ईरान के पास 5500 किलो यूरेनियम तो अब तक क्यों नहीं बना पाया परमाणु बम? जानें वजह
परमाणु हथियारों की रेस में ईरान का नाम हमेशा सबसे ऊपर रहता है. हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हुए 15 दिनों के युद्धविराम ने भले ही सीमा पर बंदूकों को खामोश किया हो, लेकिन परमाणु सस्पेंस अब भी बरकरार है. सबके मन में एक ही सवाल है कि जिस देश के पास 5500 किलो से ज्यादा यूरेनियम का भंडार हो, वह अब तक परमाणु बम क्यों नहीं बना पाया? यह कहानी केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि गहरी कूटनीति और जासूसी की है, चलिए जानें.
यूरेनियम का भंडार लेकिन अधूरा लक्ष्य
ईरान के पास इस समय 5500 किलो से भी ज्यादा यूरेनियम जमा है. सुनने में यह मात्रा किसी भी देश को परमाणु शक्ति बनाने के लिए काफी लगती है, लेकिन हकीकत इससे थोड़ी अलग है. केवल यूरेनियम का ढेर लगा लेने से कोई बम नहीं बन जाता है. परमाणु बम बनाने के लिए यूरेनियम की गुणवत्ता और उसकी शुद्धता सबसे ज्यादा मायने रखती है. ईरान के पास भंडार तो बड़ा है, लेकिन वह अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है जिसे वेपन ग्रेड यानी हथियार बनाने लायक कहा जा सके.
परमाणु बम बनाने की राह में क्या है बड़ी बाधा?
परमाणु बम बनाने की राह में सबसे बड़ी बाधा यूरेनियम का संवर्धन स्तर है. किसी भी परमाणु हथियार को तैयार करने के लिए यूरेनियम का 90 प्रतिशत तक संवर्धित होना अनिवार्य है. ईरान का ज्यादातर भंडार अभी 3.6 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत के बीच ही झूल रहा है. हालांकि 60 प्रतिशत तक पहुंचना एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि है, लेकिन बम बनाने के लिए जरूरी 90 प्रतिशत की शुद्धता हासिल करना अभी भी एक चुनौतीपूर्ण और लंबी प्रक्रिया है.
युद्धविराम के बीच परमाणु कार्यक्रम का क्या है भविष्य?
अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए 15 दिनों के युद्धविराम ने पूरी दुनिया को राहत तो दी है, लेकिन इसने परमाणु चर्चाओं को भी हवा दे दी है. डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी नेतृत्व के बीच चल रही इस बातचीत का एक बड़ा हिस्सा परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाना भी है. इस सीजफायर के दौरान ईरान पर यह दबाव रहेगा कि वह अपने संवर्धन स्तर को 60 प्रतिशत से आगे न बढ़ाए. यह शांति वार्ता तय करेगी कि ईरान अपने भंडार का इस्तेमाल बिजली बनाने में करेगा या हथियार बनाने में.
हथियार बनाने के लिए क्या हैं तकनीकी पेचीदगियां?
ईरान के पास फिलहाल 60 प्रतिशत तक संवर्धित लगभग 440 किलो यूरेनियम है. इसे 90 प्रतिशत तक ले जाना तकनीकी रूप से बहुत जटिल काम है. केवल यूरेनियम को शुद्ध करना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे धातु के गोले में बदलना और फिर उसे मिसाइल के वॉरहेड में फिट करना एक अलग ही विज्ञान है. ईरान के पास यूरेनियम तो है, लेकिन इस सामग्री को एक सक्रिय और सुरक्षित परमाणु हथियार में बदलने की तकनीक हासिल करने में उसे अभी और वक्त लग सकता है.
ईरान पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी
ईरान की परमाणु साइट्स दुनिया की सबसे ज्यादा निगरानी वाली जगहों में से एक हैं. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की टीमें लगातार ईरान के संयंत्रों का दौरा करती हैं. ईरान के पास कितना यूरेनियम है और उसे किस स्तर तक शुद्ध किया जा रहा है, इसकी एक-एक जानकारी इन एजेंसियों के पास होती है. कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और लगातार होने वाली जांच ने ईरान के लिए चोरी-छिपे बम बनाना लगभग नामुमकिन बना दिया है.
परमाणु वैज्ञानिकों की रहस्यमयी हत्या
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए केवल कूटनीति का ही सहारा नहीं लिया गया है. पिछले कुछ सालों में ईरान के कई बड़े परमाणु वैज्ञानिकों की रहस्यमयी तरीके से हत्याएं हुई हैं. इसके अलावा, स्टक्सनेट जैसे घातक साइबर हमलों ने ईरान के सेंट्रीफ्यूज (यूरेनियम साफ करने वाली मशीनें) को भारी नुकसान पहुंचाया है. इन बाहरी हस्तक्षेपों ने ईरान के परमाणु मिशन की रफ्तार को कई साल पीछे धकेल दिया है, जिससे वह भंडार होने के बावजूद नतीजे तक नहीं पहुंच सका.
इजरायल और अमेरिका के हमलों का डर
ईरान को हमेशा इस बात का डर सताता है कि अगर उसने परमाणु बम बनाने की दिशा में एक भी कदम आगे बढ़ाया, तो इजरायल या अमेरिका उसकी साइट्स पर हवाई हमला कर सकते हैं. इस्फहान और नतांज जैसी जगहों पर बने परमाणु संयंत्र हमेशा दुश्मनों के निशाने पर रहते हैं. ईरान जानता है कि परमाणु बम का परीक्षण करने से पहले ही उसकी पूरी मेहनत मलबे में तब्दील की जा सकती है. यही सैन्य जोखिम उसे अब तक अंतिम कदम उठाने से रोकता आया है.
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