होली पर नालंदा के 5 गांव में नहीं जला चूल्हा:पूर्णिया में 45 फीट ऊंचा होलिका का पुतला जला; समस्तीपुर में ‘रेन गन’ से होली खेली
होली पर नालंदा के 5 गांव में चूल्हा नहीं जला। समस्तीपुर के धमौन में बरसाना और भिरहा में लोगों ने वृंदावन की तर्ज पर होली खेली है। यहां रेन गन से लोगों ने त्योहार मनाया है। तो पूर्णिया के धमदाहा में होलिका दहन के राख से लोगों ने धूरखेल खेला है। अब पहले जानिए पूर्णिया के सिकलीगढ़ धरहरा में होलिका दहन की परमंरा को… होलिका दहन के दिन यहां पहले होलिका का दहन होता है, फिर उसी राख से धुरखेल होली खेली जाती है। बिहार ही नहीं, देश-विदेश से भी लोग इस अनोखी परंपरा को देखने और उसमें शामिल होने पहुंचते हैं। 45 फीट ऊंची होलिका का पुतला जला मुख्य कारीगर गोपाल सहनी बताते हैं कि उन्होंने साल 2006 से यहां होलिका का पुतला बनाना शुरू किया। करीब 20 साल से वे इस परंपरा को निभा रहे हैं। पिछले साल की तरह इस बार भी करीब 45 फीट ऊंची होलिका तैयार की गई है। दावा किया जाता है कि देश में शायद ही कहीं इतनी विशाल होलिका का दहन होता हो। खास बात यह है कि जहां देशभर में दशहरा पर रावण का पुतला दहन होता है, वहीं यहां होलिका का विशाल पुतला जलाया जाता है। मान्यता है कि यहीं पर भक्त प्रहलाद को बचाने भगवान नरसिंह खंभा फाड़ कर प्रकट हुए थे। यहीं पर होलिका का दहन भी पहली बार हुआ था। प्रह्लाद नगर में ऐतिहासिक नरसिंह मंदिर स्थित राजधानी पटना से सिकलीगढ़ धरहरा की दूरी लगभग 360 किलोमीटर है। पूर्णिया शहर से बनमनखी प्रखंड स्थित प्रह्लाद मंदिर की दूरी 35 किलोमीटर है। महेशखूंट-मधेपुरा-पूर्णिया NH-107 से लगा नरसिंह द्वार सीधे प्रह्लाद नगर तक पहुंचाता है, जहां यह ऐतिहासिक नरसिंह मंदिर स्थित है। प्रह्लाद को यहीं रची थी मारने की साजिश मंदिर के पुजारी अनमोल झा बताते हैं कि सिकलीगढ़ धरहरा स्थित प्रसिद्ध नरसिंह मंदिर वही स्थान माना जाता है, जहां असुरराज हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे प्रह्लाद को मारने की साजिश रची थी। जिस खंभे से भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में प्रकट हुए थे, वो माणिक्य स्तंभ आज भी मंदिर परिसर में मौजूद है। स्तंभ का अधिकांश हिस्सा जमीन में धंसा हुआ है और इसकी लंबाई करीब 1411 इंच है। भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में खंभे से प्रकट हुए, वो आज भी मौजूद खंभे को कई बार तोड़ने और उखाड़ने की कोशिश हुई। यहां तक कि मुगलों ने हाथियों की मदद से इसे गिराने का प्रयास किया, लेकिन स्तंभ टूटा नहीं, केवल थोड़ा झुक गया। स्तंभ श्रद्धालुओं के लिए आस्था और रहस्य का केंद्र है।।मंदिर परिसर में ब्रह्मा, विष्णु और शंकर सहित करीब 40 देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। असुर हिरण्यकश्यप के किले के अवशेष भी मौजूद स्थानीय सुशील कुमार आर्य कहते हैं कि यहां असुर हिरण्यकश्यप के किले के अवशेष भी मौजूद हैं, जो अब जर्जर हालत में हैं। परिसर में एक बड़ा घड़ा और एक रहस्यमयी कुआं भी है, जिसे कभी यहां बहने वाली ‘हिरण’ नाम की नदी से जोड़ा जाता है। खुदाई के दौरान यहां से प्राचीन सिक्के और कौड़ियां मिलने की बात सामने आई थी। इसके बाद प्रशासन ने आसपास खुदाई पर रोक लगा दी। यहां एक गुफा भी है, जहां हिरण्यकश्यप ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। फिलहाल इस गुफा का अध्ययन पुरातत्व विभाग कर रहा है और आम लोगों के प्रवेश पर रोक है। जब होलिका अग्नि में जलकर भस्म हुई तो उसकी राख को विजय के प्रतीक के रूप में लोगों ने उड़ाया और मिट्टी व कीचड़ के साथ खेला। तभी से यहां होलिका दहन की संध्या पर राख, मिट्टी और कीचड़ से होली खेलने की परंपरा चली आ रही है। होलिका दहन के दिन यहां लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। पहले होलिका दहन होता है, फिर उसी राख से धुरखेल होली खेली जाती है।।य ही कारण है कि बिहार ही नहीं, देश-विदेश से भी लोग इस अनोखी परंपरा को देखने और उसमें शामिल होने पहुंचते हैं। अब समस्तीपुर के वृंदावन की तर्ज पर ‘रेन गन’ से होली खेलने की परंपरा को जानिए… समस्तीपुर के धमौन में बरसाना और भिरहा में वृंदावन की तर्ज पर होली खेली गई। दोनों जगहों की अनोखी होली का कई साल पुराना इतिहास है। जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर धमौन गांव में 500 सालों से छाता वाली होली खेली गई है, जो बरसाना की तर्ज पर होता है। वहीं, 40 किलोमीटर दूर रोसरा प्रखंड के भिरहा में इस बार पिचकारी के बदले ‘रेन गन’ से होली खेली गई। धमौन और भिरहा की होली में क्या खास है? दोनों जगहों की अनोखी होली का क्या इतिहास है? कई साल पुरानी परंपरा के बारे में गांव के लोगों का क्या कहना है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट। सबसे पहले धमौन में बरसाना की तर्ज पर होली के बारे में जानिए धमौन गांव में करीब 500 साल से होली के उत्सव को अनोखे और अद्वितीय तरीके से मनाया जाता है, जिसे 'छाता होली' के नाम से जाना जाता है। यहां वृंदावन के बरसाने की होली की तर्ज पर होली का उत्सव मनाया गया। धमौन के 5 पंचायतों के लोग ‘कुलगुरु निरंजन स्वामी’ मंदिर के कैंपस में जुटे थे। यहां 30 से अधिक टोली अपने-अपने छाते के नीचे आकर होली खेल रहे थे और फगुआ गा रहे थे। हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम भी होली के उत्सव में शामिल हुए धमौन की छाता होली में सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि आसपास के मुस्लिम समाज के लोग भी जुटे और साथ में होली खेलकर भाईचारा का संदेश दिया। गांव में हर व्यक्ति अपनी टोली के साथ छतरी तैयार किया था करता है, और ये छतरियां इतनी बड़ी होती हैं कि इनमें दो दर्जन से अधिक लोग एक साथ होली गीत गा सकते हैं। गांव के बुजुर्ग रामाकांत राय ने बताया कि धमौन की छाता होली की परंपरा करीब 500 सालों से भी पुरानी है। यह परंपरा 15वीं शताब्दी से चली आ रही है, हालांकि छतरियों को नया रूप 1930 से दिया गया था। उस समय नबुदी राय के घर से पहली सजी हुई छतरी निकाली गई थी, जिसने इस परंपरा को और भी लोकप्रिय बनाया। आखिर बरसाना से धमौन गांव कैसे पहुंची