क्या अमेरिका ने भारत में भी बना रखे हैं आर्मी बेस, जानें इसे लेकर क्या है भारत की नीति?
मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच एक अमेरिकी पूर्व कर्नल के बयान ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है. दावा किया गया है कि ईरान के साथ जारी संघर्ष में अमेरिका के कई सैन्य बेस तबाह हो गए हैं, इसलिए उसको भारत के सैन्य ठिकानों पर निर्भर रहना पड़ रहा है. इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक यह सवाल तैरने लगा है कि क्या वाकई भारत ने अपनी जमीन पर अमेरिका को फौज रखने की इजाजत दे दी है? भारत की विदेश नीति हमेशा से गुटनिरपेक्ष रही है, ऐसे में इन दावों की सच्चाई जान लेते हैं.
क्या भारत में मौजूद हैं अमेरिकी सैन्य बेस?
दुनिया भर में अमेरिका का सैन्य जाल इतना बड़ा है कि उसकी बराबरी कोई दूसरा देश नहीं कर सकता है. रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के करीब 750 से अधिक सैन्य ठिकाने दुनिया के 80 अलग-अलग देशों में फैले हुए हैं. चाहे यूरोप हो, एशिया हो या मिडिल ईस्ट, अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी लगभग हर सामरिक बिंदु पर है.
लेकिन जब बात भारत की आती है, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है. स्पष्ट शब्दों में कहें तो भारत में अमेरिका का कोई भी सैन्य बेस या आर्मी बेस मौजूद नहीं है. भारत ने अपनी आजादी से लेकर अब तक किसी भी विदेशी ताकत को अपनी जमीन पर स्थायी ठिकाना बनाने की अनुमति नहीं दी है.
नेहरू से मोदी तक एक ही स्टैंड
भारत की विदेश नीति का एक बुनियादी स्तंभ सामरिक स्वायत्तता यानि Strategic Autonomy रहा है. पंडित नेहरू के दौर से लेकर प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल तक, भारत ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि वह किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनेगा. भारत का मानना है कि अपनी जमीन पर विदेशी सेना को जगह देना अपनी संप्रभुता से समझौता करने जैसा है.
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यही कारण है कि अमेरिका के साथ बेहद मजबूत रक्षा संबंधों और क्वाड (QUAD) जैसे समूहों का हिस्सा होने के बावजूद, भारत ने कभी भी अमेरिकी सैनिकों को यहां रहने की इजाजत नहीं दी है. भारत अपनी रक्षा के लिए खुद को सक्षम मानता है और उसके पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है, जिसे किसी बाहरी स्थायी बेस की जरूरत नहीं है.
लॉजिस्टिक्स समझौता और सैन्य बेस में अंतर
अक्सर लोग 2016 में हुए 'लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट' (LEMOA) को सैन्य बेस समझने की गलती कर बैठते है. यहां यह समझना जरूरी है कि यह समझौता बेस बनाने के लिए नहीं, बल्कि रसद सहायता के लिए है. इसके तहत भारत और अमेरिका एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल ईंधन भरने, मरम्मत और जरूरी सामान की आपूर्ति के लिए कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी अमेरिकी जहाज को हिंद महासागर में ईंधन की जरूरत है, तो वह भारतीय पोर्ट का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन वह वहां रुककर युद्ध की तैयारी या स्थायी कैंप नहीं बना सकता है. यह एक व्यावसायिक लेनदेन जैसा है, न कि सैन्य कब्जे जैसा.
भारत क्यों नहीं चाहता विदेशी सैन्य ठिकाने?
भारत की इस सख्ती के पीछे कई ठोस कारण हैं. सबसे बड़ा डर यह है कि अगर भारत अमेरिकी बेस को जगह देता है, तो वह अनचाहे ही मध्य पूर्व या चीन के साथ होने वाले अमेरिकी संघर्षों का हिस्सा बन जाएगा. भारत नहीं चाहता कि किसी दूसरे देश की लड़ाई उसकी जमीन से लड़ी जाए. इसके अलावा, रूस जैसे पुराने सहयोगियों के साथ भारत के रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं.
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