भारत का किशनगंज कैसे बना मिनी ईरान:खामेनेई की मौत के बाद गांव में पसरा मातम, शिया परिवारों का सवाल- PM मोदी चुप क्यों
ईरान-इजराइल के बीच चल रही जंग ने सिर्फ पश्चिम एशिया को ही नहीं, बल्कि भारत के कोने-कोने तक हलचल पैदा कर दी है। किशनगंज का “मिनी ईरान” इसका जीवंत उदाहरण बन गया है, जहां सदियों से बसे शिया परिवार खुद को उस संघर्ष से जुड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं। मिनी ईरान की गलियों में इन दिनों अगर किसी एक मुद्दे की सबसे ज्यादा चर्चा है, तो वह इजराइल और ईरान के बीच छिड़ी जंग है। स्थानीय लोगों का कहना है, 'ईरान पर अत्याचार हो रहा है, लेकिन भारत खामोश क्यों है? उनका मानना है कि जुल्म देखकर भी चुप रहना, जुल्म का ही साथ देना है।' शिया परिवारों का सवाल- भारत चुप क्यों है? समुदाय के बुजुर्ग और प्रभावशाली व्यक्ति सय्यद इमाम अली गुस्से में कहते हैं, “अगर आप जालिम को जालिम नहीं कहते, तो आप भी जुल्म में शामिल हैं। भारत एक बड़ा और ताकतवर देश है, वह आवाज उठा सकता है, लेकिन वह चुप है। चुप रहना भी जुल्म को स्वीकार करने जैसा है।” उनकी यह बात सुनकर आसपास खड़े लोग सहमति में सिर हिलाते हैं। उनके लिए यह जंग सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति या भू-राजनीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि खून, रिश्तों और पहचान से जुड़ा सवाल है। हर धमाके से दिल बैठ जाता है ईरान में जारी हमलों, हवाई हमलों में मारे गए नागरिकों और सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई से जुड़ी खबरों ने इस समुदाय को गहराई से झकझोर दिया है। मोतीबाग के मोहसिन रजा कहते हैं, “खामनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे, वे पूरी शिया दुनिया के मार्गदर्शक जैसे थे। उनकी मौत की खबर से पूरा मोहल्ला गम में डूब गया था।” टीवी पर ईरान के अस्पतालों में घायल बच्चों की तस्वीरें देखकर लोग भावुक हो उठते हैं। कई घरों में लोग एकत्र होकर शांति और अमन की दुआ करते नजर आते हैं। 500 साल पुराना रिश्ता, दिल ईरान में, जिंदगी भारत में किशनगंज का ‘मिनी ईरान’ सिर्फ नाम भर नहीं है। यहां रहने वाले परिवारों की जड़ें शिराज से जुड़ी मानी जाती हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि उनके पूर्वज मुगल काल में हुमायूं और शेरशाह सूरी के बीच हुए संघर्ष के दौरान ईरान से भारत पहुंचे थे। उस समय वे घोड़ों का व्यापार कर अपना गुजारा करते थे। सोनपुर मेला और खागड़ा मेले में कारोबार करते-करते वे यहीं बस गए। मोतीबाग, कर्बला वार्ड नंबर 5 के एहसान अली बताते हैं, “1902 से हमारा परिवार किशनगंज में रह रहा है। हमारी पांच पीढ़ियां यहीं दफन हो चुकी हैं, लेकिन हमारी संस्कृति आज भी ईरान से ही जुड़ी हुई है।” किशनगंज कैसे बना ‘मिनी ईरान’? किशनगंज के मोतीबाग कर्बला इलाके में करीब 200 साल से ईरानी मूल के परिवार बसे हुए हैं। यह इलाका आज भी ईरानी संस्कृति का जीवंत केंद्र माना जाता है। यहां कई घरों में आज भी फारसी बोली जाती है और मुहर्रम पारंपरिक ईरानी शैली में मनाया जाता है। महिलाएं अब भी पारंपरिक ईरानी परिधान पहनती हैं। रसोई में ईरानी व्यंजन बनते हैं और बच्चे ईरानी नज़्में सुनते हुए बड़े होते हैं। करीब 11.49 लाख मुस्लिम आबादी वाले इस क्षेत्र में ईरानी मूल के शिया परिवारों की उपस्थिति और सामाजिक प्रभाव उल्लेखनीय माना जाता है। ईरान पर हो रहे हमले के खिलाफ भारत बोले सय्यद इमाम का कहना है, “ईरान पर अत्याचार हो रहा है और ऐसे समय में भारत को खुलकर अपनी बात रखनी चाहिए।” वे सवाल उठाते हैं, “अगर कल को हिंदुस्तान पर हमला हो जाए, तो क्या ईरान के लोग खुश होंगे? कभी नहीं। फिर भारत जालिम के साथ दोस्ती क्यों निभा रहा है?” उनका इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल ही में इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से मुलाकात और बाद में हुई फोन पर बातचीत पर था। सय्यद इमाम का मानना है कि भारत जैसे बड़े देश को ऐसे मुद्दों पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। मिनी ईरान में मातम जैसा माहौल किशनगंज में इन दिनों माहौल त्योहारों जैसा नहीं, बल्कि मातम पसरा है। ईरान में जारी संघर्ष ने यहां के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर डाला है। दुकानों पर भीड़ कम है, व्यापारियों की आवाजाही सीमित हो गई है। ईद की तैयारियां फीकी पड़ गई हैं और मोहल्ले में हर शाम दुआ का सिलसिला चल रहा है। टीवी और मोबाइल स्क्रीन पर अधिकतर खबरें ईरान से जुड़ी ही देखी जा रही हैं। एक युवती ने कहा, “पहले ईद से पहले घरों में सजावट और रौनक होती थी। आज हालत यह है कि घरों में टीवी की आवाज भी धीमी रखी जा रही है।” हिंदुस्तान पर हमला होगा तो ईरानियों को अच्छा लगेगा? सैयद इमाम कहते हैं, “जो भी ईरानियों पर हमला कर रहे हैं, वे कभी बच नहीं सकते। जो जुल्म करते हैं, अल्लाह उन्हें ऊपर से देख रहा है। हमारी भारत सरकार से यही मांग है कि वह ईरान का समर्थन करे। वहां जो हो रहा है, वह गलत है और इस पर भारत को आवाज उठानी चाहिए।” उन्होंने कहा, “आज हमारे इस्लाम पर जुल्म हो रहा है। कल को हिंदुस्तान पर भी जुल्म हो सकता है। खुदा न खास्ता अगर ऐसा हुआ तो क्या ईरान के लोग खुश होंगे? क्या ईरान की सरकार तब भी जालिमों से दोस्ती का हाथ मिलाएगी? क्या यह भारतवासियों को अच्छा लगेगा?” क्या भारत के लोग जालिम हैं? सैयद इमाम आगे बताते हैं, "जैसे आज ईरान पर जुल्म हो रहा है और जो उनपर हमला कर रहे हैं, वे जालिम हैं। उसी तरह भारत की खामोशी भी समझ से परे है। हमारे यहां कहा जाता है यदि आप जालिम को जालिम नहीं कहते, तो फिर आप भी जालिम माने जाते हैं। जो जुल्म को खामोशी से देखते हैं, वे भी जालिम होते हैं। आज भारत भी कुछ ऐसा ही कर रहा है। जो लोग इस अत्याचार का समर्थन कर रहे हैं, वे भी नासमझ हैं। हालांकि, ऐसा नहीं है कि हिंदुस्तान में सब बेअक्ल हैं।" PM मोदी के इजाराइल दौरे के 2 दिन बाद छिड़ी जंग सैयद इमाम का कहना है, "पीएम मोदी हाल ही में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मिलने गए थे। उनके लौटने के दो दिन बाद ही हमला हो गया। हालात बिगड़ने के बाद उन्होंने नेतन्याहू से फोन पर बात की, लेकिन इस मसले पर कोई सख्त बात नहीं कही। कम से कम उन्हें इतना कहना चाहिए था कि ‘नेतन्याहू, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था। आपने आंखें पूरी तरह बंद कर ली हैं। अगर दोस्ती ऐसी हो, जिसमें सच बोलना भी मुश्किल हो जाए, तो ऐसी दोस्ती का क्या मतलब है?" ईरान के लिए दुआ और भारत से उम्मीद समुदाय के बुजुर्ग और युवाओं का कहना है, “हम भारत के हैं, लेकिन हमारी नसों में ईरान की मिट्टी है। दोनों देश हमारे लिए घर जैसे हैं। इसलिए युद्ध के हर वार की तकलीफ यहां महसूस की जाती है।” मोतीबाग की एक महिला सिया ने कहा, “ईरान में बच्चे मरते हैं तो हमारी मांओं का दिल चीख उठता है। हमारी दुआ है अमन लौट आए।” युद्ध का असर व्यापार पर मिनी ईरान के कई घरों में लोग चश्मा का कारोबार, फोटो फ्रेम, कीमती पत्थरों का व्यापार, रत्न तराशने का काम करते हैं, लेकिन युद्ध और अस्थिरता के चलते व्यापार में कमी आई है। बाजारों में ग्राहक कम हैं और दूसरे राज्यों में जाना मुश्किल हो गया है। हैदर अली बताते हैं पहले महीने में 20–25 दिन बाहर रहते थे। अब 8–10 दिन भी मुश्किल है। होटल वाले पूछताछ करते हैं। कहते हैं आप ईरान से तो नहीं हैं? ये सवाल उन्हें अंदर तक चुभ जाते हैं। हम हिंदुस्तानी हैं, लेकिन हमारी रूह ईरान की पुकार सुनती है।
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