सूचना मांगने पर 20 साल में 21 लोगों की हत्या, 600 पर हमले व झूठे मुकदमे
प्रवीण कुमार शर्मा ने 27 दिसंबर 2018 को मधेपुरा जिले के रतवारा थाना से सूचना मांगी कि किशनपुर रतवारा ओपी में 1 नवंबर 2018 से 27 दिसंबर 2018 तक धारा 107 और 144 के तहत दर्ज मामलों तथा की गई कार्रवाइयों का ब्यौरा दिया जाए। इसके बाद उन पर न केवल जानलेवा हमला हुआ, बल्कि उनका सामान भी छीन लिया गया। आरोप है कि उल्टे उसी थाने में 28 जून 2019 को उनके खिलाफ झूठी प्राथमिकी दर्ज कर दी गई, ताकि वे कानूनी प्रक्रिया में उलझकर अपनी मांग वापस ले लें। — प्रवीण कुमार शर्मा (भागलपुर) बिहार में सूचना का अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ताओं के लिए यह कानून मानो मौत का परवाना बनता जा रहा है। 2006 से 2026 के बीच के आंकड़े गवाही देते हैं कि यहां सूचना मांगना सिस्टम के ‘अंधेरे कोनों’ में टॉर्च जलाने जैसा है, जिसकी सजा प्रताड़ना और मौत तक पहुंच रही है। बीते 20 वर्षों में 21 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है। सरकार के मुख्य सचिव और मुख्य सूचना आयुक्त को पत्र लिखकर विभिन्न जिलों के कार्यकर्ताओं ने बताया है कि सरकारी कार्यालयों के भीतर लोक सूचना पदाधिकारी, ठेकेदार और अपराधी मिलकर एक त्रिकोण बना चुके हैं। जब कोई कार्यकर्ता फाइलें खंगालने की कोशिश करता है, तो उसे पहले प्रशासनिक बाधाओं में उलझाया जाता है, फिर झूठे मुकदमों (एससी/एसटी एक्ट या महिला उत्पीड़न) में फंसाया जाता है और अंत में रास्ते से हटा दिया जाता है। (शेष पेज-18 पर) इन उदाहरणों से समझें… दमन की दास्तान मधेपुरा के आलमनगर अंचल कार्यालय में भ्रष्टाचार और ‘निजी मुंशियों’ द्वारा की जा रही अवैध वसूली के खिलाफ शंभू यादव ने आवाज उठाई। 20 दिसंबर को आलमनगर थाना से जनता दरबार के अभिलेख तथा 22 दिसंबर 2025 को आलमनगर अंचल कार्यालय का सीसीटीवी फुटेज मांगने की कीमत उन्हें 4 जनवरी 2026 को जानलेवा हमले के रूप में चुकानी पड़ी। उल्टे लूट और मारपीट जैसे संगीन मामलों में उन्हें केस भी झेलना पड़ा। — शंभू यादव (मधेपुरा) आंकड़ों का आईना : दो दशक का खूनी खेल साल 2006 से 2026 तक के आंकड़े राज्य की कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। इन 20 वर्षों में बिहार में 600 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हुए या उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाया गया। सबसे भयावह आंकड़ा मौतों का है। अब तक 21 कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है। राज्य सूचना आयोग ने कई मामलों में अधिकारियों पर 25,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया, लेकिन यह राशि उन लोगों के लिए मामूली है जो करोड़ों के घोटाले छिपा रहे हैं। कार्यकर्ताओं के विरुद्ध दर्ज होने वाले 70% मुकदमे फर्जी पाए गए हैं, जो केवल डराने के उद्देश्य से किए जाते हैं। आवेदक की हत्या के साथ ही दफन हो जाती है उसकी मांगी गई सूचना, यह इंसाफ का अंत कानून की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यदि सूचना मांगने वाले की हत्या हो जाए, तो वह सूचना उसके परिजनों को नहीं दी जाती। भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों के लिए हत्या कराना एक आसान विकल्प बन गया है, क्योंकि मौत के साथ ही वह राज (सूचना) भी दफन हो जाता है। इसके अलावा, कार्यकर्ताओं पर एससी/एसटी एक्ट और महिला छेड़खानी जैसे मामलों में झूठे केस दर्ज कराना अधिकारियों की सोची-समझी रणनीति बन चुकी है। बढ़ते खतरे के कारण कई कार्यकर्ताओं ने सूचना मांगना बंद कर दिया है। शिवप्रकाश राय, संयोजक, नागरिक अधिकार मंच लोकतंत्र के सजग प्रहरियों पर वार: 2006 से 2026 तक के आंकड़े कार्यकर्ताओं का दर्द बयां कर रहे हैं। दस्तावेज बताते हैं कि सूचना कार्यकर्ताओं पर हमले और फर्जी केस लगातार दर्ज किए जा रहे हैं।
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