहण हुआ। मंत्रियों की लिस्ट में एक चौंकाने वाला नाम उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश का था। बिना किसी सदन का सदस्य बने आखिरी क्षण में दीपक को मंत्री बना दिया गया था। इन्हें मंत्री बनाने में BJP और खासकर गृह मंत्री अमित शाह की सहमति की बात सामने आई थी। यह तय किया गया था कि मंगल पांडेय के सीवान सदर सीट से विधायक बनने के बाद उनकी जगह खाली हुई MLC सीट से दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजा जाएगा। मंगल पांडेय के विधान परिषद का कार्यकाल 2030 तक बचा हुआ था। इस बीच नीतीश सरकार भंग हो गई। सम्राट चौधरी नए CM बने और कैबिनेट को होल्ड पर कर दिया गया। अब मंगल पांडेय की खाली सीट पर भी BJP की तरफ से मुख्यालय प्रभारी अरविंद शर्मा को कैंडिडेट बना दिया गया है। यानि कि दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने का फैसला फिलहाल होल्ड है। सियासी चर्चाओं की मानें तो ऐसा कर बीजेपी प्रेशर पॉलिटिक्स कर रही है। दावा किया जा रहा है कि अगर कुशवाहा मान जाते हैं तो जून में खाली हो रही विधान परिषद की 9 सीटों में से एक पर दीपक प्रकाश को पहले विधान परिषद भेजा जाएगा। इसके बाद उन्हें मंत्री बना दिया जाएगा। नहीं माने तो दीपक विधान परिषद नहीं जा पाएंगे। 2- अपने सबसे खास माधव आनंद के कार्यक्रम में नहीं आए कुशवाहा 27 अप्रैल को RLM के विधायक दल के नेता और मधुबनी विधायक माधव आनंद के बेटे आद्विक आनंद का जनेऊ कार्यक्रम पटना के एक बड़े होटल में हुआ। इसमें बिहार के CM सम्राट चौधरी, पूर्व CM नीतीश कुमार, विजय सिन्हा समेत बीजेपी, जदयू के सभी सीनियर और जूनियर विधायक पहुंचे। पार्टी सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। 26 अप्रैल तक वे बिहार के औरंगाबाद के अलग-अलग कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी और सासाराम की विधायक स्नेहलता कुशवाहा व उनके बेटे पूर्व मंत्री दीपक प्रकाश कार्यक्रम में शामिल हुए। उपेंद्र कुशवाहा के शामिल नहीं होने से इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के भीतर एक बार फिर से सब कुछ ठीक नहीं है। पार्टी के नेताओं का कुछ भी बोलने से इंकार, उपेंद्र कुशवाहा ने साधी चुप्पी क्या उपेंद्र कुशवाहा पर पार्टी के विलय का दबाव है? इसे समझने के लिए भास्कर ने पार्टी के अलग-अलग नेताओं से बात की। ऑन रिकॉर्ड सभी नेता इस पर उपेंद्र कुशवाहा से बात करने की सलाह देते हैं। लेकिन, ऑफ द रिकॉर्ड सभी अपनी बात खुल कर रखते हैं। सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पार्टी के विलय की बात चल रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और दिनारा विधायक आलोक सिंह ने भास्कर को बताया, ’हमें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है। राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा से भी इस मामले पर कोई बातचीत नहीं हुई है। वही इस पर कुछ भी स्पष्ट बता पाएंगे।’ वहीं, पार्टी के एक विधायक ने नाम नहीं छापने की रिक्वेस्ट पर बताया, ’ये बात सही है कि पार्टी पर विलय का दबाव है। इस मामले पर एक से दो राउंड की बातचीत भी हो गई है। आगे का निर्णय जल्द आप लोगों के सामने आ जाएगा।’ वहीं, इस पूरे मामले पर उपेंद्र कुशवाहा चुप्पी साधे हुए हैं। वे इस पर कुछ भी बोलने से इनकार कर रहे हैं। बीजेपी क्यों कराना चाहती है कुशवाहा की पार्टी का विलय? NDA के भीतर सम्राट के अलावा दूसरा कुशवाहा लीडर नहीं चाहती BJP 2018 से लगातार सम्राट चौधरी को कुशवाहा नेता के रूप में प्रोजेक्ट कर रही है। अब जब सम्राट चौधरी को CM बना दिया गया है तो पार्टी नहीं चाहती कि किसी दूसरे कुशवाहा लीडर को आगे बढ़ाया जाए। पार्टी सिंगल लीडर को आगे बढ़ाना चाहती है ताकि सम्राट की स्वीकार्यता राज्य के कुशवाहा नेता के तौर पर हो। अगर उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी के साथ आगे बढ़ते हैं तो इसका सबसे ज्यादा खामियाजा सम्राट चौधरी को होगा। उपेंद्र कुशवाहा भले पिछले कुछ चुनाव लगातार हार रहे हों, NDA के सपोर्ट से अपने 4 विधायक जीताने में सफल हों, लेकिन अभी भी बिहार में कुशवाहा नेता के तौर अपनी स्वीकार्यता है। BJP पर लग रहा है, परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप उपेंद्र कुशवाहा ने 2025 के विधानसभा चुनाव में पहली बार अपने परिवार को पॉलिटिक्स में उतारा था। वे खुद पहले से राज्यसभा सदस्य थे। विधानसभा चुनाव में पत्नी को सासाराम सीट से उम्मीदवार बना दिया। वह जीतकर विधायक बनीं। कुशवाहा ने किसी विधायक की जगह अपने बेटे को मंत्री बनवा दिया। इससे उपेंद्र कुशवाहा के परिवार को आगे बढ़ाने का आरोप सीधे तौर पर BJP पर लग रहा है। उपेंद्र कुशवाहा के आने से मगध-शाहाबाद में भाजपा को मजबूती मिलेगी उपेंद्र कुशवाहा भले कमजोर हुए हों, लेकिन मगध और शाहाबाद में इनकी अपनी एक पकड़ है। इनका मगध, शाहाबाद, सीवान, भागलपुर-बांका, पूर्णिया और बेतिया-मोतिहारी इलाके की 40 से 45 सीटों पर प्रभाव है। ‌BJP इसे भुनाना चाहती है। 2020 में जिस मगध की 47 में से सिर्फ 18 सीटें NDA को मिली थी। 2025 में उपेंद्र कुशवाहा के NDA में आने के बाद आंकड़ा 40 सीट तक पहुंच गया। मतलब 22 ज्यादा। 2020 में शाहाबाद में सिर्फ 2 सीट जीतने वाला NDA 2025 में 19 सीट पर पहुंच गया है। मतलब 17 ज्यादा। अब समझिए, कुशवाहा के लिए विलय की मजबूरी क्यों? बेटे के भविष्य के लिए कर सकते हैं समझौता दीपक प्रकाश 2025 में पहली बार पॉलिटिक्स में आए थे। उन्हें सीधे मंत्री बनाया गया था, लेकिन 100 दिन के भीतर मंत्री से पूर्व मंत्री हो गए। इस समय न विधायक हैं और न विधान पार्षद। ऐसे में दीपक प्रकाश के सामने करियर शुरू होने से पहले ही समाप्त होने का खतरा है। उपेंद्र कुशवाहा ऐसा नहीं चाहेंगे। बिहार की सियासत में जनरेशन शिफ्ट के इस दौर में उनकी पूरी कोशिश बेटे को पॉलिटिक्स में स्थापित करने की है। सम्राट के CM बनने के बाद कुशवाहा लीडरशिप की संभावना खत्म उपेंद्र कुशवाहा की पूरी पॉलिटिक्स कुशवाहा केंद्रित रही है। नीतीश कुमार के साथ राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पूरी राजनीति लव-कुश के इर्द-गिर्द की है। नीतीश कुमार अब एक तरीके से मार्गदर्शक मंडल में चले गए हैं। कुशवाहा 2015 से लगातार स्ट्रगल कर रहे हैं। अब जब बिहार की सियासत में सम्राट चौधरी का उदय हो गया है तो NDA के भीतर किसी दूसरे कुशवाहा लीडरशिप की संभावना लगभग समाप्त हो गई है। पार्टी के भीतर के विद्रोह को रोकना मुश्किल चुनाव जीतने के ठीक एक महीने बाद दिसंबर में ही उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के भीतर विद्रोह शुरू हो गया था। इनके 4 में से 3 विधायक (रामेश्वर महतो, आलोक सिंह और माधव आनंद) अपने नेता का विरोध करने लगे थे। रामेश्वर ने मुखर तौर अपने विरोध किया। आलोक सिंह और माधव आनंद ने उन्हें समर्थन दिया। ये सभी कुशवाहा के बेटे को मंत्री बनाने से नाराज थे। केवल एक विधायक स्नेहलता (उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी) साथ थीं। उस समय आलोक सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर किसी तरह विरोध शांत किया गया था। अब एक बार फिर से विधायकों की नाराजगी की बात सामने आ रही है। अगर उपेंद्र कुशवाहा नहीं मानते हैं तो ये तीनों विधायक BJP के साथ जा सकते हैं। इसके बाद पार्टी और सरकार में शामिल होने का मौका दोनों कुशवाहा के हाथ से छिन जाएगा।

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Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला