सऊदी अरब और ईरान दोनों मुस्लिम देश, फिर इनमें क्यों खिंची दुश्मनी की तलवार?

Mar 4, 2026 - 09:52
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सऊदी अरब और ईरान दोनों मुस्लिम देश, फिर इनमें क्यों खिंची दुश्मनी की तलवार?

ईरान पर जिस वक्त इजरायल और अमेरिका ने हमला किया, तब तक किसी को अंदाजा नहीं था कि जंग की यह शुरुआत पूरे मिडिल ईस्ट को अपनी चपेट में ले लेगी. ईरान ने जैसे ही अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को खोया, उसने पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. ईरान ने सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन जैसे खाड़ी देशों पर मिसाइलों से हमले किए, जिसने पूरे मिडिल ईस्ट को जंग के दरवाजे पर खड़ा कर दिया. 

मिडिल ईस्ट पर किए गए इन ईरानी हमलों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा सऊदी अरब की हो रही है. दरअसल, ईरान और सऊदी अरब भले ही मुस्लिम देश हों, लेकिन दोनों एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं. अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अपने ऊपर हुए ईरानी हमलों का सऊदी अरब कैसे जवाब देता है. ऐसे में चलिए जानते हैं कि मुस्लिम देश होने के बाद भी ईरान और सऊदी अरब में दुश्मनी क्यों है, क्या है इन दोनों देशों का इतिहास? 

अभी तक सऊदी अरब में क्या हुआ?

अमेरिकी नेतृत्व में ईरान पर हुए इजरायली हमले के बाद IRGC की तीखी प्रतिक्रिया से सऊदी अरब हैरान है. ईरान पर जैसे ही हमला हुआ, उसने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाना शुरू किया, इसमें सऊदी अरब में भी ठिकाने शामिल थे. धीरे-धीरे ईरान ने अपने हमलों को तेज किया और इसी बीच खबर आई कि ईरानी ड्रोन ने सऊदी अरब में दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी रास तनुरा को निशाना बनाया. सऊदी अरब ने इस हमले को नाकाम कर दिया, लेकिन इसके तुरंत बाद रिफाइनरी को अस्थाई तौर पर बंद करना पड़ा, जिसके बाद दुनिया पर बड़े तेल संकट बादल मंडराने लगे हैं. 

क्या है ईरान और सऊदी अरब का इतिहास?

सऊदी अरब और ईरान मध्य पूर्व के दो बड़े देश माने जाते हैं. दोनों ही देशों की आबादी मुस्लिम धर्म को मानने वाली है, लेकिन जब भी इन दोनों का नाम एक साथ सुनाई देता है तो आंखों के सामने युद्ध की तस्वीर उभर जाती है. ऐसा भी कहा जाता है कि मिडिल ईस्ट में शांति बनाए रखने और इसे भंग करने में ईरान और यूएई का ही हाथ होता है. दोनों देश मिडिल ईस्ट में अपना प्रभाव जमाने के लिए लंबे वक्त से संघर्ष में जूझ रहे हैं. दोनों मुस्लिम देश होने के बाद भी इनकी दुश्मनी को धार्मिक मतभेदों ने बढ़ावा दिया है . 

दरअसल ईरान में बड़ी संख्या में शिया मुस्लिम आबादी रहती है, वहीं अरब  सुन्नी बाहुल्य लोगों का देश है. इन दोनों देशों के बीच धर्म का यह बंटवारा साफ तौर पर नजर आता है. कई मुल्क ऐसे हैं जहां शिया की आबादी है तो वहीं कुछ देशों में सुन्नी लोग बहुतायत में रहते हैं. ऐसे में समर्थन और विरोध के लिए ये ईरान और सऊदी अरब का साथ देते हैं. 

मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की जंग

मध्य पूर्व की राजनीति में सऊदी अरब और ईरान के बीच टकराव सिर्फ दो देशों का विवाद नहीं है, बल्कि यह मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व, प्रभाव और विचारधारा की सीधी भिड़ंत है. एक ओर राजशाही व्यवस्था वाला सऊदी अरब है, जो खुद को इस्लाम का केंद्र मानता है. दूसरी ओर 1979 की क्रांति के बाद उभरा ईरान है, जिसने धार्मिक शासन मॉडल के जरिए पूरे क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की नीति अपनाई है. 

