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Tejraftarnews.in: *प्रकाशनार्थ*
*जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग या 'हिंदू राज' की ओर लंबी छलांग!*
*(आलेख : राजेंद्र शर्मा)*
मोदीशाही के इरादों को समझने के लिए, क्रोनोलॉजी समझना कितना जरूरी है, यह अमित शाह खुद अपने मुंह से बता चुके हैं। सो जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग का मकसद समझने के लिए उसके आगे-पीछे की क्रोनोलॉजी से शुरू करना उपयोगी रहेगा। सभी जानते हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपने हिसाब से बड़ी कामयाबी और खासतौर पर प. बंगाल में फतेह का झंडा गाड़ने के फौरन बाद, मई के आखिर में मोदी सरकार ने जनसांख्यिकी परिवर्तन पर उच्च स्तरीय कमेटी के गठन का ऐलान कर दिया।
इसकी दिशा में बढ़ने की औपचारिक शुरूआत, 2025 के प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस भाषण से हुई थी। लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कथित 'घुसपैठ' से देश के लिए भारी खतरा बताते हुए, ऐसे आयोग के गठन के जरूरी होने का ऐलान किया था। इसकी भी एकदम तात्कालिक क्रोनोलॉजी तो यही थी कि 2025 के अप्रैल के आखिर में पहलगाम में आतंकी हमले ने जब जम्मू-कश्मीर में करीब पांच साल से जारी सीधे केंद्रीय शासन में सब कुछ सामान्य हो जाने के झूठे प्रचार की चिंदियां उड़ा दीं, उसके फौरन बाद ध्यान बंटाने के लिए संघ परिवार की ओर से देश के कई हिस्सों में आम तौर पर मुसलमानों और खासतौर पर कश्मीरियों को निशाना बनाया गया था।
और पहलगाम के 'जवाब' के नाम पर मई के शुरू में छेड़े गए 'आपरेशन सिंदूर' के अचानक रोके जाने के बाद, जब ध्यान बंटाने की जरूरत और ज्यादा बढ़ी, देश के विभिन्न हिस्सों में और सबसे बढ़कर उत्तरी भारत में, कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों की पकड़-धकड़ के नाम पर, बांग्लाभाषी मजदूरों के खिलाफ सरकारी अभियान छेड़ दिया गया। इस अभियान में संभवत: पहली बार, पुलिस-प्रशासन द्वारा 'घुसपैठिया' बताए जा रहे लोगों को, बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सीमा के विभिन्न हिस्सों से बांग्लादेश में धकेलने की कार्रवाई भी की गयी, जिसमें कुछ मामलों में तो नौकाओं से ले जाकर समुद्र में धकेल आने की कार्रवाई भी शामिल थी। यह सब किस कदर मनमाना था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कम से कम दो मामलों में, उच्च न्यायालयों द्वारा भारतीय नागरिक ठहराए जाने और देश में वापस लाने का आदेश दिए जाने के बाद, एक गर्भवती महिला और एक अन्य बंगाली मुसलमान को बांग्लादेश से वापस भी लाना पड़ा था। यानी यह वह समय है, जब मोदीशाही औपचारिक रूप से देश के पैमाने पर कथित 'घुसपैठिया विरोधी' मुहिम छेड़ती है। बेशक, 'घुसपैठियों' का खतरा किसी न किसी रूप में हमेशा से आरएसएस के प्रचार का एक केंद्रीय मुद्दा बना रहा है। बहरहाल, अपने पहले कार्यकाल के आखिर तक आते-आते और खासतौर पर उत्तर प्रदेश समेत उत्तरी भारत के भाजपा-शासित राज्यों में गोरक्षा-लव जेहाद-धर्मांतरण विरोधी कानून-समान नागरिक संहिता आदि की मुस्लिम-विरोधी पुकारों की आजमाइश से, मोदीशाही इस नतीजे पर पहुंच चुकी थी कि आक्रामक मुस्लिम विरोधी पहचान ही उसकी नैया पार लगाएगी। दूसरे कार्यकाल की शुरूआत में ही, संवैधानिक छल-कपट का सहारा लेकर, पहले आरएसएस की बहुत पुरानी मांग को पूरा करते हुए, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ही नहीं, राज्य का दर्जा भी खत्म कर, देश के इकलौते मुस्लिम बहुल राज्य को सजा देने के जरिए, राज्य की नजरों में मुसलमानों का ही दर्जा कमतर करने का संदेश दिया गया। और इसके फौरन बाद सीएए लाकर, मुस्लिम और गैर-मुस्लिम अवैध प्रवासियों में अंतर करने के जरिए, मुसलमानों के पराया होने के ऐलान को भारतीय नागरिक की परिभाषा में भी रोप दिया गया। अब परिभाषा से ही 'घुसपैठिया'— जिससे कि खतरा था — मुसलमान ही हो सकता था। हिंदू तथा अन्य धर्म के अवैध प्रवासियों के लिए तो भारतीय नागरिकता आसान बनाकर, उनका स्वागत किया जाना था!
यहीं से आरएसएस के घुसपैठ के पुराने राग को वर्तमान शासन की विचारधारा के रूप में नयी ऊंचाई पर पहुंचाने की शुरूआत होती है। सीएए के व्यापक जनतांत्रिक विरोध को मोदीशाही अपने दमनतंत्र के सहारे तो पूरी तरह से नहीं कुचल सकी, पर उसका जवाब उसने मुस्लिम विरोधी आक्रामकता बढ़ाने के जरिए दिया। खासतौर पर, बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव के समय, गृहमंत्री अमित शाह ने न सिर्फ चर्चित तरीके से अपने राज की क्रोनोलॉजी समझायी कि कैसे पहले सीएए से मुसलमानों को नागरिकता अधिकार से परे कर के 'घुसपैठिया' बनाया जाएगा और फिर, हिंदुओं आदि अन्य को नागरिकता दी जाएगी, बल्कि उन्होंने कहा कि घुसपैठिये 'दीमक हैं, उन्हें चुन-चुनकर, एक-एक को निकाल बाहर करेंगे।'
बंगाल से ही इस घुसपैठिया राग को संघ-भाजपा के प्रचार की मुख्य थीम बनाने की शुरूआत हुई, जिसे 2024 के आम चुनाव तक आते-आते मोदीशाही ने देश के पैमाने पर प्रचार की अपनी एक मुख्य थीम बना लिया। बेशक, इस आम चुनाव में मोदी खुद खासतौर पर मतदान के शुरूआती चरणों में बिहार, बंगाल, झारखंड में घुसपैठियों के खतरे के राग से शुरूआत करने के बाद, बाजी हाथ से निकलती नजर आने की हताशा में जल्द ही, विरोधी 'मंगलसूत्र छीन लेंगे और ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों (मुसलमानों) को दे देंगे' पर पहुंच गए, जबकि आदित्यनाथ जैसे उनकी पार्टी के अन्य प्रमुख प्रचारक 'बंटोगे तो कटोगे' के अपने नारों के साथ, सीधे मुस्लिम विरोधी नारों से शुरूआत ही कर रहे थे।
इसके बाद भी जब सत्ता संघ-भाजपा के हाथ से जाती-जाती बची, एक ओर चुनाव आयोग पर पूरी तरह से कब्जा करने के जरिए, चुनावों को ही मैनिपुलेट करने के मुकम्मल इंतजामात किए गए, जिनमें मतदाता सूचियों को ही सत्ताधारी पार्टी के फायदे के हिसाब से काटना-छांटना-उनमें नाम जोड़ना खास है, तो दूसरी ओर वक्फ संशोधन कानून लाने तथा समान नागरिक संहिता की चर्चा देश के स्तर पर लाने के जरिए, मौजूदा सत्ता के मुस्लिम विरोधी चेहरे को और चमकाया गया। इस दौरान, सिर्फ गोरक्षा के नाम पर ही नहीं, किसी भी बहाने से, और बहुत बार तो बिना बहाने के, मुसलमानों की लिंचिंग से लेकर, शासन के व्यवहार में भेदभाव तक, सब को सामान्य बनाया ही जा चुका था। इसी सब की पृष्ठभूमि में 2025 के 15 अगस्त के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने राष्ट्र की सुरक्षा, संस्कृति, धर्म, सब के लिए 'जनसांख्यिकी परिवर्तन के खतरे' का बखान किया था और उससे निपटने के लिए उच्चस्तरीय आयोग की जरूरत का ऐलान किया था।
इससे कुछ पहले ही, उनके शासन की चिंताओं और धारणाओं से संचालित चुनाव आयोग मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) की घोषणा कर चुका था, जिसका असली मकसद मतदाता सूचियों के कथित रूप से भर गयी, 'घुसपैठियों' की विशाल संख्या की छंटनी करना बताया जा रहा था। हैरानी की बात नहीं है कि एसआईआर को शुरू से ही खासतौर पर मुसलमान मतदाताओं की नागरिकता की जांच में बदल दिया गया। लेकिन, बिहार में जहां से एसआईआर की प्रक्रिया की शुरूआत हुई, इस प्रक्रिया ने दस फीसद के करीब मतदाताओं की छंटनी तो कर दी, पर घुसपैठियों की पहचान तथा छंटनी करने में पूरी तरह से विफल ही रही। वहां मुसलमान तो मिले और कुछ इलाकों में काफी मिले, पर उन्हें घुसपैठिया साबित नहीं किया जा सका।
इसीलिए, एसआईआर के अगले चरण में और खासतौर पर प. बंगाल में चुनाव आयोग ने, एसआईआर में ही सुधार कर लिया और'तार्किक विसंगति' की अनोखी श्रेणी का आविष्कार कर, खास तौर पर सुनिश्चित किया कि मुसलमान जैसे लगने वाले नामों को छांटकर संदिग्ध घुसपैठियों के खाने में डाला जाए। इसी का नतीजा, न सिर्फ 27 लाख लोगों के, जिनमें मुसलमानों का फीसद बहुत ज्यादा है, न्यायाधीन होते हुए भी मताधिकार से वंचित किए जाने के रूप में सामने आया बल्कि 72 चुनाव अधिकारियों के ही सिर्फ इसलिए मताधिकार से वंचित कर दिए जाने के रूप में भी सामने आया कि वे सभी मुसलमान थे।
इस तरह, गृहमंत्री अमित शाह बार-बार, तथाकथित घुसपैठियों के लिए अपने राज की जिस 'डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट' नीति का ऐलान करते रहे हैं, उसके डिटेक्ट और डिलीट के पहले दो चरण मोदीशाही के अंगूठे के नीचे दबे चुनाव आयोग ने एक प्रकार से संभाल लिए हैं। पर इसमें एक समस्या है। चुनाव आयोग भी ईमानदारी से डिटेक्ट करे, तो उसे किसी उल्लेखनीय संख्या में वास्तविक घुसपैठिए नहीं मिलेंगे। क्यों? क्योंकि बड़े पैमाने पर विदेशी घुसपैठ और उसमें भी मुसलमानों की घुसपैठ, एक मिथक है, जो आरएसएस के सांप्रदायिक प्रचार से निकला है। उल्टे बांग्लादेश की स्थापना के समय की उथल-पुथल के बाद से, वहां से अवैध रूप से आकर भारत में बसने वालों में हिंदुओं की ही संख्या ज्यादा है। दूसरी ओर, आमतौर पर बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए ऐसे देश में जाकर बसने का क्या आकर्षण हो सकता है, जिसकी प्रति व्यक्ति आय तथा मानव विकास का दर्जा, उनके अपने देश से कुछ न कुछ नीचे ही है और जहां मुसलमानों के लिए असुरक्षा बढ़ती जा रही है। इस सच्चाई के सामने यही आसान और वर्तमान सत्ताधारियों के लिए उपयोगी है कि घुसपैठिया और मुसलमान को समानार्थी बना दिया जाए।
और जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग, जिसका हाल में गठन किया गया है, इस तरह पहचाने गए संदिग्ध घुसपैठियों को 'डिपोर्ट' करने का रास्ता तैयार करने के लिए है। चूंकि यही इस आयोग का मुख्य उद्देश्य है, इसीलिए हैरानी की बात नहीं है कि इस आयोग का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के बहुत समय पहले सेवानिवृत्त न्यायाधीश को बनाया गया है, जिसको खुद उसके सार्वजनिक बयान के अनुसार, जनसांख्यिकी के बारे में कुछ अता-पता ही नहीं है। अन्य सदस्यों में भी सेवानिवृत्त आईएएस, आईपीएस अफसरों से लेकर, जनगणना आयुक्त तथा एक अर्थशास्त्री तक को रखा गया है, पर जनसांख्यिकी के एक भी जानकार को शामिल नहीं किया गया। जनसांख्यिकी का जानकार, न सिर्फ इस गुब्बारे को ही पंचर सकता था, बल्कि जनसांख्यिकी से जुड़ी वास्तविक चिंताओं को सामने ला सकता था, जैसे देश की प्रजनन दर का आबादी की पूरी भरपाई की दर से नीचे जाना, आबादी में बुुजुर्गों का बढ़ता हिस्सा आदि, जो गंभीर नीतिगत विचार तथा बदलावों की मांग करती हैं।
इस आयोग के मकसद में अगर किसी को संदेह हो भी, तो इस तथ्य से दूर हो जाना चाहिए कि आयोग की विचार शर्तों में 'अवैध आप्रवास' से निपटने की जरूरत को प्रमुखता दी गयी है। और अमित शाह ने इस कदम के सिलसिले में बाकायदा बयान दिया है कि, 'अवैध घुसपैठ तथा अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव के दूसरे कारण, किसी राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य के लिए, एक बहुत बड़ी चुनौती हैं।' अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव के 'दूसरे कारण' का इशारा लगता है कि मुसलमानों की कुल प्रजनन दर की ओर है, जिसके खतरा माने जाने के निहितार्थ और भी अनिष्टकर लगते हैं। क्या इस आयोग का उपयोग, डिपोर्ट होने से बच गए मुसलमानों के अधिकारों को और कमतर करने का रास्ता बनाने लिए किया जाएगा? पर इसकी चर्चा फिर कभी और।
*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
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*प. बंगाल : आधी रात को बुलडोज़र और बेदख़ली के खिलाफ जन प्रतिरोध*
*(आलेख : संपृक्ता बोस, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)*
जून 2026 के पहले हफ़्ते में, दक्षिण कोलकाता में जादवपुर विश्वविद्यालय के पास स्थित जादवपुर रेलवे स्टेशन सिर्फ़ एक व्यस्त ट्रांसपोर्ट हब नहीं रह गया। जैसा कि पश्चिम बंगाल में हाल के दिनों में देखा गया है, यह जगह भी राज्य की जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ लोगों की आजीविका और शहर पर अधिकार को लेकर हुए तनावपूर्ण टकराव का केंद्र बन गया है। जिसे राज्य ने एक आम "अतिक्रमण-विरोधी" अभियान बताते हुए औचित्यपूर्ण ठहराया है, उसके खिलाफ तेज़ी से अलग-अलग तबकों के लोगों ने मिलकर एक बड़ा विरोध आंदोलन खड़ा कर दिया। इस अभियान ने असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों, सड़क किनारे सामान बेचने वालों, सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले वामपंथी कार्यकर्ताओं, विश्वविद्यालय के छात्रों और बंगाल के सांस्कृतिक जगत के लोगों को एक साथ ला दिया। जादवपुर की लड़ाई ने भाजपा राज में उभरते हुए 'बुलडोज़र राज' के तहत शहरी विकास की क्रूर सच्चाइयों को उजागर कर दिया है। वामपंथी नेताओं — जिनमें पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती, एसएफआई के महासचिव सृजन भट्टाचार्य और मशहूर रंगमंच कलाकार जॉयराज भट्टाचार्य शामिल थे — ने अनगिनत कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स और केंद्रीय बलों की लाठियों का डटकर सामना किया। दक्षिण कोलकाता की खून से सनी ज़मीन से वामपंथियों ने साफ़-साफ चेतावनी दी है कि बंगाल में बुलडोज़र की राजनीति का कोई राज नहीं चलेगा।
*मानवीय लागत*
इस संघर्ष के केंद्र में सैकड़ों फेरी वाले और छोटे व्यापारी हैं, जिनका जीवन स्टेशन परिसर के आसपास घूमता है। चाय बेचने वाले, फल बेचने वाले, खाने की दुकान के मालिक, दर्जी और मोची ने पीढ़ियों के निरंतर श्रम से अपनी मामूली आजीविका बनाई है। टिन की चादरों, बांस के खंभों और तिरपाल से बने उनके स्टॉल, कामकाजी लोगों के घरों की नाजुक आर्थिक नींव का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये अनौपचारिक उद्यम स्कूल की फीस, जीवन रक्षक दवाओं, किराया और दैनिक भोजन के लिए भुगतान करते हैं, जिसका अर्थ है कि पूरा परिवार जीवित रहने के लिए उन पर निर्भर है।
मंगलवार, 2 जून को प्रशासन ने अपना पहला खुला कदम उठाया और घोषणा की कि वे इस इलाके में बुलडोज़र भेज रहे हैं, जबकि इसके लिए औपचारिक नोटिस उसी दोपहर दिया गया था। इसके बाद, सीपीआई(एम) और वामपंथी विचारधारा वाले कई संगठनों ने पूरे इलाके में घर-घर जाकर लोगों को एकजुट करना शुरू कर दिया। सृजन भट्टाचार्य और जाने-माने वकील समीम अहमद के नेतृत्व में ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ। किसी युद्ध क्षेत्र जैसी स्थिति बनाते हुए, प्रशासन ने सैकड़ों पुलिस और सीआरपीएफ जवानों की सुरक्षा में इलाके में बुलडोज़र भेजे। जादवपुर का यह मामला सिर्फ़ फेरी वालों का मामला नहीं है — यह लोगों के रहने की जगह से जुड़ा एक बुनियादी सवाल है। हाई कोर्ट के आदेश का सामना करने के बाद, रेलवे अधिकारियों और पुलिस प्रशासन ने नरमी बरती और वादा किया कि 8 जून को हाई कोर्ट खुलने के बाद वे इस फ़ैसले पर विचार करेंगे और उस तारीख़ से 21 दिन का समय देंगे। धरना-प्रदर्शन और विरोध देर शाम तक जारी रहा। आख़िरकार, तर्क और कानूनी मिसाल के आगे झुकते हुए, बुलडोज़रों को उस दिन के लिए पीछे हटना पड़ा। इस अस्थायी राहत से चिंताएँ कम नहीं हुईं ; बल्कि इससे यह संकेत मिला कि सरकार की ओर से और भी सख़्त कार्रवाई होने वाली है। जादवपुर में रात भर पूरी तरह से चौकसी का माहौल बन गया।
इस बेदखली अभियान की गुस्ताखी को समझने के लिए, पश्चिम बंगाल के बदलते राजनीतिक माहौल को देखना ज़रूरी है। हाल ही में बनी भाजपा सरकार ने शहरी योजना के मामले में आम जनता से कटकर एक तरह का बेपरवाह रवैया अपनाया है। वे खुले आम सवाल उठाते हैं कि सड़क किनारे सामान बेचने वालों को अपनी चीज़ें बेचने की इजाज़त क्यों दी जानी चाहिए ; वे उन्हें बिना सोचे-समझे गैर-कानूनी कब्ज़ा करने वाला मानकर शहरी इलाकों से हटाने की बात करते हैं। इसी अहंकारी सोच का फ़ायदा उठाते हुए, रेलवे प्रशासन ने विकास का एक ऐसा मॉडल अपनाया है, जो कॉर्पोरेट घरानों पर केंद्रित है। बिना कहे भी यह साफ़ है कि रेलवे की ज़मीन से कॉर्पोरेट कंपनियों को फ़ायदा होगा, न कि मेहनत-मज़दूरी करने वाले गरीब लोगों को। जवाबदेही की कमी और राजनीतिक बढ़त की उम्मीद के कारण, केंद्र सरकार ने तय किया है कि बुलडोज़र चलाकर स्टेशन के पास बनी झुग्गियों को हटाने और गरीबों की रोज़ी-रोटी छीनकर अपनी 'डबल-इंजन' वाली ताक़त दिखाने का यही सही समय है।
*आधी रात को हमला*
पहले किए गए सभी वादों को दरकिनार करते हुए, कल दोपहर (7 जून) से ही पूरी रेलवे साइडिंग वाली जगह को ऊँची रेलिंग लगाकर घेर लिया गया। खबर फैल गई कि बुलडोज़र वापस आ रहे हैं। रात करीब 9 बजे, भारी तैनाती के साथ पुलिस, सीआरपीएफ और आरएएफ के जवानों ने कई मुख्य सड़कों पर गश्त शुरू कर दी। रात 9 बजे के बाद से, सीपीआई(एम) और वामपंथी विचारधारा वाले दूसरे संगठनों के नेताओं ने माइक पर बार-बार अपील की कि वे किसी रेलवे अधिकारी से मिलना चाहते हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि लोगों को ज़बरदस्ती हटाने की यह अनैतिक कार्रवाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पुलिस ने साफ़ तौर पर पीछे हटने से इंकार कर दिया और कहा कि वे कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें डीसी साउथ से सख़्त आदेश मिले हैं कि यह कार्रवाई उसी रात पूरी करनी है।
आधी रात के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए। तब तक पूरा इलाका मानो जंग का मैदान बन चुका था, जहाँ पुलिस और सरकारी तंत्र की भारी-भरकम सुरक्षा-व्यवस्था तैनात थी। रेलवे साइडिंग के ठीक सामने, सीपीआई(एम) और वामपंथी व लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं ने एक मानव-श्रृंखला बनाई और बुलडोज़रों को अंदर आने से रोकने के लिए डटकर खड़े हो गए। उनके साथ स्थानीय निवासियों और प्रभावित फेरीवालों का एक समूह भी शामिल हुआ — ये सभी पूरी तरह निहत्थे थे और उनकी बस एक ही मांग थी कि बातचीत की जाए।
रात करीब 12:45 बजे, पुलिस ने बुलडोज़र के इंजन चालू करने का आदेश दिया, जिससे तनाव चरम पर पहुँच गया। पुलिस ने पास आ रही भीड़ को बैरिकेड लगाकर रोक दिया। तुरंत ही, बेरहमी से लाठीचार्ज शुरू हो गया। पुलिस ने बिना किसी भेदभाव के लाठियाँ बरसाईं, जिसमें न तो पुरुषों को बख्शा गया और न ही महिलाओं को। लगभग चालीस मिनट तक बेकाबू और हिंसक लाठीचार्ज चलता रहा। पुलिस ने मुख्य प्रदर्शनकारियों को काबू में कर लिया। तब तक, बुलडोज़र ज़बरदस्ती अंदर घुस चुके थे। एक के बाद एक, दुकानें और घर भयानक आवाज़ के साथ ढहने लगे। इस बीच, सड़कों पर पुलिस का आतंक जारी रहा ; वे बेगुनाह और निहत्थे नागरिकों पर लाठियाँ और बंदूकें तानकर डराते-धमकाते रहे।
*सांस्कृतिक और लैंगिक संघर्ष*
आधी रात को हुई हिंसा ने आंदोलन को कुचलने के बजाय, पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर जवाबी लामबंदी को भड़का दिया। 8 जून को आधी रात को 2:30 बजे से, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, कोलकाता के नेतृत्व में सैकड़ों छात्रों ने हिरासत में लिए गए लोगों की तुरंत रिहाई और अवैध तोड़-फोड़ को रोकने की मांग करते हुए लगातार घेराबंदी जारी रखी। इस प्रतिरोध को बंगाल के सांस्कृतिक समुदाय से तुरंत और मज़बूत समर्थन मिला। ऐसे इलाके में जहाँ कला लंबे समय से असहमति की भाषा रही है, वहाँ उनके गीतों और मौजूदगी ने विरोध प्रदर्शन के कैंप को नैतिक प्रतिरोध के गढ़ में बदल दिया।
इसी दौरान, कामकाजी वर्ग की महिलाएं भी आगे आईं और उन्होंने दक्षिण कोलकाता में बड़े पैमाने पर विरोध रैलियां आयोजित कीं। उन्होंने 'बुलडोज़र राज' की लिंग-आधारित क्रूरता को उजागर करते हुए तर्क दिया कि किसी स्टॉल को तोड़ने से न केवल एक व्यवसाय खत्म होता है, बल्कि परिवार की नाजुक आंतरिक अर्थव्यवस्था भी चरमरा जाती है, जिससे बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा पर सीधा खतरा पैदा होता है। कानूनी मोर्चे पर, वकील समीम अहमद ने इस कार्रवाई के कानूनी आधार को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी। उन्होंने कहा कि रेलवे कोई भी ऐसा औपचारिक नियम पेश करने में विफल रहा है, जिससे ऐसी बेदखली को वह सही ठहरा सके। उन्होंने तर्क दिया कि अनधिकृत कब्जे के मामलों में भी, उचित प्रक्रिया, सही नोटिस और कानूनी प्रतिनिधित्व का अवसर मिलना अनिवार्य है।
वरिष्ठ नेताओं ने वैचारिक आलोचना को और तीखा किया। सीपीआई(एम) की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती ने तर्क दिया कि प्रशासनिक सुविधा या कॉर्पोरेट मुनाफ़े के लिए अनौपचारिक कामगारों को शहरी जीवन से बस यूं ही मिटाया नहीं जा सकता।
*लगातार वापसी*
सोमवार, 8 जून को कोर्ट ने सृजन भट्टाचार्य और हिरासत में लिए गए चार अन्य कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत मुचलके पर ज़मानत दे दी। हिरासत से बाहर आते ही, वामपंथियों ने बिना समय गंवाए विकास के सरकारी मॉडल की ज़ोरदार आलोचना की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या तरक्की सिर्फ़ अमीर और ताकतवर लोगों के लिए है, जबकि छोटे-मोटे कारोबार से गुज़ारा करने वालों को नागरिकों के तौर पर उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। इसके बाद, जाधवपुर की सड़कों पर प्रभावित इलाकों से गुज़रता हुआ एक ज़बरदस्त और जोश भरा मार्च निकला, जिसमें 'बेदखली से पहले पुनर्वास' के मुख्य नारे के साथ लोगों की भीड़ दोगुनी हो गई।
रेल हॉकर्स और रेलवे बस्तियों के अस्तित्व के पीछे गहरा सामाजिक-ऐतिहासिक और आर्थिक संदर्भ है -- वामपंथ का यह रुख़ स्पष्ट और ऐतिहासिक रूप से ठोस रहा है। कोई भी व्यक्ति शौक या मर्जी से प्लेटफॉर्म के किनारे अनिश्चित और बेहद मुश्किल ज़िंदगी नहीं चुनता। कई मामलों में, खासकर जाधवपुर इलाके में, इन कामों के पीछे दशकों से चले आ रहे शहरी जीवन-संघर्ष, शरणार्थियों के पुनर्वास और संरचनात्मक पिछड़ेपन जैसे ठोस और कानूनी रूप से मान्य आधार हैं।
अधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और शहरी इलाकों को आधुनिक बनाने के लिए अतिक्रमण-विरोधी ये कदम ज़रूरी हैं। लेकिन जाधवपुर में मलबे के ढेर एक बुनियादी सवाल खड़ा करते हैं, जो संवैधानिक लोकतंत्र की जड़ तक जाता है : शहर पर कब्ज़ा करने का अधिकार किसका है और किसकी कानूनी दावेदारी को मान्यता दी जानी चाहिए? जाधवपुर, श्यामनगर और पूरे राज्य में वामपंथियों के नेतृत्व में हुए ज़बरदस्त और डटकर किए गए विरोध ने एक स्पष्ट लकीर खींच दी है। इससे नई सरकार को यह संदेश गया है कि राज्य के दमन की 'डबल-इंजन' ताक़त के बावजूद, बंगाल में बुलडोज़र का मनमाना राज नहीं चलेगा, उसे हर तरफ से चुनौती मिलेगी, जरूर मिलेगी।
*(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क :
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)*श्री श्याम कीर्तन मंडल, देवघर मे एकादशी पर बाबा श्याम का हुआ भव्य, अलौकिक श्रृंगार, भजनों की अनुपम प्रस्तुति से पूरा वातावरण हुआ भक्तिमय

देवघर । स्थानीय कॉस्टर टाउन स्थित श्री श्याम कीर्तन मंडल अवस्थित श्री श्याम मंदिर में एकादशी के पावन शुभ अवसर पर बाबा श्याम का भव्य अलौकिक श्रृंगार किया गया। और, साथ ही, बावा श्याम का विशेष पूजा-अर्चना धूमधाम से की गई। इस अवसर पर स्थानीय गायकों द्वारा एक से बढ़कर एक भजनों की अनुपम भक्तिमय प्रस्तुति की गई। जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। भक्तगण भक्ति की रस में डूबे रहे। मौके पर ,भारी संख्या मे श्याम -भक्त महिला पुरुष मौजूद थे। कार्यक्रम के अंत में, आरती की गई, और प्रसाद वितरण किया गया। कहा जाता है, कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी की तिथि बाबा श्याम के भक्तों के लिए बहुत शुभ और फलदायी मानी जाती है और इस दिन पूजा करने से भक्तों के सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। मानव जीवन सफल माना जाता है। इस दिन इस व्रत को करने वाले समस्त सांसारिक सुखों का आनंद लेते है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत, दान, जप , पूजन, आदि करने से लोगो को पापों से मुक्ति मिलती है ,तथा सुख-शान्ति, समृद्धि की प्राप्ति होती है।वाराणसी- एक रेल यात्री के पास से 16 लाख रुपये नकद बरामद हुए, रकम बैग और बोरे में रखी मिली, ज्यादातर नोट 10 से 200 रुपये तक के नए बताए जा रहे हैं
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार यात्री कॉस्मेटिक कारोबारी है और नकदी को व्यापारिक लेन-देन से जुड़ा बताया जा रहा है, हालांकि इतनी बड़ी मात्रा में कैश ले जाने को लेकर पुलिस जांच कर रही है
अधिकारियों का कहना है कि यदि रकम वैध है तो संबंधित दस्तावेज और लेन-देन का स्पष्ट विवरण प्रस्तुत करना होगा, फिलहाल मामले की जांच जारी है
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