फिल्म रिव्यू- इक्कीस:शोर से दूर युद्ध की सच्चाई, धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत की खामोश ताकत, अगस्त्य नंदा की ईमानदार शुरुआत

Jan 1, 2026 - 10:55
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फिल्म रिव्यू- इक्कीस:शोर से दूर युद्ध की सच्चाई, धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत की खामोश ताकत, अगस्त्य नंदा की ईमानदार शुरुआत
इक्कीस एक ऐसी वॉर ड्रामा फिल्म है जो शोर, नारेबाजी और भारी भाषणों से दूर रहकर युद्ध को एक मानवीय अनुभव के रूप में देखती है। श्रीराम राघवन यहां देशभक्ति को दिखावे में नहीं, बल्कि खामोशी, यादों और भावनाओं में पिरोते हैं। यह फिल्म युद्ध जीतने से ज्यादा उस कीमत की बात करती है जो इंसान को चुकानी पड़ती है। इसी वजह से इक्कीस धीरे चलती है, मगर भीतर तक असर छोड़ती है। कहानी फिल्म सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की सच्ची कहानी से प्रेरित है, जो 1971 के युद्ध में भारत के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता बने। कहानी दो टाइमलाइन में आगे बढ़ती है।पहली टाइमलाइन 1971 के बसंतर युद्ध की है, जहां 21 साल का अरुण अपनी टैंक रेजिमेंट का नेतृत्व करता है। युद्ध को यहां रोमांच या तमाशे की तरह नहीं, बल्कि डर, दबाव और अचानक मिली जिम्मेदारी के रूप में दिखाया गया है। दूसरी टाइमलाइन 2001 में सेट है, जहां लड़ाई खत्म हो चुकी है, लेकिन उसके निशान अब भी जिंदा हैं। यही हिस्सा फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है और कहानी को सिर्फ वॉर फिल्म नहीं रहने देता। अभिनय अगस्त्य नंदा अपने डेब्यू में सच्चे और सहज लगते हैं। वह अरुण को किसी सुपरहीरो की तरह नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार, आदर्शवादी और जोशीले युवा अफसर के रूप में पेश करते हैं। उनकी बहादुरी भाषणों में नहीं, बल्कि फैसलों में नजर आती है।जयदीप अहलावत बेहद सधी हुई परफॉर्मेंस देते हैं। उनका किरदार शांत है, लेकिन हर सीन में उसका अनुभव और वजन महसूस होता है। धर्मेंद्र के साथ उनके दृश्य फिल्म के सबसे प्रभावशाली पल बनते हैं। धर्मेंद्र की मौजूदगी फिल्म को भावनात्मक मजबूती देती है। दशकों तक सिनेमा में ऊर्जा और ताकत का प्रतीक रहे धर्मेंद्र यहां एक ऐसे पिता के रूप में दिखते हैं जो कम बोलता है, लेकिन जिसकी खामोशी में दर्द, गर्व और अधूरी तसल्ली साफ झलकती है, और यही उनकी परफॉर्मेंस को यादगार बनाती है।सिमर भाटिया का रोल छोटा है, लेकिन वह कहानी में भावनात्मक संतुलन लाती हैं और उस जिंदगी की झलक दिखाती हैं जो अरुण जी सकते थे। डायरेक्शन और तकनीकी पहलू श्रीराम राघवन का निर्देशन बेहद कंट्रोल में है। वह युद्ध को भव्य तमाशा नहीं बनाते, बल्कि उसके असर पर फोकस रखते हैं। कई जगह खामोशी संवाद से ज्यादा असर करती है।टैंक युद्ध सीन, साउंड डिजाइन और VFX जरूरत भर के हैं और रियल लगते हैं। कैमरा वर्क और एडिटिंग फिल्म की गंभीर और सधी हुई गति बनाए रखते हैं। फिल्म की रफ्तार कुछ दर्शकों को धीमी लग सकती है। कुछ हिस्सों में कहानी और ज्यादा कसाव मांगती है, खासकर दूसरे हाफ में।म्यूजिक बैकग्राउंड स्कोर सीमित लेकिन असरदार है। म्यूजिक कभी सीन पर हावी नहीं होता, बल्कि भावनाओं को सपोर्ट करता है। कई अहम पलों में सन्नाटा ही सबसे बड़ा प्रभाव छोड़ता है। फाइनल वर्डिक्ट इक्कीस एक संवेदनशील, गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली वॉर ड्रामा फिल्म है। यह जंग को ग्लैमर नहीं बनाती, बल्कि उसके मानवीय असर को सामने रखती है। मजबूत अभिनय, सधा निर्देशन और ईमानदार ट्रीटमेंट इसकी ताकत हैं, जबकि इसकी धीमी रफ्तार इसकी सीमा बनती है।अगर आप शोर से दूर, असर वाली और भावनात्मक फिल्मों को पसंद करते हैं, तो इक्कीस एक बार जरूर देखी जा सकती है।

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Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला