'नीतीश ही विकल्प, दूसरा चेहरा कभी मंजूर नहीं':गयाजी में जेडीयू कार्यकर्ताओं-समर्थकों में नाराजगी, बीजेपी पर साजिश करने का लगाया आरोप
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं। उन्होंने इसका ऐलान खुद अपने एक्स पर किया है। इस फैसले के विरोध में पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं में नाराजगी है। इसी सवाल की पड़ताल के लिए भास्कर की टीम गयाजी के मानपुर प्रखंड के सिकहर गांव पहुंची। जहां जदयू समर्थकों में आक्रोश देखने को मिला। गांव की चौपाल से लेकर चाय की दुकानों तक एक ही चर्चा थी, ‘नीतीश कुमार को हटाने की साजिश चल रही है।’ जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी ग्रामीण अमरनाथ राय कहते हैं कि जदयू को जो जनादेश मिला है, वह नीतीश कुमार के चेहरे पर मिला है। एनडीए ने चुनाव लड़ा, जनता ने भरोसा किया और भारी बहुमत से सरकार बनी। अब अगर अचानक उन्हें राज्यसभा भेजने की चर्चा हो रही है तो यह सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है। जब तक नीतीश कुमार हैं, तब तक किसी दूसरे विकल्प की जरूरत ही नहीं है। उन्हें हटाने की कोशिश जनता स्वीकार नहीं करेगी। जदयू के भीतर कुछ बड़े नेता भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं। धीरे-धीरे नीतीश कुमार को साइडलाइन करने की कोशिश हो रही है। फैसला समर्थकों को मंजूर नहीं विनोद कुमार का कहना है कि यह पूरा खेल सत्ता की राजनीति का है। जदयू एक बड़ी पार्टी है लेकिन इसके अंदर कुछ नेता अति महत्वाकांक्षी हो गए हैं। कुछ लोग अब खुद कुर्सी चाहते हैं। इसलिए नीतीश कुमार को हटाने की साजिश रची जा रही है। लेकिन यह जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं और समर्थकों को मंजूर नहीं है। दिलीप कुमार भी इसी बात को दोहराते हैं बिहार में विकास की जो पहचान बनी है, उसमें सबसे बड़ा योगदान नीतीश कुमार का है। भाजपा भी सपने में नहीं सोच सकती थी कि बिहार में इतने काम होंगे। इसलिए अब राजनीति का नया खेल शुरू किया गया है। वहीं, निशांत कुमार के राजनीति में आने की चर्चा पर भी गांव में अलग-अलग राय सुनने को मिली। अशोक कुमार का कहना है कि हाल ही में निशांत कुमार ने यह कहा था कि अगर उनके पिता बिहार छोड़ देंगे तो राज्य का क्या होगा, हमारा क्या होगा। बिहार की राजनीति में अभी भी सबसे बड़ा चेहरा नीतीश कुमार ही हैं। इसके अलावा हमें दूसरा पसंद नहीं है। फॉरवर्ड और बैकवर्ड की राजनीतिक लड़ाई ग्रामीणों के बीच एक धारणा यह भी है कि भाजपा की रणनीति सत्ता समीकरण बदलने की हो सकती है। कुछ लोग इसे सामाजिक समीकरण से भी जोड़कर देख रहे हैं। उनका मानना है कि अगर सत्ता का संतुलन बदला तो इसका असर पूरे राजनीतिक ढांचे पर पड़ेगा। इसे फॉरवर्ड और बैकवर्ड की राजनीतिक लड़ाई बता रहे हैं। नया राजनीतिक प्रयोग भी हो सकता है हालांकि अमरनाथ राय इस पूरे घटनाक्रम को थोड़ा अलग नजरिए से भी देखते हैं। उनका कहना है कि राजनीति में कुछ भी संभव है। हो सकता है कि नीतीश कुमार खुद गद्दारों की पहचान करने के लिए यह राजनीतिक प्रयोग कर रहे हों। उनका व्यक्तित्व हमेशा से जटिल और रणनीतिक रहा है, लेकिन इसके साथ ही वह यह भी मानते हैं कि मौजूदा राजनीतिक संकेत साफ बता रहे हैं कि सत्ता के गलियारों में सब कुछ सामान्य नहीं है।
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