महोबा में दूसरे दिन खेली गई रंगों की होली:राजा गंगाधर राव के सम्मान में एक दिन बाद मानने की परंपरा

Mar 5, 2026 - 17:17
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महोबा में दूसरे दिन खेली गई रंगों की होली:राजा गंगाधर राव के सम्मान में एक दिन बाद मानने की परंपरा
देशभर में होली का त्योहार संपन्न होने के बाद आज वीरभूमि महोबा में रंगों की असली होली खेली जा रही है। यहां राजा गंगाधर राव के सम्मान में एक दिन बाद होली मनाने की अनोखी परंपरा है, जिसमें पूरा शहर सराबोर है। बुंदेलखंड की मिट्टी में शौर्य के साथ-साथ अपनी परंपराओं के प्रति अटूट आस्था भी निहित है। जहां समूचे भारत में रंगों का त्योहार संपन्न हो चुका है, वहीं महोबा की आल्हा-ऊदल नगरी में आज से होली का असली जश्न शुरू हुआ है। शहर के गली-कूचे, चौराहे और मोहल्ले अबीर-गुलाल से गुलजार हैं। बाइक सवारों की टोलियां रंगों की बौछार महोबा के प्रमुख केंद्रों जैसे आल्हा चौक, ऊदल चौक, भटीपुरा और हवेली दरवाजा में सुबह से ही उत्सव का माहौल है। डीजे की थाप पर बजते फिल्मी गानों के बीच बच्चे, युवा और महिलाएं एक-दूसरे को रंगों से सराबोर कर रहे हैं। हवा में गुलाल उड़ाया जा रहा है, और बाइक सवारों की टोलियां रंगों की बौछार कर रही हैं। रास्ते से गुजरने वाले मुसाफिर भी इन रंगों से बच नहीं पा रहे हैं; उन पर पानी और रंगों से भरे गुब्बारे फेंककर उन्हें इस उत्सव का हिस्सा बनाया जा रहा है। होली का आनंद ठंडई और भांग के बिना अधूरा माना जाता है, और यहां जगह-जगह भांग छानने व पिलाने का दौर चल रहा है, जो मस्ती को दोगुना कर रहा है। रंग पंचमी तक होली का महापर्व इस जश्न के पीछे एक गहरा ऐतिहासिक कारण छिपा है। दरअसल, बुंदेलखंड में होलिका दहन के अगले दिन यानी परेवा को रंग नहीं खेला जाता। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन झांसी के राजा गंगाधर राव का निधन हुआ था। उनके शोक और सम्मान में पूरा बुंदेलखंड उस दिन रंगों से दूर रहता है। यही वजह है कि यहां दूज से लेकर रंग पंचमी तक होली का महापर्व मनाया जाता है। परंपरा और इतिहास का यह अद्भुत संगम महोबा की होली को देश के बाकी हिस्सों से अलग और खास बनाता है। परमानंद और झलकारी बाई जैसे इलाकों में उमड़ा जनसैलाब इस बात का प्रमाण है कि महोबा अपनी सांस्कृतिक विरासत को आधुनिकता के दौर में भी बखूबी संजो कर रखा है।

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Admin तेज रफ्तार न्यूज देश का बोलबाला