क्या पाकिस्तान को धूल चटा सकता है सोवियत संघ और US से टक्कर लेने वाला तालिबान, जानें इसकी ताकत?
पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा, जिसे डूरंड लाइन कहा जाता है, पर हाल के महीनों में तनाव बढ़ा है. पाकिस्तानी वायुसेना की ओर से अफगान क्षेत्र में किए गए हवाई हमलों के बाद दोनों पक्षों के बीच कई बार झड़पें हुईं. तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने इन हमलों को शर्मनाक बताया और जवाब देने की बात कही. इसके बाद सवाल उठ रहा है कि क्या तालिबान पाकिस्तान का सामना कर सकता है.
क्या पारंपरिक युद्ध संभव है?
सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान के लिए पाकिस्तान के साथ पारंपरिक युद्ध करना मुश्किल है. पाकिस्तान के पास नियमित सेना, आधुनिक हथियार, वायुसेना और संगठित सप्लाई सिस्टम है. बीबीसी की मानें तो विश्लेषक इफ्तिखार फिरदौस के मुताबिक, अफगानिस्तान की मौजूदा आर्थिक हालत और सैन्य ढांचे को देखते हुए तालिबान की संभावित कार्रवाई सीमित और प्रतीकात्मक हो सकती है. पूर्ण युद्ध की संभावना कम ही है.
बीबीसी के अनुसार, डॉक्टर खुर्रम इकबाल भी मानते हैं कि तालिबान पारंपरिक मोर्चे पर पाकिस्तान का मुकाबला नहीं कर सकता है. उनका कहना है कि तालिबान अपारंपरिक या गुरिल्ला तरीके अपना सकता है.
तालिबान की संभावित कार्रवाई कैसी हो सकती है?
विशेषज्ञों के अनुसार, सीमा पर सीमित झड़पें, तोपखाने का सीमित इस्तेमाल और कड़ी बयानबाजी देखने को मिल सकती है. पाकिस्तान के अंदर चरमपंथी हमलों का खतरा बढ़ सकता है, खासकर अगर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) सक्रिय होता है. हालांकि यह सीधे तालिबान सरकार की आधिकारिक सैन्य कार्रवाई नहीं मानी जाएगी, बल्कि अप्रत्यक्ष दबाव की रणनीति हो सकती है.
तालिबान की सैन्य ताकत क्या है?
2021 में अमेरिकी और नाटो सेनाओं की वापसी के बाद अफगानिस्तान में बड़ी मात्रा में सैन्य उपकरण पीछे छूट गए. अमेरिकी रक्षा विभाग की रिपोर्टों के अनुसार, पूर्व अफगान सरकार को लाखों हल्के और भारी हथियार दिए गए थे. इनमें से बड़ी संख्या तालिबान के नियंत्रण में आ गई. तालिबान के पास हल्के हथियारों में क्लाश्निकोव राइफल, एम-16, एम-4 और लाइट मशीन गन शामिल हैं. इसके अलावा पीकेएम और एम-240 जैसी हेवी मशीन गन, आरपीजी-7 और एंटी-टैंक मिसाइलें भी मौजूद हैं.
भारी हथियारों में 122 मिमी डी-30 हॉवित्जर तोप, 155 मिमी मोर्टार और कुछ रूसी मूल के सिस्टम शामिल बताए जाते हैं. 2024 में बगराम एयर बेस पर हुई परेड में स्कड आर-17 और एल्ब्रोस आर-300 जैसी मिसाइलों का प्रदर्शन किया गया, जिनकी रेंज करीब 300 किलोमीटर बताई जाती है. हालांकि इन हथियारों की तकनीकी स्थिति और उनकी पूरी क्षमता को लेकर स्वतंत्र पुष्टि सीमित है.
वायुसेना और संरचना में अंतर
पाकिस्तान की सबसे बड़ी बढ़त उसकी वायुसेना और संगठित सैन्य ढांचा है. पाकिस्तान एयर फोर्स के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, ड्रोन और मिसाइल सिस्टम हैं. तालिबान के पास प्रभावी वायुसेना नहीं है. पूर्व अफगान वायुसेना के कई विमान या तो नष्ट हो चुके हैं या उड़ान की स्थिति में नहीं हैं. इस वजह से खुले युद्ध में तालिबान को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है.
तालिबान का गुरिल्ला अनुभव
तालिबान ने लगभग दो दशक तक अमेरिकी और नाटो सेनाओं के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ा है. इस कारण उसके पास घात लगाकर हमला करने, सीमित संसाधनों में लड़ाई लड़ने और पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशन चलाने का अनुभव है. सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यही उसकी मुख्य ताकत है. तालिबान अभी पूरी तरह नियमित सेना में नहीं बदला है और उसकी रणनीति अब भी छोटे समूहों और तेज हमलों पर आधारित है.
आर्थिक स्थिति का असर
अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों से संकट में है. अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और सीमित विदेशी मदद के कारण वहां सरकारी संसाधन कम हैं. बड़े पैमाने पर युद्ध के लिए वित्तीय और लॉजिस्टिक क्षमता जरूरी होती है, जो फिलहाल तालिबान के पास सीमित मानी जाती है. इस कारण विशेषज्ञ पूर्ण युद्ध की संभावना कम और सीमित सैन्य या प्रतीकात्मक कार्रवाई की संभावना ज्यादा बताते हैं.
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