आज का राशिफल और पंचांग विज्ञान तकनीक सहयोग संगठन और यह नियंत्रण कार्यक्रम प्रस्तुत रिपोर्ट तैयार किए

मीनाक्षी सहरावत पहुंच गई है गोवा सरकार की नींव हिलाने के लिए 🚩 चाटुकारों के अनुसार यह भी रंग सियार है 😂

May 22, 2026 - 06:58
Updated: 18 hours ago
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आज का राशिफल और पंचांग विज्ञान तकनीक सहयोग संगठन और यह नियंत्रण कार्यक्रम प्रस्तुत रिपोर्ट तैयार किए
Jitendra Kumar

Tejraftarnews.in: *🌞~ वैदिक हिन्दू पंचांग ~🌞*

*⛅दिनांक - 22 मई 2026*

*⛅दिन - शुक्रवार*

*⛅विक्रम संवत् - 2083*

*⛅अयन - उत्तरायण*

*⛅ऋतु - ग्रीष्म*

*⛅मास - अधिक ज्येष्ठ* 

*⛅पक्ष - शुक्ल*

*⛅तिथि - षष्ठी प्रातः 06:24 तक, तत्पश्चात् सप्तमी प्रातः 05:04 मई 23 तक, तत्पश्चात् अष्टमी*

*⛅नक्षत्र - अश्लेशा मध्यरात्रि 02:08 तक तत्पश्चात् मघा*

*⛅योग - वृद्धि सुबह 08:19 तक तत्पश्चात् ध्रुव*

*⛅राहुकाल - सुबह 10:44 से दोपहर 12:24 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* 

*⛅सूर्योदय - 05:43*

*⛅सूर्यास्त - 07:04 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार)*

*⛅दिशा शूल - पश्चिम दिशा में*

*⛅ब्रह्ममुहूर्त - प्रातः 04:18 से प्रातः 05:00 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*

*⛅अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 11:57 से दोपहर 12:50 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*

*⛅निशिता मुहूर्त - मध्यरात्रि 12:02 से मध्यरात्रि 12:45 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*

*🌥️विशेष -‌ षष्ठी को नीम की पत्ती फल या दातून से मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है एवं सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग बढ़ता है तथा शरीर का नाश होता है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*

🌷 *श्रीमद्भागवत पुराण* 🌷

🙏🏻 *श्रीमद्भागवत पुराण हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। इस ग्रंथ की रचना आज से लगभग 5000 साल पहले कर दी गई थी। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि कलयुग में क्या-क्या घटित होगा इसकी भविष्यवाणी भागवत पुराण में पहले ही दे दी गई थी। जानिए श्रीमद्भागवत पुराण में की गई कलियुग से जुड़ी 10 भविष्यवाणियां..*

 1⃣ *ततश्चानुदिनं धर्मः सत्यं शौचं क्षमा दया ।*

*कालेन बलिना राजन् नङ्‌क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः ॥*

  💥 *अर्थ - कलयुग में धर्म, स्वच्छता, सत्यवादिता, स्मृति, शारीरक शक्ति, दया भाव और जीवन की अवधि दिन-दिन घटती जाएगी.*

2⃣ *वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।*

*धर्मन्याय व्यवस्थायां कारणं बलमेव हि ॥*

 💥 *अर्थ - कलयुग में वही व्यक्ति गुणी माना जायेगा जिसके पास ज्यादा धन है. न्याय और कानून सिर्फ एक शक्ति के आधार पे होगा !*    

  3⃣ *दाम्पत्येऽभिरुचि र्हेतुः मायैव व्यावहारिके ।*

*स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिः विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥*

💥 *अर्थ - कलयुग में स्त्री-पुरुष बिना विवाह के केवल रूचि के अनुसार ही रहेंगे.*

*व्यापार की सफलता के लिए मनुष्य छल करेगा और ब्राह्मण सिर्फ नाम के होंगे.*

 4⃣ *लिङ्‌गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।*

*अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वचः ॥*

💥 *अर्थ - घूस देने वाले व्यक्ति ही न्याय पा सकेंगे और जो धन नहीं खर्च करेगा उसे न्याय के लिए दर-दर की ठोकरे खानी होंगी. स्वार्थी और चालाक लोगों को कलयुग में विद्वान माना जायेगा.* 

5⃣ *क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव संतप्स्यन्ते च चिन्तया ।*

*त्रिंशद्विंशति वर्षाणि परमायुः कलौ नृणाम.।।*

 💥 *अर्थ - कलयुग में लोग कई तरह की चिंताओं में घिरे रहेंगे. लोगों को कई तरह की चिंताए सताएंगी और बाद में मनुष्य की उम्र घटकर सिर्फ 20-30 साल की रह जाएगी.*

6⃣ *दूरे वार्ययनं तीर्थं लावण्यं केशधारणम् ।*

*उदरंभरता स्वार्थः सत्यत्वे धार्ष्ट्यमेव हि॥*

  💥 *अर्थ - लोग दूर के नदी- तालाबों और पहाड़ों को तीर्थ स्थान की तरह जायेंगे लेकिन अपनी ही माता पिता का अनादर करेंगे. सर पे बड़े बाल रखना खूबसूरती मानी जाएगी और लोग पेट भरने के लिए हर तरह के बुरे काम करेंगे.*

  7⃣ *अनावृष्ट्या विनङ्‌क्ष्यन्ति दुर्भिक्षकरपीडिताः ।* *शीतवातातपप्रावृड् हिमैरन्योन्यतः प्रजाः ॥*  

💥 *अर्थ - कलयुग में बारिश नहीं पड़ेगी और हर जगह सूखा होगा.मौसम बहुत विचित्र अंदाज़ ले लेगा. कभी तो भीषण सर्दी होगी तो कभी असहनीय गर्मी. कभी आंधी तो कभी बाढ़ आएगी और इन्ही परिस्तिथियों से लोग परेशान रहेंगे.* 

  8⃣ *अनाढ्यतैव असाधुत्वे साधुत्वे दंभ एव तु ।*

*स्वीकार एव चोद्वाहे स्नानमेव प्रसाधनम् ॥*  

💥 *अर्थ - कलयुग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा उसे लोग अपवित्र, बेकार और अधर्मी मानेंगे. विवाह के नाम पे सिर्फ समझौता होगा और लोग स्नान को ही शरीर का शुद्धिकरण समझेंगे.* 

9⃣ *दाक्ष्यं कुटुंबभरणं यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ।*

*एवं प्रजाभिर्दुष्टाभिः आकीर्णे क्षितिमण्डले ॥* 

💥 *अर्थ - लोग सिर्फ दूसरो के सामने अच्छा दिखने के लिए धर्म- कर्म के काम करेंगे. कलयुग में दिखावा बहुत होगा और पृथ्वी पे भृष्ट लोग भारी मात्रा में होंगे. लोग सत्ता या शक्ति हासिल करने के लिए किसी को मारने से भी पीछे नहीं हटेंगे.* 

1⃣0⃣ *आच्छिन्नदारद्रविणा यास्यन्ति गिरिकाननम् ।*

*शाकमूलामिषक्षौद्र फलपुष्पाष्टिभोजनाः ॥*

  💥 *अर्थ - पृथ्वी के लोग अत्यधिक कर और सूखे के वजह से घर छोड़ पहाड़ों पे रहने के लिए मजबूर हो जायेंगे. कलयुग में ऐसा वक़्त आएगा जब लोग पत्ते, मांस, फूल और जंगली शहद जैसी चीज़ें खाने को मजबूर होंगे.*

राधे राधे 💐 🙏

🙏🏻🌷💐🌸🌼🌹🍀🌺💐🙏🏻

Tejraftarnews.in: राम ! राम !! राम !!! राम !!!!

 *_विषय –चुप साधन_* |  

 

परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जी कह रहे हैं कि सीधी सरल बात है परमात्मा सब जगह मौजूद हैं | तो जहां साधक अपने आप को मानता है, वहां भी परमात्मा परिपूर्ण हैं | तो *आत्म संस्थं मन: कृत्वा ......* | मन, बुद्धि परमात्मा में लगा दे | अर्थात् परमात्मा तो पहले से ही है, मानना है | बनाना नहीं है | फिर कुछ भी चिंतन नहीं करें | न आत्मा का, न परमात्मा का, न संसार का | कुछ भी चिंतन नहीं करें | चिंतन नहीं करने से परमात्मा में स्थित स्वाभाविक है; क्योंकि परमात्मा हैं | सब जगह स्वाभाविक स्थिति परमात्मा में है | आश्रय परमात्मा का, परम विश्राम | जैसे तुलसीदास जी ने कहा पायो परम विश्राम | पदार्थ की जगह तो परमात्मा ले लें | चिंतन की जगह विश्राम ले लें | क्योंकि परमात्मा हैं | सभी जीवो की स्थिति परमात्मा में है | परमात्मा का स्वरूप स्वाभाविक विश्राम है, स्वत: | परम विश्राम | परमात्मा का आश्रय, परम विश्राम | ये परमात्मा स्वत: हैं | परम विश्राम में परमात्मा होता है | परमात्मा को लाना नहीं है | यह साधन बहुतों को पता नहीं है | कुछ भी चिंतन नहीं करें | क्रिया की जगह विश्राम, पदार्थ की जगह परमात्मा स्वाभाविक है, स्वत: हैं | आग्रह नहीं करना चाहिए, स्वाभाविक है | करना कुछ नहीं चाहिए | चिंतन करता है तो परमात्मा से दूर होता है, क्योंकि परमात्मा तो हैं | स्वाभाविक परमात्मा हैं, स्वतः सिद्ध | वो तो स्वत: है स्वाभाविक | 

गीता का यह सिद्धांत है – वासुदेव: सर्वम् | अपने शरीर में जो स्थिति बनी है, शरीर में स्थिति नहीं है | धीरे-धीरे उपराम हो जाए, जल्द बाजी न करें और कुछ भी चिंतन नहीं करें | क्रिया और पदार्थ से कोई मतलब नहीं है | उनसे तटस्थ रहे, तटस्थ | तटस्थ रहना एक विद्या है | एक करना होता है, एक होना होता है, एक होता है | करना होने में बदल जाए | होना “है” में बादल जाए | होने, न होने से कोई मतलब नहीं है | परम श्रद्धेय सेठ जी यही कहते थे - आनंद ही आनंद | पूर्ण आनंद, परिपूर्ण आनंद | सम, शांत आनंद | अचल आनंद | अनंत आनंद | आनंद ही आनंद | *न किंचिदपि चिन्तयेत्* | सब जगह जो व्यापक होती है, उसका चिंतन नहीं होता, उसका विश्राम होता है | जो स्वत: प्राप्त है सबको ही उसका अनुभव करना है | अचल आनंद, घन आनंद, आनंद ही आनंद | 

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!!!

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*♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*

           *!! त्याग और दान !!*

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एक समय की बात है। एक नगर में एक कंजूस व्यक्ति रहता था। उसकी कंजूसी सर्वप्रसिद्ध थी। वह खाने, पहनने तक में भी कंजूस था।

एक बार उसके घर से एक कटोरी गुम हो गई। इसी कटोरी के दुःख में कंजूस ने 3 दिन तक कुछ न खाया। परिवार के सभी सदस्य उसकी कंजूसी से दुःखी थे।

मोहल्ले में उसकी कोई इज्जत न थी, क्योंकि वह किसी भी सामाजिक कार्य में दान नहीं करता था।

एक बार उस कंजूस के पड़ोस में धार्मिक कथा का आयोजन हुआ। वेदमंत्रों व उपनिषदों पर आधारित कथा हो रही थी। कंजूस को सद्बुद्धि आई तो वह भी कथा सुनने के लिए सत्संग में पहुँच गया।

वेद के वैज्ञानिक सिद्धांतों को सुनकर उसको भी रस आने लगा क्योंकि वैदिक सिद्धान्त व्यावहारिक व वास्तविकता पर आधारित एवं सत्य-असत्य का बोध कराने वाले होते हैं। 

कंजूस को और रस आने लगा। उसकी कोई कदर न करता फिर भी वह प्रतिदिन कथा में आने लगा। कथा के समाप्त होते ही वह सबसे पहले शंका पूछता। इस तरह उसकी रूचि बढती गई।

वैदिक कथा के अंत में लंगर का आयोजन था इसलिए कथावाचक ने इसकी सूचना दी कि कल लंगर होगा। इसके लिए जो श्रद्धा से कुछ भी लाना चाहे या दान करना चाहे तो कर सकता है।

अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार सभी लोग कुछ न कुछ लाए। कंजूस के हृदय में जो श्रद्धा पैदा हुई वह भी एक गठरी बांध सर पर रखकर लाया। भीड़ काफी थी। कंजूस को देखकर उसे कोई भी आगे नहीं बढ़ने देता। इस प्रकार सभी दान देकर यथास्थान बैठ गए।

अब कंजूस की बारी आई तो सभी लोग उसे देख रहे थे। कंजूस को विद्वान की ओर बढ़ता देख सभी को हंसी आ गई क्योंकि सभी को मालूम था कि यह महाकंजूस है।

उसकी गठरी को देख लोग तरह-तरह के अनुमान लगाते और हँसते, लेकिन कंजूस को इसकी परवाह न थी।

कंजूस ने आगे बढ़कर विद्वान ब्राह्मण को प्रणाम किया। जो गठरी अपने साथ लाया था, उसे उसके चरणों में रखकर खोला तो सभी लोगों की आँखें फटी-की-फटी रह गई।

कंजूस के जीवन की जो भी अमूल्य संपत्ति, गहने, जेवर, हीरे-जवाहरात आदि थे उसने सब कुछ को दान कर दिया।

उठकर वह यथास्थान जाने लगा तो विद्वान ने कहा, “महाराज! आप वहाँ नहीं, यहाँ बैठिये।”

कंजूस बोला, “पंडित जी! यह मेरा आदर नहीं है, यह तो मेरे धन का आदर है, अन्यथा मैं तो रोज आता था और यही पर बैठता था, तब मुझे कोई न पूछता था।”

ब्राह्मण बोला, “नहीं, महाराज! यह आपके धन का आदर नहीं है, बल्कि आपके महान त्याग (दान) का आदर है।

यह धन तो थोड़ी देर पहले आपके पास ही था, तब इतना आदर-सम्मान नहीं था जितना कि अब आपके त्याग (दान) में है; इसलिए आप आज से एक सम्मानित व्यक्ति बन गए हैं।

*शिक्षा:-*

मनुष्य को कमाना भी चाहिए और दान भी अवश्य देना चाहिए। इससे उसे समाज में सम्मान और इष्टलोक तथा परलोक में पुण्य मिलता है।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*

*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*

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*🕉️प्रेरक कहानी*

*सच्चा सुख संतोष में है..*

एक संत को अपना भव्य आश्रम बनाने के लिए धन की जरूरत पड़ी। वह अपने शिष्य को साथ लेकर धन जुटाने के लिए लोगों के पास गए। घूमते-घूमते वह एक गांव में अपनी शिष्या एक बुढ़िया की कुटिया में पहुंचे। कुटिया बहुत साधारण थी। वहां किसी तरह की सुविधा नहीं थी फिर भी रात हो गई तो संत वहीं ठहर गए। बूढ़ी मां ने उनके लिए खाना बनाया।

खाने के बाद संत के सोने के लिए मां ने एक तख्त पर दरी बिछा दी और तकिया दे दिया। खुद वह जमीन पर एक टाट बिछाकर सो गईं। थोड़ी ही देर में वह गहरी नींद सो गईं लेकिन संत को नींद नहीं आ रही थी। वह दरी पर सोने के आदी नहीं थे। अपने आश्रम में सदा मोटे गद्दे पर सोते थे। संत सोचने लगे कि जमीन पर टाट बिछा कर सोने के बावजूद इस को गहरी नींद आ गई और मुझे तख्त पर दरी के बिछोने पर भी नींद क्यों नहीं आई। 

मैं तो संत हूँ, सैंकड़ों का मार्गदर्शन करता हूं और यह एक साधारण बुढ़िया। यह बात उन्हें देर तक मथती रही। सोचने लगे, एक दिन यहीं रुकता हूं, देखता हूं कि यह ऐसा कौनसा मंत्र जानती है कि ऐसी अवस्था में भी प्रसन्न है, चैन से सोती है।

सुबह जल्दी उठकर बूढ़ी मां ने अपने हाथ से कुटिया की सफाई की और चिडिय़ों को दाना खिलाया। गाय को चारा दिया। फिर सूर्य को जल अर्पण किया, पौधों को सींचा। गुरु को प्रणाम किया और कुछ देर बैठ कर भगवान नाम का स्मरण। आंगन से तरक़ारी तोड़ कर भोजन पकाया। 

गुरु को प्रथम भोजन करवा कर आप ग्रहण किया। दिन में आस पड़ोस की बच्चियों को बुला कर उन्हें हरि कथा सुनाई, हरि भजन का ज्ञान दिया। फिर संध्या पूजन, रात को पुन: सादे भोजन का प्रबंध। सोने की तैयारी। गुरु सोचने लगे आज फिर नींद नहीं आयेगी। पूछ ही लूं कि क्या रहस्य है।

संत ने पूछा, ‘‘मां, तुमने मेरे लिए अच्छा बिछोना बिछाया। फिर भी मुझे नींद नहीं आई जबकि तुम्हें जमीन पर गहरी नींद आ गई। क्या तुम्हें धरती की कठोरता नहीं सताती? क्या यह चिंता नहीं होती कि कैसे अपने लिये अच्छे भोजन का, नरम बिछड़ने का प्रबंध करूं? इसका कारण क्या है?’’ वह बोलीं, ‘‘गुरुदेव जब मैं सोती हूं तो मुझे पता नहीं होता कि मेरी पीठ के नीचे गद्दा है या टाट। 

उस समय मुझे आपके वचन अनुसार दिन भर किए गए सत्कर्मों का स्मरण करके ऐसा अद्भुत आनंद मिलता है कि मैं सुख-दुख सब भूल कर परम पिता की गोद में सो जाती हूं इसलिए मुझे गहरी नींद आती है।’’

संत ने कहा, ‘‘मैं अपने सुख के लिए धन एकत्रित करने निकला था। यहां आकर मुझे मालूम हुआ कि सच्चा सुख भव्य आश्रम में नहीं बल्कि संतोष में है, गरीब की इस कुटिया में है।’

सच्चा सुख संतोष में है – 

असली आनंद भव्य आश्रमों या ऐशो-आराम में नहीं, बल्कि संतोषपूर्ण जीवन और अच्छे कर्मों में मिलता है।  

साधारण जीवन, उच्च विचार – 

एक साधारण बुढ़िया, जो सादा जीवन जीती थी, फिर भी आत्मिक रूप से संतुष्ट और प्रसन्न थी, जबकि संत होते हुए भी गुरु को चैन नहीं था।  

धन और सुविधाएँ शांति की गारंटी नहीं हैं– 

संत के पास आरामदायक बिछौना था, फिर भी उन्हें नींद नहीं आई, जबकि बुढ़िया टाट पर भी चैन से सो गई। इसका अर्थ है कि बाहरी सुख-सुविधाएँ हमें आंतरिक शांति नहीं दे सकतीं।  

सत्कर्म और भक्ति जीवन को सुखद बनाते हैं– 

बुढ़िया ने अपने दिन को सत्कर्मों, दान-पुण्य और ईश्वर स्मरण में लगाया, जिससे उसे आत्मिक सुख मिला और वह चिंता मुक्त होकर सो सकी।  

दूसरों की सेवा सच्ची खुशी देती है– 

बुढ़िया ने संत की सेवा की, पशु-पक्षियों का ध्यान रखा, पड़ोस की बच्चियों को हरि कथा सुनाई, जिससे उसके मन में संतोष और खुशी बनी रही।  

सुख-दुख हमारे विचारों पर निर्भर करते हैं– 

अगर हमारा मन शुद्ध और संतुष्ट रहेगा, तो हमें बाहरी परिस्थितियाँ परेशान नहीं करेंगी।  

सच्ची नींद और शांति अच्छे कर्मों से आती है – 

बुढ़िया को शांति से नींद आई क्योंकि उसने दिनभर अच्छे कर्म किए थे। जब मन में शांति और संतोष होता है, तब शरीर को भी आराम मिलता है।  

सच्चा सुख बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि मन की शांति, संतोष और सत्कर्मों में है।

इसलिए हमें धन और ऐशो-आराम की जगह अच्छे कर्मों, सेवा और भक्ति पर ध्यान देना चाहिए, जिससे हमें वास्तविक सुख और मानसिक शांति मिले..!!

    *🙏🏿🙏🏻🙏🏾जय श्री कृष्ण*🙏🏽🙏🏼🙏

Tejraftarnews.in: *हिंदू गरीब क्यों होते जा रहे हैं?*

*एक तरफ...*

जब एक हिंदू ने घर बनवाया, तो सलीम ठेकेदार ने 35 लाख रुपये का अनुमान दिया।

1. नईम फैब्रिकेटर ने उसका गेट 40,000 रुपये में बनाया।

2. लकड़ी का काम आसिफ बढ़ई ने 6 लाख रुपये में किया।

3. बिजली की फिटिंग अली ने 2 लाख रुपये में की।

4. प्लंबिंग का काम असलम भाई ने 80,000 रुपये में किया।

5. पेंटिंग फैजल ने 2 लाख रुपये में की।

6. पीओपी का काम इरफान ने 65,000 रुपये में किया।

7. मॉड्यूलर किचन हाफिज भाई ने 1.5 लाख रुपये में बनाया।

8. कचरा इस्माईल भाई ने उठाया - प्रति चक्कर 3,000 रुपये।

9. गाड़ी को अमीर गैरेज में 15,000 रुपये में रंगवाया।

10. हिंदू महिला ने अपना ब्लाउज मकबूल दर्जी से 1,000 रुपये में सिलवाया।

11. हिंदू की बेटी ने जावेद हबीब से 8,000 रुपये में बालों पर केराटिन ट्रीटमेंट करवाया। अब...

*हिंदू का बेटा, 30 लाख रुपये खर्च करके, इंजीनियरिंग की नौकरी से महीने में सिर्फ 40,000 रुपये कमाता है।*

*दूसरी ओर*,

सलीम भाई ने ठेकेदारी करके अपने बेटे के लिए दो निर्माण की दुकानें खोल दी हैं। उनके बेटे मैट्रिक में फेल हो गए हैं, लेकिन वे महीने में 1.5 लाख रुपये कमाते हैं।

1. नईम फैब्रिकेटर 🔨 अपने दो भाइयों के साथ महीने में 80,000 से 1,20,000 रुपये कमाता है।

2. आसिफ बढ़ईगिरी से 🪚 प्रतिदिन 2,000 से 3,000 रुपये कमाता है।

3. अली इलेक्ट्रिकल के काम से महीने में 80,000 रुपये कमाता है।

4. असलम अपने 3 प्लंबरों को रोज 500 रुपये देकर खुद महीने में 70,000 रुपये कमाता है।

5. फैजल सालाना 10 से 12 लाख रुपये कमाता है और उसके गांव में 10 बीघे जमीन पर खेती करता है। उसका बेटा दुबई में महीने में 50,000 रुपये कमाता है।

6. हाफिज भाई को मॉड्यूलर किचन बनाने पर 20% मुनाफा मिलता है।

7. भंगारवाले के लड़के भंगार की दुकान पर बैठकर स्विफ्ट गाड़ियां 🚗 चलाते हैं और उनके पास 3 बाइक हैं। 🏍️

8. मकबूल भाई अन्य कारीगरों से 300 रुपये प्रति ब्लाउज की दर से ब्लाउज 👚 सिलवाते हैं और उस पर 70 रुपये मुनाफा लेते हैं, लेकिन उन्होंने पांडू की पत्नी से 1000 रुपये लिए।

9. जावेद हबीब सैलून की मालकिन सफिया, 5,000 रुपये वेतन वाले लोगों से केराटिन करवाती है और पांडू की बेटी से 8000 रुपये लेती है। 5 वर्षों में उसने 3 सैलून खोल लिए हैं।

*हिंदू अपना पैसा अपने बच्चों के लिए नहीं, बल्कि अली, नईम, आसिफ, इस्माईल, मकबूल और हाफिज के लिए कमा रहा है।* 😱

_निष्कर्ष:_💥

आरक्षण और नौकरी का लालच देकर हिंदुओं का ब्रेनवॉश किया गया है। 12वीं पास हुआ हिंदू भी व्यवसाय के बजाय नौकरी ढूंढता है। दूसरी ओर, निरक्षर मुसलमानों ने धीरे-धीरे सभी व्यवसायों पर कब्जा कर लिया है।

*विदारक सत्य....हिंदू कब सुधरेंगे*

Tejraftarnews.in: *‘Parishram Hi Safalta Ki Kunji Hai’: Meloni Uses Hindi Proverb To Describe India-Italy Ties*

*PM Modi On Stage, Giorgia Meloni's Hindi Moment Goes Viral In Rome*

* Italian Prime Minister Giorgia Meloni said PM Modi's visit had opened a fresh chapter in bilateral relations and that both countries would work to deepen those ties going forward.

* "There is an Indian word which states that very well, which is 'parishram'. 'Parishram', which means hard work, constant commitment. 

* A word which I know is very often used in India, and it is often used in a very popular way of saying: 'Parishram hi safalta ki kunji hai'," Meloni said.

* She translated the phrase herself: "Which means, tough work is the key to success. And we use it to build our relations in this way, with hard work, which becomes success at the end."

*The visit also had a lighter moment. Modi carried a packet of Parley's Melody toffee as a gift for Meloni -- a nod to "Melodi", the portmanteau that fans and meme-makers have coined from the two leaders' names.*

Tejraftarnews.in: राजा राममोहन राय जी की जयंती आज 

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राजा राममोहन राय जी की जयंती हर साल 22 मई को मनाई जाती है, और 2026 में यह शुक्रवार, 22 मई को मनाई जाएगी। 'आधुनिक भारत के जनक' और भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध, उन्होंने सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

राजा राममोहन रॉय : जीवन परिचय

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पूरा नाम: राममोहन रॉय

जन्म: 22 मई, 1772, राधानगर (वर्तमान पश्चिम बंगाल, हुगली जिला)

मृत्यु: 27 सितंबर, 1833, ब्रिस्टल (इंग्लैंड)

उपाधि: मुगल सम्राट अकबर द्वितीय द्वारा ‘राजा’ की उपाधि दी गई।

उपनाम: भारतीय पुनर्जागरण का पिता, आधुनिक भारत का निर्माता, ब्रह्म समाज के संस्थापक

प्रारंभिक जीवन

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धनी ब्राह्मण परिवार में जन्मे। पिता रामकांत रॉय मुगल दरबार में नौकरी करते थे।

14 भाषाएँ सीखीं– संस्कृत, फारसी, अरबी, अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला, ग्रीक, लैटिन आदि।

15 वर्ष की आयु में ही वेदांत, उपनिषद एवं इस्लाम के सूफी विचारों पर गहरी पकड़।

16 वर्ष की आयु में मूर्तिपूजा के खिलाफ पहला लेख लिखा, जिससे घर छोड़ना पड़ा।

करियर

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वर्ष 1803-1814: ईस्ट इंडिया कंपनी में दीवान के रूप में कार्य किया।

वर्ष 1814 में कंपनी की नौकरी छोड़कर पूरी तरह समाज सुधार में लग गए।

वर्ष 1828 में ब्रह्म सभा (बाद में ब्रह्म समाज) की स्थापना की।

सामाजिक सेवा

वर्ष 1829 में लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने सती प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया, जिसका श्रेय मुख्य रूप से राममोहन को जाता है।

विधवा विवाह का समर्थन किया।

बहुविवाह, बाल-विवाह और जाति प्रथा का विरोध किया।

महिलाओं को संपत्ति में अधिकार और शिक्षा का अधिकार दिलाने की वकालत की।

अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी विज्ञान का पक्षधर होने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति के प्रति भी सम्मानक थे।

प्रमुख उपलब्धियाँ

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1829: सती प्रथा पर कानूनी रोक

1828: ब्रह्म समाज की स्थापना– एकेश्वरवाद, मूर्तिपूजा का विरोध, सभी धर्मों के अच्छे तत्वों को अपनाने की शिक्षा

1817: कलकत्ता में हिंदू कॉलेज (अब प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी) की स्थापना में सहयोग

1822: आंग्ल-हिंदू स्कूल और वेदांत कॉलेज की स्थापना

1825: पहली बांग्ला साप्ताहिक अखबार ‘संवाद कौमुदी’ की शुरूआत 

प्रेस की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। 

प्रमुख पुस्तकें एवं ग्रंथ

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तुहफत-उल-मुवाहिदीन (1804) एकेश्वरवाद पर पहली पुस्तक 

गिफ्ट टु मोनोथीइस्ट्स (अंग्रेजी में)

प्रेसीप्ट्स ऑफ जीसस (ईसाई धर्म की तुलना)

वेदांत ग्रंथ (संस्कृत से बांग्ला अनुवाद)

