सरकार बोली- कोर्ट धार्मिक परंपरा को अंधविश्वास नहीं कह सकता:आप एक्सपर्ट नहीं, यह फैसला विधायिका करेगी; कोर्ट बोला- हमें रिव्यू का पूरा अधिकार

Apr 8, 2026 - 17:10
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सरकार बोली- कोर्ट धार्मिक परंपरा को अंधविश्वास नहीं कह सकता:आप एक्सपर्ट नहीं, यह फैसला विधायिका करेगी; कोर्ट बोला- हमें रिव्यू का पूरा अधिकार
धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाव मामले में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को दूसरे दिन की सुनवाई जारी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- कोई सेक्युलर अदालत किसी धार्मिक प्रथा को सिर्फ अंधविश्वास नहीं कह सकती, क्योंकि उसके पास ऐसा तय करने की विशेषज्ञता नहीं होती। उन्होंने कहा कि जो चीज नगालैंड के किसी समुदाय के लिए धार्मिक हो सकती है, वही मेरे लिए अंधविश्वास लग सकती है। हमारा समाज बहुत विविधतापूर्ण है, यहां अलग-अलग लोग, धर्म और मान्यताएं हैं। ऐसे में अदालत के लिए ऐसा फैसला देना खतरनाक हो सकता है। इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा… मिस्टर मेहता, आपने बात को बहुत आसान बना दिया है। अदालत के पास न्यायिक समीक्षा का अधिकार है कि वह यह तय कर सके कि अंधविश्वास क्या है। उसके बाद उस पर कानून बनाना या कार्रवाई करना विधानमंडल (संसद-विधानसभा) का काम हो सकता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि अंतिम फैसला सिर्फ विधानमंडल ही करेगा। धर्म के मामलों में तर्क उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे। धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाद मामले की लाइव अपडेट्स के लिए ब्लॉग से गुजर जाएं…

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Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला