चंग की थाप से गूंजता है किशनगंज शहर:ठाकुरगंज के मारवाड़ी समाज की सूखी होली, पानी बचाने का संदेश; 5 साल पहले लिया गया था संकल्प

Mar 4, 2026 - 09:54
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चंग की थाप से गूंजता है किशनगंज शहर:ठाकुरगंज के मारवाड़ी समाज की सूखी होली, पानी बचाने का संदेश; 5 साल पहले लिया गया था संकल्प
होली के रंग हर साल आते हैं, लेकिन इस बार किशनगंज की गलियों में उत्सव ने कुछ अलग ही रंग बिखेरे हैं। शहर के बाजारों में राजस्थानी चंग की तालों पर थिरकते युवा और दूसरी ओर ठाकुरगंज में मारवाड़ी समाज की सूखी होली दोनों मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं, जो संदेश भी देता है और संस्कृति का गर्व भी बढ़ाता है। जहां मुख्य बाजारों में राजस्थानी लोकधुनें हवा को रंगीन कर रही हैं। वहीं, ठाकुरगंज के मारवाड़ी समाज के लोग जल संरक्षण का संदेश देते हुए सूखे गुलाल और पुष्पों से होली मनाने की तैयारी में जुटे हैं। एक ओर चंग की गूंजती थाप पर उत्सव की मस्ती है, वहीं दूसरी ओर बिना पानी के रंगों की सौम्यता और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भाव किशनगंज की यह होली सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक चेतना का अनोखा संगम बन गई है। राजस्थानी धुनें बनीं शहर की पहचान होली में रंग से पहले किशनगंज रंगों की आवाज से चंग की आवाज से रंग जाता है। बाजार, मेन रोड, लाइन बाजार, इसाकचक्की, नया टोला और छोटी-बड़ी तमाम गलियों में जब युवाओं की टोली चंग बजाते हुए निकलती है, तो भीड़ खुद-ब-खुद खिंच आती है। दूर से आती थाप से ही लोग समझ जाते हैं होली करीब है। धुनें राजस्थानी हैं, लेकिन उत्साह किशनगंज का है। युवाओं के पैर खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। बच्चे तालियां बजाते हुए टोली के साथ चल पड़ते हैं। दुकानदार भी दुकान से बाहर निकलकर माहौल का आनंद लेने लगते हैं। पूरे शहर में एक ही दृश्य चंग की थाप पर पूरा किशनगंज झूमता है। कई बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा दशकों पुरानी है। कभी राजस्थान से आए कुछ परिवार अपने लोकगीतों, लोकनृत्यों और चंग की संस्कृति के साथ यहां बसे हैं। धीरे-धीरे यह परंपरा सिर्फ एक समुदाय की नहीं रही पूरे शहर ने इसे अपनाया गया है। आज तीसरी-चौथी पीढ़ी इस संस्कृति को गर्व और ऊर्जा के साथ आगे बढ़ा रही है। राजस्थान की मिट्टी की धुनें अब किशनगंज की पहचान बन चुकी हैं। परंपरा और आधुनिकता का मेल युवा भी निभा रहे विरासत चंग बजाने वाली टोलियों में शामिल युवा ज्यादातर आधुनिक कपड़ों में होते हैं। लेकिन जैसे ही धुन शुरू होती है, चेहरे पर चमक और कदमों में जोश ऐसा दिखता है मानो पीढ़ियों पुरानी कला उनके भीतर ही बसती हो। गीतों के बोल समझ आएं या न आएं, उनकी लय हर किसी को जोड़ देती है। कई लोगों की यही प्रतिक्रिया है। यह सिर्फ संगीत नहीं सांस्कृतिक एकता का उत्सव है। यह भावना कि एक परंपरा किसी भाषा, क्षेत्र या समुदाय से बंधी नहीं होती जहां प्रेम और अपनापन मिलता है, वहीं फलती-फूलती है। किशनगंज इसका जीवंत उदाहरण है। जल बचाओ, सूखी होली खेलो दूसरी ओर ठाकुरगंज नगर की होली एक बिल्कुल अलग और प्रेरणादायक कहानी बयां करती है। होली के दिन जहां कई जगह पानी में रंग घोलकर एक-दूसरे को भिगोने की परंपरा है, वहीं ठाकुरगंज का मारवाड़ी समाज पिछले पांच साल से केवल सूखे रंग, गुलाल और पुष्पों से होली खेल रहा है। एक अद्भुत उदाहरण उत्सव भी, जिम्मेदारी भी। हर साल की तरह इस साल भी होली की शुरुआत जगन्नाथ मंदिर में होगी। सबसे पहले भगवान जगन्नाथ को गुलाल अर्पित किया जाएगा, फिर समाज के लोग बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने के बाद उत्सव की शुरुआत करेंगे। पूरे दिन लोग गुलाल और फूलों से एक-दूसरे को रंगते हैं, लेकिन पानी की एक बूंद भी बर्बाद नहीं होने देते हैं। ‘जल ही जीवन है’, पांच साल पहले लिया था संकल्प मारवाड़ी समाज के लोगों ने बताया कि 5 साल पहले उन्होंने होली पर पानी की बर्बादी रोकने का संकल्प लिया था।जल को बनाया नहीं जा सकता, केवल बचाया जा सकता है। इसी सोच के साथ देवकी अग्रवाल, श्यामा पेडिवाल, मोहन जैन, राजेश जैन, अमित अग्रवाल सहित अन्य सदस्यों ने तय किया कि होली पानी से नहीं, गुलाल और फूलों से खेली जाएगी। इस संकल्प को उन्होंने निभाया भी और समाज का हर सदस्य इसे गर्व से आगे बढ़ा रहा है। क्योंकि यह भी सच है, होली में रंग खेलने के बाद नहाने में भी हजारों लीटर पानी एक शहर में खर्च हो जाता है, जबकि आज दुनिया जल संकट से जूझ रही है। ठाकुरगंज का यह फैसला उत्सव को बचाते हुए प्रकृति को भी बचाता है। सूखी होली बनी मिसाल, दूसरे समाज भी प्रेरित इस परंपरा का प्रभाव अब बाकी इलाकों में भी दिख रहा है। कई युवा समूह, स्कूल और संस्थाएं भी इस बार पानी बचाने की अपील कर रहे हैं। पिछले 2 सालों में किशनगंज और आसपास के कई परिवारों ने सूखी होली अपनाना शुरू किया है। मारवाड़ी समाज कहता है, पानी से भिगोकर खेलने से त्योहार की खुशी तो होती है, लेकिन जिम्मेदारी वहीं मर जाती है। पुष्प और गुलाल से खेली गई होली में भी उतना ही आनंद है, बस दिल में पानी बचाने की भावना जोड़नी होती है। उनकी यह सोच और अनुशासन इस होली को और खास बनाता है। किशनगंज की दो पहचान, एक ही संदेश एक तरफ रंगों की धुनों पर नाचने वाला उत्साह, दूसरी तरफ प्रकृति को बचाने का संकल्प है। दोनों मिलकर किशनगंज को होली के मौसम में एक अलग ही रंग देते हैं। चंग की थाप बताती है कि विरासत जीवित है। वहीं, सूखी होली सिखाती है कि जिम्मेदारी भी जरूरी है। किशनगंज की यह होली सिर्फ त्योहार नहीं यह संस्कृति, चेतना और सामाजिक सामंजस्य की कहानी है। बाजारों में खुशी की लहर, व्यापारी भी उत्साहित चंग की टोली जैसे ही बाजार में पहुंचती है, माहौल अचानक बदल जाता है। दुकानदार बताते हैं कि इससे खरीदारी भी बढ़ जाती है। लोग झूमते हुए दुकान के पास आते हैं और खुशी में ज्यादा सामान खरीदते हैं। एक मिठाई दुकानदार ने बताया, रंग, अबीर, गुलाल, पिचकारी, टोपी सभी दुकानों पर भीड़ है। कई दुकानों पर पुष्प-गुलाल की भी पूछ बढ़ गई है, क्योंकि लोग अब पानी बचाने वाली होली का समर्थन करने लगे हैं। बच्चों के लिए दोहरी खुशी बच्चों के चेहरे पर इस बार दोगुना उत्साह है। चंग की धुन सुनते ही बच्चे टोली के पीछे-पीछे दौड़ते हैं। वहीं, दूसरी तरफ सूखी होली से वे खुश हैं, क्योंकि इससे उनके कपड़े खराब भी नहीं होते और पानी की ठंड से तबीयत बिगड़ने का डर भी नहीं रहता है। परंपराएं सीमाओं में नहीं दिलों में बसती हैं किशनगंज ने यह साबित कर दिया कि परंपराएं सिर्फ जगहों से नहीं बनतीं दिलों से बनती हैं। राजस्थान की धुनें यहां की पहचान बन गईं, तो ठाकुरगंज की सूखी होली समाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं यह बताती है कि संस्कृति और संवेदनशीलता साथ-साथ चलें तो त्योहार और खूबसूरत हो जाता है। कुल मिलाकर किशनगंज की होली अनोखी है न रंगों की कमी, न उत्साह की कमी, न जिम्मेदारी की कमी किशनगंज की होली में चंग की मस्ती है। फूलों की खुशबू है, गुलाल की उड़ान है, और पानी बचाने का संदेश भी है। यही बताता है किशनगंज केवल त्योहार नहीं मनाता उसे सार्थक भी बनाता है।

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Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला