लोकतंत्र मेहनतकश जनता को प्रतिरोध और संघर्ष के लिए व्यापक अवसर प्रदान करता है, जिसके कारण किसी भी संकट

दुनिया भर में इस वक्त अल नीनो का खतरा मंडरा रहा है और भारत की खेती भी इससे अछूती नहीं रहेगी। लेकिन केंद्र सरकार ने

Jun 23, 2026 - 21:11
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लोकतंत्र मेहनतकश जनता को प्रतिरोध और संघर्ष के लिए व्यापक अवसर प्रदान करता है, जिसके कारण किसी भी संकट
Jitendra Kumar

*🌸🌾दोपहर शाम की देश राज्यों से बड़ी खबरें*

                      👇

*=======================================23/06/2026*

*1* अल नीनो के खतरे और इसके चलते कमजोर मानसून और कम बारिश की आशंका को देखते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी राज्यों के साथ उच्च स्तरीय बैठक की। शिवराज ने साफ कहा है कि संकट आने से पहले ही तैयारी पूरी कर ली जाएगी। ICAR-CRIDA ने देश के हर जिले के लिए आकस्मिक प्लान तैयार कर लिया है।

*2* दुनिया भर में इस वक्त अल नीनो का खतरा मंडरा रहा है और भारत की खेती भी इससे अछूती नहीं रहेगी। लेकिन केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वो हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठेगी। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि संकट का इंतजार करने की बजाय पहले से तैयारी कर ली जाए — यही हमारा तरीका है

*3* 'अनुच्छेद 370 की समाप्ति से श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना हुआ पूरा', गृह मंत्री शाह ने जनसंघ के संस्थापक को बताया महान नेता

*4* व्यापार वार्ता के लिए आज भारत आएगा अमेरिकी दल, जेमिसन ग्रीर के नेतृत्व में समझौते को अंतिम रूप देंगे दोनों देश

*5* कांग्रेस की पीएम मोदी को सलाह: ट्रंप को खुश करना बंद करें, देश हित के खिलाफ व्यापार समझौते पर न करें हस्ताक्षर

*6* चालू वित्त वर्ष 2026-27 में कृषि क्षेत्र का जीडीपी में योगदान लुढ़क सकता है। क्वांटेको रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, कमजोर मानसून की वजह से कृषि और संबंधित गतिविधियों का सकल मूल्यवर्धन (GVA) तीन प्रतिशत से घटकर शून्य से एक प्रतिशत के बीच आ सकता है।

*7* केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा, 21 जून को राज्यसभा कार्यकाल खत्म हुआ था; भाजपा ने दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया

*8* ममता जो सीट हारीं, वहां EVM-VVPAT सुरक्षित रखने का आदेश, हाईकोर्ट बोला- जरूरत पड़ने पर जांच होगी; भवानीपुर में शुभेंदु 15,000 वोटों से जीते थे

*9* NASA ने डराया! प्रशांत महासागर में खतरनाक अल नीनो एक्टिव, भारत पर मंडराया बड़ा खतरा

*10* लखनऊ अग्निकांड में 15 मौतें, जांच के लिए SIT पहुंची, सभी शव परिजन को सौंपे, बेटी का शव देखकर मां बेहोश

*11* राममंदिर चढ़ावा चोरी की रिपोर्ट SIT ने सरकार को सौंपी, 20 पेज की रिपोर्ट में FIR और ट्रस्ट को दोबारा गठित करने की सिफारिश

*12* TMC ने ममता को पार्टी प्रमुख बताया, चुनाव आयोग को वर्किंग कमेटी की लिस्ट भेजी; एक दिन पहले बागी गुट ने अरूप रॉय को अध्यक्ष चुना था

*13* गंगा नदी में नाव पर बैठकर बीयर पार्टी, नॉनवेज खाया, वाराणसी पुलिस ने पांच को गिरफ्तार किया, 5 साल तक की सजा हो सकती है

*14* एक मोबाइल नंबर से खुला ₹3000 करोड़ का फर्जीवाड़ा, पंजाब के सगे भाइयों ने 27 कागजी कंपनियां बनाईं; फर्जी बिल बनाकर टैक्स लाभ भी लिया

*15* ईरान बोला- होर्मुज अब पहले जैसा नहीं रहेगा, इसकी देखरेख हम अपने तरीके से करेंगे, अमेरिका पर भरोसा नहीं

*16* वॉटरवेज लीजर टूरिज्म का IPO आज से खुला, फ्रेश इश्यू से ₹585 करोड़ जुटाएगी, मिनिमम इन्वेस्टमेंट ₹14,544; 1-जुलाई को लिस्टिंग होगी

*17* वैभव सूर्यवंशी को टीम इंडिया की 3 नंबर जर्सी मिली, कहा- खुशी बयां करने के लिए शब्द नहीं, आयरलैंड-इंग्लैंड दौरे पर रवाना

*18* सेंसेक्स 600 अंक गिरकर 76,450 पर आया, निफ्टी 190 अंक गिरा; मेटल-आईटी शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली; वेदांता का शेयर 6% गिरा

*हिंदू राष्ट्र का क्या अर्थ है?*

*(आलेख : प्रभात पटनायक)* 

*हिंदू राज्य, जैसा कि इसके नाम से प्रतीत होता है, एकाधिकार पूंजी की तानाशाही के अलावा और कुछ नहीं है, जिसे मोदी बेशर्मी से बढ़ावा दे रहे हैं।*

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का उद्देश्य भारत में एक हिंदू राज्य की स्थापना करना है। लेकिन हिंदू राज्य का वास्तव में क्या अर्थ है? इसका सीधा और स्पष्ट उत्तर यह होगा कि वर्तमान में संविधान द्वारा सभी नागरिकों को धर्म के आधार पर जो समानता प्राप्त है, उसके स्थान पर ऐसे राज्य में हिंदुओं को अन्य धर्मों के अनुयायियों, विशेषकर मुसलमानों (जो देश में सबसे बड़ा धार्मिक अल्पसंख्यक हैं) की तुलना में श्रेष्ठ दर्जा प्राप्त होगा।

हालांकि, इस तरह की असमानता को एक दमनकारी राज्य के बिना कायम नहीं रखा जा सकता। वर्ग-दमनकारी समाज में सभी राज्य दमनकारी होते हैं, लेकिन जो राज्य इस तरह से असमानता को संस्थागत रूप देता है, उसे और भी अधिक दमनकारी होना पड़ेगा। क्या हिंदू राज्य का अर्थ हिंदुओं नामक एक समूह द्वारा अन्य धर्मों के लोगों पर तानाशाही स्थापित करना होगा?

जैसे ही यह सवाल पूछा जाता है, जवाब स्पष्ट रूप से "नहीं" होता है। एक हिंदू राज्य में रिक्शा चालक, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, रिक्शा चालक ही रहेगा ; एक हिंदू राज्य में चपरासी, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, चपरासी ही रहेगा ; एक हिंदू राज्य में दिहाड़ी मजदूर, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, दिहाड़ी मजदूर ही रहेगा।

तथाकथित हिंदू राज्य हिंदुओं के बहुमत के जीवन की भौतिक स्थिति में कोई बदलाव लाने का वादा नहीं करता और न ही ऐसा कर पाएगा ; तो फिर तानाशाही, जो कि ऐसे राज्य का अनिवार्य रूप से हिस्सा होगी, किसके हित में चलाई जाएगी? इसका स्पष्ट उत्तर है : एकाधिकार पूंजी के हित में। हिंदू राज्य, जैसा कि इसके नाम से प्रतीत होता है, वास्तव में एकाधिकार पूंजी की तानाशाही के अलावा कुछ नहीं है।

राज्य के कार्यों से पहले हिंदू रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं का दिखावा तो होगा ही, और नौकरियों के चयन में अन्य लोगों की तुलना में हिंदुओं को प्राथमिकता दी जाएगी ; लेकिन नई नौकरियां तो न केवल आज की तरह न के बराबर होंगी, बल्कि कॉरपोरेट जगत द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के प्रयोग से मौजूदा नौकरियां भी लुप्त हो जाएंगी। जहां मुसलमान और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को गंभीर और बहुआयामी उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा, वहीं हिंदुओं को अपने उत्पीड़न से कोई राहत नहीं मिलेगी ।

जिस वर्ग की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि होगी, वह एकाधिकारवादी पूंजीपति वर्ग है, और इस वर्ग के भीतर भी एकाधिकारवादी पूंजीपति वर्ग का नया समूह है। दूसरे शब्दों में : एक हिंदू राज्य वह राज्य होगा, जिस पर आम तौर पर भारतीय बड़े निगमों का, और विशेष रूप से अडानी और अंबानी जैसे बड़े निगमों का, प्रभुत्व होगा।

यह 1930 के दशक में जर्मनी की स्थिति की याद दिलाता है, जहां नाजियों ने यहूदियों (नाजियों का मानना था कि किसी व्यक्ति का "आर्यन यहूदी" होना असंभव है) और जिप्सियों (इसी तरह "आर्यन जिप्सी" होना भी असंभव माना जाता था) जैसी "गैर-आर्यन" आबादी को पीड़ित करके "आर्यन श्रेष्ठता" को प्रभावी बनाने का दावा किया था।

हालाँकि, नाज़ी राज्य कोई "आर्यन राज्य" नहीं था। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के अध्यक्ष जॉर्जी दिमित्रोव ने 1935 में अपने सातवें सम्मेलन में कहा था कि नाज़ी द्वारा स्थापित तानाशाही, "वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे कट्टरपंथी और सबसे साम्राज्यवादी तत्वों की खुली आतंकवादी तानाशाही" थी।

सत्ताधारियों द्वारा राज्य का जो वर्णन किया जाता है, वह आवश्यक रूप से उसकी वास्तविकता से मेल नहीं खाता। प्रश्न यह है कि कौन-सा वर्ग राज्य का उपयोग अपने स्वार्थों को साधने के लिए कर रहा है? समकालीन समय में वे सभी राज्य, जो लोकतंत्र को कुचलकर और अन्य समूहों को द्वितीय श्रेणी के नागरिक बनाकर किसी जातीय, धार्मिक या भाषाई समूह के हितों को साधने का दावा करते हैं, वास्तव में एकाधिकार पूंजी के हितों को साधने का काम कर रहे हैं, क्योंकि वे तानाशाही स्थापित कर मेहनतकश जनता को जातीय, धार्मिक या भाषाई आधार पर विभाजित करने का प्रयास कर रहे हैं। आधुनिक, बहु-विभागीय समाज में खंडित राज्य की स्थापना वास्तव में एकाधिकार पूंजी की तानाशाही के समान है।

यह सवाल उठ सकता है : जब मौजूदा “धर्मनिरपेक्ष” राज्य भी एकाधिकार पूंजी के प्रभुत्व में है, तो एकाधिकार पूंजी को एक नए, बिल्कुल अलग, हिंदू-प्रधान राज्य की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए, जो उसकी तानाशाही का प्रतीक हो, और इसलिए वह इसके गठन में सहायता क्यों करे? इस तरह के बदलाव की आवश्यकता स्पष्ट रूप से तभी उत्पन्न होती है, जब राज्य का पूर्ववर्ती स्वरूप गंभीर खतरे का सामना करता है ; और ऐसा तब होता है, जब अर्थव्यवस्था में ठहराव आ जाता है और बेरोजगारी बहुत बढ़ जाती है। हिंदू राज्य के वेश में एकाधिकार पूंजी की तानाशाही की ओर वर्तमान कदम नव-उदारवादी शासन की विफलता को दर्शाता है, जिसने अर्थव्यवस्था में ठहराव ला दिया है, और मेहनतकश लोगों के विशाल जनसमूह के लिए बेरोजगारी और घोर संकट को बढ़ा दिया है।

लोकतंत्र मेहनतकश जनता को प्रतिरोध और संघर्ष के लिए व्यापक अवसर प्रदान करता है, जिसके कारण किसी भी संकट के दौर में लोकतंत्र को कमजोर करने के प्रयास किए जाते हैं, ताकि एकाधिकार पूंजी के वर्चस्व को खतरे से बचाया जा सके। लेकिन जब संकट लंबा खिंचता है और उसके वर्चस्व को खतरा बना रहता है, तो एकाधिकार पूंजी अधिक चरम उपाय अपनाती है। वह जनता को विभाजित करने में सबसे सक्षम किसी भी शक्ति के साथ गठबंधन करती है, ताकि एक वैकल्पिक भ्रामक विमर्श उत्पन्न किया जा सके, मेहनतकश जनता को एकजुट होकर संघर्ष करने से रोका जा सके और सांप्रदायिक राज्य की स्थापना के नाम पर लोकतंत्र को कुचलने को उचित ठहराया जा सके, जो भारतीय संदर्भ में प्रतिज्ञाबद्ध हिंदू राज्य है।

आरएसएस-भाजपा के भाषणों का भ्रामक स्वरूप इस समय स्पष्ट है। जब देश का कार्यबल, विशेषकर युवा, बेरोजगारी से जूझ रहा है, जब शिक्षित बेरोजगारी की दर अत्यधिक है, तब भी देश के शासक इस गंभीर समस्या पर एक शब्द भी नहीं कह रहे हैं ; इसके बजाय, वे बांग्लादेश से घुसपैठ का शोर मचा रहे हैं! विडंबना यह है कि भाजपा के अपने ही आकलन के अनुसार, किसी राष्ट्र का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद उसकी प्रगति का सूचकांक है, और बांग्लादेश, जिसकी आईएमएफ के अनुसार, वर्तमान में प्रति व्यक्ति आय भारत से अधिक है, को भारत से अधिक विकसित माना जाना चाहिए। ऐसे में भाजपा एक अधिक विकसित देश से कम विकसित देश में इतनी बड़ी घुसपैठ का दावा कैसे सही ठहरा सकती है?

उदारवादी विचारधारा कुछ समय से यह समझाने की कोशिश कर रही है कि हाल ही में भारत में हिंदुत्व का इतना उभार क्यों आया है। लेकिन यह इस बात को नज़रअंदाज़ कर रही है कि भारत में हिंदुत्व का उदय विश्व भर में नव-फासीवाद के उभार का ही एक हिस्सा है, जिसके कारण इस उभार की कोई भी भारत-विशिष्ट व्याख्या पर्याप्त नहीं होगी। दूसरे शब्दों में, हिंदुत्व का उदय कोई अनोखी घटना नहीं है ; यह काफी हद तक एकाधिकार पूंजी द्वारा वित्तीय और मीडिया समर्थन के माध्यम से संचालित किया जा रहा है, भारत में भी, और पूंजीवादी दुनिया के अन्य हिस्सों में भी, अर्जेंटीना से लेकर अमेरिका, इटली, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन तक, नवउदारवादी पूंजीवाद द्वारा विश्व अर्थव्यवस्था में लाए गए गतिरोध के संदर्भ में।

आरएसएस ने हाल ही में अपनी शताब्दी मनाई है। यह तथ्य कि सौ वर्षों तक सत्ता से इसका कोई वास्ता नहीं था, और आज यह दुनिया की "सबसे धनी राजनीतिक पार्टी" होने का दावा कर सकती है, इसका श्रेय वर्तमान में एकाधिकार पूंजी से प्राप्त भारी समर्थन को दिया जा सकता है।

लेकिन केवल एकाधिकार पूंजी ही हिंदुत्व के प्रति अनुकूल नहीं हुई है। हिंदुत्ववादी तत्वों ने भी एकाधिकार पूंजी के प्रति अपना रवैया बदल लिया है। आरएसएस का मुख्य समर्थक आधार मूल रूप से दुकानदारों, छोटे पूंजीपतियों और शहरी मध्यम वर्ग के बीच था, और इसे कुछ सामंती तत्वों का वित्तीय समर्थन प्राप्त था। बेशक, इसने कभी भी एकाधिकार-विरोधी बयानबाजी नहीं अपनाई, जैसा कि उदाहरण के लिए जर्मनी में हुआ था, जहां नाजियों ने सत्ता में आने से पहले खुले तौर पर एकाधिकार-विरोधी रुख अपनाया था; लेकिन आरएसएस पूरी तरह से एकाधिकार पूंजी समर्थक भी नहीं था। आर्थिक नीति के संबंध में हिंदुत्ववादी खेमे के भीतर वैकल्पिक आवाजें भी थीं, हालांकि आर्थिक नीति स्वयं हिंदुत्ववादी ताकतों के लिए स्पष्ट रूप से चिंता का विषय नहीं थी ।

नरेंद्र मोदी का योगदान इन सब को बदलने में रहा है। हिंदुत्व के पदानुक्रम में उनका महत्व इसलिए है, क्योंकि वे कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठबंधन के सूत्रधार बने ; और इसी गठबंधन के गठन से हिंदुत्व सत्ता में आया। दरअसल, मोदी को देश के प्रधानमंत्री के रूप में बढ़ावा देने का विचार गुजरात में पूंजीपतियों के एक सम्मेलन में रखा गया था, जब मोदी उस राज्य के मुख्यमंत्री थे। और मोदी एकाधिकार पूंजी, विशेष रूप से इसके भीतर के नए तत्वों के, निर्भीक और बेबाक समर्थक बन गए।

इस प्रक्रिया में वे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के प्रमोटर भी बन गए, जिसके साथ नवउदारवादी युग में भारतीय एकाधिकार पूंजी का एकीकरण हो गया था। नवउदारवादी पूंजीवाद की गतिरोध की स्थिति में, मोदी अपने नव-फासीवादी एजेंडे के साथ भारतीय एकाधिकार पूंजी के लिए विशेष रूप से उपयोगी संपत्ति बन गए हैं।