कहां से हुई दोनों देशों में तकरार की असली शुरुआत?

1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई. इस क्रांति के नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी थे. उनके नेतृत्व में ईरान में शाह की सत्ता खत्म हुई और एक धार्मिक शासन प्रणाली स्थापित की गई. इसके बाद ईरान ने खुद को सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक वैचारिक मॉडल के रूप में पेश किया.

सऊदी अरब पहले से ही इस्लाम के पवित्र शहरों का संरक्षक होने के कारण खुद को मुस्लिम दुनिया का स्वाभाविक नेता मानता रहा है, लेकिन ईरान की क्रांति ने इस दावे को सीधी चुनौती दी. ईरान ने शिया समुदाय के जरिए क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की रणनीति अपनाई, जबकि सऊदी खुद को सुन्नी नेतृत्व का केंद्र मानता है. बस यहीं से वैचारिक और सामरिक संघर्ष की नींव पड़ी.

इराक युद्ध से बदला ताकत का संतुलन

2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला कर सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया. सद्दाम हुसैन सुन्नी थे, जबकि इराक की आबादी शिया बहुल है. उनके हटने के बाद बगदाद में शिया नेतृत्व वाली सरकार बनी और वहां ईरान का प्रभाव तेजी से बढ़ा. अब इराक, जो पहले सऊदी के लिए संतुलन का काम करता था, वो धीरे-धीरे ईरान के प्रभाव क्षेत्र में जाता नजर आने लगा. इससे सऊदी की रणनीतिक चिंता बढ़ गई और दोनों देशों के बीच अविश्वास गहराता गया.

अरब क्रांति और देशों का बढ़ता दखल

इसके बाद साल 2011 में अरब देशों में राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हुई, जिसे अरब क्रांति कहा गया. इस अस्थिरता ने कई देशों की सरकारों को कमजोर किया. सऊदी और ईरान ने इस मौके का इस्तेमाल अपने-अपने हित मजबूत करने के लिए किया. सीरिया में ईरान ने राष्ट्रपति बशर अल-असद का खुलकर समर्थन किया. इसके विपरीत सऊदी ने विद्रोही गुटों का साथ दिया. अब इसका नतीजा यह हुआ कि सीरिया युद्ध दोनों देशों की परोक्ष जंग में बदल गया. यहां भी ईरान की रणनीति यह रही कि इराक, सीरिया और लेबनान के जरिए भूमध्य सागर तक अपना एक प्रभाव क्षेत्र बनाया जाए, लेकिन सऊदी इसे अपने लिए खतरा मानता है.

यमन में हूती विद्रोहियों का विवाद

यमन में हूती विद्रोहियों का उभार सऊदी के लिए बड़ी चुनौती बना. सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया. सऊदी का आरोप है कि ईरान हूतियों को हथियार और समर्थन देता है. ईरान इन आरोपों को नकारता है, लेकिन क्षेत्रीय विशेषज्ञ मानते हैं कि हूती समूह के जरिए ईरान यमन में प्रभाव बढ़ाना चाहता है. कई सालों की लड़ाई के बाद भी सऊदी को निर्णायक सफलता नहीं मिली, जिससे उसकी रणनीतिक स्थिति कमजोर दिखी.

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लेबनान और हिजबुल्लाह फैक्टर

लेबनान में शिया संगठन हिजबुल्लाह का मजबूत प्रभाव है. यह संगठन राजनीतिक और सैन्य दोनों रूपों में ताकतवर है और ईरान का करीबी सहयोगी माना जाता है. 2017 में लेबनान में सऊदी अरब ने अपने समर्थन वाले प्रधानमंत्री साद हरीरी ने अचानक इस्तीफा देने पर मजबूर किया था. यह कदम हिजबुल्लाह की बढ़ती राजनीतिक ताकत को रोकने की कोशिश के रूप में देखा गया. 

सिर्फ इतना ही नहीं इजराइल और सऊदी अरब के बीच भले दुश्मनी हो, लेकिन दोनों को ही ईरान से खतरा है. अब पुरानी कहावत कि दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त है, इसीलिए ईरान के प्रभाव को रोकने के लिए इजरायल भी सऊदी अरब का साथ देता है.

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Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला