ब्रिटिश क्राउन में जड़े कोहिनूर की असल कीमत क्या है? जोहरान ममदानी के बयान के बीच जान लीजिए जवाब
ब्रिटिश राजघराने की शान और इतिहास के सबसे विवादास्पद रत्नों में शुमार कोहिनूर एक बार फिर वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गया है. न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के एक साहसी बयान ने सदियों पुराने औपनिवेशिक घावों को फिर से हरा कर दिया है. किंग चार्ल्स III की अमेरिका यात्रा के दौरान कोहिनूर को भारत वापस लौटाने की मांग ने न केवल कूटनीतिक हलकों में हलचल मचाई है, बल्कि उस बेशकीमती हीरे की असल कीमत और उसके पीछे के खूनी संघर्षों को भी सुर्खियों में ला दिया है. यह मुद्दा अब केवल एक आभूषण का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत की बहाली का प्रतीक बन चुका है. आइए इसकी कीमत जानें.
ममदानी का ऐतिहासिक बयान
ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स III और रानी कैमिला इन दिनों न्यूयॉर्क के दौरे पर हैं. इस यात्रा के बीच न्यूयॉर्क के युवा मेयर जोहरान ममदानी ने एक ऐसी मांग रख दी है, जिसने हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब ममदानी से पूछा गया कि किंग चार्ल्स से मुलाकात के दौरान उनका क्या संदेश होगा, तो उन्होंने दो टूक कहा कि वे किंग से कोहिनूर हीरा भारत को वापस लौटाने की बात करेंगे. ममदानी का यह बयान उस समय आया है जब दुनिया भर में औपनिवेशिक काल के दौरान लूटी गई संपत्तियों को उनके मूल देशों को वापस करने की बहस तेज है.
कोहिनूर की अनकही कीमत
कोहिनूर हीरा केवल एक पत्थर नहीं है, बल्कि यह दुनिया का सबसे नायाब और शुद्ध हीरा माना जाता है. 100 कैरेट से अधिक की शुद्धता वाला यह हीरा अपनी बनावट और चमक में अद्वितीय है. अगर इसकी आर्थिक कीमत की बात करें, तो विशेषज्ञों और विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार मौजूदा दौर में इसकी कीमत लगभग 1 अरब अमेरिकी डॉलर आंकी गई है. भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब 9,540 करोड़ रुपये बैठती है. हालांकि, इतिहासकारों का मानना है कि कोहिनूर जैसी ऐतिहासिक वस्तु की कीमत रुपयों में आंकना नामुमकिन है, क्योंकि इसका सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व अनमोल है.
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10 साल के राजा से अंग्रेजों ने छीनी विरासत
कोहिनूर के भारत से ब्रिटेन जाने की कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है. साल 1849 में दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब पर अधिकार कर लिया था. उस समय पंजाब के महाराजा दलीप सिंह की उम्र महज 10 साल थी. ब्रिटिश अधिकारियों ने छोटे से बालक महाराजा को लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया. इस संधि की एक प्रमुख और कठोर शर्त यह थी कि कोहिनूर हीरा हमेशा के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया जाएगा. इस तरह छल और बल के दम पर भारत की यह विरासत सात समंदर पार चली गई.
महारानी विक्टोरिया को तोहफा
ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब कोहिनूर पर कब्जा कर लिया, तो इसे तत्कालीन ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को सौंपने का निर्णय लिया गया. लंदन पहुंचने के बाद इसे ब्रिटिश क्राउन ज्वेल (राजसी आभूषणों) का हिस्सा बना दिया गया. समय के साथ इसे कई बार तराशा गया ताकि इसकी चमक और बढ़ सके. यह हीरा लंबे समय तक दिवंगत महारानी एलिजाबेथ II के ताज की शोभा बढ़ाता रहा. भारत ने आजादी के बाद से कई बार आधिकारिक रूप से कोहिनूर की वापसी की मांग की है, लेकिन हर बार ब्रिटिश सरकार ने इसे संधि का हिस्सा बताकर लौटाने से इनकार कर दिया है.
लंदन के टॉवर में कैद है चमक
वर्तमान में कोहिनूर हीरा किसी के सिर पर नहीं सज रहा, बल्कि इसे लंदन के टॉवर (Tower of London) में कड़ी सुरक्षा के बीच रखा गया है. यह वहां की प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण है जिसे देखने दुनिया भर से सैलानी पहुंचते हैं. किंग चार्ल्स III के राज्याभिषेक के समय भी यह उम्मीद जताई गई थी कि शायद अब इसे भारत को सौंपने की प्रक्रिया शुरू हो, लेकिन ब्रिटिश राजतंत्र ने अपनी परंपराओं का हवाला देते हुए इसे राजकोष का हिस्सा बनाए रखा है. ममदानी के ताजा बयान ने अब इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर फिर से जीवित कर दिया है.
क्या वापस आएगा भारत का गौरव?
जोहरान ममदानी ने जिस तरह सार्वजनिक रूप से किंग चार्ल्स के सामने कोहिनूर की वापसी का मुद्दा उठाने की बात कही है, उसने ब्रिटेन पर एक नैतिक दबाव बना दिया है. भारत सरकार और देश की जनता का हमेशा से मानना रहा है कि कोहिनूर कोई उपहार नहीं था, बल्कि इसे लूट के जरिए ले जाया गया था. हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियां जटिल हैं, लेकिन ममदानी जैसे युवा नेताओं के बयान दुनिया भर में इस धारणा को मजबूत कर रहे हैं कि अब ब्रिटेन को अपने औपनिवेशिक अतीत की गलतियों को सुधारना चाहिए और कोहिनूर को उसके असली घर यानी भारत वापस भेज देना चाहिए.
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