परंपरा पेशे से टीचर दिनकर प्रसाद राय ने बताया कि धमौन के लोग मूल रूप से उत्तर प्रदेश के संबलगढ के हैं, जो काफी पहले धमौन आकर कर बस गए। चुकि संबलगढ के पास ही बरसाना है। वहां भगवान श्री कृष्ण भी छाता बनाकर उसके नीचे रंग-गुलाल से होली खेलते और गीत गाते थे। धमौन आने के बाद लोगों ने इस परंपरा की शुरुआत यहां भी शुरू कर दी, जो करीब 500 साल से ऐसे ही चला आ रहा है। उन्होंने कहा कि होली के दिन, धमौन के लोग सुबह-सुबह स्वामी निरंजन मंदिर में जुटते हैं, जहां वे अपनी छतरियों के साथ अबीर-गुलाल चढ़ाते हैं और 'धम्मर' तथा 'फाग' गीत गाते हैं। इसके बाद, छतरियों को कलाबाजी के साथ घुमाया जाता है और घंटियों की आवाज से पूरा गांव गूंज उठता है। बिहार सरकार से ‘छाता होली’ को राजकीय महोत्सव घोषित करने की मांग धमौन के लोग अब इस प्राचीन परंपरा को राजकीय महोत्सव घोषित करने की मांग कर रहे हैं। गांव के इंजीनियर रजनीश यादव ने इस परंपरा को एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा है और सरकार से अपील की है कि इसे राजकीय महोत्सव का दर्जा दिया जाए। उन्होंने बताया कि धमौन की छाता होली को देखने के लिए शरद यादव, लालू प्रसाद और चौधरी चरण सिंह जैसी प्रमुख हस्तियां भी यहां आ चुकी हैं। यदि इसे राजकीय महोत्सव का दर्जा मिल जाता है, तो यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर बन सकती है और इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को भी बढ़ावा मिलेगा। भिरहा में वृंदावन की तर्ज पर खेली जा रही होली के बारे में जानिए भिरहा गांव में होली को लेकर दिवाली जैसी सजावट की गई है। गांव के तीनों टोलों में समारोह को लेकर लोगों में उत्साह है। इस बार यहां पिचकारी के बदले रेन गन से रंगों की बरसात हो रही है। ऐतिहासिक ‘होली पोखर’ पर छह पिलर बनाकर समरसेबल की मदद से रेन गन लगाया गया है, जहां पानी टैंक के माध्यम से इसके जरिए रंगों की बरसात की गई है। गांव के पूर्व सरपंच अनिल राय बताते हैं कि पूरा गांव ‘होली पोखर’ पर आकर रंग खेलता है। गांव में कही एक बूंद भी रंग नहीं दिखेगा। इसी पोखर पर लोग जुटते हैं। इस बार तो हम लोग रेन गन से होली खेल रहे हैं, लेकिन इससे पहले यहां लोग पिचकारी से ही एक-दूसरे पर रंग डालते थे। फिर गांव के सभी लोगों की सहमति हुई, और 1936 से आज तक वृंदावन की तर्ज पर ही लोग होली खेलते हैं। गांव के बुजुर्ग राजाराम राय ने बताया कि पहले इस तरह से इतनी सजावट नहीं होती थी, सांस्कृतिक कार्यक्रम, बैंड की प्रस्तुति नहीं होती थी। लेकिन समय के साथ इस पर्व में आधुनिक चीजें बढ़ती चलीं गईं। अब नालंदा के 5 गांव की कहानी पढ़िए जहां होली नहीं मनाई जाती है…. ‘हमारे गांव में होली के दिन रंग, गुलाल नहीं लगाने की परंपरा 50 से अधिक सालों से अधिक पुरानी है, अगर ये परंपरा चलती आ रही है, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। गांव में होली नहीं खेली जाती, फगुआ की जगह हरे राम-हरे कृष्ण की गूंज रहती है। अखंड कीर्तन का जाप चलता है। एक संत ने 1970-72 में होली के दिन अखंड करने का पुण्य बताया था। रंग छोड़िए, होली के दिन पानी भी एक-दूसरे पर नहीं फेंका जाता है, ऐसा करने वाले पर उसकी कमाई के मुताबिक, जुर्माना लगाया जाता है।’ नालंदा जिले के बिहारशरीफ प्रखंड के पांच गांवों के लोगों ने यह बातें दैनिक भास्कर से साझा कीं। दरअसल, प्रखंड के पतुआना, बासवान बिगहा, ढीबरापर, नकटपुरा और डेढ़धारा गांवों में होली के दिन हरिकीर्तन की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। सबसे पहले होेली वाले दिन रंग गुलाल नहीं खेलने वाले परंपरा के बारे में जान लीजिए नकटपुरा गांव के रामदास, डेढ़धारा के राजाराम और ढीबरापर के रमेश बताते हैं कि बिहार के अन्य गांवों की तरह हमारे गांवों में भी धूमधाम से होली मनाई जाती थी। होली में जमकर हुड़दंग मचता था। घरों में पकवान के साथ मटन भी पकता था। मटन होता था तो लोग होली को सेलिब्रेट करने के लिए शाम होते-होते शराब भी पी लेते थे। बस फिर लड़ाई-झगड़ा का दौर शुरू हो जाता था। गांव के इन लोगों ने बताया कि 1970-72 के आसपास गांव में एक संत बाबा हुआ करते थे। लड़ाई-झगड़ा और मांस-मदिरा वाली परंपरा से तंग संत बाबा ने एक अलग तरह की परंपरा बनाई। उन्होंने कहा कि अब से होली के मौके पर न तो किसी घर में चूल्हा जलेगा और न ही कोई शराब पीएगा। संत बाबा को मानने वाले लोगों ने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया और तब से लेकर अब तक 5 दशक से ज्यादा वक्त हो गया, ये परंपरा चली आ रही है। होली वाले दिन चूल्हा भी नहीं जलता, एक दिन पहले का बासी खाना खाते हैं लोग गांव के लोगों की मानें तो भक्ति वाला माहौल रहने की वजह से हम लोग उपवास ही रहते हैं। परंपरा के मुताबिक ही होली वाले दिन गांव में किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलता है। पांचों गांव में करीब 1500 परिवार हैं। युवा, महिलाएं और बुजुर्ग अधिकतर उपवास में रहते हैं। होलिका जलने के पहले ही हम लोग खाना बनाकर रख लेते हैं। गांव के लोगों ने कहा कि परंपरा के तहत बासी खाना खाने का चलन भी है। घर में चूल्हा तो नहीं जलता है, बच्चे और युवा जो उपवास नहीं रख पाते हैं, वे होली वाले दिन बासी खाना ही खाते हैं। ग्रामीण अखंड शुरू होने के पहले ही खाना और पकवान तैयार कर लेते हैं। कीर्तन के दौरान घरों से धुआं निकलना भी वर्जित रहता है। अधिकांश लोग इस दौरान नमक का त्याग कर देते हैं और सात्विक आहार ग्रहण करते हैं। मांस और मदिरा से तो लोग कोसों दूर रहते हैं। होली के अगले दिन पांच गांवों में एक दूसरे को लगाते हैं रंग गुलाल इन पांचों गांव में एक दिन बाद होली मनाई जाती है। यानी इस बार इन पांचों गांव में 4 के बजाए 5 मार्च को होली मनाई जाएगी। होली मनाने से पहले लोग संत बाबा के समाधि स्थल पर जाते हैं और पूजा पाठ करते हैं। इन गांवों में होलिका दहन के दिन अखंड कीर्तन का आयोजन होता है। गांव के युवा बोले- भक्ति वाला माहौल होता है, शांति होती है बसावन बिगहा गांव के 23 साल के गौतम कुमार ने बताया कि जब पूरा देश फागुन की मस्ती में सराबोर होकर रंग, गुलाल और फगुआ के गीतों में डूबा होता है, तब हमारे गांव में हुड़दंग के बजाए हरिकीर्तन होता है। माहौल बिल्कुल भक्तिमय होता है। होली वाले दिन न तो रंगों की बौछार होती है और न ही पकवानों की खुशबू आती है। गौतम ने बताया कि होली के एक दिन पहले घर में जो खाना बना होता है, उस बासी खाना को ही हम लोग होली वाले दिन खाते हैं और दिनभर भक्ति में लीन होते हैं। ये परंपरा 50 से अधिक साल से चली आ रही है। परंपरा की वजह से गांव में होली वाले दिन किसी तरह का कोई विवाद नहीं होता है, इस परंपरा को हम लोग आगे भी जारी रखेंगे, ये जिम्मेदारी हम युवाओं की है। बुजुर्ग बोले- होली पर शराब-मांस खाने से झगड़े होते थे पतुआना गांव के 55 साल के बुजुर्ग राम खेलावन यादव बताते हैं कि होली के दिन का खानपान अन्य दिनों से अलग होता है। उनके अनुसार, कई जगहों पर होली पर तामसी भोजन बनता है। बिहार में आज भले ही शराबबंदी है, लेकिन करीब 10 साल पहले तक होली के दिन लोग मुर्गा-मटन खाकर शराब भी पीते थे, जिससे अक्सर लड़ाई-झगड़े होते थे। राम खेलावन यादव कहते हैं कि शराबबंदी के बाद भले ही शराब बंद हो गई हो, लेकिन कई घरों में मांस-मछली बनना आम बात है। हालांकि, इन पांच गांवों के लोग इससे दूर रहते हैं। इसकी वजह संत बाबा द्वारा बनाई गई परंपरा है। उन्होंने बताया कि करीब 55 साल पहले संत बाबा ने जो नियम और परंपरा बनाई थी, उसे आज भी गांववासी खुशी-खुशी निभा रहे हैं। होलिका दहन के साथ ही गांव में 24 घंटे का अखंड कीर्तन शुरू हो जाता है, जिसमें बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी शामिल होते हैं। उनका मानना है कि होली के दिन रंग खेलने से मन के विकार बढ़ सकते हैं, जबकि कीर्तन करने से मन को शांति मिलती है। महिला बोली- चूल्हा नहीं जलता है, सबसे ज्यादा हम लोग खुश हैं नकटपुरा गांव की महिला निर्मला देवी ने बताया कि संत बाबा ने जो परंपरा बनाई है, उससे सबसे ज्यादा हम लोग खुश हैं। होली के दिन तरह-तरह के पकवान बनाना पुरानी परंपरा थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। मैं जब से इस गांव में अपने ससुराल आई हूं, मुझे ये परंपरा काफी अच्छी लगी। अखंड कीर्तन से हम भक्ति में लीन रहते हैं, न किसी तरह के पकवान बनाने की चिंता होती है और न ही रंग लगाने और छुड़ाने की मशक्कत करनी पड़ती है। अब उस संत बाबा के बारे में जानिए, जिन्होंने ये परंपरा बनाई गांव के लोगों के मुताबिक, संत बाबा मूल रूप से नालंदा शहर के इमादपुर के रहने वाले थे। उन्होंने कम उम्र में ही सांसारिक मोह त्याग दिया और पतुआना और राजाकुआं के मैदानों (खंधे) में तपस्या करने लगे। उन्होंने देखा कि होली के दिन अक्सर नशे और हुड़दंग के कारण विवाद होते हैं, जिससे आपसी भाईचारा बिगड़ता है। बाबा ने ये बातें देखकर गांव वालों को अपने पास बुलाया और ग्रामीणों को होली वाले दिन को भगवान के नाम समर्पित करने की सीख दी। 2 अक्टूबर 2000 को शरीर त्यागने वाले संत बाबा की समाधि आज एक भव्य मंदिर का रूप ले चुकी है। होली के दिन दूर-दराज से लोग यहां माथा टेकने आते हैं।
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