वेदांत सार

योगदान

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भारतीय समाज को अंधविश्वास, कुरीतियों और रूढ़ियों से मुक्त करने का पहला बड़ा प्रयास।

धर्म को तर्क और मानवता के आधार पर देखने की नई सोच दी।

हिंदू धर्म में सुधार लाकर उसे आधुनिक युग के अनुकूल बनाया।

भारतीय और पश्चिमी ज्ञान का सुंदर समन्वय किया।

प्रेस की आजादी, महिलाओं के अधिकार और शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाई।

विरासत

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आज भी ब्रह्म समाज भारत और बांग्लादेश में सक्रिय हैं।

सती प्रथा पर रोक उनके जीवन का सबसे बड़ा कार्य रहा।

संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें ‘मानवाधिकारों का प्रथम भारतीय चैंपियन’ कहा है।

भारत सरकार ने वर्ष 1972 में उनके जन्म की 200वीं वर्षगांठ पर डाक टिकट जारी किया।

कोलकाता में राजा राममोहन रॉय मेमोरियल म्यूजियम है।

अंतिम अध्याय: एक स्थायी विरासत

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राजा राम मोहन रॉय की जीवन यात्रा 27 सितंबर, 1833 को इंग्लैंड के ब्रिस्टल में समाप्त हुई। हालांकि, एक सामाजिक और धार्मिक सुधारक के रूप में उनकी विरासत पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है, जो भारतीय उपमहाद्वीप पर उनके गहन प्रभाव की प्रतिध्वनि प्रस्तुत करती है!

Tejraftarnews.in: *Pension*

जवानी में हमारे भी बड़े रंग थे,

तनख़्वाह नाम की एक हसीना के संग थे।

महीने की पहली तारीख को वो मुस्कुराती थी,

और तीसरी तक आते-आते “अलविदा” कह जाती थी!

कभी दोस्तों के साथ घूमने में चली जाती,

कभी EMI के संग भाग जाती,

हम ढूंढते रह जाते जेब के कोनों में,

और वो “खर्चों” के संग इठलाती!

फिर एक दिन ज़िंदगी ने करवट ली,

बालों ने भी सफ़ेदी की साज़िश की,

घुटनों ने भी कहना शुरू किया —

“भाई साहब, अब आराम कीजिए ज़रा जी!” 

तभी एक नई नायिका ने एंट्री मारी,

ना मेकअप, ना नखरे — सीधी-सादी प्यारी।

नाम था उसका — “पेंशन”,

और अंदाज़ था पूरा “लाइफटाइम कनेक्शन”!

अब ये हर महीने टाइम पे आती है,

ना बहाना बनाती, ना रूठ के जाती है।

चुपचाप बैंक में आकर बैठ जाती है,

और SMS करके दिल बहलाती है! 

“प्रिय ग्राहक, आपकी पेंशन आ गई है…”

बस ये मैसेज सुनकर दिल गा उठता है!

शाम की चाय के साथ जब बैठते हैं,

ये कान में धीरे से कहती है —

“घबराइए मत हीरो,

पिक्चर अभी बाकी है… मैं यहीं हूँ!” 

हाँ, एक शर्त ज़रूर लगाती है ये,

साल में एक बार परीक्षा लेती है ये—

“जीवन प्रमाण पत्र” का फॉर्म भरवाती है,

और प्यार से पूछती है —

“बताइए… अभी ज़िंदा हैं?” 

हम भी सीना तान के कहते हैं —

“अरे भई! टाइगर अभी ज़िंदा है!” 

और सुनिए… असली मोहब्बत तो ये है,

अगर हम भी कभी चुपके से निकल जाएँ,

तो ये हमारी अर्धांगिनी का हाथ थाम लेती है,

उसे बिना झुके जीना सिखा देती है।

ना कोई शिकवा, ना कोई शिकायत,

बस चुपचाप निभाती है हर ज़िम्मेदारी की इबादत।

तो दोस्तों…

मोहब्बत बहुत देखी होगी आपने,

पर ऐसी वफ़ादारी कम ही मिलती है।

जहाँ तनख़्वाह ने साथ छोड़ा,

वहाँ पेंशन ने उम्र भर साथ निभाया है।

*Pension ~ ज़िंदगी के साथ भी ज़िंदगी के बाद भी!* .

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