*(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफेसर एमेरिटस हैं।)*

Jitendra: *प्रकाशनार्थ*

*विभाजन, राजनीति और 20 जून : क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी पश्चिम बंगाल के संस्थापक हैं?*

*(आलेख : शमिक लाहिड़ी, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)*

हाल के वर्षों में, 20 जून को 'पश्चिम बंगाल दिवस' के तौर पर स्थापित करने और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पश्चिम बंगाल का संस्थापक बताने की एक सुनियोजित राजनीतिक कोशिश की गई है। इतिहास का राजनीतिक इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है, लेकिन किसी भी ऐतिहासिक घटना को उसके पूरे संदर्भ में समझा जाना चाहिए। इसलिए, 20 जून से जुड़ी इस धारणा की सच्चाई की जांच करना ज़रूरी है।

बंगाल को बांटने की राजनीति 1947 में शुरू नहीं हुई थी। औपनिवेशिक शासन के दौरान, अंग्रेजों ने बार-बार बंगाल की राजनीतिक और सांस्कृतिक ताकत को कमजोर करने की कोशिश की। 1905 में बंगाल का विभाजन इसका एक बड़ा उदाहरण था। हालांकि इसे प्रशासनिक कदम के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन इसका असली मकसद बंगाली राष्ट्रवाद को कमजोर करना और हिंदुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालना था। बंगाल के लोगों ने 'स्वदेशी आंदोलन', 'रक्षाबंधन', सांस्कृतिक विरोध और आर्थिक बहिष्कार के ज़रिए इसका विरोध किया।

इस आंदोलन के पीछे मुख्य प्रेरणा देने वालों में से एक रवींद्रनाथ टैगोर थे। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि बंगाली पहचान धर्म के बजाय भाषा, संस्कृति और साझा सामाजिक जीवन पर आधारित थी। उनके आह्वान पर, 'रक्षाबंधन' सांप्रदायिक विभाजन के ख़िलाफ़ एकता का प्रतीक बन गया। 'बंग्लार माटी बंग्लार जल...' और 'आमार सोनार बांग्ला...' जैसे गीतों के ज़रिए उन्होंने बंगाल की सांस्कृतिक एकता के विचार को मज़बूत किया। आख़िरकार, ब्रिटिश सरकार को विभाजन रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

फिर भी, विभाजन की राजनीति जारी रही। 1930 और 1940 के दशकों में सांप्रदायिक राजनीति और मज़बूत हुई। मुस्लिम लीग के 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' और हिंदुत्व की राजनीतिक सोच, दोनों ने ही धर्म को राजनीतिक पहचान का आधार बनाने की कोशिश की। फलस्वरूप, साझा भाषा और संस्कृति पर आधारित व्यापक 'बंगाली' पहचान पर दबाव बढ़ता गया।

जब भारत से अंग्रेजों की वापसी अवश्यंभावी हो गई, तो विभाजन का मुद्दा सबसे अहम हो गया। 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि सत्ता भारतीयों को सौंप दी जाएगी। इसके बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने समय-सीमा को आगे बढ़ाया और 3 जून 1947 को अपनी योजना की घोषणा की। उस योजना ने असल में भारत और बंगाल, दोनों के विभाजन को तय कर दिया। इसलिए, 20 जून को बंगाल विधानसभा के सत्र का आयोजन पहले से लिए गए फैसले को औपचारिक रूप से लागू करने का एक हिस्सा था। यह वह समय नहीं था, जब बंगाल के विभाजन की योजना बनी थी। 

यह वह मुख्य ऐतिहासिक तथ्य है, जो अक्सर आज के राजनीतिक अभियानों में छिपा दिया जाता है। बंगाल के विभाजन का फ़ैसला 20 जून से पहले ही हो चुका था। विधानसभा ने तो बस उस रूपरेखा पर वोट दिया था, जो पहले ही तय की जा चुकी थी।

यह भी याद रखना ज़रूरी है कि कई प्रमुख बंगाली नेताओं ने विभाजन का विरोध किया था। शरत चंद्र बोस, अबुल हाशिम और अन्य नेताओं ने एक एकजुट बंगाल की वकालत की थी। उनका मानना था कि धार्मिक आधार पर विभाजन से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से बंगाल कमज़ोर हो जाएगा और साथ ही वहाँ के लोगों की साझा पहचान भी कमज़ोर होगी।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी लंबे समय तक एक एकजुट भारत के भीतर एक अखंड बंगाल के विचार का समर्थन किया था। कम्युनिस्ट नेताओं का तर्क था कि साम्राज्यवादी हितों के कारण ही बंटवारे की बात की जा रही थी, क्योंकि इससे बंगाल राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाता। बहरहाल, जून 1947 तक राजनीतिक हालात बहुत खराब हो गए थे। मुस्लिम लीग चाहती थी कि पूरा बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बन जाए, जबकि हिंदू सांप्रदायिक ताकतें विभाजन के लिए सक्रिय रूप से अभियान चला रही थीं। ऐसे हालात में, कम्युनिस्टों का तर्क था कि किसी भी आबादी को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी राज्य के ढांचे में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। नतीजन, कम्युनिस्ट विधायकों ने बंगाल के विभाजन के पक्ष में वोट दिया, जबकि साथ ही वे भारत के विभाजन का पूरी तरह से विरोध भी कर रहे थे।

आज प्रायः 20 जून के मतदान को ऐसे दिखाया जाता है, जैसे कि यह लोगों की सीधी इच्छा को ज़ाहिर करती हो। असल में, यह कोई जनमत संग्रह नहीं था। अविभाजित बंगाल के लगभग 5.5 करोड़ लोगों का भविष्य सिर्फ़ 250 विधायकों ने तय किया था, जिन्हें मतदान के बहुत सीमित अधिकार वाली व्यवस्था के तहत चुना गया था। बंगाल का विभाजन होना चाहिए या नहीं, इस बारे में आम बंगालियों से कभी सीधे तौर पर राय नहीं ली गई। इसलिए, बंगाल के बंटवारे को सही मायनों में जनता का लोकतांत्रिक जनादेश नहीं कहा जा सकता।

19 जून 1947 को कम्युनिस्ट विधायकों ज्योति बसु, रतन लाल ब्राह्मण और रूपनारायण रॉय ने एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें कम्युनिस्टों का रुख़ साफ़ तौर पर ज़ाहिर हुआ। यह बयान कम्युनिस्ट दैनिक 'स्वाधीनता' में छपा था। बयान में कहा गया था कि माउंटबेटन योजना ने एक संप्रभु और एकजुट बंगाल की संभावना को असल में खत्म कर दिया है। साथ ही, इसमें ऐसी किसी भी कार्रवाई के ख़िलाफ़ चेतावनी दी गई थी, जिससे हिंदू-मुसलमानों के रिश्ते और ज़्यादा खराब हो सकते थे। इस बयान में यह भी कहा गया था कि पश्चिमी बंगाल के ग़ैर-मुस्लिम बहुल इलाक़ों की इच्छा के ख़िलाफ़ पूरे बंगाल को पाकिस्तान में मिलाना ज़बरदस्ती होगी। फलस्वरूप, कम्युनिस्ट विधायकों ने घोषणा की कि वे विभाजन के पक्ष में वोट देंगे, ताकि किसी भी अनिच्छुक आबादी को उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ किसी राजनीतिक व्यवस्था में शामिल होने के लिए मजबूर न किया जाए।

इस तरह, कम्युनिस्ट विधायकों ने बंटवारे का समर्थन किसी आदर्श समाधान के तौर पर नहीं किया था, बल्कि पहले से मौजूद राजनीतिक सच्चाई के जवाब में किया था। जैसा कि बाद में ज्योति बसु ने कहा, पार्टी भारत के विभाजन के खिलाफ थी, लेकिन उसे रोकने के लिए ज़रूरी ताकत उसमें नहीं थी। यह ऐतिहासिक संदर्भ तब अहम हो जाता है, जब हम श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पश्चिम बंगाल का एकमात्र निर्माता या संस्थापक बताने की आज की कोशिशों को देखते हैं। ऐतिहासिक सबूत ऐसे दावे का समर्थन नहीं करते। 20 जून को विधानसभा में हुए मतदान में, बंगाल के पश्चिमी हिस्से के 58 विधायकों ने विभाजन के पक्ष में वोट दिया था। इनमें से ज़्यादातर कांग्रेस के सदस्य थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक बहुत बड़ी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल सिर्फ़ एक व्यक्ति थे। इसलिए, पश्चिम बंगाल के गठन को किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि के तौर पर पेश करना ऐतिहासिक रूप से गलत है।

ब्रिटिश शासन के दौरान उनकी राजनीतिक भूमिका भी विवादित रही है। 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के समय, मुखर्जी बंगाल सरकार में वित्त मंत्री थे। 26 जुलाई 1942 को तत्कालीन गवर्नर जॉन हर्बर्ट को लिखे एक पत्र में उन्होंने तर्क दिया था -- "युद्ध के दौरान, यदि कोई भी ऐसी जन-भावना भड़काने की योजना बनाता है जिससे आंतरिक अशांति या असुरक्षा पैदा हो, तो किसी भी सरकार को उसका विरोध करना चाहिए। ...सवाल यह है कि बंगाल में इस आंदोलन का मुकाबला कैसे किया जाए? राज्य का प्रशासन इस तरह से चलाया जाना चाहिए कि ... यह आंदोलन राज्य में जड़ें जमा न पाए।"

ये बातें स्वतः स्पष्ट हैं और भारत की आज़ादी के आंदोलन में उनके विश्वासघात को उजागर करता है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी सांप्रदायिक राजनीति के कड़े आलोचक थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपनी डायरी 'लीव्स फ्रॉम ए डायरी' में खुद लिखा था -- "सुभाष ने एक बार दोस्ताना अंदाज़ में मुझे चेतावनी दी थी और खास तौर पर यह कहा था कि अगर हमने बंगाल में कोई विरोधी राजनीतिक संगठन बनाने की कोशिश की, तो वे यह पक्का करेंगे (ज़रूरत पड़ने पर ज़बरदस्ती भी) कि वह संगठन बनने से पहले ही टूट जाए। मुझे उनका यह रवैया बहुत अनुचित और बेतुका लगा।" चाहे कोई बोस की भाषा से सहमत हो या न हो, यह घटना सांप्रदायिक राजनीतिक लामबंदी के प्रति उनके विरोध की गहराई को दिखाती है।

इसलिए यह विडंबनापूर्ण है कि ऐसे संगठन, जिनके वैचारिक पूर्वज अक्सर उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ विरोध का संबंध बनाए रखते थे, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कम्युनिस्टों के योगदान पर सवाल उठाना चाहते हैं। बंगाल की जेलों, हिरासत शिविरों और अंडमान की सेलुलर जेल का इतिहास कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और भावी कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा किए गए बलिदानों का प्रमाण बताता है। 

 

भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के संस्थापकों में से एक, मुज़फ़्फ़र अहमद और अब्दुल हलीम ने औपनिवेशिक शोषण के ख़िलाफ़ मज़दूरों, किसानों और छात्रों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी। ट्रेड यूनियन, किसान संगठन और साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन के निर्माण की उनकी कोशिशों ने बंगाल में एक मज़बूत लोकतांत्रिक लहर पैदा करने में मदद की।

आज़ादी की लड़ाई में शामिल कई क्रांतिकारी बाद में कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गए। गणेश घोष, कल्पना दत्त (जोशी), सुबोध रॉय, हरे कृष्ण कोनार और सतीश पक्राशी जैसे कई लोगों ने ब्रिटिश जेलों — जिनमें सेलुलर जेल भी शामिल थी — में कई साल बिताए। जेल में रहने के दौरान, उनमें से कई लोग मार्क्सवादी विचारों के संपर्क में आए और बाद में कम्युनिस्ट राजनीति में सक्रिय हो गए। उनके ज़रिए, उपनिवेश-विरोधी संघर्ष की क्रांतिकारी परंपरा और वामपंथ के मज़दूर-किसान आंदोलनों के बीच एक ऐतिहासिक कड़ी बनी।

इस परंपरा ने ट्रेड यूनियन आंदोलनों, किसान संगठनों, सांप्रदायिकता-विरोधी अभियानों और 1946-47 के ऐतिहासिक तेभागा आंदोलन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये घटनाक्रम बंगाल के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं।

एक और आम दावा यह है कि कोलकाता केवल श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण पश्चिम बंगाल का हिस्सा बना। ऐतिहासिक अभिलेख एक अलग ही कहानी बताते हैं। कांग्रेस, हिंदू महासभा और कई अन्य संगठन सभी पश्चिम बंगाल की व्यवहार्यता के लिए कोलकाता को अपरिहार्य मानते थे। लगभग हर प्रमुख राजनीतिक समूह द्वारा, बंगाल के प्रमुख बंदरगाह, औद्योगिक केंद्र और प्रशासनिक राजधानी के रूप में इसका समावेश आवश्यक माना जाता था। नतीजन, किसी एक व्यक्ति को विशेष श्रेय देना, ऐतिहासिक तथ्यों की ज़बरदस्त तोड़-मरोड़ के अलावा और कुछ नहीं है।

इसके बाद एक और सवाल उठता है -- क्या 20 जून को सचमुच पश्चिम बंगाल का स्थापना दिवस माना जा सकता है? ऐतिहासिक रूप से इसका जवाब है -- 'नहीं'। 15 अगस्त 1947 को पश्चिम बंगाल की सीमाएँ वैसी नहीं थीं, जैसी कि आज राज्य की सीमा हैं। कूच बिहार 1950 में पश्चिम बंगाल में शामिल हुआ, पुरुलिया को 1956 में जोड़ा गया, और 2015 में भारत-बांग्लादेश एन्क्लेव (क्षेत्र) के आदान-प्रदान के ज़रिए इलाकों में और बदलाव हुए। यह आधुनिक राज्य कई ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से गुज़रकर बना है, जो जून 1947 से कहीं आगे तक फैली हुई हैं।

सबसे अहम बात यह है कि बंगाल के बंटवारे की भारी मानवीय कीमत चुकानी पड़ी है। करोड़ों लोग विस्थापित हुए और शरणार्थी बन गए। परिवार बिछड़ गए। खेती, उद्योग, व्यापार नेटवर्क और सामाजिक रिश्तों पर बहुत बुरा असर पड़ा। बंगाल ने अपनी प्राकृतिक आर्थिक एकता का बड़ा हिस्सा खो दिया, और उस बंटवारे के नतीजे आज भी इस इलाके पर असर डाल रहे हैं।

इसीलिए, बंगाल के बंटवारे को सिर्फ़ एक जीत के तौर पर नहीं मनाया जा सकता। यह एक दुखद और जटिल ऐतिहासिक घटना बनी हुई है। यह हमें याद दिलाता है कि धार्मिक आधार पर बंटवारा सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को हल नहीं करता ; बल्कि अक्सर नई समस्याएं पैदा करता है।

बंगाल की ताकत कभी भी बंटवारे पर टिकी नहीं रही है। इसकी असली ताकत इसकी भाषा, संस्कृति, मानवतावाद, तर्कवाद और अनेकतावादी परंपराओं में निहित है। रवींद्रनाथ टैगोर, काज़ी नज़रुल इस्लाम, जीवनानंद दास, सुकांत भट्टाचार्य, सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और अमर्त्य सेन की विरासतें इसी व्यापक सांस्कृतिक धरोहर से उपजी हैं। यहाँ तक कि पूर्वी बंगाल ने भी अंततः भाषा के मुद्दे पर पाकिस्तान के खिलाफ़ विद्रोह किया, जिससे एक बार फिर यह साबित हुआ कि अक्सर भाषाई और सांस्कृतिक बंधन धार्मिक पहचान से कहीं अधिक मज़बूत होते हैं। 1952 के भाषा आंदोलन और 1971 के मुक्ति संग्राम ने इस सच्चाई को फिर से पुष्ट किया।

इसलिए, समकालीन राजनीतिक लामबंदी के लिए 20 जून को हथियार में बदलने के बजाय, बंगाल के विभाजन के इतिहास को उसकी पूरी जटिलता के साथ समझना ज़्यादा ज़रूरी है। इतिहास का मकसद मनगढ़ंत कहानियाँ बनाना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना है। और सच यह है कि बंगाल का विभाजन एक ऐसी त्रासदी थी, जिससे मिले सबक आज भी हमसे सोच-विचार, सतर्कता और ऐतिहासिक ईमानदारी की माँग करते हैं। 

*(लेखक पूर्व सांसद, माकपा के केंद्रीय समिति सदस्य और 'गणशक्ति' के संपादक हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क :

: *चंबा,सोशल मीडिया में जारी वीडियो के आधार पर पुलिस ने काटा 4,500 रुपये का चालान*

*बिना हेलमेट बाइक चलाते हुए बनाया था वीडियो, सोशल मीडिया पर पोस्ट करना पड़ा महंगा*

चंबा। सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने की चाह में यातायात नियमों की अनदेखी करना युवकों को महंगा पड़ गया। *बाइक पर बिना हेलमेट सवारी करते हुए वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करने वाले युवकों का पुलिस ने 4,500 रुपये का चालान काटा है।*

*एएसपी दिनेश कुमार शर्मा ने बताया* कि दो युवकों ने सड़क पर बिना हेलमेट सरपट बाइक चलाते हुए वीडियो बनाया और इसे सोशल मीडिया में साझा कर दिया। वीडियो में यातायात नियमों का उल्लंघन स्पष्ट दिखाई देने पर पुलिस ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत कार्रवाई की। उन्होंने बताया कि सड़क सुरक्षा नियमों की अवहेलना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि चालक और अन्य सड़क उपयोगकर्ताओं की जान को भी खतरे में डालती है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने के लिए स्टंट करना या नियमों की अनदेखी कर वीडियो बनाना स्वीकार्य नहीं है। ऐसे मामलों पर विभाग नजर रख रहा है। नियम तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने युवाओं से अपील की है कि वे सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करें। हेलमेट और सीट बेल्ट का अनिवार्य रूप से उपयोग करें।

TRN Live: *हिमाचल एचआरटीसी में भर्ती होंगे 656 अस्थायी चालक, प्रबंधन ने मांगे आवेदन, इस दिन होगा ड्राइविंग टेस्ट*

*एचआरटीसी ने प्रदेशभर में बस सेवाओं के सुचारू संचालन के लिए 656 अस्थायी चालकों (एचटीवी) की भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है।*

 हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) ने प्रदेशभर में बस सेवाओं के सुचारू संचालन के लिए 656 अस्थायी चालकों (एचटीवी) की भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है। निगम ने मंगलवार को भर्ती विज्ञापन जारी कर पात्र उम्मीदवारों से आवेदन मांगे हैं। चयनित चालकों को विभिन्न डिपुओं में आवश्यकता के अनुसार दैनिक आधार पर तैनात किया जाएगा। एचआरटीसी प्रबंधन के अनुसार सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में किसी प्रकार का व्यवधान न आए और परिचालन आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके, इसके लिए अस्थायी चालकों की नियुक्ति की जा रही है। भर्ती प्रक्रिया के तहत प्रदेश के 31 परिवहन यूनिटों में चालक लगाए जाएंगे। यह निर्णय एचआरटीसी चालकों-परिचालकों की अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की चेतावनी के बीच लिया गया है। 

*किस यूनिट में कितने पद भरे जाएंगे*

सबसे अधिक 25-25 पद रामपुर, रोहड़ू, शिमला ग्रामीण, शिमला लोकल, करसोग, तारादेवी, नेरवा, सोलन, नाहन, मंडी, कुल्लू, केलांग, सुंदरनगर, चंबा, पालमपुर, बैजनाथ, हमीरपुर, देहरा और बिलासपुर यूनिटों में रखे गए हैं। उना, नगरोटा, सरकाघाट, धर्मपुर यूनिट के लिए 20-20 पदों के लिए साक्षात्कार होंगे। रिकांगपिओ 15, नालागढ़ 15, तारादेवी 13, जोगेंद्रनगर 12, परवाणु ओर पठानकोट में 10 -10, संसारपुर 6 पदों पर साक्षात्कार होंगे।

*ये रहे पात्रता मानदंड*

भर्ती के लिए उम्मीदवार का किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से दसवीं पास होना अनिवार्य है। इसके अलावा उसके पास एचटीवी/एचएमवी ड्राइविंग लाइसेंस होना चाहिए तथा भारी वाहनों को चलाने का कम से कम तीन वर्ष का अनुभव होना आवश्यक है। अभ्यर्थी का चरित्र और आचरण भी संतोषजनक होना चाहिए तथा उसके खिलाफ कोई गंभीर यातायात या आपराधिक मामला दर्ज नहीं होना चाहिए।

*1500 रुपये प्रतिदिन मिलेगा मानदेय*

एचआरटीसी ने स्पष्ट किया है कि चयनित उम्मीदवारों को 1500 रुपये प्रतिदिन का निश्चित मानदेय दिया जाएगा। यह नियुक्ति पूरी तरह अस्थायी होगी और इससे नियमित नियुक्ति, वरिष्ठता, समायोजन या सेवा निरंतरता का कोई अधिकार प्राप्त नहीं होगा। एचआरटीसी प्रबंध निदेशक की ओर से जारी निर्देशों में कहा गया है कि भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों को कोई यात्रा भत्ता या दैनिक भत्ता (टीए/डीए) नहीं दिया जाएगा। निगम प्रबंधन ने यह अधिकार भी सुरक्षित रखा है कि आवश्यकता के अनुसार पदों की संख्या बढ़ाई या घटाई जा सकती है अथवा चयन प्रक्रिया को किसी भी समय रद्द किया जा सकता है।

*24 जून को होगा ड्राइविंग टेस्ट*

उम्मीदवारों के लिए वॉक इन इंटरव्यू और ड्राइविंग टेस्ट 24 जून 2026 को आयोजित किया जाएगा। अभ्यर्थियों को संबंधित क्षेत्रीय प्रबंधक (आरएम) कार्यालय में दोपहर 12 बजे से 1 बजे के बीच रिपोर्ट करना होगा। उम्मीदवारों को अपने साथ शैक्षणिक प्रमाणपत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड अथवा अन्य पहचान पत्र, अनुभव संबंधी दस्तावेज और स्वयं सत्यापित प्रतियां लानी होंगी। इसके अलावा यह घोषणा भी देनी होगी कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है और वे किसी आपराधिक मामले में दोषी नहीं ठहराए गए हैं।

TRN Live: पंचायतों के लिए बड़ी अपडेट, 15 अगस्त तक ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड करनी होंगी विकास योजनाएं

पंचायती राज मंत्रालय ने हिमाचल सहित देश के सभी पंचायतों को अपनी विकास योजना ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश दिए हैं.

हिमाचल पंचायत

हिमाचल पंचायत (ETV Bharat)

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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : June 21, 2026 at 9:35 PM IST

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शिमला: ग्रामीण विकास को नई रफ्तार देने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. पंचायती राज मंत्रालय ने हिमाचल सहित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि सभी पंचायतें वर्ष 2026-27 के लिए अपनी पंचायत विकास योजनाएं (GPDP) तैयार कर उन्हें 15 अगस्त 2026 तक ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अनिवार्य रूप से अपलोड करें.

16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुरूप पोर्टल में तकनीकी बदलाव और नए प्रावधान शामिल किए जाने के बाद 19 जून से योजना अपलोडिंग विंडो खोल दी गई है. इन योजनाओं के आधार पर आगामी वित्तीय वर्ष में गांवों में विकास कार्यों को गति मिलेगी.

सभी राज्यों को जारी पत्र

पंचायती राज मंत्रालय के अपर सचिव सुशील कुमार लोहानी ने हिमाचल सहित सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों, अतिरिक्त मुख्य सचिवों, प्रधान सचिवों एवं सचिवों को पत्र भेजकर पंचायत विकास योजनाओं को समयबद्ध तरीके से तैयार करने और पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश दिए हैं.

पत्र में कहा गया है कि ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) विकेंद्रीकृत योजना निर्माण और सहभागी शासन व्यवस्था की आधारशिला है. ग्राम सभाओं और स्थानीय हितधारकों की सक्रिय भागीदारी से तैयार होने वाली ये योजनाएं स्थानीय आवश्यकताओं और विकास प्राथमिकताओं को पहचानने और उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी उपयोग का मार्ग प्रशस्त करती हैं.

15 अगस्त तक खुली रहेगी अपलोडिंग विंडो

मंत्रालय के अनुसार 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को शामिल करने और ई-ग्राम स्वराज पोर्टल के GPDP मॉड्यूल में आवश्यक तकनीकी संशोधन किए जाने के कारण इस वर्ष प्रक्रिया में कुछ विलंब हुआ है. इसी वजह से पंचायतों को पर्याप्त समय देने के लिए योजना अपलोडिंग विंडो 15 अगस्त 2026 तक खुली रहेगी.

पंचायत विकास योजनाओं के माध्यम से गांवों में विभिन्न विकास कार्यों की प्राथमिकताएं तय की जाती हैं. इनमें प्रमुख रूप से पेयजल सुविधाए,स्वच्छता एवं साफ-सफाई, शिक्षा से जुड़े कार्य, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, आजीविका संवर्धन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन व सामाजिक सुरक्षा योजनाएं शामिल*

मंगलवार, 23 जून 2026 के मुख्य समाचार*

🔶ब्रिटिश राजनीति में फिर बड़ा भूचाल: प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने किया इस्तीफे का एलान; लेबर पार्टी में बगावत के आगे झुके

🔶स्विट्जरलैंड में 80 मिनट चली Iran-US वार्ताः हिजबुल्ला-इजराइल संघर्ष पर नया फार्मूला तैयार, अंतिम समझौते के रोडमैप पर भी सहति

🔶कतर के प्रमुख गैस एक्सपोर्ट टर्मिनल में भीषण विस्फोट, 54 लोग घायल और 18 लापता

🔶कतर धमाके में मारे गए 13 लोगों में 12 भारतीय शामिल, 66 अन्य घायल

🔶झारखंड में आकाशीय बिजली का कहर, 24 घंटे में 11 लोगों की मौ'त; मृतकों में 10 साल का बच्चा भी शामिल 

🔶जेडी वेंस का दावाः शांति समझौते की मजबूत नींव तैयार, ईरान की फ्रीज संपत्तियां जारी कर सकता है अमेरिका 

🔶लखनऊ की कोचिंग में आग, 15 मौतें: इनमें ज्यादा स्टूडेंट्स, बचने के लिए बाथरूम में छिपे, दम घुटा; 4 अफसर सस्पेंड, 4 आरोपी अरेस्ट

🔶पंजाब में बदलाव की लड़ाई के लिए भाजपा तैयार, युवा निभाएं अग्रणी भूमिका: नितिन नबीन 

 🔶टीएमसी अध्यक्ष पद से हटाई गईं ममता बनर्जी, अरूप रॉय को मिली कुर्सी!

🔶अब 60 दिनों तक पूरी दुनिया को तेल बेच सकेगा ईरान, अमेरिका ने हटाया प्रतिबंध

🔶भारत में 6 साल में 1.8 लाख पैदल यात्रियों की मौत, सुप्रीम कोर्ट सख्त; सुरक्षित फुटपाथ बनाने के निर्देश

🔶बिहार में NEET री-एग्जाम में सॉल्वर गैंग का पर्दाफाश, असली की जगह नकली परीक्षार्थियों ने लिखे पेपर; 30 गिरफ्तार

🔶राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद: SIT की प्रारंभिक रिपोर्ट में चंपत राय समेत 14 लोग जिम्मेदार, ट्रस्ट ने की है बड़ी सिफारिश

🔶भाजपा सरकार का पहला बजट: ‘विकसित बंगाल’ की नींव, रोजगार से महिला सशक्तीकरण तक बड़ी सौगात

🔶दावा- राहुल की स्कूबा डाइविंग पर 26 करोड़ खर्च: कांग्रेस बोली- रिजिजू बदनामी फैलाने वाले मंत्री बने; ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से ध्यान भटकाना चाहते हैं

🔶ईरान ने जेडी वेंस के दावे को किया खारिज, कहा- तेहरान ने परमाणु निरीक्षण की नहीं दी अनुमति

🔶'सरेंडर के बाद गोली मारने' के आरोप पर मानवाधिकार आयोग सख्त, भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में बिहार सरकार से मांगा जवाब

🔶बीकानेर-अहमदाबाद नई रेल सेवा: राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को मिली नई रफ्तार

🔶जयशंकर की कूटनीतिक दौड़ शुरू: मंगोलिया-दक्षिण कोरिया दौरे पर करेंगे अहम वार्ता, जेजू फोरम में देंगे संबोधन

         *आपका दिन शुभ और मंगलमय हो सुप्रभात..!!*

                          जय हो🙏

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Jeetu dehati

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