200-400 नहीं हजारों साल पुराना है ईरान का इतिहास, जानें कब-कब हो चुकी इस सभ्यता को मिटाने की कोशिश?
History of Iran: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध को लेकर बड़ी बात कह दी. ट्रंप ने धमकी देते हुए कहा कि आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी और जो होगा वो दुनिया के लिहाज से काफी जटिल होगा. ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि ट्रंप ने ये धमकी ईरान को दी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस सभ्यता को खत्म करने की धमकी डोनाल्ड ट्रंप दे रहे हैं वो कितनी पुरानी है? आइए जानते हैं ईरान की सभ्यता का इतिहास क्या है और इसे कितनी बार मिटाने की कोशिश की गई है.
4000 साल से ज्यादा पुराना है ईरान का इतिहास
आपको बता दें कि ईरान दुनिया के लिए कोई नया खिलाड़ी नहीं है. ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो ईरान अपने अंदर 4000 साल से ज्यादा पुराना इतिहास समाए बैठा है. जी हां, ईरान की सभ्यता और संस्कृति का इतिहास 4000 से 5000 साल पुराना है. यह सिर्फ एक देश का इतिहास नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की सबसे मजबूत सांस्कृतिक विरासतों में से एक है. हजारों साल पुराने इस इतिहास में साम्राज्य बने, टूटे, हमले हुए, शहर उजड़े, लेकिन इसके बावजूद इसकी पहचान खत्म नहीं हो सकी. आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, तब ईरान की सभ्यता का इतिहास यह दिखाता है कि सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हो सकती हैं.
वैसे तो ईरान का इतिहास काफी साल पुराना है लेकिन फिर भी इसकी संस्कृति और सभ्याता को हम मोटे तौर पर तीन युगों में देख सकते हैं.
1- पूर्व इस्लामिक प्राचीन काल
2- इस्लामी युग
3- आधुनिक युग
अगर बात करें पूर्व इस्लामिक प्राचीन काल की तो इसे 559 ई. से 651 ई. तक माना जाता है. यह एक गौरवशाली प्राचीन सभ्यता है, जो एलामाइट सभ्यता से शुरू होकर अचमेनिद (साइरस महान), पार्थियन और सासानी राजवंशों के विशाल साम्राज्यों तक विस्तृत थी. इस दौर में पारसी (ज Zoroastrian) धर्म प्रमुख था और कला, संस्कृति, प्रशासन और वास्तुकला का अभूतपूर्व विकास हुआ, जिसे 651 ईस्वी में अरब विजय के बाद प्रमुखता से जाना गया.
ऐसे हुई ईरान में इस्लाम की शुरुआत, इसे ही कहा गया इस्लामिक युग
ईरान में इस्लाम की शुरुआत किसी एक घटना से नहीं, बल्कि एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव के जरिए हुई थी. यह बदलाव 7वीं सदी में हुआ, जब अरब मुस्लिम सेनाओं ने प्राचीन पर्शिया पर विजय हासिल की. इस समय ईरान पर सासानी साम्राज्य का शासन था, जो कमजोर हो चुका था और लगातार युद्धों से थक चुका था. अरब सेनाओं और सासानी सेना के बीच कई निर्णायक युद्ध हुए, जिनमें सबसे अहम था:
क़ादिसियाह का युद्ध (636 CE)
नहावंद का युद्ध (642 CE)
इन युद्धों में सासानी साम्राज्य की हार हुई और धीरे-धीरे पूरा पर्शिया मुस्लिम शासन के अधीन आ गया और फिर शुरू हुई ईरान में इस्लाम की हुकूमत.
कैसे वजूद में आया आधुनिक ईरान
1800 ई के बाद आधुनिक ईरान का निर्माण कई बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलावों से होकर गुजरा. शुरुआत काजार वंश से हुई, जब देश कमजोर था और रूस व ब्रिटेन का दखल बढ़ रहा था. इसके खिलाफ 1905 की ईरानी संवैधानिक क्रांति ने पहली बार संविधान और संसद की नींव रखी. बाद में रेजा शाह पहलवी के नेतृत्व में पहलवी वंश आया, जिसने देश को आधुनिक बनाने की कोशिश की, लेकिन बढ़ती तानाशाही और असंतोष ने 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति को जन्म दिया. आयतुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में राजशाही खत्म हुई और ईरान इस्लामिक गणराज्य बन गया. इसके बाद ईरान-इराक युद्ध और अंतरराष्ट्रीय तनावों के बावजूद आज का ईरान एक ऐसा देश है, जहां प्राचीन पर्शियन विरासत, इस्लामिक शासन और आधुनिक राजनीति का अनोखा मेल देखने को मिलता है.
ग्रीस ने की थी सभ्यता को मिटाने की कोशिश?
प्राचीन पर्शिया और ग्रीस के बीच टकराव मुख्य रूप से ग्रीको-पर्शियन युद्ध (499–449 BCE) के दौरान हुआ, जहां दोनों शक्तियां वर्चस्व के लिए भिड़ीं. हालांकि निर्णायक मोड़ तब आया जब अलेक्जेंडर महान ने 330 BCE में पर्शिया पर हमला कर आकेमेनिड साम्राज्य को खत्म कर दिया. इस दौरान पर्सेपोलिस जैसे महत्वपूर्ण शहरों को जलाया गया, जिसे पर्शियन सत्ता और प्रतीकों को नष्ट करने की कोशिश माना जाता है. हालांकि ये तनाव वर्तमान ईरान की सीमाओं में नहीं हुआ बल्कि एक पूरे साम्राज्य को हासिल करने के लिए वजूद में आया था.
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रोमन साम्राज्य ने भी की थी कोशिश
ग्रीस के बाद रोमन साम्राज्य और बाद में बाइजेंटाइन साम्राज्य का पर्शिया से सदियों तक संघर्ष चला. ये युद्ध खासकर पार्थियन साम्राज्य और सासानी साम्राज्य के खिलाफ थे. लगातार युद्धों की वजह से सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी तबाही हुई, आर्थिक दबाव बढ़ा और पर्शियन साम्राज्य कमजोर होता गया. हालांकि रोम कभी भी पूरे पर्शिया को जीत नहीं पाया, लेकिन इन संघर्षों ने उसे इतना कमजोर कर दिया कि बाद में अरब आक्रमण के समय उसका पतन तेजी से हो गया. इसके बावजूद पर्शियन सभ्यता और पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई.
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